हत्या के मामले में बरी के खिलाफ अपील कमजोर साक्ष्य के कारण खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shipra Sinha

Reviewed by: Shipra Sinha

License Number: BR/1674/2021

शिप्रा सिन्हा समविदा लॉ एसोसिएट्स में एक वकील हैं जो पारिवारिक कानून और नागरिक विवादों में प्रथा करती हैं। वह पटना उच्च न्यायालय और अधीनस्थ अदालतों में विवाहात्मक मामलों, विरासत विवादों, संपत्ति संबंधित पारिवारिक संघर्षों और नागरिक मुकदमेबाजी में क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी प्रैक्टिस बिहार में व्यक्तियों और परिवारों के लिए पारिवारिक कानून कार्यवाही और नागरिक मामलों को संभालती है।

इस आपराधिक अपील में, हत्या के एक पीड़ित के रिश्तेदार ने चार आरोपितों को बरी करने वाले सत्र न्यायालय के आदेश को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने सभी गवाहों के बयान और चिकित्सीय साक्ष्य की समीक्षा की। न्यायालय ने पाया कि महत्वपूर्ण गवाह या तो सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे या फिर शत्रुतापूर्ण हो गए थे तथा स्वयं मृतक की माता ने भी केवल शक के आधार पर बात की थी। न्यायालय ने बरी के आदेश को पलटने से इनकार किया और अपील को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक युवक, राजन यादव, उम्र लगभग 23–24 वर्ष, निवासी ग्राम रमावालिया, जिला पश्चिम चंपारण, की मृत्यु से संबंधित है।

अभियोजन के अनुसार, 16.01.2013 की रात को राजन अपने गांव के लड़कों के साथ पड़ोसी गांव सेमराहनी (जिसे बयान में सेमरौली/सेमरौली भी कहा गया है) में एक नाच कार्यक्रम देखने गया था।

जब वह अगले दिन सुबह तक घर नहीं लौटा, तो उसका चाचा, जो बाद में सूचक बना, सिंचाई के काम से अपने खेत पर जाने के लिए गांव सवना गया। वहां उसे सूचना मिली कि राजन का शव सेमराहनी गांव के पूर्व दिशा में स्थित “सरेह” (खेत वाला क्षेत्र) में फेंका हुआ पाया गया है।

चाचा तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे और शव देखा। शव की स्थिति देखकर उन्हें लगा कि किसी ने उसका गला दबाकर उसकी हत्या कर दी है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें यह नहीं पता कि राजन किसके साथ गया था और न ही यह जानते हैं कि उसकी हत्या किसने की।

इस फर्दबयान के आधार पर 17.01.2013 को अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत सिमरा थाना कांड संख्‍या 3/2013 दर्ज की गई। अनुसंधानकर्ता राजेश कुमार (PW-15) ने मामले की जांच की और अंततः चार आरोपितों के विरुद्ध धारा 302 सहपठित धारा 34 भा.दं.सं. के अंतर्गत आरोपपत्र समर्पित किया।

मामला सेशन न्यायालय को समर्पित हुआ और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-प्रथम, बगहा, पश्चिम चंपारण के समक्ष सत्र वाद संख्‍या 158/2015 के रूप में दर्ज हुआ। पूर्ण विचारण के बाद, दिनांक 07.01.2020 के निर्णय द्वारा, माननीय सत्र न्यायालय ने सभी आरोपितों को यह कहते हुए बरी कर दिया कि अभियोजन धारा 302/34 भा.दं.सं. के अंतर्गत उनका अपराध सिद्ध करने में असफल रहा है।

इससे आहत होकर मृतक के चाचा तथा सूचक (PW-13) सुरेश यादव ने पटना उच्च न्यायालय में बरी के इस निर्णय को निरस्त करवाने के लिए Criminal Appeal (DB) No. 365 of 2020 दायर की।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ, जिसमें माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति अशोक कुमार पांडेय सम्मिलित थे, ने अपील की सुनवाई की। मौखिक निर्णय 22.10.2024 को न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद द्वारा दिया गया।

न्यायालय ने सत्र न्यायालय के पूर्ण अभिलेख, जिसमें अभियोजन के 15 गवाहों के बयान तथा तीन दस्तावेजी प्रदर्श सम्मिलित थे, का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया।

अभियोजन साक्ष्य का संक्षिप्त विवरण

विचारण में अभियोजन ने निम्नलिखित गवाहों की परीक्षा की: PW-1 राधा किशुन उरांव, PW-2 सत्यनारायण यादव, PW-3 शंभू उरांव, PW-4 आजाद खान, PW-5 लम्बू उरांव, PW-6 उमेश यादव, PW-7 महेश यादव, PW-8 मनोज उरांव, PW-9 सावन उरांव, PW-10 बच्ची देवी (मृतक की माता), PW-11 बिरेंद्र यादव, PW-12 अवधेश यादव, PW-13 सुरेश यादव (सूचक तथा मृतक के चाचा), PW-14 डॉ. अशोक कुमार तिवारी (जिन्होंने पोस्टमॉर्टम किया) तथा PW-15 राजेश कुमार (अनुसंधानकर्ता)।

तीन दस्तावेज प्रदर्शित किए गए: जब्ती सूची पर उमेश यादव और बिरेंद्र यादव के हस्ताक्षर (प्रदर्श 1 और 2) तथा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पर डॉ. अशोक कुमार तिवारी के हस्ताक्षर (प्रदर्श 3)। एक “बकुआ” (एक फुट एक इंच लंबा नुकीला धारदार औजार, जिसमें साढ़े तीन इंच का लकड़ी का हैंडल था) की जब्ती सूची को भी अनुसंधानकर्ता ने प्रदर्श 4 के रूप में सिद्ध किया।

सूचक और मृतक की माता का साक्ष्य

उच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि संपूर्ण अभियोजन कथा की शुरुआत मृतक के चाचा PW-13 के फर्दबयान से होती है। अपने बयान में उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने घटना को स्वयं नहीं देखा था। अपनी गवाही के अनुच्छेद 6 में उन्होंने कहा कि फर्दबयान में उन्होंने किसी भी आरोपित का नाम नहीं लिया था।

उन्होंने आगे स्वीकार किया कि घटना के बारे में जो भी जानते हैं, वह उनकी “भाभी”, यानी मृतक की माता, से सुनी हुई बात है, जिन्होंने PW-10 के रूप में साक्ष्य दिया। इस प्रकार उनका साक्ष्य स्पष्ट रूप से द्वितीयक था और PW-10 पर निर्भर था।

इसलिए PW-10, मृतक की माता, अभियोजन पक्ष की सबसे महत्वपूर्ण गवाह बन गईं। अपने मुख्य परीक्षण में उन्होंने कहा कि राजन गांव सेमरौली में मनोज, लम्बू और छोटे के साथ नाच देखने गया था। उनके अनुसार, भगिरथी ने फोन कर राजन को बुलाया और उसे नाच पर ले गया, जिसके बाद राजन वापस नहीं आया।

परंतु, जिरह में उन्होंने महत्वपूर्ण स्वीकारोक्तियां कीं। उन्होंने कहा कि उन्होंने आरोपितों के नाम केवल शक के आधार पर दिए थे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो लोग उनके बेटे को नाच दिखाने के लिए बुलाने आए थे, वे घटना में शामिल नहीं थे। उन्होंने यह भी कहा कि उनके बेटे की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी।

उच्च न्यायालय ने उनके इस बयान पर विशेष रूप से भरोसा किया। न्यायालय ने माना कि उनका यह साफ-साफ स्वीकार करना कि नाम केवल शक के आधार पर दिए गए थे, अभियोजन के मामले के लिए घातक है।

PW-5 का साक्ष्य और उसे अस्वीकार करने का कारण

अपील में, अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने PW-5 लम्बू उरांव की गवाही पर विशेष जोर दिया। उनके मुख्य परीक्षण के अनुसार, वे स्वयं तथा अन्य कई व्यक्ति, जैसे छोटे लाल, मनोज उरांव, सरवन उरांव, जितेंद्र शाह, प्रवेश उरांव और मंजीत उरांव, रात लगभग 10:00 बजे नाच कार्यक्रम देखने गए थे।

उन्होंने कहा कि जब वे कार्यक्रम देख रहे थे, तभी राजन के मोबाइल पर फोन आया, वह उठकर चला गया। उन्होंने आगे दावा किया कि दो आरोपित, पहवारी और भगिरथी, स्टेज के पास खड़े थे। लगभग 1:00 बजे रात को राजन उनके साथ कहीं चला गया। PW-5 के अनुसार, बाद में पहवारी और भगिरथी वापस आए और समूह से कहा कि वे घर चले जाएं, क्योंकि राजन पहले ही घर चला गया है। अगले दिन सुबह उन्हें पता चला कि राजन की हत्या हो गई है।

इसी आधार पर, अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मृतक को आरोपितों के साथ “अंतिम बार साथ देखा गया” था और सत्र न्यायालय को PW-5 की गवाही पर भरोसा करते हुए आरोपितों को दोषसिद्ध करना चाहिए था।

राज्य की ओर से, अतिरिक्त लोक अभियोजक ने PW-5 की गवाही की कमजोरियों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया। जिरह में PW-5 ने स्वीकार किया कि राजन उसका मित्र था, परंतु राजन ने कभी भी आरोपितों के साथ किसी दुश्मनी की बात उससे नहीं की थी। उसने यह भी स्वीकार किया कि उसे हत्या की वास्तविक घटना के बारे में कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है; वह न तो शव देखने गया और न ही दाह संस्कार में गया। उसने कहा कि उसने केवल घटना के बारे में सुना था और उसी सुनी-सुनाई बात के आधार पर बयान दे रहा है। उसने यह भी स्वीकार किया कि उसे गवाही देने के लिए मृतक के भाई सुनील यादव अदालत लेकर आए थे।

उच्च न्यायालय ने राज्य के इस तर्क से सहमति व्यक्त की कि ये उत्तर दर्शाते हैं कि PW-5 एक सुनी-सुनाई बात का गवाह है, घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं। उसका आचरण—अपने को घनिष्ठ मित्र बताते हुए भी न तो शव देखने जाना और न ही दाह संस्कार में शामिल होना—उसकी गवाही की विश्वसनीयता को और कम करता है। न्यायालय ने माना कि उसका साक्ष्य “न तो निर्णायक है और न ही उस पर आधारित होकर किसी को दोषसिद्ध करना सुरक्षित होगा।”

अन्य गवाह और शत्रुतापूर्ण साक्ष्य

सत्र न्यायालय तथा उच्च न्यायालय ने अन्य गवाहों के साक्ष्य को भी देखा। PW-1 को घटना से संबंधित भौतिक तथ्यों का प्रत्यक्ष गवाह नहीं पाया गया; उन्हें केवल गांव वालों से घटना के बारे में पता चला था। PW-2, PW-3 और PW-4 ने अभियोजन का साथ नहीं दिया और शत्रुतापूर्ण घोषित किए गए। PW-5, जैसा कि उल्लेख किया गया, सुनी-सुनाई बात का गवाह था।

PW-6 एक औपचारिक गवाह था, जिसने केवल जब्ती सूची को सिद्ध किया। PW-7, PW-8 और PW-9 ने भी अभियोजन का समर्थन नहीं किया और शत्रुतापूर्ण घोषित हुए। PW-11, जो एक अन्य जब्ती सूची गवाह था, के पास घटना की परिस्थितियों के संबंध में कहने के लिए कुछ भी नहीं था। PW-12 भी शत्रुतापूर्ण गवाह निकला।

न्यायालय ने नोट किया कि जिन व्यक्तियों के बारे में PW-5 ने कहा था कि वे उसके साथ नाच देखने गए थे, जैसे मनोज उरांव (PW-8) और सावन उरांव (PW-9), उन्होंने जब अदालत में गवाही दी तो अभियोजन का साथ नहीं दिया और शत्रुतापूर्ण घोषित किए गए। इससे “अंतिम बार साथ देखे जाने” की थ्योरी और भी कमजोर हो गई।

चिकित्सीय साक्ष्य और मृत्यु का समय

PW-14, डॉ. अशोक कुमार तिवारी ने मृतक के शव का पोस्टमॉर्टम किया। उनकी राय में मृत्यु का समय लगभग 24 से 36 घंटे पूर्व का था।

अतिरिक्त लोक अभियोजक ने तर्क दिया, और न्यायालय ने नोट किया, कि यदि अभियोजन की यह थ्योरी मानी जाए कि मृतक लगभग रात 10:00 बजे आरोपितों के साथ गया और अगली सुबह उसका शव मिला, तो यह समय-रेखा मृत्यु के 24–36 घंटे पहले होने संबंधी चिकित्सीय राय से पूरी तरह मेल नहीं खाती। इस असंगति ने घटना के सही समय और तरीके पर अतिरिक्त संदेह उत्पन्न किया।

अनुसंधानकर्ता और प्रदर्शित न की गई स्वीकारोक्ति

अनुसंधानकर्ता PW-15 राजेश कुमार ने कहा कि जांच के दौरान उन्होंने सबसे पहले भगिरथी यादव और पहवारी यादव को गिरफ्तार किया। उनके अनुसार, इन दोनों ने स्वीकारोक्ति बयान दिए और पहवारी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अंतर्गत भी बयान दिया।

परंतु उच्च न्यायालय ने ध्यान दिलाया कि यह धारा 164 दं.प्र.सं. का बयान विचारण के दौरान कभी प्रदर्शित ही नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त, जिस अभियंत्रण दंडाधिकारी के समक्ष कथित स्वीकारोक्ति दर्ज की गई थी, उन्हें गवाह के रूप में परीक्षित ही नहीं किया गया। अतः इस कथित स्वीकारोक्ति पर साक्ष्य के रूप में भरोसा नहीं किया जा सकता था।

उच्च न्यायालय की निष्कर्षात्मक राय

सभी साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि सत्र न्यायालय ने अभिलेख पर उपलब्ध सामग्रियों का सही मूल्यांकन किया था। मुख्य कारण इस प्रकार थे:

पहला, सूचक (PW-13) ने स्वीकार किया कि उन्हें घटना के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी नहीं थी और मूल फर्दबयान में आरोपितों के नाम नहीं थे।

दूसरा, सबसे महत्वपूर्ण गवाह, PW-10 (मृतक की माता), ने साफ-साफ कहा कि उन्होंने आरोपितों के नाम केवल शक के आधार पर दिए थे और जो लोग उसके बेटे को नाच दिखाने के लिए बुलाने आए थे, वे उसकी हत्या में शामिल नहीं थे।

तीसरा, PW-5 केवल सुनी-सुनाई बात का गवाह था। उसने स्वीकार किया कि उसे हत्या की घटना के बारे में कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है और जो कुछ भी वह कह रहा है, वह सुनी-सुनाई बात पर आधारित है; साथ ही उसका व्यवहार भी किसी घनिष्ठ मित्र जैसा नहीं था।

चौथा, अधिकांश स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन का साथ नहीं दिया और शत्रुतापूर्ण घोषित किए गए तथा अभियोजन द्वारा की गई जिरह के बाद भी उनसे कोई सहायक तथ्य प्राप्त नहीं हुआ।

पांचवां, मृत्यु के समय (24–36 घंटे पूर्व) संबंधी चिकित्सीय साक्ष्य ने अभियोजन द्वारा सुझाई गई घटनाक्रम की समय-रेखा पर संदेह उत्पन्न किया।

इन परिस्थितियों में न्यायालय ने माना कि आरोपितों को बरी करने के सत्र न्यायालय के निर्णय में कोई गलती नहीं है। बरी के विरुद्ध अपील निराधार पाई गई और उसे खारिज कर दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय पीड़ितों के परिजनों तथा बिहार और अन्य राज्यों में आपराधिक मामलों से जुड़े सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि धारा 302 भा.दं.सं. के अंतर्गत हत्या जैसे गंभीर अपराधों में भी दोषसिद्धि के लिए न्यायालयों को मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्य की आवश्यकता होती है।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि कितना भी प्रबल संदेह क्यों न हो, केवल शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती। जब मुख्य परिजन स्वयं कह दे कि उसने केवल शक के आधार पर नाम दिए थे, और जब गवाह शत्रुतापूर्ण हो जाएं या यह स्वीकार करें कि उन्हें घटना की जानकारी केवल दूसरों से सुनने पर है, तो न्यायालय लोगों को आजीवन कारावास की सजा नहीं दे सकता।

यह निर्णय पुनः पुष्ट करता है कि सुनी-सुनाई बात (हियर्से) पर आधारित साक्ष्य और सिद्ध न की गई स्वीकारोक्तियां दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकतीं। यह अभियोजन की इस जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है कि वह धारा 164 दं.प्र.सं. जैसे बयानों को विधिवत प्रदर्शित करे और जिन दंडाधिकारियों के समक्ष वे रिकॉर्ड हुए हैं, उन्हें गवाह के रूप में प्रस्तुत करे।

साधारण लोगों के लिए यह निर्णय इस बात पर जोर देता है कि पुलिस को दिया गया पहला बयान सटीक और पूर्ण होना चाहिए तथा जिन गवाहों के पास प्रत्यक्ष जानकारी हो, वे आगे आकर सच्चाई के साथ गवाही दें।

कानूनी मुद्दे और उनके उत्तर


  • मुद्दा: क्या धारा 302/34 भा.दं.सं. के अंतर्गत हत्या के आरोप से आरोपितों की बरी, जो मुख्यतः कमजोर और सुनी-सुनाई बात पर आधारित साक्ष्य पर टिकी थी, को पटना उच्च न्यायालय अपील में पलट सकता था?

    उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन आरोपितों का अपराध संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा तथा सत्र न्यायालय ने साक्ष्य का सही मूल्यांकन किया था। बरी के विरुद्ध अपील खारिज कर दी गई।

  • मुद्दा: क्या न्यायालय किसी ऐसे गवाह की गवाही पर निर्भर होकर हत्या के मामले में आरोपितों को दोषसिद्ध कर सकता है, जो यह स्वीकार करे कि उसे घटना की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं है और उसने केवल दूसरों से सुनकर बात कही है?

    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने ऐसी गवाही को सुनी-सुनाई और दोषसिद्धि के लिए असुरक्षित माना, विशेषकर तब जब अन्य स्वतंत्र गवाहों ने अभियोजन का समर्थन न किया हो।

  • मुद्दा: जब कोई प्रमुख पारिवारिक गवाह यह कह दे कि आरोपितों के नाम केवल शक के आधार पर दिए गए थे तथा चिकित्सीय साक्ष्य और कथित घटना के समय में असंगति हो, तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है?

    उत्तर: ऐसी स्वीकारोक्तियां और असंगतियां अभियोजन के मामले में गंभीर संदेह उत्पन्न करती हैं। इस मामले में, इन्होंने निर्दोषता के अनुमान को और मजबूत किया और बरी को बरकरार रखने को उचित ठहराया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • निर्णय के पाठ में किसी विशिष्ट पूर्ववर्ती निर्णय का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है। किसी भी नज़ीर का नाम से उद्धरण नहीं है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Appeal (DB) No. 365 of 2020; arising out of Simra P.S. Case No. 3 of 2013; Sessions Trial No. 158 of 2015

मामले का शीर्षक: Suresh Yadav v. The State of Bihar & Ors.

उद्धरण: 2024 (4) PLJR 662

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Rajeev Ranjan Prasad; Hon’ble Mr. Justice Ashok Kumar Pandey

वकील: अपीलकर्ता की ओर से – Mr. Prithvi Nath Mishra, Advocate; राज्य की ओर से – Mr. Satya Narayan Prasad, Additional Public Prosecutor

मामले का स्वरूप: धारा 302/34 भा.दं.सं. के अंतर्गत हत्या मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-प्रथम, बगहा, पश्चिम चंपारण द्वारा पारित बरी के निर्णय के विरुद्ध आपराधिक अपील (खंडपीठ)।

अंतिम परिणाम: अपील खारिज; सभी आरोपितों की बरी बरकरार।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय देखें

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