मामले की पृष्ठभूमि
विवाद मधुबनी जिला परिषद, क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र संख्या 12 के सदस्य के 2021 के चुनाव से उत्पन्न होता है। यह निर्वाचन क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए आरक्षित था। केवल EBC वर्ग के उम्मीदवार ही यहां से चुनाव लड़ सकते थे।
नामांकन की तिथियां 18.11.2021 से 24.11.2021 तक निर्धारित की गई थीं। नामांकन पत्रों की जांच 27.11.2021 को प्रस्तावित थी। उम्मीदवार 29.11.2021 तक अपना नाम वापस ले सकते थे और प्रतीक चिह्नों का आवंटन 29.11.2021 को किया गया। मतदान 12.12.2021 को हुआ और मतगणना 14.12.2021 को की गई।
वर्तमान रिट याचिकाकर्ता, जो EBC वर्ग के सदस्य हैं, ने निर्वाचन क्षेत्र संख्या 12 से नामांकन भरा। प्रतिवादी संख्या 6 ने भी 20.11.2021 को अपना नामांकन दाखिल किया और उसके साथ 15.04.2021 की दिनांक वाला जाति प्रमाणपत्र संलग्न किया, जो अंचल पदाधिकारी, बिस्फी द्वारा जारी था, जिसमें उनकी जाति “चाय” दर्शाई गई थी, जो EBC श्रेणी में आती है। अधिकरण के समक्ष चुनाव याचिकाकर्ता (रिट वाद में प्रतिवादी संख्या 5) ने भी EBC उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।
मतदान और मतगणना के बाद रिट याचिकाकर्ता को निर्वाचित घोषित किया गया। उन्हें 14,092 मत प्राप्त हुए। प्रतिवादी संख्या 5 को 12,716 मत मिले। प्रतिवादी संख्या 6 को 2,387 मत प्राप्त हुए। अन्य दो उम्मीदवार, अजय कुमार और दिलीप कुमार मंडल को क्रमशः 3,665 और 2,117 मत मिले। याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या 5 के बीच जीत का अंतर 1,376 मतों का था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने निर्वाचन क्षेत्र संख्या 12 से निर्वाचित सदस्य के रूप में शपथ ली।
असंतुष्ट होकर, प्रतिवादी संख्या 5 ने सब-जज-प्रथम, सिविल कोर्ट, बेनीपट्टी (जो चुनाव अधिकरण के रूप में कार्यरत थे) के समक्ष चुनाव वाद संख्या 02/2022 दायर किया। उनका आरोप था कि प्रतिवादी संख्या 6 ने जाली जाति प्रमाणपत्र के आधार पर चुनाव लड़ा और वास्तव में वह “नट” जाति (अनुसूचित जाति) से संबंधित है, अतः वह EBC के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के योग्य नहीं था।
अदालत ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
चुनाव अधिकरण के समक्ष प्रतिवादी संख्या 5 का मामला यह था कि उन्होंने जांच के चरण पर ही प्रतिवादी संख्या 6 के नामांकन पर आपत्ति की थी। 27.11.2021 को उन्होंने कलेक्टर के समक्ष आपत्ति दाखिल की कि प्रतिवादी संख्या 6 जाति से “नट” (अनुसूचित जाति) है और उसने जाली जाति प्रमाणपत्र का उपयोग कर स्वयं को “चाय” (EBC) दिखाकर EBC-आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ा। कार्यालय के अभिलेख में आपत्ति प्राप्ति की तिथि 29.11.2021 दर्ज हुई।
जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो प्रतिवादी संख्या 5 ने 30.11.2021 को जिला निर्वाचन पदाधिकारी (प्रतिवादी संख्या 3) के समक्ष एक और शिकायत दायर की। तब भी कोई कदम नहीं उठाया गया। इन आपत्तियों के बावजूद, प्रतिवादी संख्या 6 को चुनाव लड़ने दिया गया। प्रतिवादी संख्या 5 का आरोप था कि ऐसा उसकी मतों को “बर्बाद” करने और उसके समर्थन आधार को विभाजित करने के लिए किया गया, ताकि EBC के लिए आरक्षित सीट होने के बावजूद वह मामूली अंतर से हार जाए।
उसने दलील दी कि यदि प्रतिवादी संख्या 6 का नामांकन खारिज कर दिया गया होता, तो उसके 2,387 मतों में से अधिकांश मत प्रतिवादी संख्या 5 को मिलते और वह विजयी हो जाता। उसने यह भी आरोप लगाया कि पंचायत चुनाव पदाधिकारी-सह-अनुमंडल पदाधिकारी, बेनीपट्टी ने जिला निर्वाचन पदाधिकारी-सह-जिला दंडाधीश तथा रिट याचिकाकर्ता के प्रभाव में आकर प्रतिवादी संख्या 6 के अवैध नामांकन को वैध ठहरा दिया, जो भ्रष्ट आचरण के समान है।
चुनाव अधिकरण ने 23.02.2022 को याचिका को स्वीकार कर लिया। समन साधारण और विशेष दोनों माध्यमों से तथा आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन द्वारा प्रतिनियोजन सेवा के माध्यम से भी जारी किए गए। रिट याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या 6 उपस्थित नहीं हुए, इसलिए उनके विरुद्ध मामला एकतरफा (ex-parte) रूप से आगे बढ़ा।
प्रतिवादी संख्या 3 और 4 (चुनाव प्राधिकारी) उपस्थित हुए और अपना लिखित बयान दाखिल किया। उन्होंने कहा कि चुनाव निष्पक्ष ढंग से कराया गया, जिसमें मतगणना और परिणाम की घोषणा भी शामिल है। उन्होंने यह इंगित किया कि याचिकाकर्ता स्पष्ट मतांतर से विजयी हुआ और प्रतिवादी संख्या 6 का नामांकन सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र के आधार पर स्वीकार किया गया। मतगणना उम्मीदवारों की उपस्थिति में तथा निर्वाचन आयोग के प्रेक्षकों की देखरेख में कराई गई।
अधिकरण ने कई मुद्दों का निर्धारण किया। तीन प्रमुख मुद्दे यह थे कि क्या प्रतिवादी संख्या 6 “नट” जाति (अनुसूचित जाति) का है, क्या उसकी नामांकन पत्रावली जाली जाति प्रमाणपत्र के आधार पर भ्रष्ट आचरण अपनाकर अनुचित रूप से स्वीकार की गई, और क्या इस अनुचित स्वीकृति ने चुनाव परिणाम को इस हद तक भौतिक रूप से प्रभावित किया कि लौटाए गए प्रत्याशी का चुनाव अवैध हो गया और रद्द किया जा सके।
चुनाव याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों पर अधिकरण ने माना कि प्रतिवादी संख्या 6 वास्तव में “नट” जाति (अनुसूचित जाति) का सदस्य है और उसने क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र संख्या 12 से चुनाव लड़ने के लिए स्वयं को “चाय” (एक EBC जाति) दिखाते हुए एक जाली जाति प्रमाणपत्र प्राप्त किया। अधिकरण ने यह माना कि मधुबनी जिला परिषद, क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र संख्या 12 के सदस्य के रूप में उसका नामांकन भ्रष्ट आचरण अपनाकर अनुचित रूप से स्वीकार किया गया।
इस अनुचित स्वीकृति के प्रभाव के संबंध में अधिकरण ने यह तर्क दिया कि चूँकि रिट याचिकाकर्ता (14,092 मत) और प्रतिवादी संख्या 5 (12,716 मत) के बीच जीत का अंतर 1,376 मतों का था और प्रतिवादी संख्या 6 को 2,387 मत प्राप्त हुए, इसलिए प्रतिवादी संख्या 6 के पक्ष में पड़े मत शीर्ष दो प्रत्याशियों के बीच अंतर से “काफी अधिक” थे। उसने निष्कर्ष निकाला कि यह परिणाम को भौतिक रूप से प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है। अधिकरण ने यह भी नोट किया कि किसी भी उम्मीदवार, जिसमें रिट याचिकाकर्ता भी शामिल है, ने किसी भी स्तर पर प्रतिवादी संख्या 6 के नामांकन पर आपत्ति नहीं की और इससे उसने मिलीभगत का निष्कर्ष निकाला।
इन्हीं आधारों पर, अधिकरण ने 12.10.2022 को चुनाव याचिका स्वीकार कर ली। उसने रिट याचिकाकर्ता का चुनाव रद्द कर दिया और राज्य निर्वाचन आयोग को छह महीनों के भीतर पुनः चुनाव कराने का निर्देश दिया। उसने यह भी निर्देश दिया कि पुनः चुनाव की लागत का आकलन कर, प्रतिवादी संख्या 6 के नामांकन की अनुचित स्वीकृति के लिए उत्तरदायी अधिकारियों से वह लागत वसूल की जाए। इसके अलावा, प्रतिवादी संख्या 6 के विरुद्ध जाली जाति प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए एफआईआर दर्ज करने तथा उस समय के अंचल पदाधिकारी और रिट याचिकाकर्ता की भूमिका की जांच का भी निर्देश दिया।
रिट याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत पटना उच्च न्यायालय की शरण ली। उनका तर्क था कि अधिकरण का निर्णय पूर्णतः अनुमान पर आधारित है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं था जिससे यह सिद्ध हो कि प्रतिवादी संख्या 6 को मिले 2,387 मतों में से सभी या अधिकांश मत उसकी अनुपस्थिति में प्रतिवादी संख्या 5 को ही मिलते। चुनाव मैदान में पाँच उम्मीदवार थे। भले ही प्रतिवादी संख्या 6 ने चुनाव न लड़ा होता, उसके मत शेष चारों उम्मीदवारों के बीच विभाजित हो सकते थे। उच्च न्यायालय के समक्ष यह भी कहा गया कि यदि ये 2,387 मत अन्य उम्मीदवारों के बीच समान रूप से बांट दिए जाएँ, तब भी याचिकाकर्ता 500 से अधिक मतों के अंतर से विजयी रहता।
उन्होंने यह भी कहा कि उनके विरुद्ध न तो किसी भ्रष्ट आचरण का आरोप था और न ही यह सिद्ध हुआ कि उन्होंने अवैध मत प्राप्त किए या प्रतिवादी संख्या 6 को नामांकन दाखिल करने में कोई सहायता की। उनके अपने नामांकन या उनके संबंध में चुनाव प्रक्रिया में कोई दोष नहीं पाया गया। ऐसे में उनका चुनाव रद्द किए जाने से निर्वाचन क्षेत्र संख्या 12 के मतदाताओं को उनके चुने हुए प्रतिनिधि से बिना वैध आधार के वंचित कर दिया गया।
रक्षणीयता (maintainability) के प्रश्न पर प्रतिवादी संख्या 5 की दलील थी कि चूँकि अधिकरण का डिक्री एकतरफा (ex-parte) है, इसलिए याचिकाकर्ता का उपचार सिविल प्रक्रिया संहिता की आदेश 9 नियम 13 के तहत एकतरफा डिक्री रद्द कराने में निहित है और रिट याचिका विचारणीय नहीं है। उसने यह भी तर्क दिया कि बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 139(1)(d)(i) के तहत अनुचित नामांकन स्वीकृति के कारण पूरा चुनाव दूषित (vitiated) हो गया।
उच्च न्यायालय ने पहले रक्षणीयता के प्रश्न पर विचार किया। उसने यह नोट किया कि बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 के तहत धारा 137 के अंतर्गत चुनाव याचिका पर पारित आदेश के विरुद्ध अपील का कोई प्रावधान नहीं है। अतः अनुच्छेद 226 और 227 के तहत रिट याचिका एक उपयुक्त उपचार है।
आदेश 9 नियम 13 CPC पर आधारित आपत्ति पर न्यायालय ने कहा कि यह आपत्ति भ्रमपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों Neerja Realtors Pvt. Ltd. v. Janglu तथा N. Mohan v. R. Madhu पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि एकतरफा डिक्री से पीड़ित व्यक्ति के पास दो विकल्प होते हैं: (1) आदेश 9 नियम 13 के तहत एकतरफा डिक्री रद्द कराने का आवेदन करना, और (2) अपील दायर करना (या उपयुक्त उच्च न्यायालय/न्यायिक मंच का रुख करना)। इन उपचारों को समानांतर रूप से अपनाया जा सकता है, और केवल इस आधार पर कि आदेश 9 नियम 13 का उपचार उपलब्ध है, निर्णय के गुण-दोषों को चुनौती देने के अधिकार को रोका नहीं जा सकता। इसी तर्क से, एकतरफा चुनाव आदेश भी रिट अधिकारिता के दायरे में आता है।
प्रतिवादी संख्या 6 के नामांकन की अनुचित स्वीकृति ने क्या चुनाव परिणाम को भौतिक रूप से प्रभावित किया, इस मूल प्रश्न पर न्यायालय ने बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 की धारा 139 का परीक्षण किया, जिसमें वे आधार दिए गए हैं जिन पर चुनाव शून्य घोषित किया जा सकता है। धारा 139(1) के खंड (d) में यह अपेक्षित है कि लौटाए गए प्रत्याशी के संदर्भ में चुनाव परिणाम “भौतिक रूप से प्रभावित” हुआ हो, चाहे वह किसी नामांकन की अनुचित स्वीकृति के कारण हो, भ्रष्ट आचरण के कारण, मतों के अनुचित स्वीकार या अस्वीकार के कारण, या अधिनियम अथवा नियमों के अनुपालन न होने के कारण।
न्यायालय ने नोट किया कि लौटाए गए प्रत्याशी द्वारा किसी भ्रष्ट आचरण का आरोप नहीं था। ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं था कि उसके पक्ष में अवैध मत डाले गए या प्रतिवादी संख्या 5 के विरुद्ध वैध मतों को गलत तरीके से अस्वीकार किया गया। चुनाव रद्द करने का एकमात्र आधार अधिकरण की यह धारणा थी कि चूँकि प्रतिवादी संख्या 6 के कुल मत (2,387) जीत के अंतर (1,376) से अधिक हैं, इसलिए परिणाम भौतिक रूप से प्रभावित हुआ।
अपने पूर्ववर्ती निर्णयों Bibi Rukhsana Khatoon v. State of Bihar तथा Usha Devi v. State of Bihar का संदर्भ लेते हुए उच्च न्यायालय ने दोहराया कि केवल अनुमान के आधार पर चुनाव रद्द नहीं किए जा सकते। यह दायित्व चुनाव याचिकाकर्ता पर है कि वह संदेह से परे (beyond reasonable doubt) साबित करे कि लौटाए गए प्रत्याशी के लिए परिणाम भौतिक रूप से प्रभावित हुआ। यह दिखाया जाना आवश्यक है कि जो मत नहीं पड़े या गलत ढंग से पड़े, वे यदि सही तरीके से पड़ते तो लौटाए गए प्रत्याशी की पराजय होती।
न्यायालय ने पाया कि अधिकरण ने यह नहीं बताया कि यदि प्रतिवादी संख्या 6 का नामांकन खारिज कर दिया जाता तो उसके कितने मत प्रतिवादी संख्या 5 या अन्य उम्मीदवारों को जाते। पाँच उम्मीदवारों के चुनाव मैदान में होने की स्थिति में यह पूर्णतः काल्पनिक था कि यह मान लिया जाए कि 2,387 मतों का अधिकांश हिस्सा प्रतिवादी संख्या 5 के पक्ष में स्थानांतरित हो जाता। अतः चुनाव के भौतिक रूप से प्रभावित होने का निष्कर्ष “परिकल्पित” (hypothetical) था और प्रमाणों से समर्थित नहीं था।
न्यायालय ने केवल इस आधार पर अधिकरण द्वारा रिट याचिकाकर्ता और प्रतिवादी संख्या 6 के बीच “मिलीभगत” का निकाला गया निष्कर्ष भी अस्वीकार कर दिया कि याचिकाकर्ता ने पूर्व में प्रतिवादी संख्या 6 के नामांकन को चुनौती नहीं दी। न्यायालय ने कहा कि मिलीभगत का आरोप लगाने वाले पर ही प्रमाण का भार (burden of proof) होता है और इस प्रकार के आरोप का समर्थन करने के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय सामग्री उपलब्ध नहीं थी।
संविधान पीठ के निर्णय Jagan Nath v. Jaswant Singh (AIR 1954 SC 210) पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने जोर देकर कहा कि चुनाव संबंधी विधि की सांविधिक आवश्यकताओं का कठोरता से पालन किया जाना चाहिए। यद्यपि चुनाव प्रक्रिया की शुचिता महत्त्वपूर्ण है, फिर भी किसी निर्वाचित उम्मीदवार की सफलता में हल्के ढंग से हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। लौटाए गए प्रत्याशी को अपदस्थ करने की मांग करने वाली किसी भी याचिका को सांविधिक आवश्यकताओं का कड़ाई से पालन करना होगा और उसे स्पष्ट प्रमाणों से समर्थित होना चाहिए।
समग्र मूल्यांकन में उच्च न्यायालय ने माना कि अधिकरण का दृष्टिकोण विधि के अनुरूप नहीं था और उसकी निष्कर्ष श्रेणीबद्ध रूप से प्रत्यक्ष अवैधता (patent illegality) के दायरे में आते हैं। यह निष्कर्ष कि प्रतिवादी संख्या 6 के नामांकन की अनुचित स्वीकृति ने चुनाव को भौतिक रूप से प्रभावित किया, अनुमानों पर आधारित था, प्रमाणों पर नहीं। अतः चुनाव वाद संख्या 02/2022 में दिनांक 12.10.2022 का आदेश रद्द किए जाने योग्य था।
तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने रिट याचिका स्वीकार कर ली और अधिकरण के आदेश को निरस्त कर दिया। पुनः चुनाव कराने, अधिकारियों से चुनाव लागत वसूलने, एफआईआर दर्ज करने तथा अंचल पदाधिकारी एवं याचिकाकर्ता की भूमिका की जांच के निर्देश मुख्य आदेश के साथ ही स्वतः ही निरस्त माने गए। लागत के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया गया।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार भर में स्थानीय निकाय चुनावों के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि पंचायती राज या जिला परिषद का चुनाव परिणाम केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि गलत तरीके से स्वीकृत किसी एक उम्मीदवार को विजयी अंतर से अधिक मत प्राप्त हो गए।
जो भी व्यक्ति किसी चुनाव को अनुचित नामांकन स्वीकृति के आधार पर चुनौती देना चाहता है, उसे ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे। उसे यह दिखाना होगा कि यदि वह अनुचित उम्मीदवार मैदान में न होता, तो मतदान का पैटर्न इस प्रकार बदल जाता कि लौटाए गए प्रत्याशी की हार होती।
निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि चुनाव अधिकरण के एकतरफा (ex-parte) चुनाव आदेश को भी, आदेश 9 नियम 13 CPC के तहत आवेदन के विकल्प के बावजूद, अनुच्छेद 226 और 227 के तहत पटना उच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। उम्मीदवारों और मतदाताओं के लिए इसका अर्थ यह है कि अनुमान और अटकलों पर आधारित चुनाव अधिकरण के निर्णयों पर एक संवैधानिक निगरानी (constitutional check) उपलब्ध है।
चुनाव कराने वाले अधिकारियों के लिए यह निर्णय पुष्टि करता है कि यद्यपि उन्हें विधिसम्मत और निष्पक्ष रूप से कार्य करना होगा, फिर भी केवल ठोस और विश्वसनीय प्रमाणों के आधार पर ही यह कहा जा सकता है कि परिणाम भौतिक रूप से प्रभावित हुआ है; अन्यथा संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया को उलट-पुलट नहीं किया जाएगा।
कानूनी मुद्दे और उत्तर
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मुद्दा: जब आदेश 9 नियम 13 CPC का उपचार उपलब्ध हो, तब क्या एकतरफा चुनाव आदेश के विरुद्ध अनुच्छेद 226/227 के तहत रिट याचिका विचारणीय है?
उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि आदेश 9 नियम 13 CPC का अस्तित्व रिट अधिकारिता पर रोक नहीं लगाता। पीड़ित पक्ष एकतरफा चुनाव निर्णय को चुनौती देने के लिए भी रिट अधिकारिता का उपयोग कर सकता है। -
मुद्दा: क्या केवल इस आधार पर लौटाए गए प्रत्याशी का चुनाव रद्द किया जा सकता है कि किसी अन्य उम्मीदवार के अनुचित रूप से स्वीकार किए गए नामांकन के कारण उसे विजयी अंतर से अधिक मत प्राप्त हो गए?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होना चाहिए कि लौटाए गए प्रत्याशी के लिए परिणाम भौतिक रूप से प्रभावित हुआ। केवल विजयी अंतर और अयोग्य उम्मीदवार को मिले मतों की संख्यात्मक तुलना पर्याप्त नहीं है। -
मुद्दा: क्या केवल इस आधार पर लौटाए गए प्रत्याशी और किसी अन्य उम्मीदवार के बीच मिलीभगत का निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लौटाए गए प्रत्याशी ने दूसरे के नामांकन पर आपत्ति नहीं की?
उत्तर: नहीं। मिलीभगत का आरोप लगाने वाले पर ही प्रमाण का भार होता है और ठोस सामग्री के बिना ऐसा निष्कर्ष टिकाऊ नहीं है।
अदालत द्वारा उद्धृत मामले
- Radhey Shyam & Another v. Chhabi Nath & Ors., (2015) 5 SCC 423
- Neerja Realtors Pvt. Ltd. v. Janglu, (2018) 2 SCC 649
- N. Mohan v. R. Madhu, (2020) 20 SCC 302
- Bhanu Kumar Jain v. Archana Kumar & Another, (2005) 1 SCC 787 (बाद के मामलों के माध्यम से संदर्भित)
- Bhivchandra Shankar More v. Balu Gangaram More, (2019) 6 SCC 387 (N. Mohan में उद्धृत)
- Ram Roop Devi v. The State of Bihar & Ors., 2017 SCC OnLine Pat. 449
- Bibi Rukhsana Khatoon @ Roksana Khatoon v. The State of Bihar & Ors., 2016 (1) PLJR 109
- Usha Devi v. The State of Bihar, 2013 (2) PLJR 953
- Jagan Nath v. Jaswant Singh and Others, AIR 1954 SC 210
- Mamta Devi v. The State of Bihar & Ors., 2016 (4) PLJR 258 (पक्षकारों द्वारा संदर्भित)
- Anand Kumar v. Sri Lal Babu Rai & Ors., 2017 (3) PLJR 707 (पक्षकारों द्वारा संदर्भित)
- Shri Bhagwan Singh v. The State of Bihar & Ors., 2010 (4) PLJR 640 (पक्षकारों द्वारा संदर्भित)
- Sangita Kumari v. The State of Bihar & Ors., CWJC No. 4400 of 2019, दिनांक 08.01.2020 को निर्णयित (राज्य द्वारा संदर्भित)
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 1717 of 2023
मामले का शीर्षक: Md. Tazuddin v. The State of Bihar & Ors.
न्यायालय: हाई कोर्ट ऑफ ज्यूडिकेचर एट पटना
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार
निर्णय की तिथि: 24.11.2023
उद्धरण: 2024(1) PLJR 599
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 तथा 227 के तहत दायर रिट याचिका, जिसमें जिला परिषद चुनाव से संबंधित चुनाव अधिकरण (चुनाव वाद संख्या 02/2022) के एकतरफा निर्णय को चुनौती दी गई।
वकील:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री कल्याण शंकर, अधिवक्ता
- राज्य/प्रतिवादियों की ओर से: श्री अजय, GA-5; श्री प्रतीक कुमार सिन्हा, AC to GA-5
- बिहार राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से: श्री गिरीश पांडे, अधिवक्ता
- प्रतिवादी संख्या 5 (अधिकरण के समक्ष चुनाव याचिकाकर्ता) की ओर से: श्री शंकर कुमार ठाकुर, अधिवक्ता
- प्रतिवादी संख्या 6 की ओर से: श्री एस. एन. यादव, अधिवक्ता; श्री सरोज कुमार, अधिवक्ता
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय तक पहुँचने के लिए यहाँ क्लिक करें
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