हत्या के मामले में आजीवन कारावास बरकरार — अंतिम बार साथ देखे जाने और बरामदगी के साक्ष्य के आधार पर — पटना उच्च न्यायालय, 2018

एक युवा ग्रामीण की हत्या के आरोप में दोषी ठहराए गए चार व्यक्तियों ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष अपनी आजीवन कारावास की सजा को चुनौती दी। न्यायालय ने उन गवाहों के बयान के आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार रखा जिन्होंने मृतक को अंतिम बार इन अभियुक्तों के साथ देखा था और अभियुक्तों के खुलासे के बाद दफन शव की बरामदगी के साक्ष्य पर भरोसा किया। न्यायालय ने कथित स्वीकारोक्ति बयानों और जांच में कमी से संबंधित तर्कों को अस्वीकार कर दिया। अपील खारिज कर दी गई और आजीवन कारावास की सजा यथावत बनी रही।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला अचानक एक युवा व्यक्ति, अरविंद कुमार केवट, के गांव चिपली, थाना दुर्गावती, जिला कैमूर से गायब हो जाने से शुरू हुआ।

दिनांक 27.12.2010 को गांव में सुदामा केवट (जिसे शिकायत में राजा राम भी कहा गया है) के घर पर श्राद्ध का आयोजन हुआ। सूचक विनोद कुमार केवट (पी.डब्ल्यू.4) अपने पुत्र अरविंद के साथ श्राद्ध में शामिल हुए। चार सह-ग्रामवासी, जो बाद में अपीलकर्ता बने, भी वहां मौजूद थे।

भोजन करने के बाद पिता घर लौट आए। उनका पुत्र श्राद्ध में ही रह गया। जब देर रात तक भी अरविंद घर नहीं लौटा तो परिवारजनों ने उसकी खोजबीन की। वे चारों अपीलकर्ताओं के घर भी गए, पर न तो अरविंद मिला और न ही अपीलकर्ता अपने घरों पर पाए गए।

सूचक के अनुसार, 09.01.2011 को लगभग सुबह 5:00 बजे उसके दरवाजे के पास एक पत्र मिला। उसमें धमकी दी गई थी कि यदि 13.01.2011 तक रु. 1,00,000 का भुगतान नहीं किया गया तो उसके पुत्र की हत्या कर दी जाएगी। इसे फिरौती के लिए अपहरण का मामला समझते हुए पिता स्थानीय पुलिस के पास गए, पर कोई मामला दर्ज नहीं हुआ। कथित रूप से उन्हें डांट-फटकार कर लौटा दिया गया।

कोई विकल्प न बचने पर, 13.01.2011 को उन्होंने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, भभुआ के समक्ष परिवाद वाद संख्या 40 सन् 2011 दायर किया, जिसमें चारों अपीलकर्ताओं को भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 364 और 364A के अंतर्गत अभियुक्त बनाया गया।

दंडाधिकारी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के तहत शिकायत को पुलिस के पास भेज दिया। दिनांक 06.02.2011 को दुर्गावती थाना कांड संख्या 07 सन् 2011 धारा 364/34 आईपीसी के अंतर्गत चारों अपीलकर्ताओं के विरुद्ध दर्ज किया गया।

अगले दिन, 07.02.2011 को गांव के एक खेत से सड़ी-गली अवस्था में एक मृत शरीर बरामद हुआ। जब पुलिस को यह जानकारी हुई कि गुमशुदा व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है, तो 29.03.2011 को धारा 302 और 201 आईपीसी जोड़ी गईं।

जांच जारी रही। पुलिस का दावा था कि दो अपीलकर्ताओं द्वारा किए गए खुलासे के आधार पर उन्होंने विजय तिवारी के खेत में दफन एक शव को ढूंढ निकाला, जिसे बाद में कपड़ों से अरविंद के रूप में पहचाना गया। पोस्टमॉर्टम 08.02.2011 को ए.एन. मगध मेडिकल कॉलेज, गया में किया गया।

दिनांक 31.03.2011 को चारों अपीलकर्ताओं के विरुद्ध धारा 364, 302, 201 और 34 आईपीसी के अंतर्गत आरोपपत्र समर्पित किया गया। 07.05.2011 को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा cognizance लिया गया और 13.07.2011 को मामला सत्र न्यायालय को संज्ञानोपरांत विचारण के लिए सौंपा गया, जिसे बाद में सत्र वाद संख्या 231 सन् 2011 के रूप में दर्ज किया गया।

09.08.2011 को सभी चारों के विरुद्ध धारा 302/34, 364 और 201 आईपीसी के अंतर्गत संयुक्त आरोप तय किए गए। सत्र न्यायाधीश, कैमूर, भभुआ (विशेष न्यायाधीश) ने विचारण के बाद, दिनांक 20.09.2014 के निर्णय द्वारा चारों को धारा 302/34 और 201 आईपीसी के अंतर्गत दोषी ठहराया। 22.09.2014 को उन्हें धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास तथा जुर्माना और धारा 201 के तहत तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा दी गई, दोनों सजाएँ साथ-साथ चलने वाली थीं।

आहत होकर, चारों दोषियों ने पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील (डिवीजन बेंच) संख्या 868 सन् 2014 दायर की। खंडपीठ (माननीय श्री न्यायमूर्ति राकेश कुमार एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति अरविंद श्रीवास्तव) ने 19.03.2018 को मौखिक निर्णय सुनाते हुए अपील खारिज कर दी।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने पूरे अभिलेख का गहन परीक्षण किया: अभियोजन के छह गवाहों के मौखिक साक्ष्य, दस्तावेजी प्रदर्श, तथा दोनों पक्षों द्वारा दिए गए तर्क।

अभियोजन की ओर से छह गवाहों की जिरह हुई। पी.डब्ल्यू.1 बंगाली केवट और पी.डब्ल्यू.2 राधे केवट सूचक के चाचा थे। पी.डब्ल्यू.3 टेटरी देवी मृतक की माता थीं। पी.डब्ल्यू.4 सूचक-पिता थे। पी.डब्ल्यू.5 अन्वेषण अधिकारी रमेश्वर सिंह थे। पी.डब्ल्यू.6 डॉ. अरविंद प्रसाद थे, जिन्होंने पोस्टमॉर्टम किया।

शिकायत पत्र, औपचारिक एफआईआर, शव परीक्षण पंचनामा, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और कथित फिरौती पत्र जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत किए गए और साक्ष्य के रूप में सिद्ध किए गए। प्रत्येक अभियुक्त के पुलिस द्वारा दर्ज स्वीकारोक्ति बयानों को भी प्रदर्शित किया गया, हालांकि उनकी वैधानिक मूल्य पर प्रश्न उठाया गया।

बचाव पक्ष के प्रमुख तर्क

अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने मुख्य रूप से तीन बिंदु उठाए।

पहला, उनका कहना था कि अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि मृतक को अंतिम बार जीवित अपीलकर्ताओं की संगति में देखा गया था (“अंतिम बार साथ देखा जाना” सिद्धांत)। बिना ऐसे स्पष्ट प्रमाण के, उनके अनुसार, विचारण न्यायालय को केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि नहीं करनी चाहिए थी।

दूसरा, उन्होंने अभियुक्तों के कथित खुलासे के आधार पर शव की बरामदगी पर प्रहार किया। उन्होंने इंगित किया कि शव परीक्षण पंचनामा में दिखाया गया है कि शव 07.02.2011 को सुबह 8:30 बजे बरामद हुआ, जबकि सभी चार अपीलकर्ताओं के स्वीकारोक्ति बयान (प्रदर्श 6 से 9) उसी दिन 12:40 बजे से 1:15 बजे के बीच दर्ज किए गए। यदि शव सुबह ही बरामद हो गया था, तो अधिवक्ता के अनुसार यह सही नहीं कहा जा सकता कि शव उन स्वीकारोक्ति बयानों के “आधार पर” बरामद हुआ, जो दिन में बाद में दर्ज हुए।

तीसरा, बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि अपीलकर्ताओं की गिरफ्तारी के मेमो या गिरफ्तारी के सटीक समय के स्पष्ट साक्ष्य पेश नहीं किए गए। यह भी इंगित किया गया कि जब पुलिस ने उनके स्वीकारोक्ति बयान दर्ज किए, उस समय अभियुक्तों को किसी दंडाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया था।

इन परिस्थितियों से, बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने उच्च न्यायालय से आग्रह किया कि “अंतिम बार साथ देखे जाने” की कहानी और अभियुक्तों के कथित इशारे पर बरामदगी — दोनों संदिग्ध हैं, और इस आधार पर दोषसिद्धि निरस्त की जानी चाहिए।

अभियोजन और सूचक का पक्ष

अतिरिक्त लोक अभियोजक ने, सूचक के अधिवक्ता के सहयोग से, विचारण न्यायालय के निष्कर्षों का समर्थन किया।

उन्होंने उन निकट परिजनों और चाचाओं के साक्ष्य पर विशेष रूप से भरोसा किया जिन्होंने कहा कि मृतक को अंतिम बार श्राद्ध के दौरान या उसके तुरंत बाद चारों अपीलकर्ताओं के साथ देखा गया था।

पी.डब्ल्यू.3, माता ने बयान दिया कि उन्होंने अपने पुत्र को श्राद्ध के समय सुदामा के दरवाजे के पास चारों अपीलकर्ताओं के साथ बैठे देखा था। उन्होंने आगे कहा कि जब वह अगले दिन सुबह एक अपीलकर्ता के घर पूछताछ के लिए गईं तो उन्हें कोई संतोषजनक जानकारी नहीं मिली।

पी.डब्ल्यू.4, पिता ने गवाही दी कि भोजन करने के बाद वे श्राद्ध से घर लौट आए और अपने पुत्र को वहां चारों अपीलकर्ताओं के साथ छोड़ आए। जब लड़का रात तक घर नहीं लौटा, तो उन्होंने खोज की और अपीलकर्ताओं के घर भी गए, जहाँ वे भी अनुपस्थित थे।

पी.डब्ल्यू.1 और पी.डब्ल्यू.2 ने इस कथन का समर्थन किया और कहा कि श्राद्ध में भोजन करने के बाद मृतक चारों अपीलकर्ताओं के साथ गया था। उन्होंने रु. 1,00,000 की फिरौती की मांग वाले पत्र का भी उल्लेख किया और यह भी कहा कि बाद में, अपीलकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद, उन्होंने खुलासा किया कि मृत शरीर विजय तिवारी के खेत में दफन किया गया है, जहाँ से पुलिस ने उसे बरामद किया।

अतिरिक्त लोक अभियोजक ने पी.डब्ल्यू.5 की गवाही की ओर भी संकेत किया। अन्वेषण अधिकारी ने कहा कि दो अपीलकर्ताओं द्वारा किए गए खुलासे के आधार पर वे और पुलिस दल टॉर्च लेकर रात में चिपली गांव के दक्षिण दिशा की ओर गए। काफी खोजबीन के बाद, सूर्योदय तक उन्हें विजय तिवारी के खेत में वह स्थान मिला जहाँ शव दफन था। उसे सड़ी-गली अवस्था में, दुर्गंध के साथ निकाला गया और कपड़ों से पिता एवं अन्य लोगों द्वारा पहचान की गई।

स्वीकारोक्ति के समय संबंधी मुद्दे पर, राज्य ने स्वीकार किया कि औपचारिक स्वीकारोक्ति बयान शव बरामद होने के बाद दर्ज किए गए थे। तथापि, उसका तर्क था कि महत्वपूर्ण बात यह है कि वास्तविक रूप से शव अपीलकर्ताओं द्वारा पूर्व में किए गए खुलासे के आधार पर ही ढूंढा गया, और इस बरामदगी पर अब भी भरोसा किया जा सकता है।

सूचक के अधिवक्ता ने यह भी निष्पक्ष रूप से कहा कि यद्यपि फिरौती पत्र प्राप्त हुआ था और फिरौती के लिए अपहरण का आरोप लगाया गया था, किंतु विचारण के दौरान धारा 364 आईपीसी के तहत अपहरण का अपराध अंततः सिद्ध नहीं हो सका।

चिकित्सीय साक्ष्य

पोस्टमॉर्टम पी.डब्ल्यू.6, डॉ. अरविंद प्रसाद द्वारा 08.02.2011 को दोपहर 1:00 बजे किया गया।

उन्होंने पाया कि सिर छठी ग्रीवा कशेरुका के स्तर से धड़ से अलग था, जिसके किनारे साफ कटे हुए थे, तथा श्वासनली और अन्ननलिका जैसी महत्वपूर्ण संरचनाएँ तेज धार वाले हथियार से काटी गई थीं। शरीर अत्यधिक सड़न अवस्था में था और विभिन्न भाग लुप्त या द्रवित हो चुके थे। उन्होंने राय दी कि मृत्यु को हुए लगभग तीन से चार सप्ताह का समय बीत चुका था।

डॉक्टर ने निष्कर्ष निकाला कि मृत्यु का कारण गर्दन पर तेज धारदार हथियार से चोट लगने के कारण हुआ शॉक और रक्तस्राव था। जिरह में उन्होंने स्पष्ट किया कि पूर्ण सड़न के मामलों में घावों के प्रकारों में भेद करना कठिन हो सकता है, परंतु इस मामले में शरीर पूरी तरह सड़ा हुआ नहीं था।

उच्च न्यायालय की तर्क-पद्धति

समस्त साक्ष्य का मूल्यांकन करने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय से सहमति व्यक्त की।

स्वीकारोक्ति बयानों के संबंध में न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण भेद किया। उसने माना कि शव बरामद होने के बाद पुलिस द्वारा दर्ज की गई औपचारिक स्वीकारोक्तियाँ, चूँकि पुलिस के समक्ष की गईं और शव मिलने के बाद दर्ज हुईं, इस रूप में “कोई प्रासंगिकता” नहीं रखतीं। किंतु न्यायालय ने यह भी माना कि अन्वेषण अधिकारी के बयानानुसार, अपीलकर्ताओं द्वारा किए गए खुलासे के आधार पर शव की बरामदगी मात्र समय के इस अंतर से संदिग्ध नहीं हो जाती।

खंडपीठ ने उल्लेख किया कि पी.डब्ल्यू.5 ने स्पष्ट कहा कि दो अपीलकर्ताओं के खुलासे पर वे विजय तिवारी के खेत गए, कई स्थानों पर खोज की और अंततः सूर्योदय के समय दफन शव को ढूंढा, जिसे बाद में ग्रामीणों की उपस्थिति में निकाला गया। न्यायालय को इस बरामदगी के विवरण पर शंका करने का कोई कारण नहीं लगा।

इसके बाद न्यायालय ने “अंतिम बार साथ देखे जाने” के साक्ष्य की ओर रुख किया। उसने देखा कि पी.डब्ल्यू.1, पी.डब्ल्यू.2, पी.डब्ल्यू.3 और पी.डब्ल्यू.4 ने लगातार यह बयान दिया कि मृतक को श्राद्ध समारोह में चारों अपीलकर्ताओं की संगति में अंतिम बार देखा गया था। विशेष रूप से माता (पी.डब्ल्यू.3) और पिता (पी.डब्ल्यू.4) ने स्पष्ट और विशिष्ट साक्ष्य दिया कि जब उन्होंने अपने पुत्र को अंतिम बार जीवित देखा, वह चारों अपीलकर्ताओं के साथ था।

जिरह के दौरान बचाव पक्ष इन गवाहों की गवाही को किसी भी महत्वपूर्ण बिंदु पर हिलाने में असफल रहा। न्यायालय ने यह भी कहा कि यद्यपि श्राद्ध में बहुत से ग्रामीण उपस्थित थे, इससे उन परिजनों की स्पष्ट गवाही कमजोर नहीं होती जिन्होंने विशेष रूप से अपीलकर्ताओं के साथ मृतक को देखे जाने की बात कही।

इन परिस्थितियों को एक साथ देखते हुए — (i) अंतिम बार साथ देखे जाने के साक्ष्य, (ii) अपीलकर्ताओं के खुलासे के आधार पर छिपाकर दफन स्थान से शव की बरामदगी, (iii) शव की अवस्था और चिकित्सक की राय कि यह हत्या का मामला है — उच्च न्यायालय ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला पूर्ण है और केवल अपीलकर्ताओं के ही दोष की ओर संकेत करती है।

तदनुसार, न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि विशेष न्यायाधीश द्वारा यह कहना कि अपीलकर्ताओं ने साझा अभिप्राय से अरविंद की हत्या की और शव को दफन करके साक्ष्य को नष्ट किया, किसी त्रुटि से ग्रस्त नहीं है।

फलस्वरूप, आपराधिक अपील खारिज कर दी गई। चारों अपीलकर्ताओं की धारा 302/34 और 201 आईपीसी के तहत दोषसिद्धि तथा सत्र न्यायाधीश द्वारा दी गई सजाएँ पूर्ण रूप से बरकरार रखी गईं।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन परिवारों और वकीलों के लिए महत्वपूर्ण है जो मुख्यतः परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित हत्या के मामलों से जूझ रहे हैं।

पहला, यह दर्शाता है कि यदि निकट संबंधियों द्वारा दिया गया “अंतिम बार साथ देखा गया” वाला साक्ष्य जिरह में मजबूत बना रहे, तो पटना उच्च न्यायालय उस पर भरोसा करने के लिए तैयार है। किसी समारोह में लोगों की अधिक संख्या होने के बावजूद, यदि विशेष रूप से यह गवाही हो कि मृतक को अंतिम बार किन अभियुक्तों के साथ देखा गया था, तो वह पर्याप्त हो सकती है।

दूसरा, निर्णय स्पष्ट करता है कि भले ही पुलिस द्वारा दर्ज औपचारिक स्वीकारोक्ति बयान कानूनी रूप से कमजोर या अप्रासंगिक हों, किंतु यदि अभियुक्तों द्वारा दी गई सूचना के आधार पर किसी छिपे स्थान से वास्तव में शव बरामद हो जाए और अन्वेषण अधिकारी इसे समुचित रूप से सिद्ध कर दे, तो उस बरामदगी का उपयोग अभियुक्तों के विरुद्ध किया जा सकता है।

तीसरा, यह मामला रेखांकित करता है कि फिरौती या अपहरण का आरोप (जैसे धारा 364 आईपीसी) पूर्ण रूप से सिद्ध न हो पाने के बावजूद, यदि हत्या (धारा 302 आईपीसी) और साक्ष्य नष्ट करने (धारा 201 आईपीसी) के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हो, तो न्यायालय उन धाराओं के तहत दोषसिद्धि से नहीं रुकेगा।

साधारण पाठकों के लिए संदेश यह है कि गुमशुदगी और बाद में शव बरामद होने वाले मामलों में छोटी-छोटी बातें — व्यक्ति को अंतिम बार किसने, किनके साथ देखा, परिवार ने क्या कदम उठाए, शव कैसे बरामद हुआ — अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती हैं। जब पुलिस मामला दर्ज नहीं करती, तब यहाँ की तरह न्यायालय में परिवाद दायर कर तुरंत कदम उठाना भी जांच को आगे बढ़ाने में उपयोगी हो सकता है।

कानूनी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या अभियोजन यह सिद्ध कर सका कि मृतक को अंतिम बार अपीलकर्ताओं के साथ देखा गया और वे ही उसकी हत्या के लिए जिम्मेदार थे, संदेह से परे?
    उत्तर: हाँ। पी.डब्ल्यू.1, पी.डब्ल्यू.2, पी.डब्ल्यू.3 और पी.डब्ल्यू.4 की यह सतत गवाही कि मृतक को श्राद्ध में अंतिम बार अपीलकर्ताओं के साथ देखा गया था, स्वीकार की गई और जिरह में उस पर कोई गंभीर संदेह नहीं उठ पाया।
  • प्रश्न: क्या तब भी शव की बरामदगी पर भरोसा किया जा सकता है, जब अपीलकर्ताओं के औपचारिक स्वीकारोक्ति बयान शव बरामद होने के बाद और केवल पुलिस के समक्ष दर्ज किए गए हों?
    उत्तर: हाँ। यद्यपि पुलिस के समक्ष बाद में दर्ज स्वीकारोक्ति बयान अप्रासंगिक माने गए, पर न्यायालय ने अन्वेषण अधिकारी के इस साक्ष्य को स्वीकार किया कि वास्तव में शव अपीलकर्ताओं द्वारा पूर्व में दिए गए खुलासे के आधार पर ढूंढकर बरामद किया गया था।
  • प्रश्न: क्या फिरौती के लिए अपहरण को सिद्ध करने में कमी या गिरफ्तारी मेमो जैसे जांच संबंधी अभिलेखों में खामियाँ हत्या की दोषसिद्धि को उलटने के लिए पर्याप्त थीं?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि ऐसी कमियों के बावजूद, अंतिम बार साथ देखे जाने और शव बरामदगी से संबद्ध मुख्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य ने हत्या और साक्ष्य नष्ट करने का अपराध सिद्ध कर दिया, इसलिए दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी गई।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • निर्णय के पाठ में किसी पूर्ववर्ती निर्णय का नाम लेकर उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है। कोई विशिष्ट नज़ीर उद्धृत नहीं है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Appeal (DB) No. 868 of 2014; arising out of Durgawati P.S. Case No. 7 of 2011, District Kaimur (Bhabhua)

मामला शीर्षक: Bhajan Kewat & Ors v. The State of Bihar

उद्धरण: 2019(3) PLJR 260

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Rakesh Kumar and Hon’ble Mr. Justice Arvind Srivastava

पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 19.03.2018

विचारण न्यायालय: Sessions Trial No. 231 of 2011, Court of the Sessions Judge, Kaimur at Bhabhua

दोषसिद्धि: Sections 302/34 and 201 IPC

सजा: Section 302/34 IPC के तहत प्रत्येक को आजीवन कारावास और रु. 15,000 का जुर्माना (अदायगी न होने पर छह माह का सश्रम कारावास), तथा Section 201 IPC के तहत तीन वर्ष का सश्रम कारावास; सजाएँ साथ-साथ चलने योग्य

अधिवक्ता:

  • अपीलकर्ताओं की ओर से: Shri Vikramdeo Singh, Advocate; Shri Sada Nand Roy, Advocate
  • राज्य की ओर से: Shri Ajay Mishra, Additional Public Prosecutor
  • सूचक की ओर से: Shri Rajni Kant Pandey, Advocate

मामले का स्वरूप: हत्या एवं साक्ष्य नष्ट करने के अपराध में सत्र वाद की दोषसिद्धि एवं सजा के विरुद्ध दायर आपराधिक अपील (खंडपीठ)।

पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in Cr. App (DB) No. 868 of 2014

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