पटना उच्च न्यायालय का फैसला: आपदा प्रबंधन पद पर चयन से इनकार को गलत बताते हुए पुनर्विचार का निर्देश (2023)

निर्णय की सरल व्याख्या

पटना उच्च न्यायालय ने 4 जनवरी 2023 को एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए एक अभ्यर्थी के पक्ष में राहत प्रदान की, जिसे आपदा प्रबंधन विभाग में चयन से वंचित कर दिया गया था। यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथ्री और माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया।

मामला दरअसल जिला प्रशासन, दरभंगा द्वारा वर्ष 2017 में जारी एक विज्ञापन से जुड़ा है। इस विज्ञापन के माध्यम से Disaster Management Professional (Senior Research Officer) के पद पर संविदा के आधार पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। विज्ञापन में न्यूनतम योग्यता के रूप में किसी मान्यता प्राप्त विषय में स्नातकोत्तर डिग्री तथा संबंधित क्षेत्र में कम-से-कम पाँच वर्ष का अनुभव निर्धारित किया गया था।

अपीलकर्ता ने समय रहते इस पद के लिए आवेदन किया और आवश्यक दस्तावेज भी संलग्न किए। इसके बाद 13 मार्च 2018 को साक्षात्कार आयोजित हुआ, जिसमें केवल तीन अभ्यर्थी उपस्थित हुए। चयन समिति ने यह कहते हुए सभी अभ्यर्थियों को अयोग्य घोषित कर दिया कि किसी के पास पाँच वर्ष का आवश्यक अनुभव नहीं है और पद को पुनः विज्ञापित करने का निर्णय लिया गया।

इस निर्णय से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर की, लेकिन एकल पीठ ने चयन समिति के निर्णय में हस्तक्षेप से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। इसके बाद अपीलकर्ता ने Letters Patent Appeal दायर की, जिस पर यह अंतिम निर्णय आया।

अपीलकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि उसके पास आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में आठ वर्ष से अधिक का अनुभव है। उसने Master Trainer-cum-Volunteer और Coordinator के रूप में किए गए कार्य के प्रमाण पत्र प्रस्तुत किए थे, लेकिन चयन समिति ने केवल तीन वर्ष के अनुभव को ही मान्य माना और शेष अनुभव को बिना ठोस कारण के नजरअंदाज कर दिया।

राज्य सरकार की ओर से यह कहा गया कि अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत एक अनुभव प्रमाण पत्र स्वयं यह दर्शाता है कि वह Volunteer के रूप में कार्य कर रहा था और किसी स्वीकृत पद पर कार्यरत नहीं था। इसलिए केवल Coordinator के रूप में प्राप्त तीन वर्ष का अनुभव ही मान्य किया गया।

न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह पाया कि विज्ञापन में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि अनुभव किस प्रकार का होना चाहिए — जैसे कि पूर्णकालिक, संविदा, या केवल नियमित पद पर कार्य का अनुभव। ऐसी स्थिति में चयन समिति द्वारा बाद में अनुभव की संकीर्ण व्याख्या करना न्यायसंगत नहीं है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब विज्ञापन में अनुभव प्राप्त करने की विधि स्पष्ट नहीं है, तो अभ्यर्थी को उसके प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर उचित अवसर मिलना चाहिए।

निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव

यह निर्णय सरकारी भर्तियों से जुड़े मामलों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे यह सिद्ध होता है कि—

  • चयन प्राधिकारी विज्ञापन की शर्तों से आगे जाकर नई या सख्त व्याख्या नहीं कर सकते।
  • यदि अनुभव की प्रकृति स्पष्ट नहीं की गई है, तो अभ्यर्थी के प्रस्तुत अनुभव को मनमाने ढंग से अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
  • भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता आवश्यक है।

यह फैसला उन सभी अभ्यर्थियों के लिए राहत का संदेश है, जिन्हें केवल तकनीकी या प्रक्रियागत आधार पर चयन से वंचित कर दिया जाता है।

कानूनी मुद्दे और न्यायालय का निर्णय (बिंदुओं में)

  • क्या विज्ञापन में स्पष्ट किए बिना अनुभव की संकीर्ण व्याख्या की जा सकती है?
    • ❌ नहीं। ऐसा करना अनुचित है।
  • क्या स्वैच्छिक या संविदा अनुभव को पूरी तरह नकारा जा सकता है?
    • ❌ नहीं, जब तक विज्ञापन में इसका निषेध न हो।
  • क्या चयन प्राधिकारी अनुभव प्रमाण पत्र की जांच कर सकते हैं?
    • ✔️ हाँ, लेकिन सीधे तौर पर अभ्यर्थी को अयोग्य घोषित नहीं कर सकते।
  • न्यायालय का अंतिम निर्देश
    • चयन प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे अपीलकर्ता के अनुभव प्रमाण पत्रों का पुनर्मूल्यांकन (reconsideration) करें और दो माह के भीतर निर्णय लें।

मामले का शीर्षक

Santosh Kumar Sah v. State of Bihar & Others

केस नंबर

Letters Patent Appeal No. 1013 of 2019
(Arising out of Civil Writ Jurisdiction Case No. 14664 of 2019)

उद्धरण (Citation)

2023 (1) PLJR 657

न्यायमूर्ति गण का नाम

माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथ्री
माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा

वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए

  • अपीलकर्ता की ओर से:
    • श्री मोहम्मद सोबान अशगर, अधिवक्ता
  • राज्य की ओर से:
    • श्री अंजनी कुमार, अपर महाधिवक्ता (AAG-4)
    • श्री आसिफ कलीम, सहायक अधिवक्ता

निर्णय का लिंक

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