क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक से इनकार — पटना उच्च न्यायालय, 2023

Abhishek Kumar

Reviewed by: Abhishek Kumar

License Number: BR/1810/2019

अभिषेक कुमार समविदा लॉ एसोसिएट्स में एक वकील हैं जो जीएसटी और आयकर मामलों में प्रथा करते हैं। वह पटना उच्च न्यायालय और अन्य अधिकार क्षेत्रों में कर विवाद और नियामक अनुपालन के मामलों में क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी प्रैक्टिस बिहार और आसपास के क्षेत्रों में व्यवसायों और व्यक्तियों के लिए कर मूल्यांकन कार्यवाही, जीएसटी संबंधित मामलों और व्यावसायिक विवादों को संभालती है।

यह एक अपील थी जो पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी, जिसमें तलाक और बाल संरक्षण (कस्टडी) से इनकार किया गया था।
पटना उच्च न्यायालय ने माना कि पत्नी के पास वाद दायर करने का वैध कारण (cause of action) था, परंतु वह अपने पति द्वारा की गई क्रूरता या परित्याग सिद्ध नहीं कर सकी।
तलाक का दावा और संरक्षण (कस्टडी) का दावा, दोनों ही खारिज कर दिए गए।
पारिवारिक न्यायालय का निर्णय बरकरार रखा गया और विवाह विधि की दृष्टि से अभी भी जारी माना गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार पुलिस में महिला सिपाही के रूप में कार्यरत पत्नी और कटिहार जिले के निवासी पति के बीच वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुआ। उनका विवाह 25.09.1998 को हिन्दू रीति-रिवाज के अनुसार सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद पत्नी ससुराल के घर रहने लगी। पत्नी के अनुसार, विवाह के समय विवाह व्यय के लिए भव्य उपहार और ₹1.5 लाख नकद दिए गए थे।

विवाह के शुरुआती वर्ष सौहार्दपूर्ण रहे और वैवाहिक संबंध से दो पुत्र, प्रियांसु कुमार और साकेत कुमार, पैदा हुए। 2013 में पारिवारिक न्यायालय में तलाक याचिका दायर करते समय लड़कों की उम्र क्रमशः लगभग 12 और 10 वर्ष थी।

बाद में पत्नी जिला पुलिस में सिपाही के रूप में मासिक वेतन पर नियुक्त हुई और उसे सरकारी क्वार्टर आवंटित हुआ। समय बीतने के साथ दम्पति के बीच गंभीर विवाद उत्पन्न हुए, जिसके परिणामस्वरूप अलगाव हो गया। दोनों नाबालिग पुत्र पिता के साथ रहने लगे। पत्नी का आरोप था कि बच्चों के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है और वह एक बेहतर अभिभावक सिद्ध होंगी।

2013 में पत्नी ने हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-b) के अंतर्गत अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, कटिहार के समक्ष वैवाहिक (तलाक) वाद संख्या 413/2013 दायर किया। उन्होंने तलाक की डिक्री और दोनों नाबालिग पुत्रों की कस्टडी की माँग की। पति ने वाद का प्रतिवाद किया।

12.01.2017 को पारिवारिक न्यायालय ने प्रतिवाद पर विचार करते हुए तलाक याचिका खारिज कर दी और पत्नी को कस्टडी देने से इनकार कर दिया। इससे आहत होकर पत्नी ने पटना उच्च न्यायालय में अपील संख्या 114/2017 दायर की। अपील की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी और माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार की खंडपीठ ने की। निर्णय 25.08.2023 को दिया गया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पत्नी के मुख्य आरोप थे कि छोटे पुत्र के जन्म के बाद पति का गाँव की एक अन्य महिला से घनिष्ठ संबंध हो गया और उसने व्यभिचारी जीवन जीना शुरू कर दिया। यह भी आरोप था कि पति और उसके रिश्तेदार लगातार कम दहेज और आभूषणों की शिकायत करते रहे, उसे शारीरिक एवं मानसिक क्रूरता का शिकार बनाया और अंततः उसे घर से निकाल दिया, जबकि उसके सामान और गहने अपने पास रख लिए।

उसका यह भी कहना था कि पुलिस सेवा जॉइन करने के बाद पति हर माह के अंत में उसके पदस्थापन स्थल पर आता और धमकी एवं दबाव देकर उसका वेतन जबरन ले जाता, जिससे वह किसी तरह गुजर-बसर करती थी। उसने दावा किया कि दोनों नाबालिग पुत्र, जो पति के साथ रह रहे थे, उनके साथ दुर्व्यवहार हो रहा था और चूँकि उसके पास सरकारी क्वार्टर और नियमित आय है, वह उनके शैक्षणिक जीवन और कल्याण की बेहतर देखभाल कर सकती है। कथित दुर्व्यवहार के कारण उसने माननीय एसडीजेएम, कटिहार के समक्ष भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498A के अंतर्गत परिवाद वाद संख्या 203/2013 दायर किया।

पति ने लिखित वक्तव्य में विवाह और दोनों पुत्रों के जन्म को स्वीकार किया, परंतु दहेज माँग, क्रूरता और व्यभिचार के सभी आरोपों से इनकार किया। उसका कहना था कि लगभग 15–16 वर्षों तक वैवाहिक जीवन सौहार्दपूर्ण रहा। उसके अनुसार, उसने पत्नी को पढ़ने में सहायता की, उसे मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कराई और बिहार पुलिस में सिपाही के पद पर चयनित होने में मदद की। उसका आरोप था कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाने के बाद पत्नी का व्यवहार बदल गया, उसने उसके और उसके परिवार के प्रति उपेक्षा दिखानी शुरू कर दी और बच्चों की भी परवाह करनी छोड़ दी। उसने कहा कि पत्नी ने तलाक के आधार तैयार करने के उद्देश्य से ही झूठा आपराधिक मामला दर्ज किया।

पारिवारिक न्यायालय ने सात मुद्दों का प्रारूपण किया, जिनमें वाद की ग्राह्यता, कारण कार्रवाई (cause of action) का अस्तित्व, क्या पत्नी के पास पति का साथ छोड़ने के लिए उचित कारण था, क्या उसे दहेज-संबंधी क्रूरता झेलनी पड़ी, क्या वह दोनों पुत्रों की कस्टडी की हकदार है, और क्या वह तलाक की डिक्री तथा अन्य राहत पाने की हकदार है, शामिल थे।

सबूत के तौर पर पत्नी ने स्वयं को पी.डब्ल्यू.-1 के रूप में, अपनी माँ (पी.डब्ल्यू.-2), अपने पिता (पी.डब्ल्यू.-3) और एक परिचित (पी.डब्ल्यू.-4) को गवाही में पेश किया। इन्होंने मोटे तौर पर वादपत्र में किए गए आरोपों की पुनरावृत्ति की, परंतु कोई दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। जिरह में पत्नी ने स्वीकार किया कि वह पहले पति के साथ मिलकर बच्चों की देखभाल करती थी और पहला तथा दूसरा पुत्र क्रमशः विवाह के लगभग दो और चार वर्ष बाद पैदा हुए। उसने कहा कि वह पति के साथ नहीं रहना चाहती क्योंकि वह उसे मारता-पीटता था और उसने 498A का मामला दायर करने की बात भी स्वीकार की।

माता (पी.डब्ल्यू.-2) ने बयान दिया कि पत्नी 2007 में बिहार पुलिस में चयनित हुई, उसकी पहली पोस्टिंग सुपौल में हुई और कुछ समय तक बच्चे वहीं उसके साथ रहे। उसने स्वीकार किया कि दोनों बच्चे अब अपने पिता के साथ रह रहे हैं और उसे उस महिला की पहचान नहीं पता जिससे पति के अवैध संबंध होने का आरोप लगाया गया है।

पिता (पी.डब्ल्यू.-3) और पी.डब्ल्यू.-4 ने केवल सामान्य रूप से पत्नी के कथन का समर्थन किया, परंतु कोई विशिष्ट विवरण नहीं दिया।

पति ने चार बचाव साक्षी पेश किए: दोनों पुत्रों को डी.डब्ल्यू.-1 और डी.डब्ल्यू.-2 के रूप में, एक ग्रामीण को डी.डब्ल्यू.-3 के रूप में और स्वयं को डी.डब्ल्यू.-4 के रूप में। पति की ओर से भी कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया।

डी.डब्ल्यू.-1 साकेत कुमार, बड़े पुत्र, ने कहा कि उनकी माँ ने उन्हें और उनके भाई को घर से निकाल दिया था और तब से वे पिता के साथ रह रहे हैं। उसका बयान था कि माँ के सरकारी नौकरी मिलने के बाद उसका व्यवहार उनके और पिता के प्रति बदल गया, वह उन्हें नीचा दिखाने लगी, उन्हें प्रताड़ित किया और अंततः झूठे आरोप लगाकर स्वयं अलग हो गई। उसने कहा कि पिता के पास कोई कृषिभूमि नहीं है और वह मजदूरी करके जीविकोपार्जन करते हैं, जबकि माँ लगभग ₹30,000 प्रति माह कमाती है। साकेत ने बताया कि पिता स्नेहपूर्वक दोनों पुत्रों की देखभाल करते हैं और उनकी पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। उसका कहना था कि यदि माँ को तलाक मिल गया तो वे अनाथ हो जाएंगे और उनका भविष्य नष्ट हो जाएगा।

डी.डब्ल्यू.-2 प्रियांशु कुमार, छोटे पुत्र, ने अपने भाई के बयान का समर्थन किया। उसने कहा कि उसकी माँ लगभग ₹30,000 प्रति माह कमाती है, जबकि पिता बेरोजगार हैं और ट्यूशन पढ़ाते हैं। उसने कहा कि भले ही माँ उसके साथ रखने के लिए तैयार हो, वह उसके साथ जाने से इनकार करेगा क्योंकि उसका स्वभाव और व्यवहार “बहुत खराब” है और उसने आगे यह भी आरोप लगाया कि उसकी माँ किसी और के साथ रह रही है।

डी.डब्ल्यू.-3, जो दोनों पक्षों से परिचित एक ग्रामीण था, ने मोटे तौर पर पति की लिखित बयान में ली गई स्थिति का समर्थन किया। डी.डब्ल्यू.-4, पति, ने पुनः कहा कि लगभग 15–16 वर्ष तक विवाह प्रायः सौहार्दपूर्ण रहा, उसने पत्नी को शिक्षित होने और नौकरी पाने में मदद की, और वह चाहता है कि पत्नी वापस आ जाए। उसने स्वीकार किया कि उसने हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए कोई वाद दायर नहीं किया। उसने यह भी स्वीकार किया कि पत्नी की मार्च 2007 में नियुक्ति के बाद वह और बच्चे लगभग दो वर्षों तक उसके सरकारी क्वार्टर में उसके साथ रहे और बाद में पत्नी ने उन्हें अपने साथ रहने देना बंद कर दिया।

अपील में, पटना उच्च न्यायालय ने पहले यह परखा कि क्या पत्नी के पास “cause of action” था और क्या उसकी तलाक याचिका पारिवारिक न्यायालय के समक्ष ग्राह्य (maintainable) थी। पारिवारिक न्यायालय ने यह माना था कि याचिका में cause of action का अभाव है और वह ग्राह्य नहीं है। उच्च न्यायालय ने इस निष्कर्ष से असहमति व्यक्त की।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Mayar (H.K.) Ltd. v. Vessel M.V. Fortune, I.T.C. Ltd. v. Debts Recovery Appellate Tribunal और T. Arivandandam v. T.V. Satyapal पर भरोसा करते हुए उच्च न्यायालय ने समझाया कि “cause of action” आवश्यक तथ्यों का वह समूह है, जिनका सिद्ध होना राहत पाने के लिए आवश्यक है और इसका आकलन केवल वादी की दलीलों (प्लीडिंग्स) से किया जाता है। चूँकि पत्नी की याचिका में स्पष्ट रूप से क्रूरता, परित्याग और कस्टडी का दावा किया गया था, अतः उसके पास cause of action था। उच्च न्यायालय के अनुसार पारिवारिक न्यायालय की भ्रम की स्थिति इस बात से उत्पन्न हुई कि उसने “cause of action” को आरोपों के प्रमाण से मिला दिया।

इसी प्रकार ग्राह्यता (maintainability) पर भी उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कोई वाद तभी अग्रह्य (non-maintainable) होगा जब वह सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 10 और 11 के अंतर्गत वादपत्र लौटाने या अस्वीकार करने के किसी आधार में आए। चूँकि पत्नी की याचिका ऐसे किसी भी आधार के अंतर्गत नहीं आती थी, वह पूर्णतः ग्राह्य थी। इन दो प्रारंभिक बिंदुओं पर उच्च न्यायालय ने पत्नी के पक्ष में निर्णय दिया।

इसके बाद पीठ ने मूल प्रश्नों की ओर रुख किया: क्या हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक के विधिक आधार के रूप में क्रूरता या परित्याग सिद्ध हुए हैं। निर्णय में “क्रूरता” और “परित्याग” की व्याख्या करने वाले सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों का विस्तृत सर्वेक्षण किया गया और यह रेखांकित किया गया कि:

  • साबित करने का दायित्व (burden of proof) याचिकाकर्ता पर होता है, और
  • प्रमाण का मानक “संभावनाओं का पलड़ा भारी होना” (preponderance of probabilities) है, न कि “संदेह से परे” (beyond reasonable doubt)।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायालय ने पाया कि पत्नी के क्रूरता संबंधी आरोप “सामान्य और व्यापक” (omnibus and general) थे, जिनमें तिथि, स्थान या ठोस घटनाओं का कोई विशेष उल्लेख नहीं था। यद्यपि उसने मारपीट, दहेज की माँग, व्यभिचार और वेतन जबरन लेने के आरोप लगाए, उसने किसी भी घटना का विस्तृत या पुष्ट उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। धारा 498A आईपीसी के तहत दायर परिवाद अभी लंबित था, अतः वह कोई निष्कर्षात्मक निष्कर्ष नहीं था।

न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि लंबे समय तक विवाह शांतिपूर्ण रहा, पत्नी को 2007 में सरकारी सेवा मिली और दम्पति अपने बच्चों के साथ लगभग दो वर्ष तक सरकारी क्वार्टर में रहे, बिना किसी विशेष क्रूरता की घटना को याचिका में दर्ज किए हुए। 2009 के बाद वे मुख्यतः पत्नी की पोस्टिंग के कारण अलग-अलग रहे और पत्नी ने पति तथा बच्चों को अपने साथ रहने नहीं दिया। इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने यह संभावना कम आँकी कि इस अवधि में पति को उस गंभीर क्रूरता को अंजाम देने का पर्याप्त अवसर मिला होगा, जैसा आरोप लगाया गया था।

दोनों पुत्रों की गवाही, जिन्होंने सीधे-सीधे माँ के आरोपों का खंडन किया और नौकरी मिलने के बाद उसके बदले हुए व्यवहार और उपेक्षा के बारे में कहा, को न्यायालय ने विशेष महत्व दिया। समग्र साक्ष्य का आकलन करते हुए पीठ ने माना कि पति की ओर से ऐसा कोई कृत्य सिद्ध नहीं हुआ जो इतना गंभीर और भारयुक्त हो कि पत्नी के मन में यह युक्तिसंगत आशंका पैदा हो जाए कि विवाह संबंध जारी रखना असुरक्षित है। सामान्य कहा-सुनी या साधारण कलह को धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता। अतः क्रूरता का आधार असफल रहा।

धारा 13(1)(ib) के तहत परित्याग के प्रश्न पर न्यायालय ने Bipinchandra Jaisinghbai Shah v. Prabhavati, Lachman Utamchand Kirpalani v. Meena, Savitri Pandey v. Prem Chandra Pandey और Debananda Tamuli v. Kakumoni Kataky जैसे निर्णयों पर भरोसा किया। न्यायालय ने दोहराया कि परित्याग के लिए दोनों तत्व आवश्यक हैं:

  • अलग रहने का तथ्य (factum of separation), और
  • परित्याग करने वाले जीवनसाथी की सहवास को स्थायी रूप से समाप्त करने की मंशा (animus deserendi) — साथ ही, परित्यक्त जीवनसाथी की ओर से सहमति का अभाव और उचित कारण का न होना।

पत्नी ने दलील दी थी कि उसे दहेज-संबंधी क्रूरता के कारण घर से निकाला गया। परंतु साक्ष्य में उसने यह स्पष्ट नहीं किया कि पति ने कब कथित रूप से उसे छोड़ दिया, या ऐसा परित्याग कितने समय तक जारी रहा। इसके विपरीत, पति ने लगातार उसके साथ रहने की इच्छा व्यक्त की और कहा कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद पत्नी ही अलग होना चाहती है।

उच्च न्यायालय ने ध्यान दिया कि पत्नी ने हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की कोई याचिका दायर नहीं की, जो यह दर्शाने में सहायक हो सकती थी कि वह स्वयं निर्दोष रहते हुए परित्यक्त थी। स्पष्ट दलीलों और animus deserendi के साथ दीर्घकालिक परित्याग के प्रमाण के अभाव में परित्याग का आधार भी सिद्ध नहीं माना गया।

बच्चों की कस्टडी के संबंध में न्यायालय ने यह तथ्य ध्यान में रखा कि वाद दायर होने के समय 2013 में दोनों लड़के नाबालिग थे, परंतु उच्च न्यायालय के निर्णय के समय 2023 तक वे बालिग हो चुके थे — उम्र लगभग 22 और 20 वर्ष। चूँकि अभिभावक एवं संरक्षक अधिनियम तथा हिन्दू अल्पसंख्यकता और अभिभावकता अधिनियम के अंतर्गत कस्टडी संबंधी विवाद केवल नाबालिगों से संबंधित होते हैं, इसलिए कस्टडी का प्रश्न निरर्थक (infructuous) हो गया। बालिग होने के बाद पुत्र स्वयं यह तय करने के लिए स्वतंत्र हैं कि वे कहाँ और किसके साथ रहेंगे।

निष्कर्षतः, यद्यपि उच्च न्यायालय ने “cause of action” और “maintainability” के प्रश्न पर पारिवारिक न्यायालय की त्रुटि को सुधारा, उसने अंतिम परिणाम से सहमति व्यक्त की। पत्नी क्रूरता या परित्याग को “संभावनाओं के पलड़े के भारी होने” के स्तर पर भी सिद्ध नहीं कर सकी और कस्टडी का दावा अब जीवित नहीं रहा। अपील इस प्रकार खारिज कर दी गई, पारिवारिक न्यायालय द्वारा वैवाहिक वाद की dismissal को बरकरार रखा गया और दोनों पक्षों को अपने-अपने खर्च स्वयं वहन करने के लिए कहा गया। रजिस्ट्रार जनरल को यह निर्देश दिया गया कि वह इस निर्णय की प्रति सभी पारिवारिक न्यायालयों के प्रभारियों के बीच प्रेषित करें और एक प्रति निदेशक, बिहार न्यायिक अकादमी को भी भेजें।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय विशेषकर बिहार में क्रूरता या परित्याग के आधार पर तलाक लेने की सोच रहे लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल याचिका में कड़े शब्दों में आरोप लिख देना पर्याप्त नहीं है। तलाक माँगने वाले जीवनसाथी को स्पष्ट, ठोस तथ्य और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करने होते हैं।

निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि याचिकाकर्ता अंततः साक्ष्य पर असफल हो जाए, तब भी तलाक का वाद पूर्णतः “ग्राह्य” (maintainable) हो सकता है। इससे उन वास्तविक वादियों की सुरक्षा होती है जिनके मामले तथ्यात्मक रूप से कमजोर हो सकते हैं, परंतु विधि की दृष्टि से बाधित नहीं हैं।

कार्यरत जीवनसाथियों, विशेषकर सरकारी सेवा में कार्यरत लोगों के लिए, यह मामला दर्शाता है कि केवल आर्थिक स्थिति में बदलाव विवाह तोड़ने का औचित्य नहीं बन सकता। न्यायालय दोनों पक्षों के समग्र आचरण को देखेगा, जिसमें बच्चों के साथ किया जा रहा व्यवहार और उनकी बात भी शामिल है।

अंततः, कस्टडी के मामलों में न्यायालय ने स्मरण कराया कि एक बार बच्चे बालिग हो जाएँ, तो कोई भी अभिभावक उनके ऊपर वैधानिक कस्टडी का दावा नहीं कर सकता। वयस्क पुत्र और पुत्रियाँ यह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं कि वे कहाँ और किसके साथ रहेंगे।

विधिक प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या पत्नी के पास वैध cause of action था और क्या उसकी तलाक याचिका पारिवारिक न्यायालय के समक्ष ग्राह्य (maintainable) थी?
    उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि उसकी दलीलों से cause of action प्रकट होता है और याचिका सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 10 और 11 के अंतर्गत वादपत्र लौटाने या अस्वीकार करने के किसी भी आधार में नहीं आती।
  • प्रश्न: क्या पत्नी ने पति द्वारा की गई ऐसी क्रूरता सिद्ध की जो हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक के लिए पर्याप्त हो?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि आरोप सामान्य और अप्रमाणित थे, किसी विशिष्ट घटना को सिद्ध नहीं किया गया। साक्ष्य, जिसमें पुत्रों की गवाही भी शामिल थी, पति के किसी ऐसे गंभीर या भारयुक्त दुराचार को प्रदर्शित नहीं करता जो तलाक का आधार बन सके।
  • प्रश्न: क्या पत्नी ने हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ib) के तहत पति द्वारा परित्याग सिद्ध किया?
    उत्तर: नहीं। पति द्वारा सहवास स्थायी रूप से समाप्त करने की मंशा के साथ उसे छोड़ देने की कोई स्पष्ट दलील या प्रमाण नहीं था। पति ने विवाह जारी रखने की इच्छा व्यक्त की और पत्नी ने दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए कोई वाद भी दायर नहीं किया।
  • प्रश्न: क्या पत्नी दोनों पुत्रों की कस्टडी पाने की हकदार थी?
    उत्तर: नहीं। उच्च न्यायालय के निर्णय तक दोनों पुत्र बालिग हो चुके थे, जिसके कारण कस्टडी का दावा निरर्थक हो गया। वयस्क संतानें स्वयं यह चुनने के लिए स्वतंत्र हैं कि वे कहाँ रहेंगी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Mayar (H.K.) Ltd. & Ors v. Owners & Parties, Vessel M.V. Fortune, (2006) 3 SCC 100
  • I.T.C. Ltd v. Debts Recovery Appellate Tribunal, (1998) 2 SCC 70
  • T. Arivandandam v. T.V. Satyapal and Anr., (1977) 4 SCC 467
  • Dr. Narayan Ganesh Dastane v. Sucheta Narayan Dastane, 1975 (2) SCC 326
  • Shobha Rani v. Madhukar Reddi, AIR 1988 SC 121
  • A. Jayachandra v. Aneel Kaur, 2005 (2) SCC 22
  • Mohandas Panicker v. Dakshayani, 2013 SCC Online Ker 24493
  • Gananath Pattnaik v. State of Orissa, 2002 (2) SCC 619
  • Harbhajan Singh Monga v. Amarjeet Kaur, 1985 SCC Online MP 83
  • Smt. Uma Wanti v. Arjan Dev, 1995 SCC Online P & H 56
  • Mrs. Rita Nijhawan v. Mr. Bal Krishna Nijhawan, ILR (1973) I Delhi 944
  • Samar Ghosh v. Jaya Ghosh, (2007) 4 SCC 511
  • Ravi Kumar v. Jumla Devi, 2010 SCCR 265
  • Ramchander v. Ananta, 2015 (11) SCC 539
  • Vinita Saxena v. Pankaj Pandit, (2006) 3 SCC 778
  • Bipinchandra Jaisinghbai Shah v. Prabhavati, AIR 1957 SC 176
  • Lachman Utamchand Kirpalani v. Meena, AIR 1964 SC 40
  • Savitri Pandey v. Prem Chandra Pandey, 2002 (2) SCC 73
  • Debananda Tamuli v. Kakumoni Kataky, (2022) 5 SCC 459

मामले का विवरण

मामला संख्या: Miscellaneous Appeal No. 114 of 2017; arising out of Matrimonial (Divorce) Case No. 413 of 2013 (Family Court, Katihar)

मामला शीर्षक: Savita Mandal v. Nakshtra Kumar Mandal

उद्धरण: 2024 (1) PLJR 350

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice P. B. Bajanthri and Hon’ble Mr. Justice Jitendra Kumar

निर्णय की तिथि (उच्च न्यायालय): 25.08.2023

अपीलित आदेश: Additional Principal Judge, Family Court, Katihar का दिनांक 12.01.2017 का निर्णय

अधिवक्ता:

अपीलकर्ता (पत्नी) की ओर से: Mr. Mukesh Kumar Jha, Advocate

प्रतिवादी (पति) की ओर से: Mr. Jibendra Mishra, Advocate

वाद का स्वरूप: हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(i-b) के अंतर्गत पारिवारिक न्यायालय द्वारा तलाक और बाल कस्टडी संबंधी याचिका की dismissal के विरुद्ध दायर Miscellaneous Appeal।

अंतिम परिणाम: अपील खारिज; पारिवारिक न्यायालय का निर्णय बरकरार; तलाक की कोई डिक्री नहीं; बच्चे बालिग हो जाने के कारण कस्टडी का प्रश्न निरर्थक घोषित; पक्षकार अपने-अपने खर्च स्वयं वहन करेंगे।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूरा निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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