सबूतों के अभाव में बालिका बलात्कार‑हत्या मामले में सुनाई गई मृत्युदंड की सज़ा रद्द — पटना उच्च न्यायालय, 2023

अररिया के एक विशेष POCSO न्यायालय द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सज़ा को पटना उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई। न्यायालय ने पाया कि 12 वर्षीया बालिका के बलात्कार और हत्या के लिए दोषसिद्धि कमज़ोर और अविश्वसनीय सबूतों पर आधारित थी। न्यायालय ने मुख्य रूप से सिर्फ़ स्निफर डॉग की ट्रेल और अप्रमाणित बरामदगियों पर भरोसा करने से इनकार कर दिया। अपील स्वीकार की गई, डेथ रेफरेंस खारिज कर दिया गया और अभियुक्त की रिहाई का आदेश दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला इस दुखद आरोप से शुरू हुआ कि नागपंचमी के अवसर पर फ़ोर्बिसगंज, ज़िला अररिया में आयोजित मंदिर मेले के पास 12 वर्ष की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गई।

कथित घटना 05.08.2019 को होने की बात कही गई। पीड़िता अपनी दादी (P.W. 1) के साथ मेला देखने गई थी। P.W. 1 के अनुसार, जब वह मंदिर के फ़र्श पर गद्दा बिछा रही थी, उसी दौरान लड़की मेला से गायब हो गई।

खोजबीन की गई लेकिन लड़की नहीं मिली। अगले दिन यानी 06.08.2019 को P.W. 1 के भाई के नाति ने उन्हें सूचना दी कि लड़की की लाश मंदिर के पास सड़क पर बिल्कुल नग्न अवस्था में पड़ी है। P.W. 1 और उनके पति (P.W. 2) वहाँ पहुँचे और लाश को अपनी नातिन के रूप में पहचान लिया।

P.W. 1 ने पुलिस को अपना फर्दबयान दिया, जिसमें कहा कि अज्ञात व्यक्तियों ने अवश्य ही बच्ची से छेड़छाड़ कर उसकी हत्या कर दी होगी। उन्होंने मृतका की कमर के नीचे रक्त की कुछ बूंदें देखे जाने का ज़िक्र किया। इस फर्दबयान के आधार पर फ़ोर्बिसगंज (सिमराहा) थाना कांड सं. 758/2019, दिनांक 06.08.2019 धारा 302, 201, 354A, 34 भारतीय दंड संहिता तथा धारा 8 POCSO अधिनियम, 2012 के अंतर्गत अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध दर्ज किया गया।

मृत शरीर को जब्त कर उसी दिन पोस्ट‑मार्टम के लिए भेजा गया। जाँच के दौरान पुलिस ने बाद में एक व्यक्ति अमर कुमार के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 376D, 201/34 तथा POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 4 के तहत आरोपपत्र दायर किया।

मामले की सुनवाई स्पेशल POCSO एक्ट केस सं. 46/2019 के रूप में विशेष न्यायाधीश (POCSO)‑cum‑अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश‑VI, अररिया के समक्ष हुई। 08.10.2021 को ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को दोषी ठहराकर फांसी द्वारा मृत्युदंड की सज़ा सुनाई। साथ ही, जब्त वस्तुओं को समयानुसार नष्ट करने का निर्देश दिया तथा पीड़िता के परिवार को D.L.S.A. के माध्यम से 10,00,000/- रुपये मुआवज़ा देने की अनुशंसा भी की।

क़ानून के अनुसार मृत्युदंड की सज़ा की पुष्टि हेतु इसे डेथ रेफरेंस नं. 9/2021 के रूप में पटना उच्च न्यायालय को भेजा गया। अभियुक्त ने भी अपनी दोषसिद्धि और सज़ा को चुनौती देते हुए आपराधिक अपील (DB) सं. 728/2021 दायर की। दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार एवं माननीय न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडेय की खंडपीठ ने की और 18.12.2023 के समान मौखिक निर्णय से निस्तारित किया।

न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने सबसे पहले विशेष POCSO न्यायालय द्वारा मामले के संचालन के तरीके पर कड़ी असंतोष दर्ज किया। उसने उल्लेख किया कि ट्रायल कोर्ट ने “क़ानून के बुनियादी सिद्धांतों की परवाह किए बिना” मृत्युदंड की सज़ा सुना दी।

पीठ ने पहले यह जाँचा कि अभियुक्त की गिरफ़्तारी कैसे हुई। मृत शरीर मिलने के बाद पुलिस एक ट्रैकर स्निफर डॉग को घटनास्थल पर लाई। कुत्ते ने मृत शरीर को सूँघा और फिर एक ग्रामीण के घर में चला गया। वहाँ कुछ आपत्तिजनक न मिलने पर कुत्ते को फिर आगे ले जाया गया और वह अभियुक्त के घर में घुस गया। इसके बाद अभियुक्त को उसके घर से गिरफ़्तार किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने यह परिस्थितिजन्य तथ्य अभियुक्त के ख़िलाफ़ माना कि वह अंदर से कमरा बंद कर के बैठा था और उसे पकड़ने के लिए दरवाज़ा तोड़ना पड़ा। उच्च न्यायालय ने पाया कि दरवाज़ा तोड़े जाने का कोई सबूत रिकॉर्ड पर नहीं है।

व्यावहारिक रूप से अभियुक्त पर संदेह करने का एकमात्र आधार स्निफर डॉग का यह “ट्रैकिंग ट्राजेक्टरी” ही था। न्यायालय ने नोट किया कि रिकार्ड पर कहीं भी कुत्ते के प्रशिक्षण, उसकी दक्षता या उसके हैंडलर की योग्यता के बारे में कोई बात दर्ज नहीं है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने मृत्युदंड सुना दिया।

जाँच एजेंसी ने मृत शरीर के पास से चार जोड़ी चप्पल, एक पर्स और एक चेन भी जब्त की थी। उचित प्रमाण के बिना ही उसने “यह निष्कर्ष कूदकर” निकाल लिया कि उन में से एक जोड़ी चप्पल अभियुक्त की है। अभियुक्त के घर से एक क्रीम रंग की मैले‑कुचैले जीन्स जब्त किए जाने का दावा किया गया, जिसे घटना के समय अभियुक्त द्वारा पहना हुआ कपड़ा बताया गया। आश्चर्य की बात यह रही कि इस जीन्स को कभी फ़ॉरेंसिक जाँच के लिए भेजा ही नहीं गया।

न्यायालय ने नोट किया कि रिकॉर्ड पर यह नहीं दिखता कि सामूहिक बलात्कार के आरोप के बावजूद अभियुक्त की चिकित्सकीय जाँच दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 53A के तहत कराई गई हो। उसने यह भी टिप्पणी की कि संभवतः इन्हीं कारणों से जाँच के दौरान ही उच्च न्यायालय ने अभियुक्त को ज़मानत दे दी थी।

ट्रायल कोर्ट ने कई “परिस्थितियाँ” सूचीबद्ध की थीं, जो उसके मत में अभियुक्त के ख़िलाफ़ पूर्ण श्रृंखला बनाती थीं: मेले में उसकी उपस्थिति (जिसकी पुष्टि P.W. 1 ने की), मृत शरीर के पास उसकी चप्पलें होना, शरीर के निचले हिस्से पर रक्त के धब्बे, उसके घर से मैले‑कुचैले जीन्स की बरामदगी, और स्निफर डॉग द्वारा पुलिस को उसके घर ले जाने पर उसके कमरे के अंदर से बंद होना।

उच्च न्यायालय ने इन सभी बिंदुओं को सावधानी से परखा।

पहले, उसने माना कि केवल यह तथ्य कि पीड़िता अपनी दादी के साथ मेले में गई थी जहाँ अभियुक्त भी मौजूद था, अपने‑आप में उसके ख़िलाफ़ कोई आपत्तिजनक परिस्थिति नहीं बनाता।

दूसरे, मृत शरीर के पास से चार जोड़ी चप्पलें तो बरामद हुईं, परन्तु रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था कि किसी विशिष्ट जोड़ी का संबंध अभियुक्त से था या वह उक्त दिन वही चप्पल पहने हुए था।

तीसरे, चिकित्सकीय साक्ष्य शरीर पर रक्त होने के दावे का समर्थन नहीं करता। जहाँ P.W. 1 ने अपने फर्दबयान में रक्त की बूंदों का ज़िक्र किया, वहीं घटनास्थल पर तैयार इनक्वेस्ट रिपोर्ट में कहीं भी रक्त के धब्बों का उल्लेख नहीं था।

चौथे, अभियुक्त के घर से मैले‑कुचैले जीन्स की कथित बरामदगी भी कमज़ोर थी। किसी ने भी यह पहचान नहीं की कि यही जीन्स उसने मेले में पहनी थी। इसे कभी फ़ॉरेंसिक प्रयोगशाला नहीं भेजा गया। एक जप्ती गवाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि केवल अभियुक्त को उसके घर से गिरफ़्तार किया गया और कुछ भी बरामद नहीं हुआ। कई जप्ती गवाहों ने कहा कि उन्होंने कोरे कागज़ों पर दस्तखत किए। इससे जप्ती सूची की विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।

इन खामियों के मद्देनज़र न्यायालय समझ नहीं सका कि ट्रायल कोर्ट ने इतने संदिग्ध सामग्री को कैसे अभियुक्त के ख़िलाफ़ पूर्ण परिस्थितिजन्य श्रृंखला मान लिया।

इसके बाद पीठ ने चिकित्सकीय और फ़ॉरेंसिक साक्ष्य की ओर रुख किया। मृत शरीर का पोस्ट‑मार्टम 06.08.2019 को रात्रि 10:17 बजे डॉ. प्रवीण कुमार (P.W. 11) ने किया। उन्होंने शरीर को पूर्णतः सूजा हुआ पाया तथा सड़न के कारण कुछ स्थानों पर त्वचा छिली हुई थी, परन्तु कोई भी आंतरिक असामान्यता नहीं मिली। सभी अंग साबुत थे और मौत का कारण पता न चल पाने के कारण विसरा संरक्षित किया गया। रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा कि मृत्यु के कारण के संबंध में कोई निश्चित मत नहीं दिया जा सकता।

उन्होंने मृत्यु के समयांतर को 72 घंटे के भीतर आँका। जबकि 12 वर्षीया बालिका के सामूहिक बलात्कार के आरोप थे, फिर भी पोस्ट‑मार्टम रिपोर्ट में जननांगों की जाँच का कोई उल्लेख नहीं था।

शरीर के किसी भी हिस्से पर एक भी चोट का निशान नहीं पाया गया। फर्दबयान के अनुसार गुमशुदगी और पोस्ट‑मार्टम के बीच 30 घंटे से कम समय बीता था, फिर भी डॉक्टर ने सड़न दर्ज की पर रक्त और चोट का कोई ज़िक्र नहीं किया। फ़ॉरेंसिक प्रयोगशाला से प्राप्त विसरा रिपोर्ट में किसी भी प्रकार का धात्विक, अल्कलॉइडल, ग्लाइकोसाइडल, कीटनाशी या वाष्पशील विष मौजूद नहीं पाया गया।

इससे उच्च न्यायालय के सामने गंभीर प्रश्न खड़ा हुआ: फिर मृत्यु का कारण क्या था और बलात्कार का सबूत कहाँ है? न्यायालय ने ज़ोर दिया कि यद्यपि बलात्कार सिद्ध करने के लिए हर मामले में चिकित्सकीय साक्ष्य अनिवार्य नहीं है, परन्तु यहाँ न तो कोई नेत्रदर्शी था, न किसी ने अभियुक्त को पीड़िता के साथ देखा, और “छेड़छाड़ या बलात्कार का कोई भी साक्ष्य पूर्णतः अनुपस्थित” था। ऐसे हालात में न्यायालय ने यहाँ तक संदेह व्यक्त किया कि पोस्ट‑मार्टम के लिए भेजा गया शव वास्तव में इसी मामले की पीड़िता का था भी या नहीं। उसने नोट किया कि P.W. 11 ने शुरू में कहा कि शव सीलबंद अवस्था में बिना पहचान के आया, फिर खुद को सुधारते हुए कहा कि शव खुले में लाया गया, फिर भी पहचान के बारे में स्पष्टता नहीं थी।

न्यायालय ने अभियुक्त के कथित इकबालिया बयान पर भी विश्वास नहीं किया। जाँच के अनुसार उसने फ़ोर्बिसगंज के B.D.O. के सामने स्वीकारोक्ति की थी। परन्तु रिकॉर्ड में B.D.O. का नाम होने के बावजूद कहीं भी यह नहीं दिखा कि किसी अधिकृत अधिकारी द्वारा विधिवत् स्वीकारोक्ति दर्ज की गई हो — न कोई आधिकारिक मुहर, न चिह्न। पीठ ने माना कि ऐसे स्वीकारोक्ति पर भरोसा करना असंगत है।

न्यायालय की दलील का एक अहम हिस्सा स्निफर डॉग साक्ष्य की क़ानूनी स्थिति से जुड़ा था। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Abdul Rajak Murtaja Dafedar v. State of Maharashtra (AIR 1970 SC 283) का हवाला देते हुए पीठ ने समझाया कि डॉग‑ट्रैकिंग साक्ष्य में गंभीर सीमाएँ हैं: कुत्तों से जिरह नहीं की जा सकती; उनके हैंडलर का बयान अधिक से अधिक श्रुतलेख (hearsay) की तरह है; और किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को किसी कुत्ते की सूँघने की क्षमता पर निर्भर नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने माना कि ऐसा साक्ष्य पुलिस जाँच में सहायता कर सकता है, पर मज़बूत, स्वतंत्र साक्ष्य के बिना यह दोषसिद्धि का मुख्य आधार नहीं बन सकता। इस मामले में तो हैंडलर का भी बयान दर्ज नहीं हुआ और कुत्ते की दक्षता या प्रदर्शन इतिहास का कोई रिकॉर्ड नहीं था।

न्यायालय ने यह भी नोट किया कि ट्रायल कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 का समुचित अनुपालन नहीं किया। निर्णय में जिन सभी आपत्तिजनक परिस्थितियों पर भरोसा किया गया, उन्हें अभियुक्त के समक्ष न्यायपूर्ण ढंग से उसके स्पष्टीकरण के लिए रखा ही नहीं गया। कुछ प्रश्नों के उसके उत्तरों की अनदेखी की गई, और जिन परिस्थितियों को उससे पूछा भी गया, वे प्रमाणित ही नहीं थीं।

न्यायालय ने आगे दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 53A और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Rajendra Prahladrao Wasnik v. State of Maharashtra (2019) 12 SCC 460 पर चर्चा की। निर्णय में कहा गया कि हर मामले में अभियुक्त की चिकित्सकीय जाँच अनिवार्य न भी हो, फिर भी यदि ऐसे परीक्षण से बलात्कार से संबंधित साक्ष्य मिलने की युक्तिसंगत संभावना हो तो यह परीक्षण किया जाना चाहिए और DNA प्रोफ़ाइल के लिए सामग्री ली जानी चाहिए। इस मामले में अभियुक्त की ऐसी कोई जाँच नहीं की गई।

उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट की इस बात के लिए भी आलोचना की कि उसने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Gade Lakshmi Mangraju @ Ramesh v. State of Andhra Pradesh (2001) 6 SCC 205 में स्निफर/ट्रैकर डॉग साक्ष्य की “निहित दुर्बलताओं” के बारे में दी गई चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया। न्यायालय ने रेखांकित किया कि कुत्ते या उसके हैंडलर की भूल अथवा कुत्ते के व्यवहार से गलत निष्कर्ष निकाल लिए जाने की संभावना वास्तविक है, और डॉग‑ट्रैकिंग के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान अभी सीमित है।

अंत में, पीठ ने सुप्रसिद्ध “पंचशील” सिद्धांतों को लागू किया जो परिस्थितिजन्य साक्ष्य के बारे में Sharad Birdhi Chand Sarda v. State of Maharashtra (1984) 4 SCC 116 में प्रतिपादित किए गए थे। उसने माना कि अभियुक्त के ख़िलाफ़ जिन परिस्थितियों का उल्लेख किया गया, वे न तो पूरी तरह स्थापित थीं, न ही निर्णायक, और न ही ऐसी अबाध श्रृंखला बनाती थीं जो केवल उसी की दोषिता की ओर इशारा करती हो। इसके विपरीत, वे गंभीर संदेह और ऐसी अन्य परिकल्पनाओं के लिए पर्याप्त गुंजाइश छोड़ती थीं जो अभियुक्त की निर्दोषता से भी संगत हो सकती हैं।

इस विस्तृत परीक्षण के आधार पर न्यायालय ने माना कि IPC की धारा 302/34, 201/34 और 376DB/34 तथा POCSO अधिनियम की धारा 4 के तहत अभियुक्त की दोषसिद्धि “क़ानून की दृष्टि से अत्यंत अन्यायपूर्ण” है। अतः उसने दोषसिद्धि और सज़ा के निर्णय एवं आदेश को रद्द करते हुए डेथ रेफरेंस खारिज कर दिया, अपील स्वीकार की और अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया। चूँकि वह पहले से जेल में था, न्यायालय ने उसे किसी अन्य मामले में वांछित न होने पर तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।

यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार ही नहीं, बल्कि अन्य स्थानों पर भी अभियुक्तों और पीड़ित परिवारों — दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

पहले, यह दर्शाता है कि बच्चे की मृत्यु और बलात्कार के आरोप जैसे अत्यंत संवेदनशील मामलों में भी न्यायालय साक्ष्य के मूलभूत नियमों को शिथिल नहीं कर सकते। केवल इस आधार पर कि स्निफर डॉग किसी के घर चला गया, या संदिग्ध बरामदगियाँ हुईं, या कोई डगमगाता कथित इकबालिया बयान है, किसी व्यक्ति को मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता।

दूसरे, यह उचित चिकित्सकीय और फ़ॉरेंसिक जाँच के महत्व को रेखांकित करता है। जहाँ बलात्कार और हत्या का आरोप है, वहाँ शव की सही पहचान, जननांगों की जाँच, मृत्यु के कारण का यथासंभव निर्धारण, तथा कपड़ों और अन्य वस्तुओं को फ़ॉरेंसिक और DNA परीक्षण के लिए भेजना अत्यावश्यक है। इस कर्तव्य में चूक मामले को घातक रूप से कमज़ोर बना सकती है।

तीसरे, यह निर्णय इस बात को पुष्ट करता है कि ट्रायल कोर्ट को परिस्थितिजन्य साक्ष्य के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित कसौटियों का ईमानदारी से पालन करना होगा और धारा 313 Cr.P.C. के तहत सभी परिस्थितियाँ न्यायपूर्ण ढंग से अभियुक्त के समक्ष रखनी होंगी। मृत्युदंड सर्वोच्च दंड है और इसे केवल सबसे मज़बूत एवं विश्वसनीय साक्ष्यों की बुनियाद पर ही दिया जा सकता है।

साधारण नागरिकों के लिए यह निर्णय यह स्मरण कराता है कि न्याय प्रणाली को जहाँ यौन हिंसा के पीड़ितों के प्रति संवेदनशील रहना है, वहीं जल्दबाज़ी या त्रुटिपूर्ण जाँच के कारण होने वाली ग़लत दोषसिद्धियों से भी सावधान रहना है।

क़ानूनी मुद्दे और उनके उत्तर

  • मुद्दा: जब चिकित्सकीय और फ़ॉरेंसिक साक्ष्य बलात्कार का समर्थन न करते हों और मृत्यु का कारण भी सिद्ध न हो, तो क्या मुख्यतः स्निफर डॉग की ट्रैकिंग, संदिग्ध बरामदगियाँ और अप्रमाणित इकबालिया बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को बच्चे के बलात्कार और हत्या के लिए दोषी ठहरा कर मृत्युदंड दिया जा सकता है?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि ऐसा साक्ष्य दोषसिद्धि, विशेषकर मृत्युदंड, को क़ायम रखने के लिए अत्यधिक कमज़ोर और अविश्वसनीय है, और अभियुक्त को बरी कर दिया।
  • मुद्दा: आपराधिक मुकदमों में स्निफर डॉग की ट्रैकिंग का साक्ष्यात्मक मूल्य क्या है?
    उत्तर: सुप्रीम कोर्ट के पूर्वनिर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने माना कि स्निफर डॉग की ट्रैकिंग पुलिस जाँच का प्रारंभिक बिंदु हो सकती है, परन्तु विश्वसनीय पुष्टिकरण तथा कुत्ते और हैंडलर की दक्षता का आकलन किए बिना यह दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती।
  • मुद्दा: IPC और POCSO के अंतर्गत गंभीर अपराधों में परिस्थितिजन्य साक्ष्य के सिद्धांतों और धारा 313 Cr.P.C. का ट्रायल कोर्ट द्वारा कितना कठोरता से पालन किया जाना चाहिए?
    उत्तर: न्यायालय ने ज़ोर दिया कि सभी आपत्तिजनक परिस्थितियों को पुख़्ता रूप से सिद्ध किया जाना चाहिए, वे पूर्ण एवं निर्णायक श्रृंखला बनानी चाहिए और उन्हें न्यायपूर्ण ढंग से अभियुक्त के समक्ष धारा 313 के तहत रखा जाना चाहिए। ऐसा न करने पर दोषसिद्धि अवैध हो जाती है।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Abdul Rajak Murtaja Dafedar v. State of Maharashtra, AIR 1970 SC 283 (डॉग‑ट्रैकिंग साक्ष्य की सीमाओं पर)।
  • Gade Lakshmi Mangraju @ Ramesh v. State of Andhra Pradesh, (2001) 6 SCC 205 (स्निफर/ट्रैकर डॉग साक्ष्य की दुर्बलताओं पर)।
  • Sharad Birdhi Chand Sarda v. State of Maharashtra, (1984) 4 SCC 116 (परिस्थितिजन्य साक्ष्य के सिद्धांतों पर)।
  • Rajendra Prahladrao Wasnik v. State of Maharashtra, (2019) 12 SCC 460 (धारा 53A Cr.P.C. और बलात्कार मामलों में चिकित्सकीय जाँच पर)।

मामले का विवरण

मामला संख्या: डेथ रेफरेंस नं. 9/2021 के साथ आपराधिक अपील (DB) नं. 728/2021; जो फ़ोर्बिसगंज (सिमराहा) थाना कांड सं. 758/2019; स्पेशल POCSO एक्ट केस सं. 46/2019 से उत्पन्न।

मामले का शीर्षक: The State of Bihar v. Amar Kumar (Death Reference); Amar Kumar v. The State of Bihar (Criminal Appeal).

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडेय।

उद्धरण: 2024(1) PLJR 625.

अधिवक्ता: श्री कृष्ण चंद्र, अधिवक्ता, अपीलकर्ता/दोषसिद्ध व्यक्ति की ओर से; श्री अभिमन्यु शर्मा, APP, राज्य की ओर से।

मामले का स्वरूप: मृत्युदंड की पुष्टि हेतु डेथ रेफरेंस तथा IPC और POCSO के तहत दोषसिद्धि और सज़ा के विरुद्ध आपराधिक अपील (खंडपीठ)।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के आधिकारिक निर्णय को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

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