मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता भारत सरकार से पेंशन प्राप्त करने वाले सेवानिवृत्त सेना कर्मचारी की विधवा है। उसके अनुसार, जीविकोपार्जन के लिए यह पेंशन ही उसकी एकमात्र आय का स्रोत था।
उसका पति मई 2024 में लापता हो गया। उदवंतनगर थाना में एक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके परिणामस्वरूप उदवंतनगर थाना कांड संख्या 193/2024 दर्ज हुई। प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में यह दर्ज है कि याचिकाकर्ता का पति 4.5.2024 को लापता हुआ। स्वयं एफआईआर 12.5.2024 को दर्ज की गई।
इस आपराधिक मामले की जांच के दौरान, अभियुक्तों में से एक ने कथित रूप से याचिकाकर्ता के पति की हत्या करने की बात स्वीकार की। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने स्थानीय पंजीयन प्राधिकारियों से अपने पति के संबंध में मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का अनुरोध किया।
मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने के इस अनुरोध को उत्तरदाताओं, जिनमें जिला निबंधक, वैशाली, तथा नगर परिषद, महनार के अधिकारी शामिल थे, ने अस्वीकार कर दिया। इस अस्वीकृति से आहत होकर विधवा ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट क्षेत्राधिकार वाद संख्या 19241/2025 दायर किया।
उसने दिनांक 14.08.2025 के जिला निबंधक, वैशाली (प्रतिवादी संख्या 2) के आदेश को भी चुनौती दी, जिसके द्वारा उसके दावे को अस्वीकार कर दिया गया था। रिट याचिका में उसने अपने पति का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने हेतु प्राधिकारियों को निर्देश देने तथा उक्त आदेश को निरस्त करने के लिए मंडामस की प्रार्थना की।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
मामले की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति पार्थ सारथी द्वारा 14.05.2026 को की गई। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री मनीष कुमार उपस्थित थे। यद्यपि उत्तरदाताओं की ओर से प्रति-शपथपत्र दाखिल किया गया था, फिर भी उनकी ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।
याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह थी कि मृत्यु प्रमाण पत्र के बिना वह अपने पति की मृत्यु से संबंधित पेंशन तथा अन्य लाभ प्राप्त नहीं कर पा रही थी। उसका तर्क था कि चूंकि आपराधिक मामले में एक अभियुक्त ने उसके पति की हत्या करने की बात स्वीकार की है, अतः प्राधिकारियों को इसे मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने के लिए पर्याप्त आधार के रूप में स्वीकार करना चाहिए था।
प्राधिकारियों के पक्ष का समर्थन करने के लिए न्यायालय ने दिनांक 14.08.2025 के एक पत्र का परीक्षण किया, जिसे रिट याचिका में परिशिष्ट‑6 के रूप में अंकित किया गया था। यह पत्र नगर परिषद, महनार के कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा आरटीआई, वैशाली के नोडल पदाधिकारी को लिखा गया था।
इस पत्र में कार्यपालक पदाधिकारी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि लापता व्यक्तियों के मामलों में मृत्यु प्रमाण पत्र केवल सक्षम न्यायालय के आदेश के पश्चात ही जारी किया जाता है, जैसा कि 1969 के जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 13(3) में विनिर्दिष्ट है। इस प्रकार स्थानीय निकाय ने यह स्पष्ट किया कि एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने पर वे स्वयं किसी लापता व्यक्ति को मृत घोषित कर मृत्यु पंजीकृत करने का अधिकार नहीं रखते।
इसके बाद न्यायालय ने 1969 के जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रेशन अधिनियम के वैधानिक ढांचे, विशेष रूप से धारा 13 की ओर रुख किया। इस प्रावधान का प्रासंगिक अंश निर्णय में उद्धृत किया गया।
धारा 13 विलंबित जन्म एवं मृत्यु के पंजीयन से संबंधित है। उपधारा (1) उन मामलों पर लागू होती है जहां घटना के तीस दिनों के भीतर सूचना दी जाती है। उपधारा (2) उन मामलों पर लागू होती है जहां घटना के तीस दिन बाद लेकिन एक वर्ष के भीतर विलंबित सूचना दी जाती है; ऐसी स्थिति में जिला निबंधक की लिखित अनुमति, निर्धारित शुल्क के भुगतान तथा स्व-प्रमाणित दस्तावेजों के साथ पंजीयन संभव है।
इस मामले के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण धारा 13(3) थी। यह उपधारा प्रावधान करती है कि किसी भी जन्म या मृत्यु की सूचना यदि उसकी घटना के एक वर्ष से अधिक समय के बाद दी जाती है, तो उसका पंजीयन केवल जिला दंडाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी या जिला दंडाधिकारी द्वारा अधिकृत कार्यपालक दंडाधिकारी द्वारा, जिनका उस क्षेत्र पर क्षेत्राधिकार हो, दिए गए आदेश पर ही किया जाएगा, जहां जन्म या मृत्यु हुई हो। ऐसा पंजीयन केवल जन्म या मृत्यु की सत्यता की जांच के बाद तथा निर्धारित शुल्क के भुगतान पर किया जा सकता है।
धारा 13(4) स्पष्ट करती है कि ये उपबंध उन अन्य कार्यवाहियों के अतिरिक्त हैं जो जन्म या मृत्यु का पंजीयन नियत समय में न कराने पर की जा सकती हैं। यह यह भी कहती है कि ऐसी कार्यवाही लंबित रहने के दौरान भी पंजीयन किया जा सकता है।
इस विधि को तथ्यों पर लागू करते हुए न्यायालय ने सर्वप्रथम निर्विवाद तिथियों पर ध्यान दिया। एफआईआर से स्पष्ट था कि याचिकाकर्ता का पति 4.5.2024 को लापता हुआ। गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई और 12.5.2024 को एफआईआर दर्ज हुई। मई 2026 में जब रिट याचिका का निपटारा हुआ, तब तक गुमशुदगी के दो वर्ष से अधिक समय बीत चुका था।
न्यायालय ने देखा कि याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु न तो पुष्ट हुई थी और न ही उसके लापता होने के एक वर्ष के भीतर पंजीकृत हुई थी। अतः इस चरण पर उसकी मृत्यु का पंजीयन करने का कोई भी प्रयास स्पष्ट रूप से अधिनियम की धारा 13(3) के अंतर्गत आएगा।
धारा 13(3) के तहत इस प्रकार की विलंबित मृत्यु के पंजीयन का आदेश देने की शक्ति सीधे निबंधक के पास नहीं, बल्कि मजिस्ट्रेट के पास होती है — अर्थात जिला दंडाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी, या जिला दंडाधिकारी द्वारा अधिकृत कार्यपालक दंडाधिकारी। ऐसे मजिस्ट्रेट को पहले कथित मृत्यु की सत्यता का परीक्षण करना होता है, तभी वह ऐसा आदेश पारित कर सकता है।
इसी आधार पर न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्राधिकारीगण इस बात पर जोर देने में सही थे कि सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता है। पटना उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को यह जो स्थिति बताई गई थी कि ऐसे आदेश के अभाव में उत्तरदाता विधिसम्मत रूप से मृत्यु का पंजीयन नहीं कर सकते या मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं कर सकते, उसे स्वीकार किया।
न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि आपराधिक मामले में अभियुक्त के इकबाल-ए-जुर्म को ही निबंधक द्वारा मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का पर्याप्त आधार माना जा सकता है। निर्णय में दर्ज है कि यद्यपि कहा गया कि ऐसा इकबाल-ए-जुर्म किया गया था, फिर भी धारा 13(3) के तहत विधिक आवश्यकता यह बनी रहती है कि एक वर्ष के बाद किसी भी पंजीयन से पूर्व निर्दिष्ट मजिस्ट्रेट का आदेश अनिवार्य है।
न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता को सूचित किए गए उत्तरदाताओं के निर्णय में कोई गैर-कानूनीता नहीं है। इस मामले में रिट न्यायालय की भूमिका केवल यह जांचने तक सीमित थी कि क्या सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार करना विधि के प्रतिकूल था। धारा 13(3) का सामान्य और स्पष्ट वाचन करने पर न्यायालय को यह इनकार उचित प्रतीत हुआ।
फलस्वरूप, न्यायालय ने माना कि जिला निबंधक, वैशाली का दिनांक 14.08.2025 का impugned आदेश दोषरहित है और रिट याचिका में कोई दम नहीं है। आवेदन खारिज कर दिया गया।
निर्णय में किसी अन्य निर्देश, जैसे मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने की स्वतंत्रता देने आदि, का उल्लेख नहीं है। यह मात्र रिट याचिका की खारिजी पर समाप्त होता है।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके सदस्य लापता हैं और जो लंबे अंतराल के बाद मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे अनेक परिवार पेंशन या अन्य लाभों पर निर्भर होते हैं, जिनके लिए मृत्यु का आधिकारिक प्रमाण अनिवार्य है।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद सामान्य पंजीयन प्राधिकारी सीधे मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं कर सकते। भले ही पुलिस जांच से संकेत मिले कि लापता व्यक्ति की हत्या कर दी गई है या किसी अभियुक्त ने अपराध स्वीकार कर लिया हो, केवल इस आधार पर निबंधक मृत्यु का पंजीयन नहीं कर सकता।
इसके बजाय, परिवार या संबंधित व्यक्ति को जिला दंडाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी या अधिकृत कार्यपालक दंडाधिकारी से आदेश प्राप्त करना होगा। तथ्यों की जांच‑पड़ताल तथा ऐसे आदेश के उपरांत ही मृत्यु का पंजीयन किया जा सकता है और प्रमाण पत्र जारी हो सकता है।
यह निर्णय इस प्रकार बिहार में विधवाओं, आश्रितों, वकीलों और अधिकारियों को 1969 के जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 13(3) के अंतर्गत सही विधिक प्रक्रिया के विषय में मार्गदर्शन देता है। यह पंजीयन अधिकारियों को भी इस बात से संरक्षण प्रदान करता है कि उन्हें रिट याचिकाओं के माध्यम से अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र से परे कार्य करने के लिए बाध्य न किया जाए।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय रिट याचिका में मात्र आपराधिक मामले में अभियुक्त के इकबाल-ए-जुर्म के आधार पर, एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद, किसी लापता व्यक्ति के लिए मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश पंजीयन प्राधिकारियों को दे सकता है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने निर्णय दिया कि 1969 के जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 13(3) के तहत ऐसी मृत्यु का पंजीयन केवल सक्षम मजिस्ट्रेट (जिला दंडाधिकारी, अनुमंडल पदाधिकारी या अधिकृत कार्यपालक दंडाधिकारी) के द्वारा मृत्यु की सत्यता के परीक्षण के पश्चात किए गए आदेश पर ही संभव है, और इसलिए निबंधक ने ऐसे आदेश के अभाव में मृत्यु पंजीकृत न कर के सही कार्य किया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- इस निर्णय में किसी भी पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णय या नज़ीर का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है। न्यायालय की विवेचना केवल 1969 के जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रेशन अधिनियम की धारा 13 के पाठ पर आधारित है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 19241 of 2025
मामले का शीर्षक: Priyanka Kumari बनाम The State of Bihar & Ors.
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Partha Sarthy
निर्णय की तिथि: 14.05.2026
उद्धरण: 2026(3) PLJR 626
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Manish Kumar, Advocate
- उत्तरदाताओं की ओर से: कोई उपस्थित नहीं हुआ
उत्तरदाता: बिहार राज्य, Chief Registrar, Birth and Death Registration Department के माध्यम से; District Registrar, Vaishali; Executive Officer-cum-Registrar (Death and Birth), Nagar Parishad, Mahnar; Secretary, Nagar Parishad, Mahnar; Secretary, Urban Department, Bihar, Patna.
मामले का स्वरूप: मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कराने तथा जिला निबंधक के आदेश को निरस्त कराने के लिए मंडामस की मांग वाली सिविल रिट याचिका।
प्रासंगिक अधिनियम: Registration of Births and Deaths Act, 1969, विशेष रूप से धारा 13(1)–(4)।
पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 19241 of 2025
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