मामले की पृष्ठभूमि
बिहार राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने सरकारी अस्पतालों के संचालन हेतु आवश्यक सेवाओं को आउटसोर्स करने की नीति अपनाई है। इनमें स्वच्छता, सफाई, प्रकाश व्यवस्था और लांड्री (कपड़ा धुलाई) शामिल हैं।
याचिकाकर्ता एक पंजीकृत कल्याणकारी संस्था है। इसके द्वारा दायर याचिका के अनुसार उसने एक निविदा में सफलतापूर्वक भाग लिया और उसे कैमूर (भभुआ) जिले के कई स्वास्थ्य संस्थानों की स्वच्छता से संबंधित कार्य का अनुबंध प्राप्त हुआ। इन संस्थानों में सदर अस्पताल, भभुआ; मोहनियां, रामगढ़ और अघौरा के रेफरल अस्पताल; और भभुआ, चेनारी, चांद, कुदरा, दुर्गावती, रामपुर, भगवानपुर और नुवांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र शामिल थे।
याचिकाकर्ता के पक्ष में कार्यादेश 02.09.2020 को जारी किया गया। इसके बाद, याचिकाकर्ता संस्था और सिविल सर्जन-सह-सदस्य सचिव, जिला स्वास्थ्य समिति, कैमूर के बीच एक समझौता हुआ। समझौते में स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि इसकी अवधि एक वर्ष की होगी।
साथ ही, समझौते में यह भी प्रावधान था कि यदि ठेकेदार का कार्य संतोषजनक पाया जाए, तो जिला पदाधिकारी-सह-अध्यक्ष, जिला स्वास्थ्य समिति, सचिव, जिला स्वास्थ्य समिति की अनुशंसा पर, अधिकतम तीन वर्ष की अवधि तक अनुबंध का विस्तार कर सकते हैं।
याचिकाकर्ता का कहना था कि अनुबंध अवधि के दौरान उसका कार्य संतोषजनक पाया गया और इस संबंध में विभिन्न प्राधिकारियों द्वारा प्रमाणपत्र भी जारी किए गए। इसके बावजूद जिला स्वास्थ्य समिति ने 01.10.2021 की तिथि से नई निविदा सूचना प्रकाशित की, जिसे 06.10.2021 को उसके वेब पोर्टल पर अपलोड किया गया, और यह सूचना उसी स्वच्छता कार्य के लिए थी।
अपने को प्रतिकूल रूप से प्रभावित मानते हुए, याचिकाकर्ता ने सिविल रिट क्षेत्राधिकार वाद संख्या 18205/2021 में पटना उच्च न्यायालय की शरण ली। उसने नई निविदा सूचना को रद्द करने तथा समझौते में निहित आगे की अवधि के लिए उसके अनुबंध का विस्तार करने का निर्देश देने की मांग की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की और 23.11.2021 को मौखिक निर्णय सुनाया।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलील यह थी कि राज्य सरकार ने स्वयं यह निर्णय लिया है कि यदि सार्वजनिक-निजी भागीदारी के अंतर्गत कोई आउटसोर्स एजेंसी एक वर्ष तक संतोषजनक ढंग से कार्य करती है, तो उसके अनुबंध को तीन वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है। कहा गया कि यह निर्णय स्वास्थ्य विभाग के 27.05.2010 के पत्र में निहित है, जो सभी सिविल सर्जनों को संबोधित था।
एक अनुपूरक हलफनामे के माध्यम से याचिकाकर्ता ने इस पत्र को अभिलेख पर लाया। इस पत्र में कहा गया था कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत अस्पताल सेवाओं में सुधार लाने के लिए एजेंसियों को बेहतर तकनीक और प्रबंधन जैसे वाइपर, स्वचालित सफाई मशीनें, साइलेंट जनरेटर और वाशिंग मशीन आदि में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
पत्र में यह भी दर्ज था कि ऐसी प्रौद्योगिकियों को लागू करना पूंजी-प्रधान (कैपिटल इंटेंसिव) है। अतः राज्य ने यह निर्णय लिया कि यदि किसी ऐसी एजेंसी का कार्य एक वर्ष तक संतोषजनक पाया जाए, तो उस एजेंसी की “अगली अवधि” तीन वर्ष के लिए बढ़ाई जा सकती है, ताकि एजेंसी को उपकरणों की लागत की वसूली और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने में कठिनाई न हो।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि यही विभागीय निर्णय उसके समझौते में अनुबंध अवधि के विस्तार की अनुमति देने वाले प्रावधान का आधार है। उसने यह दिखाने के लिए चिकित्सकों तथा प्रबंधकों द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्रों पर भी भरोसा किया कि उसके प्रदर्शन का मूल्यांकन संतोषजनक रूप में किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीमान वरिष्ठ वकील ने 04.10.2012 के स्वास्थ्य विभाग के एक अन्य पत्र का भी उल्लेख किया, जो सिविल सर्जन, मोतिहारी को संबोधित था और जिसमें 27.05.2010 के पूर्ववर्ती निर्णय की पुनः पुष्टि की गई थी। उनका तर्क था कि ये पत्र सरकारी पदाधिकारियों पर बाध्यकारी दिशानिर्देशों के स्वरूप में हैं।
इसका समर्थन करने के लिए उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Narendra Kumar Maheshwari v. Union of India & Ors., 1990 (Supp) SCC 440 पर भरोसा किया। उस निर्णय के पैराग्राफ 107 के आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि सरकार के गैर-वैधानिक एवं प्रशासनिक दिशानिर्देश भी उसके अधिकारियों पर बाध्यकारी होते हैं। इसलिए, जिला स्वास्थ्य समिति पर यह दायित्व था कि वह नई निविदा निकालने के बजाय याचिकाकर्ता के अनुबंध को तीन वर्ष के लिए बढ़ाए।
याचिकाओं और तर्कों के आलोक में, पटना उच्च न्यायालय ने निर्णय के लिए तीन प्रश्न तय किए:
(i) क्या स्वास्थ्य विभाग का 04.10.2012 का पत्र (जिसमें 27.05.2010 के निर्णय की पुनः पुष्टि की गई) ऐसे अनिवार्य दिशानिर्देश का रूप धारण करता है, जिसके कारण जब भी किसी आउटसोर्स एजेंसी का कार्य संतोषजनक पाया जाए, प्राधिकारी को अनुबंध अवधि बढ़ानी ही पड़े?
(ii) क्या 03.12.2020 के समझौते में किया गया प्रावधान, याचिकाकर्ता को उसके कार्य की अवधि बढ़ाने हेतु कोई ऐसा विधिसम्मत, प्रवर्तनीय अधिकार प्रदान करता है, जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत लागू कराया जा सके?
(iii) क्या अन्यथा भी, 27.05.2010 के पत्र के आधार पर याचिकाकर्ता ने अपने स्वच्छता कार्य के विस्तार के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत किए हैं?
न्यायालय ने पहले 27.05.2010 के पत्र की सामग्री का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया। उसने उल्लेख किया कि राज्य सरकार के इस निर्णय का केंद्रीय उद्देश्य यह था कि प्राधिकारियों को यह सक्षम बनाया जाए कि वे आउटसोर्स अनुबंधों की अवधि बढ़ा सकें, ताकि एजेंसियों द्वारा खरीदे गए उपकरणों और किए गए निवेश का सर्वोत्तम उपयोग किया जा सके।
यह निर्णय इस बात को ध्यान में रखकर लिया गया था कि अस्पतालों में बेहतर तकनीक और प्रबंधन अपनाने के लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। पहले वर्ष के बाद तीन वर्ष की अवधि तक विस्तार की अनुमति देकर, सरकार ऐसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी कार्यक्रमों को अधिक टिकाऊ बनाना चाहती थी।
परंतु जब न्यायालय ने याचिकाकर्ता की रिट याचिका का परीक्षण किया, तो उसे यह नहीं मिला कि याचिकाकर्ता ने यह बताया हो कि उसने कौन से विशिष्ट निवेश किए या संबंधित अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उसने किस प्रकार के उपकरण स्थापित किए। इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर कोई दलील/प्लीडिंग नहीं थी।
न्यायालय की दृष्टि में, पूंजी निवेश या उपकरणों के संबंध में ऐसी दलीलों के अभाव में, 27.05.2010 के पत्र के आधार पर याचिकाकर्ता कोई राहत नहीं मांग सकता था। उस नीति की पूरी तर्कसंगति उन एजेंसियों का समर्थन करने की थी जिन्होंने पर्याप्त निवेश किया हो, जिसकी वसूली और उपयोग के लिए समय की आवश्यकता हो।
इसके बाद न्यायालय ने 27.05.2010 के पत्र के स्वरूप पर विचार किया। उसने माना कि यह संचार बाध्यकारी दिशानिर्देश के रूप में कार्य नहीं करता। इसके बजाय, यह केवल सक्षम प्राधिकारी को यह शक्ति प्रदान करता है कि वे सार्वजनिक-निजी भागीदारी के तहत अनुबंध की अवधि, जब उन्हें उचित लगे, बढ़ा सकें।
महत्वपूर्ण रूप से, इस पत्र ने प्राधिकारियों पर यह कोई कानूनी दायित्व नहीं डाला कि वे तब भी अनुबंध अवधि बढ़ाएं जब किसी एजेंसी का कार्य संतोषजनक हो। यह एक विवेकाधीन, सक्षमकारी (एनैबलिंग) निर्णय था, न कि अनिवार्य निर्देश।
साथ ही, पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि जहां किसी एजेंसी ने वास्तव में पर्याप्त निवेश किया हो और बेहतर प्रबंधन एवं कार्य के कुशल निष्पादन के लिए उपकरण एवं तकनीक स्थापित की हो, वहां सक्षम प्राधिकारी को, यदि कार्य असंतोषजनक न हो, तो अनुबंध के विस्तार पर विचार करना चाहिए। इससे सरकार के निर्णय में मान्यता प्राप्त जनहित की पूर्ति होगी। फिर भी न्यायालय ने यह जोर देकर कहा कि कार्यपालिका को सदैव यह स्वतंत्रता है कि वह जनहित को सर्वाधिक साधने वाला निर्णय ले।
इस निष्कर्ष के आलोक में—कि 27.05.2010 का पत्र बाध्यकारी दिशानिर्देश नहीं है—याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय Narendra Kumar Maheshwari, इस मामले में अनुपयुक्त (इरेलेवेंट) पाया गया।
पीठ ने आगे यह भी माना कि मान लें, तर्क के लिए ही सही, कि 27.05.2010 का संचार किसी दिशानिर्देश के रूप में है, तो भी यह रिट क्षेत्राधिकार में प्रवर्तनीय नहीं होगा। इसके लिए न्यायालय ने Narendra Kumar Maheshwari के पैराग्राफ 106 पर भरोसा किया, जिसे उसने पूर्ण रूप से उद्धृत किया।
उस पैराग्राफ में यह स्पष्ट किया गया था कि गैर-वैधानिक दिशानिर्देश सामान्यत: न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं होते। वे कुछ स्थितियों में वैध अपेक्षा (लेजिटिमेट एक्सपेक्टेशन) या प्रॉमिसरी एसटॉपल जैसी अवधारणाओं को जन्म दे सकते हैं, पर अपने आप में वे कानून की शक्ति नहीं रखते। जहां विवेकाधिकार के उचित प्रयोग की मांग हो, वहां प्राधिकारी ऐसे दिशानिर्देशों से अलग हट सकते हैं।
याचिकाकर्ता के आचरण की ओर मुड़ते हुए, न्यायालय ने रिट याचिका के परिशिष्ट-6 का परीक्षण किया। यह दस्तावेज दिखाता था कि 09.08.2021 को याचिकाकर्ता ने सिविल सर्जन-सह-सदस्य सचिव, जिला स्वास्थ्य समिति, कैमूर को, मार्च, अप्रैल और जून 2021 के कुछ प्रमाणपत्रों के आधार पर, अनुबंध के विस्तार हेतु निवेदन किया था।
परंतु, इस अभ्यावेदन में भी, याचिकाकर्ता ने कहीं यह उल्लेख नहीं किया कि उसने इस स्वच्छता कार्य के निष्पादन हेतु कौन से निवेश किए, कौन से उपकरण या अन्य बुनियादी ढांचे की स्थापना की। यह भी नहीं कहा कि अनुबंध के न बढ़ने से उसे किस प्रकार की हानि या प्रतिकूलता होगी।
इस प्रकार के दावों और सहायक दलीलों के अभाव में, न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता 27.05.2010 के सरकारी पत्र या अनुबंध की धारा के तहत अपने कार्य के विस्तार के लिए कोई ठोस मामला प्रस्तुत करने में विफल रहा है।
फलस्वरूप, उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अनुबंध के नवीनीकरण को बाध्य करने के लिए याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई विधिक अधिकार मौजूद नहीं है, जिसे रिट याचिका के माध्यम से लागू कराया जा सके। प्राधिकारी अनुबंध की एक वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने के बाद नई निविदा जारी करने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र में थे।
इन निष्कर्षों के आधार पर रिट याचिका गुण-दोष सहित खारिज कर दी गई। इसी मामले में दायर एक अंतरिम आवेदन (इंटरलोक्यूटरी एप्लिकेशन) को भी निपटा दिया गया। अतिरिक्त रूप से, न्यायालय ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह रजिस्ट्री द्वारा इंगित की गई कमियों को छह सप्ताह के भीतर दूर करे, जो कि एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता थी और जिसका मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय सरकारी विभागों के साथ कार्य करने वाले ठेकेदारों और गैर-सरकारी संगठनों, विशेषकर बिहार के स्वास्थ्य क्षेत्र में, के लिए व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि अनुबंध में अवधि बढ़ाने की अनुमति देने वाला प्रावधान मात्र अपने आप में नवीनीकरण का सुनिश्चित (गारंटीड) अधिकार नहीं देता। जब तक कोई स्पष्ट कानूनी या वैधानिक अधिकार प्रदर्शित न किया जाए, अनुबंध का विस्तार सक्षम प्राधिकारी के विवेकाधिकार का विषय बना रहता है।
दूसरा, पटना उच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि सरकारी विभागों के आंतरिक पत्र या नीतिगत निर्णय, जैसे सार्वजनिक-निजी भागीदारी से संबंधित स्वास्थ्य विभाग का 27.05.2010 का पत्र, सामान्यत: सक्षमकारी प्रकृति के होते हैं। वे प्राधिकारियों को कदम उठाने की अनुमति देते हैं, परंतु उन्हें यह बाध्य नहीं करते कि वे कार्य संतोषजनक होने पर भी अनुबंधों का विस्तार अवश्य करें।
तीसरा, जहां कोई नीति भारी निवेश या उपकरणों की सुरक्षा के विचार पर आधारित हो, वहां उस नीति पर भरोसा करने वाला ठेकेदार अपने ऐसे निवेशों को स्पष्ट रूप से दलीलों और साक्ष्यों सहित प्रस्तुत करे। केवल अच्छे प्रदर्शन के सामान्य दावे या प्रशंसा प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं हो सकते।
स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था या अन्य आउटसोर्स अस्पताल सेवाओं में लगे सेवा प्रदाताओं के लिए यह निर्णय इस बात का संकेत है कि नवीनीकरण को अधिकार के रूप में नहीं माँगा जा सकता। अनुबंधीय अवधि समाप्त होने के बाद नई निविदा जारी करना विधिसम्मत है, जब तक कि कानून द्वारा कोई विशिष्ट अधिकार निर्मित न किया गया हो, जो यहाँ प्रदर्शित नहीं हुआ।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या 27.05.2010 (जिसकी पुनः पुष्टि 04.10.2012 को हुई) दिनांकित स्वास्थ्य विभाग का पत्र, संतोषजनक कार्य होने पर आउटसोर्स अस्पताल अनुबंधों को बढ़ाने के लिए प्राधिकारियों पर कोई अनिवार्य दायित्व डालता है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि यह पत्र केवल प्राधिकारियों को अनुबंध बढ़ाने की अनुमति देता है; यह उन्हें संतोषजनक प्रदर्शन होने पर भी अनुबंध बढ़ाने के लिए बाध्य नहीं करता। -
प्रश्न: क्या 03.12.2020 के समझौते में निहित विस्तार संबंधी धारा, संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत नवीनीकरण का ऐसा विधिसम्मत प्रवर्तनीय अधिकार ठेकेदार को प्रदान करती है?
उत्तर: नहीं। यह धारा केवल जिला पदाधिकारी-सह-अध्यक्ष, जिला स्वास्थ्य समिति को, सचिव की अनुशंसा पर, अपने विवेक से अवधि बढ़ाने की अनुमति देती है। यह विस्तार का कोई प्रवर्तनीय अधिकार सृजित नहीं करती। -
प्रश्न: क्या 27.05.2010 के पत्र के आधार पर, याचिकाकर्ता ने अपने स्वच्छता कार्य के अनुबंध के विस्तार का पर्याप्त आधार प्रस्तुत किया है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता ने किसी विशेष निवेश या उपकरण स्थापना का उल्लेख नहीं किया, जबकि यही उस नीति के तर्क का केंद्रीय तत्व था। अतः वह विस्तार के लिए कोई ठोस मामला प्रस्तुत करने में विफल रहा।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- न्यायालय ने Narendra Kumar Maheshwari v. Union of India & Ors., 1990 (Supp) SCC 440 पर चर्चा की, विशेषकर पैराग्राफ 106 पर, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि गैर-वैधानिक दिशानिर्देश सामान्यत: रिट क्षेत्राधिकार में प्रवर्तनीय नहीं होते।
- उस चर्चा के भीतर, सर्वोच्च न्यायालय के उक्त निर्णय में स्वयं कई अन्य मामलों का उल्लेख था, पर पटना उच्च न्यायालय ने उन पर स्वतंत्र रूप से भरोसा नहीं किया, बल्कि केवल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए सार को उद्धृत करने तक ही सीमित रखा।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट क्षेत्राधिकार वाद संख्या 18205/2021
मामले का नाम: Indradeo Singh Seva Sansthan through its Secretary Rajgaurav बनाम The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2022(1) PLJR 387
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति चक्रधारी शरण सिंह तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति मधुरेश प्रसाद
निर्णय की तिथि: 23.11.2021
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता की ओर से: श्री वाई. सी. वर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री राम कुमार सिंह, अधिवक्ता
राज्य/प्रतिवादी की ओर से: श्री मुझतबाउल हक, जीपी-12; श्री मनीष कुमार, एसी टू जीपी-12
मामले का स्वरूप: भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका, जिसमें निविदा आमंत्रण सूचना को चुनौती दी गई और आउटसोर्स स्वच्छता अनुबंध के विस्तार की मांग की गई।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूरा निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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