मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पटना उच्च न्यायालय के समक्ष आपराधिक रिट अधिकारिता वाद संख्या 17/2023 से उत्पन्न हुआ है।
याचिकाकर्ता बिहार कैडर के 1998 बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं। निर्णय के समय वे बिहार, पटना स्थित राज्य अपराध अभिलेख ब्यूरो के पुलिस महानिरीक्षक के पद पर पदस्थ थे।
7 दिसंबर 2022 को विशेष सतर्कता इकाई (एसवीयू), पटना द्वारा एसवीयू थाना कांड संख्या 17/2022 दर्ज किया गया। यह मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (जिसमें 2018 में संशोधन किया गया) की धारा 13(1)(ख) सहपठित 13(2) सहपठित धारा 12 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी और 168 के अधीन पंजीकृत किया गया। एफआईआर को विशेष वाद संख्या 80/2022 के रूप में दर्ज किया गया है और यह माननीय विशेष न्यायाधीश, सतर्कता, पटना के समक्ष लंबित है।
एफआईआर में आरोप है कि याचिकाकर्ता ने मघध रेंज, गया के पुलिस महानिरीक्षक के रूप में अपनी पदस्थापना के समय से ही एक प्रोडक्शन कंपनी फ्राइडे स्टोरी टेलर (जिसे फ्राइडे स्टोरी टेलर प्रा. लि. भी कहा गया है) और अन्य के साथ मिलीभगत कर अवैध रूप से आमदनी की, निजी व्यापार में संलग्न हुए और अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से अधिक संपत्ति अर्जित की। यह भी आरोप है कि याचिकाकर्ता ने अपनी पुस्तक “बिहार डायरी” का वाणिज्यिक दोहन “खाकी द बिहार चैप्टर” नामक वेब सीरीज़ के माध्यम से बिना उचित अनुमति के किया, और उनकी पत्नी के बैंक खाते के माध्यम से भेजे गए भुगतान वस्तुतः उनकी ही अवैध कमाई थी।
इसे चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की आपराधिक रिट अधिकारिता में तीन मुख्य राहतों की प्रार्थना करते हुए रुख किया: एफआईआर को रद्द किया जाए; जांच को रद्द किया जाए; और अन्य उपयुक्त राहत प्रदान की जाए।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तीन प्रमुख आधारों पर एफआईआर और जांच पर हमला किया।
पहला, उनका तर्क था कि यदि एफआईआर के आरोपों को ज्यों का त्यों स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी वे किसी संज्ञेय अपराध का प्रकटन नहीं करते। उनके अनुसार, पूरे मामले की उत्पत्ति “खाकी: द बिहार चैप्टर” नामक वेब सीरीज़ से जुड़ी है, जिसके बारे में कहा गया कि वह याचिकाकर्ता की पुस्तक से प्रेरित काल्पनिक स्क्रिप्ट पर आधारित है, और यह किसी आपराधिक कदाचार का रूप नहीं ले सकता।
दलील दी गई कि मूल आरोप फ्राइडे स्टोरी टेलर एलएलपी के साथ “निजी व्यापार” में शामिल होने का है, जिससे धारा 168 आईपीसी लागू होती है, तथा कानूनी आय के अनुरूप न होने वाली आय होने का आरोप है, जिससे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(ख) आकर्षित होती है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि पी.सी. अधिनियम की धारा 13(1)(ख) की व्याख्या 1 लागू ही नहीं होगी। उनका कहना था कि एफआईआर में कहीं भी यह नहीं दर्शाया गया है कि उनके पास ऐसी धनराशि या संपत्ति पाई गई जो उनकी ज्ञात आय के स्रोतों से असंगत हो और जिसके लिए वे संतोषजनक स्पष्टीकरण न दे सकें।
उन्होंने आगे कहा कि उनकी पत्नी द्वारा फ्राइडे स्टोरी टेलर्स से प्राप्त धनराशि वैध अनुबंधों के तहत, उनकी स्वयं की सेवाओं के बदले और उनके स्वतंत्र अधिकार में प्राप्त हुई। उनके अनुसार, एफआईआर स्वयं (विशेष रूप से अनुच्छेद 5) यह दर्शाती है कि उनकी पत्नी ने लगभग 49,50,000/- रुपये बैंकिंग माध्यम से कंपनी के साथ हुए समझौतों के तहत प्राप्त किए। उनकी आय उनकी आयकर विवरणियों में दर्शाई गई और याचिकाकर्ता द्वारा बिहार सरकार को दी जाने वाली उनकी वार्षिक संपत्ति विवरणी में भी घोषित की गई। इस आधार पर यह दलील दी गई कि ऐसी धनराशि को उनकी “असंगत संपत्ति” नहीं माना जा सकता।
उन्होंने उच्चतम न्यायालय के निर्णयों, जिनमें डीएसपी चेन्नई विरुद्ध के. इनबासगरन और अखिलेश यादव विरुद्ध विश्वनाथ चतुर्वेदी में पारित आदेश शामिल हैं, पर भरोसा करते हुए तर्क दिया कि किसी लोक सेवक की पत्नी की संपत्ति और आय को स्वतः ही लोक सेवक की संपत्ति और आय नहीं माना जा सकता, विशेषतः असंगत संपत्ति के मामले में।
धारा 168 आईपीसी (लोक सेवक द्वारा अवैध रूप से व्यापार में संलग्न होना) के संबंध में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने केवल 2 नवंबर 2018 को फ्राइडे मूवीज़ एंड टी.वी. प्राइवेट लिमिटेड के साथ एक प्रत्यायोजन समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत उन्होंने अपनी पुस्तक के रूपांतरण अधिकार 1/- रुपये के प्रतीकात्मक मानदेय पर दिए थे। उनका दावा था कि चूंकि उन्हें कोई वास्तविक प्रतिफल प्राप्त ही नहीं हुआ, इसलिए वे “व्यापार में संलग्न” नहीं हुए। उन्होंने गुजरात राज्य विरुद्ध महेशकुमार धीरजलाल ठाक्कर और कंवरजीत सिंह कक्कड़ विरुद्ध पंजाब राज्य पर भरोसा कर तर्क दिया कि यदि प्रत्यायोजन में प्रवेश करते समय सेवा आचरण नियमों का कोई उल्लंघन हुआ भी हो, तो भी वह धारा 168 आईपीसी या भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत स्वयं में आपराधिक अपराध नहीं बनता।
दूसरा, याचिकाकर्ता ने mala fide (दुर्भावना) का आरोप लगाया। उनका कहना था कि एफआईआर और जांच दुराशयपूर्ण हैं और एसवीयू ने संपत्तियों के मूल्य को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया, बिना आधार के विदेश यात्रा का आरोप लगाया और यहाँ तक कि जयपुर में मकान निर्माण का उल्लेख किया, जबकि ऐसा कोई सामग्री नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक वर्ष से अधिक की जांच के बाद भी एसवीयू ने कोई स्पष्ट असंगत संपत्ति परिभाषित नहीं की है।
उन्होंने सुरेन्द्र सिंह राठौड़ विरुद्ध राजस्थान राज्य, सतीश मेहरा विरुद्ध एनसीटी ऑफ दिल्ली राज्य और हरियाणा राज्य विरुद्ध भजनलाल जैसे निर्णयों पर भरोसा कर तर्क दिया कि ऐसी कथित रूप से अस्पष्ट और पक्षपातपूर्ण एफआईआर को जारी रहने देना न्यायालयीय प्रक्रिया के दुरुपयोग और “फिशिंग एंड रोविंग इन्क्वायरी” के समान होगा।
तीसरा, याचिकाकर्ता का तर्क था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के अंतर्गत पूर्व स्वीकृति के अभाव के कारण एफआईआर वैध नहीं है। उन्होंने संसदीय बहसों और भारत सरकार के दिनांक 3 सितंबर 2021 के परिपत्र, जिसमें धारा 17ए के तहत मानक कार्यप्रणालियाँ निर्धारित की गई हैं, पर भरोसा किया।
उन्होंने यशवंत सिन्हा विरुद्ध सीबीआई (पुनर्विचार आदेश), अनिल वसंतराव देशमुख विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, पंजाब राज्य विरुद्ध देविंदर पाल सिंह भुल्लर और कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय डॉ. अशोक वी. विरुद्ध स्टेट बाय लोकायुक्त ऑफ कर्नाटक इत्यादि पर भी भरोसा करते हुए तर्क दिया कि बिना ऐसी अनिवार्य पूर्व स्वीकृति के मामला दर्ज करने पर एफआईआर और उस पर आधारित समस्त जांच शून्य और गैर-Est (non est) है। उन्होंने यह भी दलील दी कि इस मामले में प्रारंभिक जांच (preliminary inquiry) आवश्यक थी, जिसके लिए उन्होंने ललिता कुमारी विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार और पी. सिराजुद्दीन विरुद्ध मद्रास राज्य पर भरोसा किया।
दूसरी ओर, एसवीयू और राज्य के अधिवक्ता ने रिट याचिका का कड़ा विरोध किया।
उनका कहना था कि एफआईआर में संज्ञेय प्रकृति के गंभीर अपराधों का उल्लेख है, जिनमें एक कार्यरत आईपीएस अधिकारी द्वारा कथित असंगत संपत्तियों का अर्जन और अवैध निजी व्यावसायिक संलग्नता शामिल हैं। उनका दावा था कि जांच एक महत्वपूर्ण चरण में है और उच्च न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
एसवीयू के अनुसार, याचिकाकर्ता को अपने पुस्तक प्रकाशन के लिए केवल पेंगुइन के माध्यम से प्रकाशन हेतु बीएसएफ के महानिदेशक से अनुमति प्राप्त थी। उन्हें फिल्म या वेब-सीरीज़ निर्माताओं के साथ समझौता करने की कोई अनुमति नहीं थी। एसवीयू ने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता की पत्नी ने 25 लाख रुपये पर “राइट असाइनमेंट एग्रीमेंट” पर हस्ताक्षर किए, जो उन्होंने अपनी कहानी पर आधारित फिल्म बनाने के अधिकार देने पर सहमति के बाद किया, और बाद में “स्टोरी कंसलटेंट” के रूप में एक अन्य समझौता किया जिसके लिए कथित रूप से उन्हें अतिरिक्त 27 लाख रुपये का भुगतान किया गया। उन्होंने कहा कि वे पहले से पेशेवर रूप से संलग्न नहीं थीं, और इतनी बड़ी राशि एक नवागत को दिया जाना इस बात की ओर संकेत करता है कि यह धन वस्तुतः याचिकाकर्ता के लिए था, जिसे उनकी पत्नी के माध्यम से भेजा गया।
उन्होंने याचिकाकर्ता और उनके परिवार के सदस्यों के अनेक बैंक खातों की ओर संकेत किया, जिनमें पर्याप्त शेष राशि थी, और दावा किया कि याचिकाकर्ता ने वेतन के अतिरिक्त “व्यवसाय” और “सट्टा व्यवसाय” से आय दिखायी है, जिस पर अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 के नियम 13(1)(क) और नियम 14 तथा धारा 168 आईपीसी के तहत प्रश्न उठते हैं। एसवीयू के अनुसार, असंगत संपत्ति का मूल्यांकन करने के लिए चेक पीरियड 1998, यानी उनकी सेवा की शुरुआत से 7 दिसंबर 2022 तक है।
प्रारंभिक जांच के मुद्दे पर, राज्य ने तेलंगाना राज्य विरुद्ध मनागीपेट और सीबीआई विरुद्ध टी.एच. विजयरलक्ष्मी पर भरोसा कर कहा कि प्रत्येक भ्रष्टाचार मामले में प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं है। यदि उपलब्ध सूचना स्वयं ही विश्वसनीय रूप से संज्ञेय अपराध का प्रकटन करती है, तो सीधे एफआईआर दर्ज की जा सकती है।
धारा 17ए के संबंध में, एसवीयू का तर्क था कि यह संरक्षण केवल उन मामलों में लागू होता है, जहाँ आरोपित अपराध किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई किसी सिफारिश या निर्णय से संबंधित हो। उनका कहना था कि जहाँ कृत्य ex facie (प्रथमदर्शनी ही) आपराधिक हो, जैसे असंगत संपत्तियों का संचय या निजी व्यापार में संलग्न होना, वहाँ पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं है। उन्होंने होरी राम सिंह विरुद्ध एम्परर, मताजोग दुबे विरुद्ध एच.सी. भारी, एस.बी. साहा विरुद्ध एम.एस. कोचर तथा उच्च न्यायालयों के निर्णय जैसे टी.ओ. सूरज विरुद्ध केरल राज्य, सतीश पांडेय विरुद्ध भारत संघ, शंकर भट विरुद्ध केरल राज्य और राजेन्द्र प्रसाद विरुद्ध बिहार राज्य पर भरोसा किया।
एसवीयू ने उच्चतम न्यायालय के निर्णयों जैसे डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी विरुद्ध डॉ. मनमोहन सिंह, सुब्रमण्यम स्वामी विरुद्ध निदेशक, सीबीआई, अधीक्षक पुलिस, सीबीआई विरुद्ध तपन कुमार सिंह, निहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध अमन कुमार सिंह और कर्नाटक राज्य विरुद्ध जे. जयललिता का भी संदर्भ दिया, यह रेखांकित करते हुए कि भ्रष्टाचार और असंगत संपत्ति के मामलों में जांच के चरण पर एफआईआर रद्द करने से न्यायालयों को सामान्यतः “हैंड्स-ऑफ” दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने एफआईआर का सावधानी से परीक्षण किया। उसने उल्लेख किया कि बिना कुछ जोड़े या घटाए, एफआईआर में निहित सूचनाएँ यह आरोप दर्शाती हैं कि याचिकाकर्ता, एक लोक सेवक के रूप में, ने अवैध रूप से संपत्ति अर्जित की है और फिल्म निर्माण से जुड़ी गतिविधियों से संबंधित फ्राइडे स्टोरी टेलर्स से नियमित धनराशि उनकी पत्नी के खाते में भेजी गई, जिसमें अंतिम लाभार्थी वह स्वयं, उनकी पत्नी और उनके सहयोगी हैं।
न्यायालय ने माना कि ये आरोप, सतही रूप से स्वीकार किए जाने पर, संज्ञेय अपराधों का प्रकटन करते हैं और इसलिए जांच स्पष्ट रूप से आवश्यक है। न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि एक अन्य आरोप यह है कि याचिकाकर्ता ने एक प्रोडक्शन हाउस के साथ अवैध रूप से निजी व्यापार में प्रवेश किया और लगभग 49,62,372/- रुपये की अवैध कमाई की। न्यायालय ने राज्य के इस कथन पर भी विचार किया कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सरकारी अभिलेखों की जांच से यह प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता ने अपनी वैध आय से अधिक बड़ी चल एवं अचल संपत्तियाँ अर्जित की हैं, जिसे रिट कार्यवाही में बिना पूर्व समय पर ही परीक्षण (premature trial) किए परखा नहीं जा सकता।
न्यायालय ने इस चरण पर याचिकाकर्ता के तथ्यात्मक स्पष्टीकरणों, जैसे लेनदेन का औचित्य, उनकी पत्नी के अनुबंधों की प्रकृति या एसवीयू की गणनाओं में कथित त्रुटियों को स्वीकार करने से इंकार किया। न्यायालय ने माना कि ऐसे प्रश्न पूरी तरह जांच के दायरे में आते हैं और एफआईआर रद्द करने हेतु दायर रिट याचिका में इनका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। एसवीयू ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि किसी तार्किक निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए उसे कम से कम और छह माह का समय चाहिए।
प्रारंभिक जांच के मुद्दे पर न्यायालय ने मनागीपेट और टी.एच. विजयरलक्ष्मी में उच्चतम न्यायालय के विश्लेषण पर भरोसा किया। न्यायालय ने माना कि जहाँ विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त सूचना उपलब्ध हो और वह संज्ञेय अपराध का प्रकटन करती हो, वहाँ बिना प्रारंभिक जांच के भी एफआईआर दर्ज की जा सकती है, और केवल प्रारंभिक जांच के अभाव से mala fide सिद्ध नहीं होता। न्यायालय ने यह रेखांकित करने हेतु मनागीपेट के महत्वपूर्ण अनुच्छेदों को उद्धृत किया कि सभी भ्रष्टाचार मामलों में प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं है।
पी.सी. अधिनियम की धारा 17ए के संदर्भ में न्यायालय ने माना कि किसी लोक सेवक के विरुद्ध असंगत संपत्तियों के संचय के संबंध में यदि विश्वसनीय सूचना प्राप्त हो, तो सामान्यतः केवल धारा 17ए के आधार पर हस्तक्षेप उचित नहीं होगा, जब तक कि मामला अत्यंत विशिष्ट परिस्थितियों पर आधारित न हो। न्यायालय ने पी. सिराजुद्दीन को तथ्यों के आधार पर भिन्न बताया और देवेंद्र कुमार सिंह विरुद्ध सीबीआई में उच्चतम न्यायालय के अवलोकन का उल्लेख किया कि जब लोक सेवक का कृत्य ex facie आपराधिक हो या संज्ञेय अपराध बनता हो, तो पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं होती।
न्यायालय ने छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध अमन कुमार सिंह के निर्णय से विस्तृत उद्धरण दिया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को भ्रष्टाचार मामलों में जांच के चरण पर एफआईआर रद्द न करने और “हैंड्स-ऑफ” दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी थी, भले ही उनमें राजनीतिक रंग या कथित mala fides मौजूद हों, बशर्ते एफआईआर prima facie अपराध का प्रकटन करती हो।
एसवीयू द्वारा प्रस्तुत सामग्री का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने दर्ज किया कि आरोपों और एकत्रित साक्ष्यों के अनुसार याचिकाकर्ता ने कथित रूप से अपनी सेवा अवधि के दौरान 7 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की संपत्तियाँ अर्जित की हैं, जबकि उनकी वैध स्रोतों से कुल आय लगभग 2 करोड़ रुपये (सकल) से अधिक नहीं है। इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने एफआईआर रद्द करने या जांच रोकने के अनुरोध में कोई बल नहीं पाया।
हालाँकि न्यायालय ने त्वरित और निष्पक्ष जांच के महत्व को भी स्वीकार किया, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार का हिस्सा माना गया। न्यायालय ने हुसैनआरा खातून विरुद्ध होम सेक्रेटरी, बिहार राज्य और ए.आर. अंतुले विरुद्ध आर.एस. नायक का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार जांच चरण को भी समाहित करता है। न्यायालय ने अमर नाथ चौबे विरुद्ध भारत संघ और मोहम्मद जुबैर विरुद्ध एनसीटी ऑफ दिल्ली का भी संदर्भ दिया, यह दोहराते हुए कि न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच न तो शिथिल हो और न ही लक्षित उत्पीड़न के औजार के रूप में प्रयुक्त हो।
अंतिम निर्देशों में, रिट याचिका खारिज करते हुए न्यायालय ने विशेष सतर्कता इकाई को यह आदेश दिया कि वह जांच को छह माह के भीतर, निर्णय की तारीख से, उचित, निष्पक्ष और विधिसम्मत तरीके से पूरी कर तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाए। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि लंबित जांच को लक्षित उत्पीड़न के बहाने के रूप में प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। न्यायालय ने यह दर्ज किया कि याचिकाकर्ता पर यह दायित्व है कि आवश्यकता पड़ने पर वे जांच एजेंसी के साथ सहयोग करें। साथ ही स्पष्ट किया गया कि निर्णय में की गई कोई भी टिप्पणी जांच के दौरान याचिकाकर्ता के विरुद्ध पूर्वाग्रह का कारण नहीं बनेगी और उन्हें उपयुक्त चरण पर सभी विधिक आपत्तियाँ लेने की स्वतंत्रता रहेगी।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय लोक सेवकों और सामान्य नागरिकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
लोक सेवकों के लिए पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि यदि संगठित रूप से अव्याख्येय संपत्ति या गुप्त व्यावसायिक लेनदेन के विशिष्ट आरोप हों, तो न्यायालय सामान्यतः सतर्कता जांच को प्रारंभिक चरण में नहीं रोकेगा। यह दावा कि धनराशि केवल पत्नी के नाम पर है, या यह कि अधिकारी ने केवल सेवा नियमों का उल्लंघन किया, न कि आपराधिक कानून का, प्रायः जांच एजेंसियाँ परखेंगी, न कि एफआईआर रद्द करने की रिट याचिका में।
साथ ही, न्यायालय ने विशेष सतर्कता इकाई को यह भी याद दिलाया कि जांच अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रह सकती। शीघ्र सुनवाई का अधिकार, शीघ्र जांच के अधिकार को भी समेटे हुए है। छह माह की बाह्य सीमा निर्धारित कर और निष्पक्ष तथा विधिसम्मत प्रक्रिया पर जोर देकर न्यायालय ने समाज के भ्रष्टाचार-विरोधी हित और व्यक्ति के इस अधिकार के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया कि उसे अनंत, अनिर्धारित जांच का सामना न करना पड़े।
उन पाठकों के लिए जो दीर्घकालिक आपराधिक जांचों से स्वयं को लक्षित महसूस करते हैं, यह मामला दर्शाता है कि उच्च न्यायालय भले ही सीधे मामला निरस्त न करे, लेकिन समय-सीमा और निष्पक्षता पर निगरानी रख सकता है। जो लोग भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं, उनके लिए यह संकेत देता है कि विश्वसनीय सूचना से समर्थित एफआईआर को सामान्यतः पूरा होने तक चलने दिया जाएगा।
विधिक प्रश्न और उत्तर
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प्रश्न: क्या एसवीयू थाना कांड संख्या 17/2022 में दर्ज एफआईआर किसी संज्ञेय अपराध का प्रकटन नहीं करती, जिससे उसे प्रारंभिक स्तर पर ही रद्द किया जाना चाहिए?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि एफआईआर, ज्यों की त्यों ली जाने पर, एक लोक सेवक द्वारा अवैध रूप से संपत्ति संचय और अवैध निजी व्यापार के आरोप लगाती है और इस प्रकार भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं आईपीसी के तहत स्पष्ट रूप से संज्ञेय अपराधों का प्रकटन करती है। -
प्रश्न: क्या इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत पूर्व स्वीकृति अनिवार्य थी, जिससे उसके अभाव में एफआईआर और जांच अवैध हो जाती है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि जहाँ आरोप ex facie आपराधिक कृत्यों, जैसे असंगत संपत्तियों के संचय, से संबंधित हों, वहाँ धारा 17ए के तहत पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती और इस आधार पर हस्तक्षेप उचित नहीं है। -
प्रश्न: क्या बिना प्रारंभिक जांच के एफआईआर दर्ज करना और जांच में कथित विलंब mala fide सिद्ध करने और एफआईआर रद्द करने के लिए पर्याप्त है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि सभी भ्रष्टाचार मामलों में प्रारंभिक जांच अनिवार्य नहीं है और विश्वसनीय स्रोत से प्राप्त सूचना ने सीधे एफआईआर दर्ज करने को न्यायोचित ठहराया। हाँ, न्यायालय ने याचिकाकर्ता के शीघ्र जांच के अधिकार की रक्षा हेतु एसवीयू को छह माह के भीतर निष्पक्ष जांच पूरी करने का निर्देश दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण
- हरियाणा राज्य विरुद्ध भजनलाल, 1992 Supp (1) SCC 335
- ललिता कुमारी विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार, (2014) 2 SCC 1
- तेलंगाना राज्य विरुद्ध मनागीपेट, (2019) 19 SCC 87
- सीबीआई विरुद्ध टी.एच. विजयरलक्ष्मी, AIR 2021 SC 5041
- छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध अमन कुमार सिंह, (2023) 6 SCC 559
- देवेंद्र कुमार सिंह विरुद्ध सीबीआई, 2019 (1) Crimes 726
- अधीक्षक पुलिस, सीबीआई विरुद्ध तपन कुमार सिंह, AIR 2003 SC 4140
- निहारिका इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, AIR 2021 SC 1918
- हुसैनआरा खातून विरुद्ध होम सेक्रेटरी, बिहार राज्य, AIR 1979 SC 1360
- ए.आर. अंतुले विरुद्ध आर.एस. नायक, (1992) 1 SCC 225
- अमर नाथ चौबे विरुद्ध भारत संघ, (2021) 11 SCC 804
- मोहम्मद जुबैर विरुद्ध एनसीटी ऑफ दिल्ली राज्य, AIR 2022 SC 3649
- अर्नब रंजन गोस्वामी विरुद्ध भारत संघ, (2020) 14 SCC 12
- डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी विरुद्ध डॉ. मनमोहन सिंह, (2012) 3 SCC 64
- सुब्रमण्यम स्वामी विरुद्ध निदेशक, सीबीआई, AIR 2014 SC 2140
- होरी राम सिंह विरुद्ध एम्परर, AIR 1939 PC 43
- मताजोग दुबे विरुद्ध एच.सी. भारी, AIR 1956 SC 44
- एस.बी. साहा विरुद्ध एम.एस. कोचर, AIR 1979 SC 1841
- टी.ओ. सूरज विरुद्ध केरल राज्य, 2021 SCC Online Ker 2896
- राजेन्द्र प्रसाद विरुद्ध बिहार राज्य, 2022(4) BLJ 189
मामले का विवरण
वाद संख्या: आपराधिक रिट अधिकारिता वाद संख्या 17/2023
वाद शीर्षक: अमित लोढ़ा विरुद्ध बिहार राज्य एवं अन्य
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
निर्णय की तिथि: 22.01.2024
उद्धरण: 2024(1) PLJR 557
जिससे उत्पन्न: एसवीयू पटना थाना कांड संख्या 17/2022; विशेष वाद संख्या 80/2022, जो विशेष न्यायाधीश, सतर्कता, पटना के समक्ष लंबित है
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री पी.एन. शाही, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री शेखर सिंह, अधिवक्ता; श्री सुमित कुमार, अधिवक्ता
- विशेष सतर्कता इकाई की ओर से: श्री राणा विक्रम सिंह, अधिवक्ता
- राज्य की ओर से: श्री प्रभु नारायण शर्मा, ए.सी. टू ए.जी.
मामले का स्वरूप: भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं भारतीय दंड संहिता के तहत अपराधों के आरोप वाले सतर्कता मामले में दर्ज एफआईआर और जांच को रद्द करने की मांग वाली आपराधिक रिट याचिका।
अंतिम परिणाम: रिट याचिका खारिज। एफआईआर और जांच को बरकरार रखा गया। एसवीयू को छह माह के भीतर निष्पक्ष जांच पूरी करने का निर्देश, तथा याचिकाकर्ता को सहयोग करने के लिए बाध्य किया गया।
निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment
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