अवैतनिक व्यावसायिक बकाया को लेकर चल रही आपराधिक कार्यवाही निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

शुभम शिवांश समविदा लॉ एसोसिएट्स में एक वकील हैं जो नागरिक विवाद, सेवा कानून और जीएसटी मामलों में प्रथा करते हैं। वह पटना उच्च न्यायालय और अन्य अधिकार क्षेत्रों में संपत्ति विवाद, अनुबंधात्मक असहमति, सेवा संबंधित शिकायतों और कर अनुपालन के मामलों में क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी प्रैक्टिस बिहार में व्यक्तियों और व्यवसायों के लिए नागरिक मुकदमेबाजी, रोजगार संबंधित विवाद और नियामक मामलों को संभालती है।

पटना उच्च न्यायालय से वेल्डिंग इलेक्ट्रोड की व्यावसायिक लेन-देन से उत्पन्न आपराधिक cheating (धोखाधड़ी) तथा breach of trust (आपराधिक विश्वासघात) के मामले को रद्द करने का अनुरोध किया गया था। न्यायालय ने माना कि विवाद मूलतः अवैतनिक धनराशि और ब्याज को लेकर था, न कि कोई आपराधिक अपराध। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित कंपनी को पक्षकार बनाया ही नहीं गया था। परिणामस्वरूप निदेशक के विरुद्ध संज्ञान लेने वाला आदेश निरस्त कर दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला शिकायत वाद सं. 2846(C) वर्ष 2012, जिला बेगूसराय, से उत्पन्न होता है। शिकायतकर्ता वेल्डिंग इलेक्ट्रोड के व्यापार से संबंधित एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान है। याचिकाकर्ता को M/s Harji Engg. Pvt. Ltd. के निदेशक के रूप में बताया गया, जो NTPC, कहलगांव में कार्य निष्पादित करने वाली कंपनी थी।

शिकायत के अनुसार, याचिकाकर्ता वेल्डिंग इलेक्ट्रोड की आपूर्ति के लिए शिकायतकर्ता के भागलपुर स्थित शाखा कार्यालय पर आया। मौखिक समझौता होने और फर्म के पैड पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद, शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता की कंपनी को NTPC, कहलगांव साइट पर इलेक्ट्रोड की आपूर्ति शुरू कर दी।

कथित रूप से 14.06.2006 से 06.07.2007 तक आपूर्ति की गई। इन आपूर्तियों के लिए शिकायतकर्ता ने 21,13,513/- रुपये का बिल उठाया। यह भी आरोप लगाया गया कि समझौते में यह प्रावधान था कि यदि वस्तु प्राप्ति के 30 दिनों के अंदर भुगतान नहीं किया गया, तो याचिकाकर्ता 24% वार्षिक ब्याज देने के लिए उत्तरदायी होगा।

शिकायत में स्वयं यह दर्ज है कि शिकायतकर्ता को 23.09.2008 से 28.04.2012 के बीच 5,00,000/- रुपये प्राप्त हुए। इसके बाद शिकायतकर्ता ने दावा किया कि 14.06.2006 से 24% वार्षिक ब्याज देय है और शेष राशि मूलतः ब्याज के रूप में है। शिकायतकर्ता का आरोप था कि बार-बार मांग के बावजूद पूरी देय राशि का भुगतान नहीं किया गया।

इन आरोपों के आधार पर, मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, बेगूसराय ने 20.07.2013 के आदेश द्वारा याचिकाकर्ता के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420 और 406 के अंतर्गत दंडनीय अपराधों के लिए संज्ञान लिया।

संज्ञान आदेश से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत पटना उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की प्रार्थना की। इस मुख्य प्रार्थना-पत्र (Criminal Miscellaneous No. 20168 of 2015) के साथ-साथ, उसी शिकायत वाद से उत्पन्न एक अन्य संबद्ध वाद, Criminal Miscellaneous No. 18467 of 2015, भी न्यायालय के समक्ष था।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

माननीय श्री न्यायमूर्ति चंद्र शेखर झा, पटना उच्च न्यायालय ने 28.02.2024 को मौखिक निर्णय दिया। न्यायालय ने शिकायत, याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं की दलीलों तथा उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि-सिद्धांतों पर सावधानीपूर्वक विचार किया।

याचिकाकर्ता के पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि शिकायत को यथावत सत्य मान लेने पर भी, धारा 420 IPC के अंतर्गत cheating या धारा 406 IPC के अंतर्गत आपराधिक विश्वासघात के आवश्यक तत्वों का खुलासा नहीं होता। यह विवाद, यह कहा गया, स्पष्ट रूप से केवल पूर्ण संविदात्मक राशि और ब्याज के भुगतान न होने से संबंधित है।

याचिकाकर्ता ने इस बात से इंकार नहीं किया कि शिकायतकर्ता ने इलेक्ट्रोड की आपूर्ति की और 21,13,513/- रुपये का मूल बिल उठाया। यह इंगित किया गया कि इस राशि के विरुद्ध 23.09.2008 से 28.04.2012 के बीच कुल 5,00,000/- रुपये का भुगतान किया गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने आगे कहा कि बाद में शिकायतकर्ता ने 44,49,614.76/- रुपये की मांग की, जो अवैतनिक देय राशि पर 24% वार्षिक ब्याज जोड़कर बनती है। जबकि मूल धनराशि पर विवाद नहीं था, मुख्य तर्क यह था कि इस प्रकार का धन-विवाद अपने आप cheating या आपराधिक विश्वासघात का रूप नहीं ले सकता।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि इसी शिकायत से उत्पन्न पहले के जमानत वाद में पटना उच्च न्यायालय ने एक शर्त लगाई थी। Criminal Miscellaneous No. 18467 of 2015 में 29.07.2015 के आदेश द्वारा anticipatory bail देते समय, न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता जमानत बांड दाखिल करते समय शिकायतकर्ता को 16 लाख रुपये का भुगतान करे।

उस आदेश का अनुपालन करते हुए, याचिकाकर्ता ने विपक्षी पक्ष सं. 2 को 8-8 लाख रुपये के दो बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से कुल 16 लाख रुपये का भुगतान किया। ये ड्राफ्ट 11.09.2023 को Punjab and Sindh Bank तथा 06.09.2023 को Canara Bank पर निकाले गए। दोनों ड्राफ्ट की प्राप्ति शिकायतकर्ता की ओर से स्वीकार की गई, क्योंकि इन्हें शिकायतकर्ता के अधिवक्ता के क्लर्क को सौंपा गया था।

न्यायालय ने नोट किया कि परिणामस्वरूप, मूल बिल के लिए उठाई गई मुख्य धनराशि अब शिकायतकर्ता को दे दी गई है। पूर्व में किए गए 5 लाख रुपये के भुगतान के साथ मिलाकर, यह 21,13,513/- रुपये की मूल आपूर्ति बिल का समुचित निर्वहन कर देता है, जिससे विवाद मूलतः केवल ब्याज तक सीमित रह जाता है।

याचिकाकर्ता की ओर से देरी से पूर्ण भुगतान के कारण की भी व्याख्या की गई। कहा गया कि याचिकाकर्ता की कंपनी को M/s Hindustan Steel Works Construction Ltd. से धनराशि प्राप्त होनी थी। किंतु NTPC, कहलगांव और Hindustan Steel Works Construction Ltd. के बीच लंबित arbitration proceedings के कारण याचिकाकर्ता की कंपनी को समय पर भुगतान नहीं मिला। यह वित्तीय कठिनाई, उन्होंने तर्क दिया, शिकायतकर्ता को शेष राशि देने में देरी का कारण बनी और इससे यह संकेत नहीं मिलता कि व्यवसायिक लेन-देन की शुरुआत से ही कोई बेईमानी का इरादा था।

एक अन्य महत्वपूर्ण कानूनी दलील पक्षकारों की स्थिति से संबंधित थी। M/s Harji Engg. (P) Ltd. (HEWPL) को Companies Act, 1956 के अंतर्गत पंजीकृत कंपनी बताया गया, जो एक स्वतंत्र विधिक व्यक्तित्व है। किंतु शिकायत में स्वयं कंपनी को पक्षकार नहीं बनाया गया। केवल निदेशक (वर्तमान याचिकाकर्ता) को आरोपी के रूप में नामित किया गया। केवल इसी आधार पर, यह तर्क दिया गया कि आपराधिक कार्यवाही स्थायी नहीं रह सकती।

इन दलीलों के समर्थन में, याचिकाकर्ता ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय Sushil Sethi and Another v. State of Arunachal Pradesh and Others, (2020) 3 SCC 240, पर भरोसा किया। पटना उच्च न्यायालय ने इस निर्णय के महत्वपूर्ण अनुच्छेदों (7.1, 7.2, 7.5, 8.1 और 8.2) को उद्धृत और स्वीकार किया।

इन अनुच्छेदों में उच्चतम न्यायालय ने:

  • State of Haryana v. Bhajan Lal का उल्लेख करते हुए वे श्रेणियाँ बताईं, जिनमें उच्च न्यायालय, धारा 482 CrPC के तहत, आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है; जिनमें ऐसे मामले शामिल हैं जहाँ आरोपों को संपूर्ण रूप से सत्य मान लेने पर भी कोई अपराध सिद्ध नहीं होता या वे स्वभावतः अविश्वसनीय हों।
  • Vesa Holdings (P) Ltd. v. State of Kerala में यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक संविदा-उल्लंघन cheating नहीं होता। cheating सिद्ध करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि अभियुक्त के पास लेन-देन की शुरुआत से ही धोखाधड़ी या बेईमानी का इरादा था।
  • Sharad Kumar Sanghi v. Sangita Rane में यह समझाया कि जब मुख्य आरोप किसी कंपनी के विरुद्ध हों और कंपनी को ही आरोपी नहीं बनाया जाए, तो केवल Managing Director या Director के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही टिकाऊ नहीं होगी, विशेषकर तब जब vicarious liability दर्शाने वाले विशेष आरोप ही न हों।
  • Sushil Sethi में स्वयं यह ठहराया गया कि जब अनुबंध में प्रवेश के समय धोखाधड़ी या बेईमानी के इरादे के विशिष्ट आरोप न हों, तथा दोषपूर्ण वस्तुओं के प्रतिस्थापन जैसी आचरण से विपरीत संकेत मिले, तो धारा 420 IPC के तहत prima facie मामला नहीं बनता।
  • और यह भी रेखांकित किया कि Maksud Saiyed v. State of Gujarat के अनुसार, दंड संहिता अपने आप निदेशकों की vicarious liability नहीं बनाती; ऐसी उत्तरदायित्व तभी उत्पन्न होता है जब कोई विशिष्ट क़ानून ऐसा प्रावधान करे और शिकायत में उन प्रावधानों को आकर्षित करने वाले स्पष्ट आरोप हों।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने वर्तमान मामले के तथ्यों की समीक्षा की। न्यायालय ने पाया कि व्यवसायिक संबंध शिकायतकर्ता की कंपनी और याचिकाकर्ता की कंपनी के बीच इलेक्ट्रोड की आपूर्ति को लेकर था। याचिकाकर्ता ने आंशिक भुगतान किया था और बाद में जमानत की शर्त के अनुपालन में शेष मूल धनराशि का भी भुगतान कर दिया।

न्यायालय ने नोट किया कि ये भुगतान और दूसरी कंपनी से धनराशि देर से मिलने की, लंबित arbitration के कारण उत्पन्न, व्याख्या इस ओर संकेत करती है कि लेन-देन की शुरुआत से ही याचिकाकर्ता के पास कोई बेईमानी का इरादा नहीं था। यह महत्वपूर्ण था क्योंकि विधि के अनुसार cheating के अपराध के लिए वचन या प्रतिनिधित्व करते समय धोखाधड़ी या बेईमानी का इरादा होना अनिवार्य है।

न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अवलोकन किया कि इन तथ्यों के आलोक में धारा 406 और 420 IPC के तहत prima facie मामला नहीं बनता। मामला मूलतः अवैतनिक राशि और ब्याज से संबंधित है, जिसके लिए नागरिक (civil) उपाय उपलब्ध हैं, न कि आपराधिक दायित्व का प्रश्न।

न्यायालय ने इस तथ्य को भी गंभीरता से लिया कि याचिकाकर्ता की कंपनी, जो एक पृथक विधिक इकाई है, को शिकायत में पक्षकार ही नहीं बनाया गया। Sushil Sethi और संबंधित उच्चतम न्यायालय के निर्णयों में प्रतिपादित विधि पर भरोसा करते हुए, न्यायालय ने माना कि जब मुख्य आरोप कंपनी के विरुद्ध हों, तो केवल उसके Director के विरुद्ध, कंपनी को आरोपी बनाए बिना और vicarious liability के आवश्यक आरोपों के अभाव में, आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।

तथ्यों और विधि के इस संयुक्त आधार पर, पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इस आपराधिक वाद को जारी रहने देना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और न्याय के हित में नहीं होगा।

तदनुसार, न्यायालय ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, बेगूसराय द्वारा शिकायत वाद सं. 2846(C) वर्ष 2012 में 20.07.2013 को पारित वह आदेश, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता के विरुद्ध धारा 420 और 406 IPC के तहत संज्ञान लिया गया था, तथा उससे उत्पन्न सभी अनुवर्ती कार्यवाहियों को निरस्त और रद्द कर दिया।

चूँकि मुख्य Criminal Miscellaneous Application इन्हीं आधारों पर स्वीकार कर ली गई, अतः संबद्ध Criminal Miscellaneous No. 18467 of 2015 को भी निपटा दिया गया और पृथक आदेश देना आवश्यक नहीं समझा गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन व्यवसायियों और छोटे व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अवैतनिक बिलों और ब्याज को लेकर चल रहे विवादों में आपराधिक मामलों में घसीटे जाते हैं। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि प्रत्येक भुगतान में देरी या व्यावसायिक समझौते के उल्लंघन को स्वतः cheating या आपराधिक विश्वासघात का आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।

न्यायालय ने रेखांकित किया कि किसी नागरिक (civil) धन-विवाद को आपराधिक अपराध का रूप देने के लिए यह स्पष्ट सामग्री होनी चाहिए कि लेन-देन की शुरुआत से ही अभियुक्त का इरादा बेईमानी का था। केवल आर्थिक कठिनाई या लम्बे समय तक भुगतान में देरी पर्याप्त नहीं है।

निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि जब लेन-देन दो कंपनियों के बीच हो, तो कंपनी को स्वयं पक्षकार बनाया जाना अनिवार्य है। केवल Directors को अभियुक्त बना देने से काम नहीं चलेगा, जब तक कि कोई विशिष्ट विधिक प्रावधान और विशिष्ट आरोप vicarious liability उत्पन्न न करते हों।

विलंबित भुगतान के पीड़ित पक्ष के लिए, यह निर्णय अप्रत्यक्ष रूप से संकेत करता है कि धन और ब्याज की वसूली के लिए उचित नागरिक (civil) उपायों का सहारा लेना चाहिए, न कि आपराधिक कानून का दुरुपयोग करना चाहिए। अभियुक्त पक्ष के लिए यह दिखाता है कि पटना उच्च न्यायालय धारा 482 CrPC के अंतर्गत अपनी शक्ति का प्रयोग करके ऐसी आपराधिक कार्यवाही को रोकेगा, जिसमें अपराध के आवश्यक तत्वों का खुलासा ही नहीं होता।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: शिकायत में वेल्डिंग इलेक्ट्रोड की आपूर्ति के बदले पूर्ण मूल्य और ब्याज के भुगतान न किए जाने से संबंधित जो आरोप हैं, क्या वे कंपनी के Director के विरुद्ध धारा 420 और 406 IPC के अपराध का खुलासा करते हैं?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि तथ्यों से लेन-देन की शुरुआत से बेईमानी का इरादा या आपराधिक विश्वासघात सिद्ध नहीं होता, विशेषकर जब पर्याप्त भुगतान किया गया था और बाद में संपूर्ण मूल धनराशि भी चुका दी गई।
  • प्रश्न: जब मुख्य व्यावसायिक लेन-देन कंपनी के साथ हो और कंपनी को ही आरोपी न बनाया जाए, तो क्या केवल Director के विरुद्ध cheating और breach of trust की आपराधिक कार्यवाही कायम रखी जा सकती है?
    उत्तर: नहीं। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का अनुसरण करते हुए, न्यायालय ने कहा कि जहाँ मुख्य आरोप कंपनी के विरुद्ध हों, और कंपनी को पक्षकार ही न बनाया गया हो तथा vicarious liability के विशिष्ट आरोप न हों, वहाँ केवल Director के विरुद्ध कार्यवाही विधिसम्मत नहीं है।
  • प्रश्न: क्या ऐसे परिस्थितियों में उच्च न्यायालय को धारा 482 CrPC के अंतर्गत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग कर संज्ञान आदेश को रद्द करना चाहिए?
    उत्तर: हाँ। इस शुद्ध वाणिज्यिक विवाद को आपराधिक मामला मानना न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होता, इसलिए पटना उच्च न्यायालय ने संज्ञान आदेश तथा सभी अनुवर्ती कार्यवाहियों को रद्द कर दिया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Sushil Sethi and Another v. State of Arunachal Pradesh and Others, (2020) 3 SCC 240 (अनुच्छेद 7.1, 7.2, 7.5, 8.1, 8.2 पर विशेष भरोसा)।
  • State of Haryana v. Bhajan Lal, 1992 Supp (1) SCC 335 (Article 226/धारा 482 CrPC के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की श्रेणियाँ)।
  • Vesa Holdings (P) Ltd. v. State of Kerala, (2015) 8 SCC 293 (केवल संविदा-उल्लंघन से cheating सिद्ध नहीं होती; आरंभ से बेईमानी के इरादे की आवश्यकता)।
  • Sharad Kumar Sanghi v. Sangita Rane, (2015) 12 SCC 781 (निर्देशकों के विरुद्ध अभियोजन हेतु कंपनी को पक्षकार बनाने और vicarious liability की ठोस दलीलों की आवश्यकता)।
  • Maksud Saiyed v. State of Gujarat, (2008) 5 SCC 668 : (2008) 2 SCC (Cri) 692 (IPC के तहत किसी विशिष्ट वैधानिक प्रावधान और आरोपों के बिना निदेशकों की vicarious liability नहीं)।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Miscellaneous No. 20168 of 2015 with Criminal Miscellaneous No. 18467 of 2015

मामले का शीर्षक: Gyan Singh v. The State of Bihar & Anr.

पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Chandra Shekhar Jha

उद्धरण (Citation): 2024 (2) PLJR 533

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Alok Kumar @ Alok Kr. Shahi, Advocate; Mrs. Archana Shahi, Advocate
  • राज्य की ओर से (Criminal Miscellaneous No. 20168 of 2015 में): Mr. Jharkhandi Upadhyay, APP
  • राज्य की ओर से (Criminal Miscellaneous No. 18467 of 2015 में): Mr. Madhuranand Jha, APP

मामले का स्वरूप: धारा 482 CrPC के अंतर्गत याचिका, जिसमें शिकायत वाद में धारा 420 और 406 IPC के तहत लगाए गए आरोपों पर पारित संज्ञान आदेश को रद्द करने की प्रार्थना की गई।

निर्णय की तारीख: 28.02.2024

चुनौती दिया गया निचली अदालत का आदेश: मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, बेगूसराय द्वारा शिकायत वाद सं. 2846(C) वर्ष 2012 में 20.07.2013 को पारित संज्ञान आदेश।

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment – Criminal Misc. No. 20168 of 2015


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