बाल विकास परियोजना पदाधिकारी की बर्खास्तगी भ्रष्टाचार और कदाचार के लिए बरकरार — पटना उच्च न्यायालय, 2021

Shipra Sinha

Reviewed by: Shipra Sinha

License Number: BR/1674/2021

Shipra Sinha is a lawyer at Samvida Law Associates practicing family law and civil disputes. She represents clients in matrimonial matters, inheritance disputes, property-related family conflicts, and civil litigation before the Patna High Court and subordinate courts. Her practice handles family law proceedings and civil matters for individuals and families across Bihar.

पटना उच्च न्यायालय ने समाज कल्याण विभाग की एक बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के विरुद्ध पारित बर्खास्तगी आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया। अधिकारी ने 2012 की मूल बर्खास्तगी तथा 2019 में उसकी पुनरीक्षण याचिका की अस्वीकृति – दोनों को चुनौती दी थी। न्यायालय ने पाया कि रिश्वतखोरी, उत्पीड़न और कदाचार के गंभीर आरोप विभागीय कार्यवाही में विधिवत सिद्ध हो चुके हैं। अतः सेवा से बर्खास्तगी यथावत बनी रहती है और रिट याचिका खारिज कर दी गई है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता को प्रारंभ में समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार में महिला पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। 14.01.2009 को उन्हें बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) के पद पर पदोन्नत किया गया और रोहतास जिले के तिलौथू में पदस्थापित किया गया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, तिलौथू परियोजना के अंतर्गत आंगनवाड़ी केन्द्रों में भ्रष्टाचार को उजागर करने के बाद उन्हें प्रताड़ित किया गया। उन्हें 21.04.2010 के आदेश द्वारा निलंबित कर दिया गया।

उन्होंने निलंबन आदेश को CWJC संख्या 7654/2010 में चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय की समन्वय पीठ ने 18.11.2010 के आदेश द्वारा निलंबन में हस्तक्षेप नहीं किया, परंतु अनुशासनिक प्राधिकारी को निर्देश दिया कि आदेश प्राप्त होने की तिथि से छह माह के भीतर विभागीय कार्यवाही का निष्पादन कर लिया जाए। यदि निर्धारित समय में कार्यवाही पूर्ण न हो, तो प्राधिकारी को उनके निरंतर निलंबन पर पुनर्विचार करना था।

याचिकाकर्ता ने L.P.A. संख्या 34/2011 में अपील दायर की। द्वैपीठ ने 15.03.2012 के आदेश से निर्देश दिया कि यदि 31.03.2012 तक विभागीय कार्यवाही में अंतिम आदेश पारित न किया गया, तो 21.04.2010 का निलंबन स्वतः निरस्त मानकर 01.04.2012 से उन्हें पद पर पुनर्स्थापित किया जाएगा।

इसी बीच, 07.05.2010 की स्मारपत्रयुक्त संकल्प के द्वारा, जो राज्यपाल के आदेश से समाज कल्याण विभाग के उप सचिव द्वारा निर्गत था, उनके विरुद्ध नियमित विभागीय कार्यवाही आरंभ की गई। प्रपत्र-‘क’ में आरोप निर्धारित किए गए और उनके साथ आधारभूत सामग्री संलग्न की गई।

जांच के दौरान, 10.12.2010 के पत्र द्वारा उन्हें अपना प्रतिरक्षण प्रस्तुत करने के लिए कहा गया। उन्होंने 21.12.2010 को उत्तर दिया और आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।

जांच पदाधिकारी ने 07.02.2011 को प्रथम जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें सभी आरोप सिद्ध माने गए। अनुशासनिक प्राधिकारी ने उसके बाद निर्देश दिया कि आंगनवाड़ी सेविकाओं के वे बयान, जिनमें रिश्वत के आरोप थे, अभियुक्त अधिकारी की उपस्थिति में दर्ज किए जाएं ताकि वह उनका प्रतिपरीक्षण कर सके। इस उद्देश्य से मामला पुनः जांच पदाधिकारी को सौंपा गया।

तत्पश्चात, चौदह आंगनवाड़ी सेविकाओं के बयान याचिकाकर्ता और उनके अधिवक्ता की उपस्थिति में गवाह के रूप में दर्ज किए गए। उन्होंने रिश्वत, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के अपने पूर्व आरोपों को दोहराया। इसी आधार पर 01.04.2011 की दूसरी जांच प्रतिवेदन में भी आरोपों को सिद्ध माना गया।

29.04.2011 की दिनांक से दूसरा कारण बताओ नोटिस, दोनों जांच प्रतिवेदनों की प्रतियों के साथ, याचिकाकर्ता को जारी किया गया। उन्होंने 18.05.2011 को उत्तर दाखिल कर यह कहा कि कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ है।

उपलब्ध सामग्री पर विचार कर अनुशासनिक प्राधिकारी ने सेवा से बर्खास्तगी की सजा प्रस्तावित की और अभिसमर्थन हेतु अभिलेख बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) को भेज दिए। BPSC ने 28.03.2012 की संकल्प द्वारा मत व्यक्त किया कि बर्खास्तगी आरोपों की तुलना में असंगत रूप से कठोर है।

इस मत के बावजूद विभाग ने प्रकरण पर कार्यवाही जारी रखी और मंत्रिपरिषद से स्वीकृति प्राप्त की। 10.04.2012 को हुई बैठक में, कार्यसूची संख्या 5 के अंतर्गत, मंत्रिपरिषद ने बर्खास्तगी के प्रस्ताव को अनुमोदित कर दिया। फलस्वरूप, समाज कल्याण विभाग के सचिव द्वारा 27.04.2012 को याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त करने का दंडादेश पारित किया गया।

उन्होंने बाद में इस बर्खास्तगी आदेश को CWJC संख्या 1173/2015 में चुनौती दी। 18.01.2019 के आदेश द्वारा समन्वय पीठ ने मेरिट पर विचार नहीं किया, बल्कि उन्हें बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 24(2) के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता दी।

इस स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए, उन्होंने 07.02.2019 को अपीलीय प्राधिकारी सह प्रधान सचिव, समाज कल्याण विभाग के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की। पुनरीक्षण प्राधिकारी के रूप में कार्य करते हुए अपर मुख्य सचिव ने 31.05.2019 के विस्तृत आदेश द्वारा पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी, जिसकी सूचना 18.06.2019 की स्मारपत्र द्वारा दी गई।

तत्पश्चात वर्तमान रिट याचिका (CWJC संख्या 15728/2019) दायर की गई, जिसमें 27.04.2012 के मूल बर्खास्तगी आदेश और 31.05.2019 के पुनरीक्षण आदेश – दोनों को चुनौती दी गई।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह ने COVID-19 महामारी के कारण वर्चुअल माध्यम से इस मामले की सुनवाई की। न्यायालय ने पहले आरोपों और विभागीय प्रक्रिया का संक्षिप्त विवरण किया।

याचिकाकर्ता के विरुद्ध तीन मुख्य आरोप लगाए गए थे:

पहला, याचिकाकर्ता विभागीय निर्देशों के अनुसार मुख्यालय में निवास नहीं करती थीं। इसके बजाय, उनका निवास तिलौथू और सासाराम – दोनों स्थानों पर था; वह केवल कभी-कभार तिलौथू आती थीं और मुख्यालय पर नियमित निवास का कोई सबूत प्रस्तुत नहीं कर सकीं।

दूसरा, यह आरोप था कि उन्होंने आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं से भोजन वितरण और मानदेय भुगतान के लिए अवैध धन की मांग की और वसूला, तथा उनके और अन्य अधीनस्थों के साथ दुर्व्यवहार किया। 76 आंगनवाड़ी केन्द्रों के निरीक्षण के दौरान 68 सेविकाओं ने कथित रूप से उनके और उनके पति द्वारा किए गए दुर्व्यवहार और आर्थिक शोषण की शिकायत की।

तीसरा, यह आरोप था कि उन्होंने और उनके पति ने सेविकाओं/सहायिकाओं पर मानसिक और शारीरिक अत्याचार किया तथा उनके पति ने उनके साथ यौन दुराचार या यौन प्रस्ताव रखने जैसे कृत्य किए।

जांच पदाधिकारी ने, विभागीय अभिलेखों और कई सेविकाओं के बयानों के आधार पर, 07.02.2011 की रिपोर्ट में प्रारंभिक रूप से सभी आरोप सिद्ध माने। विशेष रूप से, अधिकारी ने उपखंड पदाधिकारी (SDO), डेहरी द्वारा, प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) और जिला कार्यक्रम पदाधिकारी की उपस्थिति में दर्ज सेविकाओं के बयानों पर भरोसा किया। ये बयान लिखित रूप में थे और उन्हें एक CD में भी रिकॉर्ड किया गया था, जिसे याचिकाकर्ता और प्रस्तुतिकरण अधिकारी को दिखाया गया।

प्रथम आरोप के संबंध में, जांच पदाधिकारी ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता मुख्यालय में निवास नहीं करती थीं और तिलौथू में निवास के अपने दावे को स्थापित नहीं कर सकीं।

दूसरे आरोप के संबंध में, जांच पदाधिकारी ने लिखित बयानों और CD से यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता भोजन वितरण और भुगतान के लिए अवैध धन की मांग करती थीं, तथा उनके पति सेविकाओं और सहायिकाओं को अपने घर बुलाते थे, उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे, उनसे भोजन बनवाते थे, उन्हें रातभर रोके रखते थे और मारपीट भी करते थे। अधिकारी ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता द्वारा ही प्रस्तुत दस्तावेजों से प्रतीत होता है कि किसी न किसी प्रकार उन्होंने सेविकाओं के हस्ताक्षर अभ्यावेदन पर ले लिए थे।

तीसरे आरोप के संबंध में, जांच पदाधिकारी ने कहा कि उपलब्ध सामग्री और CD से उनके पति द्वारा यौन दुराचार या यौन प्रस्ताव रखने का मामला बनता है। हालांकि, अधिकारी ने यह भी उल्लेख किया कि यौन उत्पीड़न से संबंधित मामलों की जांच आदर्श रूप से कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम हेतु अधिसूचित जिला स्तरीय समिति द्वारा की जानी चाहिए। इसके बावजूद, अधिकारी ने निष्कर्ष निकाला कि सेविकाओं और सहायिकाओं के साथ उनके पति का दुर्व्यवहार साक्ष्य से स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

जब अनुशासनिक प्राधिकारी ने प्रतिपरीक्षण का अवसर उपलब्ध कराने हेतु मामला वापस भेजा, तो 24.03.2011 को 14 आंगनवाड़ी सेविकाएं जांच पदाधिकारी के समक्ष याचिकाकर्ता और उनके पति (जो उनके अधिवक्ता के रूप में उपस्थित थे) की उपस्थिति में पेश हुईं। इन सेविकाओं ने रिश्वत लेने, उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के अपने पूर्व बयानों पर कायम रहीं। जांच पदाधिकारी ने 01.04.2011 को नवीन प्रतिवेदन प्रस्तुत कर पुनः पुष्टि की कि आरोप सिद्ध हैं।

न्यायालय में, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कई आपत्तियां उठाईं। उन्होंने यह दलील दी कि:

जिस शिकायत के आधार पर जांच शुरू हुई और प्रपत्र-‘क’ में उल्लिखित सहायक दस्तावेज, याचिकाकर्ता को उपलब्ध नहीं कराए गए। उनके अनुसार, यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

उन्होंने यह भी कहा कि आरोपपत्र में नामित गवाहों को प्रस्तुत नहीं किया गया और जो गवाह प्रस्तुत हुए, उनके प्रतिपरीक्षण का अवसर भी याचिकाकर्ता को नहीं दिया गया।

इसके अतिरिक्त, उनका तर्क था कि विभाग ने BPSC की इस राय की उपेक्षा की कि बर्खास्तगी असंगत रूप से कठोर है, और इसके बजाय मंत्रिपरिषद से गुप्त रूप से स्वीकृति प्राप्त कर ली।

अंततः, उन्होंने प्रस्तुत किया कि भले ही कुछ कदाचार सिद्ध मान भी लिए जाएं, सेवा से बर्खास्तगी बहुत अधिक कठोर और असंगत दंड है। उन्होंने कम से कम दंड पर पुनर्विचार हेतु मामले को पुनः भेजने का अनुरोध किया।

राज्य के अधिवक्ता ने उत्तर दिया कि किसी प्रकार की प्रक्रियागत अनियमितता नहीं हुई। याचिकाकर्ता को 22.05.2009 को तिलौथू में CDPO के रूप में पदस्थापित किया गया और उन्होंने तुरंत ही रिश्वत मांगना तथा दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया। समाज कल्याण विभाग को शिकायत दी गई। रोहतास के जिलाधिकारी ने जांच के आदेश दिए और SDO, डेहरी ने जांच के बाद भ्रष्टाचार और कदाचार के आरोपों को सही पाया।

यह इंगित किया गया कि उनके अधीन कार्यरत 16 सेविकाओं ने SDO के समक्ष याचिकाकर्ता और उनके पति के विरुद्ध वसूली तथा छेड़छाड़ के संबंध में लिखित बयान दिए थे। ये बयान जांच पदाधिकारी को भेजे गए, जिन्होंने 16.03.2011 के पत्र द्वारा इन्हें याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराया। उन्होंने 24.02.2011 को उत्तर दिया, परंतु आरोपों का खंडन नहीं कर सकीं।

राज्य ने यह भी रेखांकित किया कि 24.03.2011 को उपस्थित 14 सेविकाओं को प्रतिपरीक्षण हेतु प्रस्तुत किया गया, किंतु याचिकाकर्ता और उनके पति ने उनका प्रतिपरीक्षण करने से ही इनकार कर दिया और उनके दर्ज बयानों पर हस्ताक्षर करने से भी मना कर दिया। राज्य के अनुसार, इससे स्पष्ट होता है कि पूर्ण अवसर दिया गया था और प्रतिपरीक्षण न होने का कारण स्वयं याचिकाकर्ता का आचरण था।

न्यायालय ने इन परस्पर विरोधी दावों की जांच हेतु मूल विभागीय अभिलेखों का अवलोकन किया। उसने पाया कि:

आरोपपत्र में नामित सभी प्रमुख सेविकाएं, जैसे देवांति कुमारी, ललिता देवी, कुमारी ललिता और पूनम देवी, वास्तव में जांच पदाधिकारी के समक्ष अभियोजन की ओर से याचिकाकर्ता और उनके अधिवक्ता की उपस्थिति में गवाही के लिए प्रस्तुत की गई थीं।

याचिकाकर्ता और उनके पति ने गवाहों का प्रतिपरीक्षण करने से इनकार कर दिया और उनके बयानों पर हस्ताक्षर करने से भी मना कर दिया। आचरण अधिकारी और प्रस्तुतिकरण अधिकारी – दोनों ने इस अवरोध की रिकॉर्डिंग की।

न्यायालय ने इसलिए यह दावा अस्वीकार कर दिया कि उन्हें गवाहों के प्रतिपरीक्षण का अवसर नहीं दिया गया। इसके उलट, न्यायालय ने माना कि उन्होंने और उनके पति ने “जानबूझकर जांच में बाधा उत्पन्न की।”

जहां तक मूल शिकायत की प्रति न दिए जाने की दलील का प्रश्न है, न्यायालय ने उल्लेख किया कि प्रपत्र-‘क’ में आरोप विस्तृत रूप से अंकित थे और वे केवल किसी शिकायत पर नहीं, बल्कि SDO, BDO, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी और जिलाधिकारी, रोहतास द्वारा किए गए अन्वेषण के आधार पर तैयार किए गए थे। याचिकाकर्ता यह नहीं दिखा सकीं कि प्रारंभिक शिकायत की प्रति न मिलने से उन्हें वास्तविक रूप से कोई प्रतिकूलता (prejudice) हुई। अतः इस आधार पर कार्यवाही को निरस्त करने का कोई औचित्य नहीं पाया गया।

जहां तक कुछ आरोपपत्रित गवाहों के परीक्षण न किए जाने का प्रश्न है, न्यायालय ने दोहराया कि विभागीय कार्यवाही में साक्ष्य की मात्रा नहीं, बल्कि गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है। यदि जांच पदाधिकारी और प्रस्तुतिकरण पक्ष की समझ में कुछ गवाहों की परीक्षा से ही आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो सभी नामित गवाहों का परीक्षण न होना कार्यवाही को दोषपूर्ण नहीं बनाता। याचिकाकर्ता ने भी कभी अपने बचाव में किसी विशेष गवाह को तलब करने का अनुरोध नहीं किया।

अनुशासनिक मामलों में न्यायिक पुनरावलोकन की सीमित परिधि स्पष्ट करने के लिए न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Union of India and Others v. P. Gunasekaran, (2015) 2 SCC 610 पर भरोसा किया। उद्धृत अंशों में स्पष्ट किया गया कि रिट अधिकार क्षेत्र में उच्च न्यायालय साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता और न ही वह अपीलीय प्राधिकारी की भांति कार्य कर सकता है। वह केवल यह देख सकता है कि जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा, विधि द्वारा विनिर्दिष्ट प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप की गई या नहीं, तथा क्या निष्कर्षों के समर्थन में कोई विधिसम्मत साक्ष्य उपलब्ध है।

इन सिद्धांतों को लागू करने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि:

याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय जांच सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधि के अनुसार की गई।

प्राकृतिक न्याय का कोई उल्लंघन नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें आरोपों की सूचना, सामग्री तक पहुंच तथा अपना बचाव करने और प्रतिपरीक्षण करने का अवसर प्रदान किया गया था।

14 सेविकाओं के बयानों और CD सहित पर्याप्त सामग्री एवं साक्ष्य उपलब्ध थे, जिनके आधार पर आरोप संख्या 1 और 2 के सिद्ध होने तथा आरोप संख्या 3 के संदर्भ में उनके पति के विरुद्ध गंभीर आरोप सिद्ध होने का निष्कर्ष निकाला जा सकता था।

दंड की आनुपातिकता के संबंध में न्यायालय ने कहा कि सिद्ध आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के थे: आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और अधीनस्थों से वसूली और रिश्वत, सेविकाओं/सहायिकाओं पर मानसिक एवं शारीरिक उत्पीड़न, और उनकी आधिकारिक हैसियत के संदर्भ में उनके पति द्वारा गंभीर यौन कदाचार के आरोप। ऐसे आचरण को तुच्छ नहीं माना जा सकता।

P. Gunasekaran तथा अन्य सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर पुनः भरोसा करते हुए न्यायालय ने अवलोकन किया कि वह दंड में तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब वह न्यायालय की अंतःकरण को झकझोर दे (shocks the conscience)। इस मामले में सेवा से बर्खास्तगी “चौंकाने वाली रूप से असंगत” नहीं थी।

न्यायालय ने आगे कहा कि 27.04.2012 का बर्खास्तगी आदेश तथा 31.05.2019 का पुनरीक्षण आदेश – दोनों ही सुविचारित, वक्‍तव्ययुक्त (speaking) आदेश हैं, जिनमें यह स्पष्ट रूप से दर्ज है कि बर्खास्तगी की सजा क्यों दी गई और क्यों बरकरार रखी गई। विभागीय कार्यवाही अथवा अंतिम निर्णयों में किसी प्रकार की गैरकानूनीता या त्रुटि न पाते हुए न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय विशेष रूप से समाज कल्याण तथा आंगनवाड़ी संबंधी पदों पर कार्यरत सरकारी कर्मचारियों के लिए, जो विभागीय जांच का सामना कर रहे हैं, महत्वपूर्ण है।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि जहां रिश्वतखोरी, शोषण और अधीनस्थ कर्मचारियों के उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप निष्पक्ष जांच में सिद्ध हो जाएं, वहां सेवा से बर्खास्तगी को उचित ठहराया जा सकता है।

निर्णय यह भी दर्शाता है कि यदि कोई कर्मचारी या उसका प्रतिनिधि जानबूझकर गवाहों का प्रतिपरीक्षण करने या कार्यवाही में सहयोग करने से इनकार करता है, तो बाद में वह यह नहीं कह सकता कि उसे अवसर से वंचित किया गया। न्यायालय वास्तविक अभिलेख देखेगा कि अवसर दिया गया था या नहीं।

आंगनवाड़ी सेविकाओं और सहायिकाओं के लिए, यह मामला यह परिलक्षित करता है कि लिखित शिकायतें, रिकॉर्ड किए गए बयान और यहां तक कि वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग (जैसे इस मामले में CD) भी उन अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही में प्रभावी रूप से उपयोग की जा सकती हैं जो अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं।

अंत में, यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि पटना उच्च न्यायालय, रिट अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए, जहां प्रक्रिया विधिपूर्वक हुई हो और कुछ साक्ष्य विद्यमान हों, वहां विभागीय निष्कर्षों के विरुद्ध अपीलीय न्यायालय की तरह कार्य नहीं करेगा। ऐसे मामलों में वह दंड को हल्के में कम भी नहीं करेगा।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या शिकायत की प्रति न दिए जाने, सभी आरोपपत्रित गवाहों के परीक्षण न होने तथा प्रतिपरीक्षण के अवसर के कथित अभाव के कारण याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही अवैध हो गई थी?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि आधिकारिक जांचों के बाद विस्तृत आरोप निर्धारित किए गए थे, पर्याप्त गवाहों का परीक्षण हुआ, याचिकाकर्ता को दस्तावेज तथा पूर्ण अवसर प्रदान किया गया, और स्वयं उन्होंने एवं उनके पति ने गवाहों का प्रतिपरीक्षण करने से इनकार किया। किसी प्रकार की प्रतिकूलता या प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का प्रदर्शन नहीं हुआ।
  • प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय विभागीय जांच में दर्ज दोषसिद्धि के निष्कर्षों तथा सेवा से बर्खास्तगी के दंड में हस्तक्षेप कर सकता था?
    उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को लागू करते हुए न्यायालय ने कहा कि रिट अधिकार क्षेत्र में वह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन या दंड की आनुपातिकता का पुनर्मूल्यांकन तब तक नहीं कर सकता, जब तक कि दंड न्यायालय की अंतःकरण को झकझोर न दे। रिश्वतखोरी, शोषण और उत्पीड़न के सिद्ध आरोपों को देखते हुए बर्खास्तगी चौंकाने वाली रूप से असंगत नहीं थी और उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Union of India and Others v. P. Gunasekaran, (2015) 2 SCC 610 (विभागीय कार्यवाही और दंड में हस्तक्षेप के संदर्भ में न्यायिक पुनरावलोकन की सीमित परिधि पर)।
  • State of A.P. v. S. Sree Rama Rao, AIR 1963 SC 1723 (अनुशासनिक मामलों में उच्च न्यायालय द्वारा अपीलीय न्यायालय की भांति कार्य न करने के सिद्धांत पर)।
  • State of A.P. v. Chitra Venkata Rao, (1975) 2 SCC 557 (जांच में तथ्यगत निष्कर्षों पर रिट अधिकार क्षेत्र की सीमाओं की पुनः पुष्टि करते हुए)।
  • Railway Board v. Niranjan Singh, (1969) 1 SCC 502.
  • Syed Yakoob v. K.S. Radhakrishnan, AIR 1964 SC 477.
  • State of Haryana v. Rattan Singh, (1977) 2 SCC 491.
  • B.C. Chaturvedi v. Union of India, (1995) 6 SCC 749.
  • Union of India v. G. Ganayutham, (1997) 7 SCC 463।
  • Om Kumar v. Union of India, (2001) 2 SCC 386.
  • Coimbatore District Central Coop. Bank v. Employees Assn., (2007) 4 SCC 669.
  • Coal India Ltd. v. Mukul Kumar Choudhuri, (2009) 15 SCC 620.
  • Chennai Metropolitan Water Supply and Sewerage Board v. T.T. Murali Babu, (2014) 4 SCC 108.

मामले का विवरण

मामला संख्या: सिविल रिट अधिकार क्षेत्र मामला संख्या 15728/2019

मामला शीर्षक: Nilima Sinha बनाम State of Bihar and Others

उद्धरण: 2022 (1) PLJR 396

न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह

निर्णय की तिथि: 24.12.2021

मामले का स्वरूप: सेवा से बर्खास्तगी तथा विभागीय कार्यवाही में पुनरीक्षण याचिका की अस्वीकृति को चुनौती देते हुए दायर अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका।

प्रभावित आदेश: 27.04.2012 की बर्खास्तगी का आदेश, जो समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार के सचिव द्वारा पारित; 31.05.2019 का पुनरीक्षण आदेश (18.06.2019 की स्मारपत्र द्वारा अधिसूचित), जो समाज कल्याण विभाग, बिहार सरकार के अपर मुख्य सचिव द्वारा पारित।

अधिवक्ता:

याचिकाकर्ता की ओर से: श्री केशव कुमार सिन्हा, अधिवक्ता।

प्रतिवादी (राज्य) की ओर से: श्री Md. Raisul Haque, स्टैंडिंग काउंसिल-10; श्री कृष्ण कांत सिंह, सहायक अधिवक्ता, स्टैंडिंग काउंसिल-10।

पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 15728 of 2019


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