मामले की पृष्ठभूमि
मामला 26.02.2013 को मादक द्रव्य नियंत्रण ब्यूरो (एनसीबी), पटना ज़ोनल यूनिट के अधिकारियों द्वारा मिथापुर बस स्टैंड, पटना के पास की गई छापेमारी से शुरू हुआ।
एनसीबी के अनुसार, उन्हें यह विशिष्ट सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति उस दिन शाम 06:00 बजे से 08:00 बजे के बीच रक्सौल (भारत–नेपाल सीमा क्षेत्र) से मिथापुर बस स्टैंड तक व्यावसायिक मात्रा में चरस/हशीश लेकर जाएगा।
इस सूचना के आधार पर, एनसीबी अधिकारियों की एक टीम आधिकारिक वाहन से, कथित रूप से एक मुखबिर के साथ, मिथापुर बस स्टैंड पर गई। बस स्टैंड के पास मौजूद दो व्यक्तियों, नागेन्द्र कुमार और हरिशंकर से स्वतंत्र जब्ती गवाह के रूप में कार्य करने का अनुरोध किया गया।
लगभग 06:30 बजे, टीम ने दावा किया कि उन्होंने अपीलकर्ता को रोका, जो कथित रूप से काले रंग का बैग लिए हुए था। एनसीबी अधिकारियों ने कहा कि एनडीपीएस अधिनियम, 1985 (एनडीपीएस अधिनियम) की धारा 50 के तहत अपने अधिकारों से अवगत कराए जाने के बाद, उसने मजिस्ट्रेट या गजटेड अधिकारी के समक्ष तलाशी लिए जाने से मना कर दिया और स्वयं टीम द्वारा तलाशी लिए जाने के लिए सहमत हो गया।
एनसीबी ने आरोप लगाया कि बैग से गहरे भूरे रंग के अर्ध-ठोस रेज़िनयुक्त पदार्थ की 50 स्लैब बरामद हुईं, जिनका वज़न 25.450 किलोग्राम था, जिसे चरस/हशीश माना गया। कुल से 25–25 ग्राम के दो नमूने (S-1 और S-2) लिए जाने, सील किए जाने और बाद में एक नमूना रासायनिक परीक्षण हेतु सीआरसीएल, कोलकाता भेजे जाने का दावा किया गया।
अपीलकर्ता का बयान 26.02.2013 को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत एनसीबी द्वारा रिकॉर्ड किया गया, जिसमें उसने कथित रूप से मादक पदार्थ की तस्करी स्वीकार की और राज कुमार नाम के एक व्यक्ति को आपूर्तिकर्ता बताया।
उसे उसी रात 10:50 बजे गिरफ्तार किया गया और 27.02.2013 को जब्त सामग्री और नमूनों के साथ सत्र न्यायाधीश–सह–विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस अधिनियम, पटना के समक्ष पेश किया गया। उसी दिन जब्त मादक पदार्थ को एनसीबी मालख़ाना में रखने और नमूना S-1 को सीआरसीएल, कोलकाता भेजने की अनुमति मांगी और प्राप्त की गई।
बाद में 24.07.2013 को एक अन्य इंटेलिजेंस ऑफिसर (पी.डब्ल्यू.7) द्वारा शिकायत दाखिल की गई और विशेष वाद संख्या 09/2013 / एन.सी.बी. संख्या 53/2013 दर्ज हुआ। एनडीपीएस अधिनियम की धारा 20(ब)(ii)(C) के तहत संज्ञान लिया गया और मामला अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश–VII, पटना की अदालत को स्थानांतरित कर दिया गया।
17.09.2013 को अपीलकर्ता के विरुद्ध एनडीपीएस अधिनियम की धारा 20(ब)(ii)(C) (चरस/हशीश की व्यावसायिक मात्रा के कब्ज़े) का आरोप तय किया गया। उसने दोषी न होने की दलील दी, जिसके परिणामस्वरूप मुकदमा चला।
ट्रायल कोर्ट ने 02.07.2016 को उसे दोषी ठहराया और 15.07.2016 को उसे तेहरह वर्ष के कठोर कारावास तथा 1 लाख रुपये के जुर्माने, तथा जुर्माना न देने की स्थिति में दो वर्ष छह माह के अतिरिक्त कारावास की सजा दी। इसी दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध अपीलकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील (डीबी) संख्या 775/2016 दायर की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने द्वैधपीठ के माध्यम से अभियोजन साक्ष्य और बचाव पक्ष के संस्करण, दोनों के साथ–साथ एनडीपीएस अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता के कानूनी प्रावधानों की बारीकी से समीक्षा की।
अभियोजन ने सात एनसीबी अधिकारियों को साक्षी के रूप में पेश किया, जिनमें छापेमारी टीम के सभी सदस्य और बाद के जांच अधिकारी शामिल थे। बस स्टैंड पर बहुत से लोगों की उपस्थिति स्वीकार होने के बावजूद किसी स्वतंत्र नागरिक गवाह की जांच नहीं की गई।
अधिकारियों ने मोटे तौर पर एक समान कहानी दी: गुप्त सूचना प्राप्त होना, टीम का गठन, अपीलकर्ता को रोकना, धारा 50 का नोटिस देना, काले बैग की तलाशी, 25.450 किलोग्राम वज़न वाली 50 स्लैब की बरामदगी, फील्ड टेस्ट द्वारा उसे चरस/हशीश पाना, दो नमूने लेना, सील करना, तलाशी–cum–जब्ती सूची और टेस्ट मेमो तैयार करना और बाद में सीआरसीएल, कोलकाता से रासायनिक पुष्टि प्राप्त होना।
हालाँकि, जिरह के दौरान गंभीर कमज़ोरियाँ सामने आईं:
किसी भी अधिकारी ने यह नहीं बताया कि अपीलकर्ता किस बस से आया था या वह ठीक–ठीक कहाँ से आया था। उसके पास कोई बस टिकट नहीं था और न ही उसके आगमन स्थल या जिस बस से वह आया, उसके बारे में कोई पूछताछ की गई। एक गवाह ने स्वीकार किया कि उसके पास कोई प्रमाण नहीं है कि अपीलकर्ता रक्सौल से आया था।
अधिकारियों ने माना कि बस स्टैंड भीड़भाड़ वाला था, लेकिन किसी भी जन–व्यक्ति का बयान दर्ज नहीं किया गया और बताए गए दो स्वतंत्र गवाहों (नागेन्द्र कुमार और हरिशंकर) के अलावा (जिन्हें अदालत में पेश ही नहीं किया गया) किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति को तलाशी, सीलिंग या सैंपलिंग के किसी भी चरण का गवाह नहीं बनाया गया।
पहले जांच अधिकारी अभिजीत प्रकाश, जिन्होंने जांच के मुख्य हिस्से किए थे, की गवाही बिल्कुल भी नहीं ली गई। दूसरे जांच अधिकारी (पी.डब्ल्यू.7) ने स्वीकार किया कि उन्होंने न तो जब्ती देखी, न अपीलकर्ता को गिरफ्तार किया, न जब्त पदार्थ देखा, न किसी गवाह का बयान दर्ज किया और केवल फाइल पर पहले से उपलब्ध कागज़ात और विधिक राय के आधार पर शिकायत दाखिल की।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने चार गवाहों की गवाही कराई, जिनमें अपीलकर्ता की पत्नी (डी.डब्ल्यू.1) और तीन सह–ग्रामवासी शामिल थे। उन्होंने यह बयान दिया कि 26.02.2013 को अपीलकर्ता सुबह लगभग 7:00 बजे शौच के लिए घर से निकला, वापस नहीं आया और कुछ लोग उसे जीप में बैठाकर ले गए। डी.डब्ल्यू.1 ने कहा कि उन्होंने उसी सुबह हरसिद्धि थाना में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई और अपने आवेदन की स्टेशन डायरी प्रविष्टि सहित ज़ेरॉक्स प्रति (पहचान हेतु चिह्नित) प्रस्तुत की।
उच्च न्यायालय ने अंतिम निर्णय केवल इस बचाव संस्करण पर आधारित नहीं किया, लेकिन यह माना कि यह, अभियोजन की बड़ी चूकों के साथ पढ़ने पर, झूठी फँसाने के दावे को मज़बूती देता है।
कानूनी पक्ष पर न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किया:
1. स्वतंत्र गवाहों और पहले जांच अधिकारी का परीक्षण न किया जाना
न्यायालय ने नोट किया कि तलाशी और जब्ती कथित रूप से शाम 06:30 बजे से 08:45 बजे के बीच एक व्यस्त बस स्टैंड पर हुई, जहाँ अभियोजन साक्षियों ने ही बहुत से लोगों के उपस्थित होने की बात स्वीकार की। इसके बावजूद, नामित दो जब्ती गवाहों (नागेन्द्र कुमार और हरिशंकर) को भी ट्रायल में पेश नहीं किया गया और किसी स्वतंत्र व्यक्ति को जांच के किसी भी चरण में शामिल नहीं किया गया।
न्यायालय ने देखा कि पहले जांच अधिकारी अभिजीत प्रकाश का परीक्षण न होने से बचाव और अदालत, दोनों ही कथित छापेमारी और बाद की कार्यवाही की सच्चाई की जाँच करने से वंचित रह गए। दूसरे जांच अधिकारी को सीमित जानकारी थी और उन्होंने स्वयं कुछ भी ठोस नहीं किया। इससे पीठ ने यह निष्कर्ष निकाला कि या तो घटना अभियोजन के बताए तरीके से हुई ही नहीं, या उस पर गंभीर संदेह है।
2. एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत स्वीकारोक्ति बयान की ग्राह्यता
अभियोजन ने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत एनसीबी द्वारा दर्ज अपीलकर्ता के “स्वीकारोक्ति” बयान पर भारी निर्भरता जताई।
सुप्रीम कोर्ट की तीन–न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय Tofan Singh बनाम State of Tamil Nadu [(2021) 4 SCC 1] का हवाला देते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 53 के तहत अधिकार–प्राप्त अधिकारी, भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के अर्थ में “पुलिस अधिकारी” हैं।
इसलिए, ऐसे अधिकारियों के समक्ष दिया गया कोई भी स्वीकारोक्ति बयान धारा 25 साक्ष्य अधिनियम से बाधित है और आरोपी को दोषसिद्ध करने के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। इस आधार पर उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि पी.डब्ल्यू.4 द्वारा दर्ज अपीलकर्ता का धारा 67 का बयान उसके विरुद्ध नहीं लिया जा सकता।
3. सैंपलिंग में अवैधता और स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन
न्यायालय ने अगला प्रश्न यह देखा कि कथित 50 चरस स्लैब से नमूने किस प्रकार लिए गए। साक्ष्य के अनुसार, 25–25 ग्राम के दो नमूने (S-1 और S-2) पूरे 25.450 किलोग्राम के थोक माल से “बेतरतीब ढंग से” लिए गए और केवल S-1 को रासायनिक परीक्षण के लिए भेजा गया।
पीठ ने एनसीबी द्वारा 15.03.1988 को जारी स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन संख्या 1/88 का हवाला दिया, जो जब्त मादक द्रव्यों और मन:प्रभावी पदार्थों से नमूने लेने की सही पद्धति निर्धारित करता है, विशेषतः जब कई पैकेट या स्लैब हों।
इन निर्देशों में, अन्य बातों के साथ, घटनास्थल पर ही डुप्लिकेट में नमूने लेना, सामग्री को अच्छी तरह मिलाकर समरूप बनाना, और कई पैकेट होने पर या तो प्रत्येक पैकेट से नमूना लेना या उचित लॉट बनाकर संरचित तरीके से प्रतिनिधिक नमूने लेना शामिल है। ये अस्पष्ट “रैंडम” सैंपलिंग की अनुमति नहीं देते।
इस मामले में न्यायालय ने पाया कि:
- इस बात का कोई साक्ष्य नहीं था कि 50 में से प्रत्येक स्लैब को अलग–अलग नंबर दिया गया या तोला गया।
- इसका कोई साक्ष्य नहीं था कि प्रत्येक स्लैब का फील्ड टेस्ट किट से परीक्षण किया गया।
- इसका कोई साक्ष्य नहीं था कि स्लैबों को सही तरीके से लॉट में बाँटकर उनकी सामग्री मिला–जुलाकर समरूप द्रव्यमान बनाया गया और फिर नमूना लिया गया।
- यह स्पष्ट नहीं था कि तथाकथित “रैंडम” नमूने किस–किस स्लैब से लिए गए।
अत: स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन संख्या 1/88 का पूर्ण रूप से अनुपालन नहीं किया गया। Khet Singh बनाम Union of India, Noor Aga बनाम State of Punjab तथा Union of India बनाम Bal Mukund जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि यद्यपि ऐसे स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन निदेशात्मक (directory) हैं, लेकिन उनका खुला या पूर्ण उल्लंघन जब्त सामग्री की अखंडता और अभियोजन के मामले पर गंभीर संदेह उत्पन्न करता है।
4. जब्त मादक पदार्थ का प्रस्तुत न किया जाना और अभिरक्षा की श्रृंखला का विफल होना
न्यायालय ने पाया कि यह साक्ष्य नहीं था कि जब्त मादक पदार्थ को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 52A के तहत नष्ट कर दिया गया हो। इसलिए अभियोजन पर यह दायित्व था कि वह जब्त सामग्री को ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करे।
ट्रायल के दौरान ऐसी कोई प्रस्तुति नहीं की गई। आगे, मालख़ाना प्रभारी की गवाही नहीं ली गई, न ही मालख़ाना रजिस्टर प्रस्तुत किया गया। इस बात का कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं था कि जब्त सामग्री कभी ठीक से जमा की गई या सुरक्षित अवस्था में बनी रही।
ऐसी परिस्थितियों में, Jitendra बनाम State of M.P., Ashok उर्फ डेंगरा जैसवाल बनाम State of Madhya Pradesh और Gorakh Nath Prasad बनाम State of Bihar जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर निर्भर करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि केवल मौखिक साक्ष्य और जब्ती सूची, बिना मादक पदार्थ को प्रस्तुत किए या उसकी सुरक्षित अभिरक्षा के प्रमाण के, एनडीपीएस के ऐसे मामलों में, जिनमें कठोर सज़ाएँ हैं, पर्याप्त नहीं हैं।
5. एनडीपीएस अधिनियम की धाराएँ 52 और 57 के अधीन चूक
एनडीपीएस अधिनियम की धारा 52(3) यह अपेक्षा करती है कि जब्त की गई वस्तुएँ और गिरफ्तार व्यक्तियों को शीघ्र ही उपयुक्त अधिकारी के समक्ष भेजा जाए और जब्त वस्तुओं को सुरक्षित रखकर उचित दस्तावेज़ीकरण के साथ जमा किया जाए।
न्यायालय ने नोट किया कि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं था कि जब्ती अधिकारी ने 48 घंटे के भीतर अग्रेषण पत्र के साथ मादक पदार्थ मालख़ाने में जमा किया हो या मालख़ाना प्रभारी से कोई रसीद प्राप्त की हो। इसी प्रकार, धारा 57 के तहत गिरफ्तारी और जब्ती की पूरी रिपोर्ट उच्च अधिकारी को भेजे जाने का भी कोई प्रमाण नहीं था।
हालाँकि ये प्रावधान निदेशात्मक हैं, न्यायालय ने ज़ोर दिया कि इनकी पूर्ण अनदेखी अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता और जांच की निष्पक्षता को प्रभावित करती है।
6. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत बयान में गंभीर दोष
न्यायालय ने धारा 313 दंप्रसं के तहत अपीलकर्ता से पूछे गए प्रश्नों की सावधानीपूर्वक जाँच की, जिसका उद्देश्य आरोपी को प्रतिकूल परिस्थितियों पर अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना है।
न्यायालय ने पाया कि अभियोजन जिन कई प्रमुख परिस्थितियों पर निर्भर था, उन्हें अपीलकर्ता के समक्ष रखा ही नहीं गया, जैसे: धारा 50 का नोटिस दिए जाने का विवरण, पदार्थ के फील्ड टेस्ट की प्रक्रिया, वज़न करने की कार्यवाही, नमूने लेने और सील करने का तरीका, उसके धारा 67 बयान के कथित स्वैच्छिक होने की बात, जब्त सामग्री का मालख़ाने में जमा होना, और चरस की पुष्टि करने वाली रासायनिक जांच रिपोर्ट।
इसके विपरीत, उससे यह प्रश्न पूछा गया कि क्या वह राज कुमार द्वारा वित्तपोषित होकर भारत–नेपाल सीमा से मादक पदार्थ लाता था, जबकि इस आरोप के समर्थन में कोई साक्ष्य था ही नहीं।
State of U.P. बनाम Mohd. Iqram और Naval Kishore बनाम State of Bihar जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए पीठ ने माना कि जो परिस्थितियाँ धारा 313 के तहत आरोपी के समक्ष नहीं रखी जातीं, उन्हें उसके विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। प्रश्न–सूची की यह लापरवाही अभियोजन के मामले को और कमज़ोर करती है।
अंतिम निष्कर्ष
इन सभी कारकों — स्वतंत्र और प्रमुख सरकारी गवाहों की गवाही न होना, धारा 67 की स्वीकारोक्ति के साक्ष्य के रूप में अयोग्य होना, अवैध सैंपलिंग, जब्त सामग्री का प्रस्तुत न होना और उसकी अभिरक्षा पर संदेह, एनडीपीएस अधिनियम की धाराएँ 52 और 57 का अनुपालन न होना तथा धारा 313 दंप्रसं के तहत बयान में गंभीर खामियाँ — को एक साथ तौलते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन साक्ष्य में “गंभीर दुर्बलताएँ” हैं।
न्यायालय ने इसलिए माना कि दोषसिद्धि और सजा कायम नहीं रखी जा सकती और अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने का हकदार है।
अपील स्वीकार की गई, विशेष वाद संख्या 09/2013 / एन.सी.बी. संख्या 53/2013 में दिनांक 02.07.2016 का दोषसिद्धि का निर्णय और 15.07.2016 की सजा निरस्त की गई और अपीलकर्ता को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 20(ब)(ii)(C) के आरोप से बरी कर दिया गया, साथ ही यह निर्देश दिया गया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय एनडीपीएस अधिनियम के तहत अभियोजन झेल रहे किसी भी व्यक्ति, विशेषकर व्यावसायिक मात्रा से जुड़े गंभीर आरोपों के संदर्भ में, महत्त्वपूर्ण है।
पहला, यह दर्शाता है कि भले ही बहुत बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ का आरोप हो, यदि बुनियादी कानूनी सुरक्षा–उपायों की अनदेखी हो तो न्यायालय दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखेंगे। अभियोजन को सैंपलिंग, सीलिंग, भंडारण, जब्त सामग्री की पेशी और बयान दर्ज करने की प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करना होता है।
दूसरा, यह पुष्ट करता है कि सुप्रीम कोर्ट के Tofan Singh निर्णय के बाद, एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत एनसीबी या समान अधिकारियों द्वारा दर्ज स्वीकारोक्ति को अकेले या मुख्य आधार बनाकर दोषसिद्धि नहीं दी जा सकती।
तीसरा, निर्णय रेखांकित करता है कि आरोपी को धारा 313 दंप्रसं के तहत निष्पक्ष तरीके से प्रश्न पूछे जाने का अधिकार है। यदि महत्वपूर्ण तथ्य सीधे उससे पूछे ही नहीं गए, तो बाद में उन तथ्यों के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
चौथा, यह जांच–एजेंसियों को स्पष्ट संदेश देता है कि सैंपल लेने और उसकी हैंडलिंग से संबंधित स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन, भले ही तकनीकी रूप से निदेशात्मक हों, का ठोस रूप से पालन किया जाना चाहिए। उनकी अनदेखी से अभियुक्त के बरी होने की नौबत आ सकती है।
साधारण लोगों के लिए, विशेषकर जो मादक पदार्थों के मामलों में गलत तरीके से फँसा दिए जाते हैं, यह निर्णय दिखाता है कि उच्च न्यायालय जाँच की निष्पक्षता और गहराई की बारीकी से पड़ताल करेंगे और गंभीर प्रक्रियागत खामियों की स्थिति में संदेह का लाभ देंगे।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या एनडीपीएस अधिनियम की धारा 20(ब)(ii)(C) के तहत दोषसिद्धि उस स्थिति में क़ायम रह सकती है, जब कथित स्वीकारोक्ति बयान धारा 67 के तहत एनसीबी अधिकारी द्वारा दर्ज किया गया हो?
उत्तर: नहीं। Tofan Singh के बाद, धारा 53 के तहत सशक्त एनसीबी अधिकारी “पुलिस अधिकारी” हैं, इसलिए उनके समक्ष स्वीकारोक्ति धारा 25 साक्ष्य अधिनियम से बाधित है और दोषसिद्धि के लिए उपयोग नहीं की जा सकती।
प्रश्न: स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन संख्या 1/88 में सैंपलिंग से संबंधित प्रावधानों का गंभीर उल्लंघन और जब्त मादक पदार्थ को प्रस्तुत न करना, क्या अभियोजन के मामले को अवैध कर देता है?
उत्तर: हाँ। सैंपलिंग दिशा–निर्देशों का पूर्ण अनुपालन न होना और जब्त सामग्री को प्रस्तुत न करना, साथ ही उसकी सही अभिरक्षा या निस्तारण का प्रमाण न होना गंभीर संदेह उत्पन्न करता है और दोषसिद्धि क़ायम नहीं रह सकती।
प्रश्न: क्या न्यायालय उन परिस्थितियों पर भरोसा कर सकता है जो आरोपी से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत पूछी ही नहीं गईं?
उत्तर: नहीं। जो परिस्थितियाँ विशेष रूप से आरोपी के समक्ष धारा 313 के तहत नहीं रखी जातीं, उन्हें उसके विरुद्ध उपयोग नहीं किया जा सकता। इस मामले में धारा 313 के तहत अनुचित प्रश्न–पूछताछ ने अभियोजन को और कमज़ोर किया और बरी होने में योगदान दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Tofan Singh v. State of Tamil Nadu, (2021) 4 SCC 1
- Khet Singh v. Union of India, AIR 2002 SC 1450
- Noor Aga v. State of Punjab, (2008) 16 SCC 417
- Union of India v. Bal Mukund & Ors., (2009) 12 SCC 161
- Jitendra & Another v. State of M.P., (2004) 10 SCC 562
- Ashok alias Dangra Jaiswal v. State of Madhya Pradesh, (2011) 5 SCC 123
- Gorakh Nath Prasad v. State of Bihar, (2018) 2 SCC 305
- State of Kerala & Ors. v. Kurian Abraham (P) Ltd. & Anr., (2008) 3 SCC 582
- Union of India v. Azadi Bachao Andolan, (2004) 10 SCC 1
- State of U.P. v. Mohd. Iqram & Anr., AIR 2011 SC 2296
- Naval Kishore v. State of Bihar, (2004) 7 SCC 502
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Appeal (DB) No. 775 of 2016
मामला शीर्षक: Jagat Prasad v. The State of Bihar & The Union of India
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Ashwani Kumar Singh और Hon’ble Mr. Justice Arvind Srivastava
निर्णय की तिथि: 19.01.2022
ट्रायल कोर्ट का मामला: Special Case No. 09 of 2013 / N.C.B. No. 53 of 2013, Court of Additional Sessions Judge-VII, Patna
संबंधित प्रावधान: एनडीपीएस अधिनियम, 1985 की धारा 20(ब)(ii)(C); एनडीपीएस अधिनियम की धाराएँ 8, 42, 50, 52, 52A, 53, 57, 67; दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 313; भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 25
नज़ीर: 2022 (1) PLJR 568
वकील:
- अपीलकर्ता की ओर से: Mr. Nafisuzzoha, Advocate
- प्रत्यर्थी–राज्य बिहार की ओर से: Dr. Mayanand Jha, APP
- संघ की ओर से: Mr. Manoj Kumar Singh, CGC
मामले का स्वरूप: एनडीपीएस विशेष वाद में दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध आपराधिक अपील (द्वैधपीठ)।
परिणाम: अपील स्वीकार; दोषसिद्धि और सजा निरस्त; अपीलकर्ता बरी, और निर्देश कि यदि किसी अन्य मामले में आवश्यक न हो तो उसे रिहा किया जाए।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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