अवैध पुलिस बर्खास्तगी आदेश रद्द और नयी कार्यवाही का निर्देश — पटना उच्च न्यायालय, 2022

Urvashi Bharti

Reviewed by: Urvashi Bharti

License Number: BR/3533/2024

Urvashi Bharti is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in banking regulations and arbitration matters. She represents clients in regulatory compliance issues, arbitration proceedings, and banking sector disputes before the Patna High Court and other forums. Her practice handles commercial arbitration, banking litigation, and dispute resolution for corporate clients and financial institutions.

सात याचिकाकर्ताओं ने पुलिस बल से अपनी बर्खास्तगी तथा बाद में दिए गए अपने प्रतिवेदनों की अस्वीकृति को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने 2019 के अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने प्राधिकरणों को मृत कांस्टेबलों के परिजनों के लिए मौद्रिक लाभों पर पुनर्विचार करने तथा दो जीवित कांस्टेबलों के संबंध में विधिसम्मत विभागीय कार्रवाई करने का निर्देश दिया। यदि राज्य विलंब करती है, तो इन दोनों को बकाया वेतन तथा पुनर्नियोजन (पुनः बहाली) का अधिकार होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार पुलिस में वर्ष 1994 में कांस्टेबल के पद पर की गई नियुक्तियों से उत्पन्न हुआ है। चार व्यक्ति — स्व. दीप नारायण राम, स्व. रामाशंकर महतो, रमेश्वर प्रसाद सिंह और਍ ਛੇਡੀ मंडल — का चयन किया गया और 16.09.1994 को उन्हें कांस्टेबल के रूप में नियुक्त किया गया।

उन्होंने लगभग नौ वर्ष तक सेवा दी। 18.01.2003 को जिला आदेश सं. 40/2003, जो ज्ञापन सं. 71 दिनांक 18.01.2003 के माध्यम से जारी किया गया, द्वारा उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। दिया गया कारण यह था कि उनकी नियुक्तियां तत्कालीन पुलिस महानिदेशक-सह-पुलिस महानिरीक्षक द्वारा विधि या प्रासंगिक विनियमों के अनुसार उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना अवैध रूप से की गई थीं।

अपने आप को आहत महसूस करते हुए, प्रभावित कांस्टेबलों ने और बाद में मृत कांस्टेबलों के विधिक उत्तराधिकारियों ने पटना उच्च न्यायालय की शरण ली और CWJC सं. 9595/2003 दायर किया। उस रिट याचिका का निर्णय 30.08.2018 को किया गया।

2018 के निर्णय में न्यायालय ने नोट किया कि पक्षकार इस बात पर सहमत थे कि L.P.A. सं. 1584/2017 (दिनांक 31.01.2018) में पारित आदेश के समान आदेश इस मामले को संचालित करेगा। तदनुसार, उच्च न्यायालय ने 18.01.2003 की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया। न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं या उनके विधिक उत्तराधिकारियों को निर्देश दिया कि वे आदेश की प्रमाणित प्रति एवं सभी प्रासंगिक अभिलेखों के साथ बिहार के पुलिस महानिदेशक के समक्ष जाएं। डीजीपी को निर्देशित किया गया कि वे L.P.A. सं. 1584/2017 में की गई टिप्पणियों को लागू करते हुए उनके दावों की 60 दिनों के भीतर जांच करें।

उस स्वतंत्रता के परिणामस्वरूप, पुलिस महानिदेशक के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत किए गए। बजट/अपील/कल्याण के पुलिस महानिरीक्षक के माध्यम से कार्य करते हुए, डीजीपी ने 15.04.2019 को ज्ञापन सं. 319 जारी किया। इस ज्ञापन द्वारा प्राधिकारियों ने याचिकाकर्ताओं, जिनमें विधिक उत्तराधिकारी भी शामिल थे, के प्रतिवेदनों को अस्वीकार कर दिया और पुनर्नियोजन तथा मौद्रिक लाभ देने से इंकार कर दिया।

वर्तमान मामले के सात याचिकाकर्ताओं में स्व. दीप नारायण राम और स्व. रामाशंकर महतो की विधवाएं और संतानें, साथ ही दो जीवित कांस्टेबल, रमेश्वर प्रसाद सिंह और਍ ਛੇडी मंडल शामिल हैं। इन्होंने वर्तमान रिट याचिका CWJC सं. 15289/2019 में ज्ञापन सं. 319 दिनांक 15.04.2019 तथा 18.01.2003 के मूल बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से तीन राहतें मांगीं। पहली, उन्होंने अपने प्रतिवेदनों को अस्वीकार करने वाले ज्ञापन सं. 319 दिनांक 15.04.2019 को रद्द करने की मांग की। दूसरी, उन्होंने उन्हें सेवा से बर्खास्त करने वाले जिला आदेश सं. 40/2003 (ज्ञापन सं. 71 दिनांक 18.01.2003) को रद्द करने की मांग की। तीसरी, उन्होंने एक रिट ऑफ़ मंडामस की मांग की, जिससे प्राधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे उन्हें कांस्टेबल के रूप में नियुक्त करें या मानें और सभी काल्पनिक (नोटional) लाभ, जिनमें बर्खास्तगी अवधि के लिए वेतन बकाया एवं परवर्ती लाभ ब्याज सहित शामिल हैं, प्रदान करें।

पूर्व वाद प्रक्रिया के दौरान मूल चार कांस्टेबलों में से दो — दीप नारायण राम और रामाशंकर महतो — की मृत्यु हो गई। उनके विधिक वारिसों ने मुख्यतः मृत्यु की तिथि तक के मौद्रिक लाभों के दावे को आगे बढ़ाया।

इस नये दौर में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि 15.04.2019 का विवादित ज्ञापन अवैध है क्योंकि वह बिना किसी विभागीय कार्यवाही के जारी किया गया। उनका कहना था कि एक बार 2003 का सेवा समाप्ति आदेश उच्च न्यायालय द्वारा 2018 में रद्द कर दिया गया, तो सेवा में उनका पूर्ववर्ती पद पुनः स्थापित हो गया। अतः पुनर्नियोजन से इंकार या मौद्रिक लाभ से वंचित करने जैसे किसी भी आगे के प्रतिकूल निर्णय को केवल विधिसम्मत विभागीय कार्यवाही के बाद ही लिया जा सकता था।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि मृत व्यक्तियों के विरुद्ध कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, स्व. दीप नारायण राम और स्व. रामाशंकर महतो के विरुद्ध कार्यवाही उनकी मृत्यु पर स्वतः ही समाप्त (एबेट) हो गई। इस प्रकार, उनके विधिक वारिस 18.01.2003 से लेकर संबंधित मृत्यु तिथियों तक के मौद्रिक लाभ पाने के अधिकारी हैं क्योंकि उनके विरुद्ध कोई वैध प्रचलित आदेश नहीं बचा था।

दूसरी ओर, राज्य ने अस्वीकृति आदेश का बचाव किया। उसका दावा था कि चारों कांस्टेबलों की नियुक्तियां शुरू से ही अवैध थीं क्योंकि अनिवार्य चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। इसलिए, राज्य के अनुसार, पूर्ण विभागीय जांच के बिना भी बर्खास्तगी को कायम रखा जा सकता है। राज्य ने अवैध नियुक्तियों के संदर्भ में अपने रुख का समर्थन करने के लिए पटना उच्च न्यायालय की फुल बेंच द्वारा CWJC सं. 14455/2007 व CWJC सं. 14230/2007 में 29.03.2019 को दिए गए निर्णय पर भरोसा किया। उसने तर्क दिया कि अवैध नियुक्तियों को सामान्य सुरक्षा उपायों के बिना भी रद्द किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति पी. बी. बाजंथरी ने पहले निर्विवाद तथ्यों पर गौर किया। चारों कांस्टेबलों की नियुक्ति 16.09.1994 को हुई थी, उन्होंने 18.01.2003 तक सेवा दी और 2003 का सेवा समाप्ति आदेश पहले ही पटना उच्च न्यायालय द्वारा 2018 में CWJC सं. 9595/2003 में रद्द किया जा चुका था। डीजीपी ने उस निर्णय को स्वीकार किया था तथा उस पर अमल करते हुए ही 15.04.2019 का विवादित ज्ञापन पारित किया।

इसके बाद न्यायालय ने 2003 के सेवा समाप्ति आदेश को रद्द करने के विधिक प्रभाव का परीक्षण किया। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Shree Chamundi Mopeds Ltd. v. Church of South India Trust Association, (1992) 3 SCC 1 पर भरोसा किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से “किसी आदेश को रद्द (quash)” करने और मात्र “उसके संचालन पर स्थगन (stay)” लगाने के बीच अंतर किया। जब कोई आदेश रद्द कर दिया जाता है, तो पक्षकारों की स्थिति उस स्थान पर वापिस चली जाती है जो आदेश पारित होने से पहले थी। इसके विपरीत, स्थगन आदेश के रहते मूल आदेश अस्तित्व में रहता है परंतु अप्रभावी रहता है।

इस सिद्धांत को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि 18.01.2003 के सेवा समाप्ति आदेश को रद्द करने से कांस्टेबलों की मूल स्थिति प्रभावी रूप से पुनः स्थापित हो गई। रमेश्वर प्रसाद सिंह और਍ ਛੇडी मंडल के लिए इसका अर्थ यह था कि वे जब तक विधिसम्मत नयी सेवा समाप्ति का आदेश, विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए, पारित नहीं हो जाता, तब तक पुनः कार्यरत कांस्टेबल माने जाएंगे।

दो मृत कांस्टेबलों के संदर्भ में न्यायालय ने स्वीकार किया कि उनके विरुद्ध सभी कार्यवाहियां उनकी मृत्यु पर समाप्त हो गईं। अतः उनके विधिक वारिस मौद्रिक दावों के परीक्षण के अधिकारी हैं। न्यायालय ने दर्ज किया कि स्व. दीप नारायण राम और स्व. रामाशंकर महतो के विधिक वारिस मूल सेवा समाप्ति की तिथि (18.01.2003) से लेकर मृत कर्मचारियों की मृत्यु तिथियों तक मौद्रिक लाभ पाने के अधिकारी हैं। प्राधिकारियों का कर्तव्य था कि वे इन दावों की जांच कर उन्हें निपटाएं।

न्यायालय ने जोर देकर कहा कि 2003 की सेवा समाप्ति रद्द हो जाने के बाद भी प्रतिवादियों ने बिना किसी शेष वैध आधार के पुनर्नियोजन और मौद्रिक लाभों के दावों को मात्र अस्वीकार कर दिया। जब तक विधिसम्मत प्रक्रिया के पालन के बाद कोई नया प्रतिकूल आदेश पारित न हो, तब तक याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध “कुछ भी प्रतिकूल” प्रचलित नहीं बचता।

तत्पश्चात न्यायालय ने यह देखा कि जब किसी दंडादेश को तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया जाए तो विभागीय प्राधिकारी को किस प्रकार आगे बढ़ना चाहिए। इस संदर्भ में न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ECIL v. B. Karunakaran, (1993) 4 SCC 727 तथा Chairman-cum-Managing Director, Coal India Ltd. v. Ananta Saha and others, (2011) 5 SCC 142 का अवलोकन किया। Ananta Saha के पैरा 46 से 50 का हवाला देते हुए न्यायालय ने कई सिद्धांतों को रेखांकित किया:

पहला, जब किसी दंड को तकनीकी आधार पर रद्द किया जाता है, तो विभागीय प्राधिकारी उस स्तर से नयी जांच कर सकता है जहां से दोष उत्पन्न हुआ था। किंतु ऐसी नयी जांच के लिए कर्मचारी की सेवा में पुनः बहाली आवश्यक है तथा जांच की अवधि में उसे निलंबित भी किया जा सकता है। निलंबन अवधि में नियमों के अनुसार निर्वाह भत्ता (subsistence allowance) देना होगा।

दूसरा, नयी जांच का परिणाम मूल दंडादेश की तिथि से ही प्रभावी माना जाता है। इस प्रकार, नयी जांच के बाद की विधिक स्थिति पहले सेवा समाप्ति के समय से पूरे अंतराल को आच्छादित करती है।

तीसरा, पुनः बहाली के बाद भी बकाया वेतन (back wages) का अनुदान स्वतःस्फूर्त नहीं होता। यह विवेकाधीन प्रश्न है, जिसे समस्त तथ्यों तथा न्याय, समता और सद्विवेक के सिद्धांतों को देखते हुए विभागीय प्राधिकारी या न्यायालय द्वारा तय किया जाना होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बार‑बार कहा है कि बकाया वेतन के लिए कोई कठोर, एकरूप सूत्र नहीं है।

इन सिद्धांतों के आधार पर न्यायमूर्ति बाजंथरी ने निष्कर्ष निकाला कि विभागीय प्राधिकारी को 18.01.2003 से लेकर अंतिम निर्णय तक की “बीच की अवधि” को विनियमित/निर्धारित करना आवश्यक था। स्व. दीप नारायण राम और स्व. रामाशंकर महतो के मामले में उनकी मृत्यु के कारण सारी कार्यवाहियां समाप्त हो चुकी थीं और उनके विधिक वारिस मौद्रिक लाभ पाने के अधिकारी थे, जिनका परीक्षण एवं निपटान उच्च न्यायालय के आदेश की प्राप्ति की तिथि से तीन माह के भीतर किया जाना था।

जीवित कांस्टेबलों रमेश्वर प्रसाद सिंह और਍ ਛੇडी मंडल के संबंध में न्यायालय ने नोट किया कि 2022 के निर्णय की तिथि तक भी, 30.08.2018 के पूर्ववर्ती उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में कोई नयी सेवा समाप्ति का आदेश पारित नहीं किया गया था। केवल इतना किया गया कि उनकी पुनर्नियोजन की मांग को अस्वीकार कर दिया गया।

न्यायालय ने देखा कि केवल कारण बताओ नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है। प्राधिकारियों ने यह रुख अपनाया था कि प्रारंभिक नियुक्तियां अनियमित और विधि के विपरीत थीं। तथापि, इन दोनों कांस्टेबलों का विधिवत चयन हुआ था, उन्हें 16.09.1994 को नियुक्त किया गया और उनका कार्यसंपादन संतोषजनक पाया गया था। उनकी सेवाएं दोबारा समाप्त करने से पूर्व विभागीय प्राधिकारी पर यह दायित्व था कि वह प्रासंगिक नियमों के अनुसार पूर्ण विभागीय कार्यवाही करे, जिसमें समुचित घरेलू जांच (डोमेस्टिक एन्क्वायरी) शामिल हो।

इस परिप्रेक्ष्य में न्यायालय ने माना कि 15.04.2019 का विवादित आदेश (संलग्नक‑8) टिक नहीं सकता। इसे रद्द कर दिया गया। विभागीय प्राधिकारी को निर्देश दिया गया कि वह रमेश्वर प्रसाद सिंह और਍ ਛੇडी मंडल की स्थिति को नियमित करे, विशेष रूप से 18.01.2003 से लेकर अंतिम आदेश पारित होने तक की अवधि के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के Ananta Saha (Coal India मामला) के निर्णय के आलोक में विचार करे।

न्यायालय ने स्पष्ट समयसीमा दी। विभागीय प्राधिकारी को उच्च न्यायालय के आदेश की प्राप्ति की तिथि से तीन माह के भीतर उपयुक्त कार्रवाई करनी होगी। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो डिफॉल्ट के रूप में, रमेश्वर प्रसाद सिंह और਍ ਛੇडी मंडल को 18.01.2003 से लेकर अंतिम आदेश तक की मध्यवर्ती अवधि के लिए मौद्रिक लाभों के साथ‑साथ सेवा में पुनर्नियोजन का अधिकार स्वतः प्राप्त हो जाएगा।

इन निर्देशों और टिप्पणियों के साथ रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय सरकारी कर्मचारियों, विशेषकर बिहार पुलिस के उन कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी नियुक्तियों को बाद में “अवैध” या “अनियमित” कह दिया जाता है। यह निर्णय दर्शाता है कि भले ही राज्य का मत हो कि नियुक्ति नियमों के अनुसार नहीं हुई, फिर भी कई वर्षों की सेवा के बाद केवल “अवैध” का ठप्पा लगाकर, बिना विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए, वेतन या लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि एक बार सेवा समाप्ति का आदेश रद्द हो जाने पर कर्मचारी की पूर्ववर्ती स्थिति पुनः स्थापित हो जाती है। यदि विभाग फिर भी कार्रवाई करना चाहता है, तो उसे विधिवत विभागीय कार्यवाही करनी होगी, जिसमें निष्पक्ष जांच शामिल है, और तभी कोई नया आदेश पारित किया जा सकता है।

उन कर्मचारियों के परिजनों के लिए, जिनकी मृत्यु ऐसे विवादों के दौरान हो जाती है, यह निर्णय स्पष्ट करता है कि उनके विरुद्ध कार्यवाही उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाती है। किंतु जब पूर्व सेवा समाप्ति को रद्द कर दिया गया हो और कोई वैध प्रतिकूल आदेश अस्तित्व में न हो, तब उनके विधिक वारिस मृत्यु की तिथि तक के मौद्रिक लाभों का दावा कर सकते हैं।

व्यावहारिक स्तर पर, यह निर्णय विभागों पर समयबद्ध कार्रवाई करने का दबाव डालता है। यदि वे न्यायालय द्वारा निर्धारित अवधि से अधिक विलंब करते हैं, तो उन्हें बकाया वेतन चुकाने और कर्मचारी को पुनः बहाल करने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: 2003 के सेवा समाप्ति आदेश को रद्द करने का कांस्टेबलों और उनके विधिक वारिसों की स्थिति तथा मौद्रिक दावों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
    उत्तर: सेवा समाप्ति को रद्द करने से मूल सेवा‑स्थिति पुनः स्थापित हो गई। मृत कांस्टेबलों के संबंध में, उनकी मृत्यु पर उनके विरुद्ध सभी कार्यवाहियां समाप्त हो गईं और उनके विधिक वारिस 18.01.2003 से मृत्यु की तिथि तक के मौद्रिक लाभ पाने के अधिकारी हैं। जीवित कांस्टेबलों के संबंध में कोई वैध सेवा समाप्ति आदेश प्रभावी नहीं बचा तथा बिना नयी, विधिसम्मत विभागीय कार्रवाई के उनके दावों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता था।
  • प्रश्न: क्या प्राधिकारी केवल प्रारंभिक नियुक्ति को अवैध करार देकर, बिना नयी समुचित जांच किए, जिसे पूर्व सेवा समाप्ति पहले ही रद्द की जा चुकी है, पुनर्नियोजन और बकाया वेतन से इंकार कर सकते हैं?
    उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार, जब दंड को तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया जाता है, तो प्राधिकारियों को कर्मचारी को पुनः बहाल (आवश्यक हो तो निलंबित) कर समुचित नयी विभागीय जांच करनी पड़ती है। केवल पुनर्नियोजन के अनुरोध को बिना ऐसी जांच के अस्वीकार करना विधिसम्मत नहीं है।
  • प्रश्न: यदि विभागीय प्राधिकारी न्यायालय द्वारा दी गई समय सीमा के भीतर कार्रवाई करने में विफल रहता है, तो उसके क्या परिणाम होंगे?
    उत्तर: यदि प्राधिकारी तीन माह की अवधि के भीतर उपयुक्त कार्रवाई नहीं करता, तो दोनों जीवित कांस्टेबल 18.01.2003 से लेकर अंतिम आदेश तक की मध्यवर्ती अवधि के लिए मौद्रिक लाभों तथा सेवा में पुनर्नियोजन के अधिकारी हो जाते हैं।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Shree Chamundi Mopeds Ltd. v. Church of South India Trust Association CSI Cinod Secretariat, Madras, (1992) 3 SCC 1
  • ECIL v. B. Karunakaran, (1993) 4 SCC 727
  • Chairman-cum-Managing Director, Coal India Ltd. v. Ananta Saha and others, (2011) 5 SCC 142
  • पटना उच्च न्यायालय की फुल बेंच का निर्णय दिनांक 29.03.2019, CWJC सं. 14455/2007 व CWJC सं. 14230/2007 में (राज्य द्वारा उद्धृत, यद्यपि यह अंतिम निर्देशों का आधार नहीं था)
  • L.P.A. सं. 1584/2017, पटना उच्च न्यायालय, निर्णय दिनांक 31.01.2018 (पूर्व वाद प्रक्रिया में संदर्भित)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 15289 of 2019

मामले का शीर्षक: Chandrawati Devi & Ors. v. The State of Bihar & Ors.

उद्धरण: 2022 (2) PLJR 155

पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बाजंथरी

निर्णय की तिथि: 22.03.2022 (24.03.2022 को अपलोड)

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता: श्री निरंजन कुमार, अधिवक्ता; श्री कुमार किशन, अधिवक्ता

प्रतिवादियों (राज्य) के अधिवक्ता: श्री शिव शंकर प्रसाद, SC 8; श्री अनिल कुमार, AC to SC 8

प्रतिवादी प्राधिकारी: बिहार राज्य, गृह सचिव के माध्यम से; पुलिस महानिदेशक, बिहार; पुलिस महानिदेशक-सह-पुलिस महानिरीक्षक, बिहार; डी.आई.जी., दरभंगा जोन; पुलिस अधीक्षक, कटिहार; पुलिस अधीक्षक (रेल), कटिहार; पुलिस अधीक्षक, दरभंगा; तथा निजी प्रतिवादी

मामले की प्रकृति: सेवा से बर्खास्तगी तथा प्रतिवेदनों की अस्वीकृति को चुनौती देते हुए पुनर्नियोजन एवं मौद्रिक लाभों की मांग संबंधी सिविल रिट याचिका

निर्णय का लिंक: पूरा पटना उच्च न्यायालय का निर्णय देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

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