मामले की पृष्ठभूमि
विवाद पूर्णिया जिले के के. नगर प्रखंड में कैंप साक्षात्कार प्रक्रिया के माध्यम से उर्दू शिक्षकों की भर्ती से उत्पन्न हुआ। याचिकाकर्ता ने सामान्य (अवर्गीकृत) श्रेणी में आवेदन किया था।
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष अभिलेख के अनुसार, उर्दू शिक्षक के तीन पदों के लिए अवर्गीकृत श्रेणी में 92 अभ्यर्थी थे। याचिकाकर्ता का दावा था कि उसके अंक निजी प्रतिवादी संख्या 10 से अधिक थे, जिसे अंततः नियुक्त किया गया।
याचिकाकर्ता को यह कहते हुए नियुक्ति से वंचित कर दिया गया कि कैंप साक्षात्कार के दौरान जब उसका नाम पुकारा गया, तब वह उपस्थित नहीं था। उसने इसका विवाद किया और कहा कि वह पूरे समय कैंप स्थल पर मौजूद था, पर अव्यवस्था और अफरातफरी के बीच उसका नाम कभी पुकारा ही नहीं गया।
जब अधिकारियों के समक्ष की गई उसकी शिकायत से कोई राहत नहीं मिली, तो वह जिला शिक्षक नियोजन अपीलीय प्राधिकरण, पूर्णिया (जिसे निर्णय में जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण कहा गया है) के पास गया। उस प्राधिकरण ने उसकी याचिका स्वीकार की और आदेश दिया कि उसे निजी प्रतिवादी संख्या 10 के स्थान पर उर्दू शिक्षक के रूप में बहाल किया जाए।
इसके बाद निजी प्रतिवादी संख्या 10 ने राज्य अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील संख्या 399/2018 दायर कर इस आदेश को चुनौती दी। राज्य अपीलीय प्राधिकरण ने जिला प्राधिकरण के निर्णय को निरस्त कर दिया और मुख्यतः इस आधार पर कि याचिकाकर्ता ने साक्षात्कार में अपनी उपस्थिति सिद्ध नहीं की, प्रतिवादी संख्या 10 की नियुक्ति को बरकरार रखा।
राज्य अपीलीय प्राधिकरण के आदेश से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष सिविल रिट अधिकारिता प्रकरण संख्या 10879/2019 दायर किया।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार ने रिट याचिका की सुनवाई की। न्यायालय ने कैंप साक्षात्कार में अपनाई गई भर्ती प्रक्रिया, जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण के निष्कर्षों और उन निष्कर्षों को उलटने के लिए राज्य अपीलीय प्राधिकरण द्वारा दिए गए कारणों पर विचार किया।
याचिकाकर्ता का मूल पक्ष सरल था। उसके अंक निजी प्रतिवादी संख्या 10 से अधिक थे। उसका कहना था कि वह पूरे समय कैंप स्थल पर मौजूद था। उसका दावा था कि स्थल पर भारी अफरातफरी थी और जब उसे एहसास हुआ कि उसका नाम नहीं पुकारा गया है तो वह नोडल पदाधिकारी का पता नहीं लगा सका।
इस स्थिति का सामना करते हुए उसने अधिकारियों को टेलीफोन से शिकायत की। बाद में, जब कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया गया, तो वह जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण के पास गया। अपनी उपस्थिति के दावे के समर्थन में, उसने दो साक्ष्य प्रस्तुत किए: एक अन्य अभ्यर्थी (भिन्न विषय के) का शपथ–पत्र और पंचायत समिति के एक सदस्य का शपथ–पत्र, दोनों में यह कहा गया कि प्रासंगिक तिथि को याचिकाकर्ता कैंप स्थल पर उपस्थित था।
जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण ने उसकी बात स्वीकार की। उसने माना कि याचिकाकर्ता के अंक प्रतिवादी संख्या 10 से अधिक थे और यह कि प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से संचालित नहीं की गई थी। अतः उसने निर्देश दिया कि निजी प्रतिवादी संख्या 10 को हटाकर याचिकाकर्ता को उर्दू शिक्षक के पद पर नियुक्त किया जाए।
जब इस आदेश को अपील संख्या 399/2018 में चुनौती दी गई, तो राज्य अपीलीय प्राधिकरण ने सामग्री का पुनः परीक्षण किया। उसने निष्कर्ष निकाला कि साक्षात्कार के समय याचिकाकर्ता के उपस्थित होने के संबंध में जिला न्यायाधिकरण का निष्कर्ष ठोस साक्ष्य पर आधारित नहीं था। उसने एक अन्य परिस्थिति पर भी भरोसा किया: याचिकाकर्ता की पहली शिकायत निजी प्रतिवादी संख्या 10 के विरुद्ध नहीं, बल्कि प्रतिवादी संख्या 11 (मरग़ूब क़मर) के विरुद्ध थी। इससे राज्य अपीलीय प्राधिकरण ने यह निष्कर्ष निकाला कि जब उसका नाम पुकारा गया, तब याचिकाकर्ता उपस्थित नहीं था।
राज्य अपीलीय प्राधिकरण ने कैंप साक्षात्कार प्रक्रिया के स्वरूप का भी उल्लेख किया। उसने कहा कि इस प्रणाली के तहत, अधिक अंक वाला अभ्यर्थी भी तब तक नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता जब तक कि नाम पुकारे जाने के समय वह वास्तव में उपस्थित न हो। उसने यह भी कहा कि ऐसे कैंप साक्षात्कारों का उद्देश्य शीघ्रता से चयन पूरा कर विलंब को रोकना है। इसी तर्क पर उसने अपील को स्वीकार किया और व्यवहारतः प्रतिवादी संख्या 10 की नियुक्ति को बहाल कर दिया।
पटना उच्च न्यायालय, हालांकि, राज्य अपीलीय प्राधिकरण के दृष्टिकोण से संतुष्ट नहीं हुआ। न्यायालय को एक निर्विवाद तथ्य ने विशेष रूप से प्रभावित किया: अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित साक्षात्कार रजिस्टर में अवर्गीकृत श्रेणी के 92 आवेदकों में से केवल एक अभ्यर्थी को कैंप साक्षात्कार में उपस्थित दिखाया गया था, जबकि उर्दू शिक्षक के लिए तीन पद थे।
न्यायालय ने प्रचलित बेरोजगारी की स्थिति को देखते हुए इसे “काफी अजीब” करार दिया। सरल शब्दों में, उसे यह मानना कठिन लगा कि इतने अधिक आवेदन होने के बावजूद केवल एक ही अभ्यर्थी उपस्थित हुआ होगा।
फिर न्यायालय ने यह परखा कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ता की टेलीफोनिक शिकायत के साथ कैसा व्यवहार किया। उसने कहा कि यदि वास्तव में कैंप स्थल पर अफरातफरी थी और नोडल पदाधिकारी मिल नहीं रहा था, तो शिकायत दर्ज कराने का व्यावहारिक तरीका केवल टेलीफोन ही था। न्यायालय ने माना कि ऐसी टेलीफोनिक शिकायत को याचिकाकर्ता के विरुद्ध, उसकी अनुपस्थिति का प्रमाण मानकर, इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था।
न्यायालय के मत में, यह तथ्य भी कि उसकी पहली शिकायत में प्रतिवादी संख्या 11 का नाम था, न कि प्रतिवादी संख्या 10 का, अपने–आप में यह निर्णायक प्रमाण नहीं था कि जब उसका नाम पुकारा गया, वह उपस्थित नहीं था। केवल इसी परिस्थिति के आधार पर उसके दावे को अस्वीकार नहीं किया जा सकता था।
दूसरी ओर, न्यायालय ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने कैंप स्थल पर अपनी उपस्थिति के संबंध में दो सहायक साक्ष्य प्रस्तुत किए थे: एक अन्य विषय के अभ्यर्थी का शपथ–पत्र और पंचायत समिति के सदस्य का शपथ–पत्र। जिला न्यायाधिकरण के निष्कर्षों की आलोचना करते हुए भी, राज्य अपीलीय प्राधिकरण ने इन सहायक शपथ–पत्रों को “पूरी तरह नज़रअंदाज़” कर दिया था।
न्यायालय ने आगे देखा कि राज्य अपीलीय प्राधिकरण ने जिला न्यायाधिकरण के तर्कों के कुछ हिस्सों को चुन–चुन कर स्वीकार किया और बाकी को बिना कोई समुचित कारण बताए नज़रअंदाज़ कर दिया। एक स्वीकृत स्थिति यह थी कि याचिकाकर्ता के अंक निजी प्रतिवादी संख्या 10 से अधिक थे।
न्यायालय ने कैंप साक्षात्कार प्रक्रिया के मूल नियमों को स्वीकार किया। उस प्रक्रिया के तहत, प्रत्येक श्रेणी और विषय के अभ्यर्थियों के नाम तीन बार पुकारे जाते हैं। यदि अधिक अंक वाला अभ्यर्थी भी पुकारे जाने पर उपलब्ध नहीं होता, तो उसकी दावेदारी बाद में स्वीकार नहीं की जाती, जब तक कि वह प्रक्रिया चल रही हो और उसी दौरान आ न जाए। यह पद्धति प्राथमिक और ابتدाई विद्यालयों में शिक्षक नियुक्ति को गति देने के लिए बनाई गई है।
हालाँकि, न्यायालय ने माना कि इस मामले में याचिकाकर्ता के अनुपस्थित होने के निष्कर्ष का तथ्यात्मक आधार कमजोर था। उसने एक समाचार पत्र रिपोर्ट का उल्लेख किया, जिसमें संकेत था कि प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से नहीं चलायी गई थी और याचिकाकर्ता जैसे अधिक अंक वाले अभ्यर्थियों को, जो दावा करते थे कि वे उपस्थित थे पर उनका नाम नहीं पुकारा गया, अनुपस्थिति के आधार पर नियुक्ति से वंचित किया जा रहा था।
न्यायालय के आकलन में, ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं था जो साक्षात्कार में याचिकाकर्ता की उपस्थिति को निर्णायक रूप से सिद्ध करता हो। किंतु, उतना ही प्रबल साक्ष्य उसकी अनुपस्थिति सिद्ध करने के लिए भी उपलब्ध नहीं था। इसलिए न्यायालय ने जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण और राज्य अपीलीय प्राधिकरण, दोनों के तथ्यात्मक निष्कर्षों को असंतोषजनक पाया।
ऐसी स्थिति में न्यायालय ने किसी भी अभ्यर्थी की नियुक्ति को सीधे–सीधे पुष्टि करने का मार्ग नहीं अपनाया। इसके बजाय, उसने जिला शिक्षक अपीलीय न्यायाधिकरण और राज्य अपीलीय प्राधिकरण दोनों के आदेशों को निरस्त कर दिया।
न्यायालय ने तत्पश्चात संबंधित प्रखंड में उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नए सिरे से प्रक्रिया चलाने का निर्देश दिया। उसने आदेश दिया कि वही कैंप साक्षात्कार प्रक्रिया अपनाई जाए, लेकिन साक्षात्कार की तिथि और तरीके के संबंध में सभी संबंधित व्यक्तियों को समुचित रूप से सूचना दी जाए।
न्यायालय ने निर्देश दिया कि उच्च न्यायालय के आदेश की प्रति सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन माह के भीतर यह नया अभ्यास पूरा किया जाए। आगे यह भी निर्देश दिया कि प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद सभी अनुवर्ती कार्रवाइयाँ की जाएँ।
महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने आदेश दिया कि इस बीच संबंधित प्रखंड में उर्दू शिक्षक की विद्यमान नियुक्ति के संबंध में यथास्थिति बनाए रखी जाए। इसका अर्थ यह है कि नई चयन प्रक्रिया पूरी होकर उसके परिणामों पर कार्रवाई होने तक वर्तमान नियुक्ति में कोई तात्कालिक हस्तक्षेप नहीं होगा।
इन निर्देशों और टिप्पणियों के साथ पटना उच्च न्यायालय ने रिट याचिका का निपटारा कर दिया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार में शिक्षक नियुक्ति तथा अन्य समान सरकारी नियुक्तियों के लिए कैंप साक्षात्कार में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रथम, पटना उच्च न्यायालय ने रेखांकित किया कि जब परिवेशीय तथ्यों से अनियमितता का संकेत मिलता हो, तो प्राधिकार केवल साक्षात्कार रजिस्टर या तकनीकी बिंदुओं पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं कर सकते। यदि 92 आवेदकों में से केवल एक को उपस्थित दिखाया गया हो, तो न्यायालय चयन प्रक्रिया को संदेह की दृष्टि से देखेगा।
द्वितीय, न्यायालय ने माना कि अव्यवस्थित और अराजक साक्षात्कार स्थिति में की गई टेलीफोनिक शिकायत को किसी अभ्यर्थी की अनुपस्थिति का प्रमाण मानकर उसके विरुद्ध इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। अनेक अभ्यर्थियों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों से आने वालों के लिए, समस्याएँ तत्काल दर्ज कराने का एकमात्र व्यावहारिक माध्यम फोन कॉल ही हो सकता है।
तृतीय, यह निर्णय दर्शाता है कि अपीलीय निकायों को सभी साक्ष्यों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए। वे किसी अभ्यर्थी के पक्ष में गए शपथ–पत्रों या अन्य दस्तावेजों को बिना उचित कारण बताए नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।
अंततः, कमजोर साक्ष्यों के आधार पर किसी एक अभ्यर्थी को दूसरे पर प्राथमिकता देने के बजाय, न्यायालय ने नए, पारदर्शी चयन का विकल्प चुना। यह दृष्टिकोण उस अभ्यर्थी के अधिकारों की भी रक्षा करता है जो स्वयं को पीड़ित मानता है और उस अभ्यर्थी की भी, जो पहले से नियुक्त है, साथ ही प्रशासन को निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाने के लिए बाध्य करता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: कैंप साक्षात्कार के दौरान कथित अनुपस्थिति के आधार पर ही याचिकाकर्ता का उर्दू शिक्षक के रूप में चयन न होना, संदिग्ध चयन प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों के प्रकाश में, क्या विधिसंगत था?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता की उपस्थिति या अनुपस्थिति संबंधी साक्ष्य समान रूप से अपर्याप्त थे, कैंप साक्षात्कार की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया, और दोनों अधिकरणों के आदेशों को निरस्त करते हुए नए सिरे से चयन प्रक्रिया का निर्देश दिया।
प्रश्न: जब प्रारंभिक अपीलीय प्राधिकरण और उच्च राज्य अपीलीय प्राधिकरण, दोनों ने भर्ती विवाद में असंतोषजनक और आंशिक रूप से परस्पर असंगत आदेश पारित किए हों, तब कौन–सा उपचारात्मक मार्ग अपनाया जाना चाहिए?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि उपयुक्त उपाय यह है कि दोनों आदेशों को निरस्त कर संबंधित पदों के लिए नई भर्ती प्रक्रिया का निर्देश दिया जाए, जिसे निश्चित समय–सीमा के भीतर पूरा किया जाए, और इस बीच विद्यमान नियुक्तियों के संबंध में यथास्थिति बनाए रखी जाए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- इस निर्णय के पाठ में किसी पूर्व निर्णय का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।
मामले का विवरण
प्रकरण संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 10879 of 2019
मामले का शीर्षक: Md. Wasim Reza v. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2022 (1) PLJR 135
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Ashutosh Kumar
निर्णय की तिथि: 30-11-2021
मामले का स्वरूप: कैंप साक्षात्कार के माध्यम से उर्दू शिक्षक की नियुक्ति से संबंधित राज्य अपीलीय प्राधिकरण के आदेश को चुनौती देते हुए दायर सिविल रिट अधिकारिता के तहत रिट याचिका।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता: Mr. Nasrul Hoda, Advocate; Mr. Nadimul Hasan, Advocate
राज्य प्रतिवादियों के अधिवक्ता: Mr. Jitendra Kr. Roy 1 (SC13); Mr. Hitesh Suman, AC to SC 13
प्रतिवादी संख्या 10 के अधिवक्ता: Mr. Shambhu Sharan Kumar, Advocate
प्रतिवादी संख्या 11 के अधिवक्ता: Md. Imtiyaz Hussain, Advocate
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय की वेबसाइट पर पूरा निर्णय देखें
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बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
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