मामले की पृष्ठभूमि
यह आपराधिक अपील, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14A(1) के तहत पटना उच्च न्यायालय के समक्ष दाखिल की गई थी।
अपील में 31.05.2023 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी, जो अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश–I–cum–विशेष न्यायाधीश, SC/ST (POA) अधिनियम, द्वारा SC/ST केस नंबर 48 of 2022 में पारित किया गया था। यह मामला मधेपुरा थाना कांड संख्या 428 of 2022 से उत्पन्न हुआ था।
पुलिस मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 448, 341, 323, 354A, 506, 427 सहपठित धारा 34 तथा SC/ST अधिनियम की धाराओं 3(i)(r)(s) और 3(ii)(v)(a) के तहत दंडनीय अपराधों के लिए दर्ज किया गया था। अनुसंधान के उपरांत पुलिस ने अभियक्तों के पक्ष में अंतिम प्रपत्र समर्पित किया, यह निष्कर्ष निकालते हुए कि प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे हैं।
पुलिस के इस निष्कर्ष के बावजूद, विशेष न्यायाधीश ने अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 341, 323, 379, 380, 427, 448, 354-A, 504, 506, 34 तथा SC/ST अधिनियम की धाराओं 3(i)(r)(s) के अंतर्गत अपराधों का संज्ञान ले लिया। इससे आहत होकर अभियुक्तों ने पटना उच्च न्यायालय की शरण ली।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
माननीय श्री न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अपील की सुनवाई की तथा प्राथमिकी, केस डायरी एवं विवादित संज्ञान आदेश की जांच की।
अपीलकर्ताओं की ओर से यह प्रस्तुत किया गया कि विवाद अपीलकर्ताओं के घर के रास्ते से संबंधित एक अतिक्रमण विवाद से उपजा। अधिवक्ता के अनुसार, सूचनाकर्त्री तथा उसके परिवार के सदस्यों ने इस रास्ते पर अतिक्रमण कर रखा था।
अतिक्रमण से संबंधित पुलिस जांच के दौरान कथित रूप से कई स्वतंत्र गवाहों के बयान लिए गए, जिन्होंने अपीलकर्ताओं के उस पक्ष का समर्थन किया कि उनके रास्ते पर अतिक्रमण किया गया था।
अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उन्होंने बार–बार सूचनाकर्त्री के परिवार से अतिक्रमण हटाने का अनुरोध किया। जब इन अनुरोधों का कोई परिणाम नहीं निकला, तो अपीलकर्ता संख्या 2 ने सूचनाकर्त्री के ससुर के विरुद्ध अतिक्रमण कार्यवाही शुरू की।
उच्च न्यायालय ने यह प्रस्तुति नोट की कि 05.05.2022 को अंचल पदाधिकारी की देखरेख में, पुलिस अधिकारी, सशस्त्र बल तथा महिला कॉन्स्टेबलों के साथ, JCB मशीन तथा अन्य साधनों का उपयोग कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इसी आधिकारिक अतिक्रमण–उन्मूलन प्रक्रिया के दौरान प्रतिवादी संख्या 2, रंजन देवी, को चोटें आईं।
अपीलकर्ताओं ने आगे यह भी प्रस्तुत किया कि अतिक्रमण हटाए जाने के समय वे में से कोई भी घटना स्थल पर मौजूद नहीं था। जिला प्रशासन के अधिकारियों द्वारा अतिक्रमण हटाए जाने के बाद ही प्रतिवादी संख्या 2 ने मधेपुरा थाना कांड संख्या 428 of 2022 दर्ज कराया।
उस मामले में पुलिस ने अनुसंधान कर अंततः अपीलकर्ताओं के पक्ष में रिपोर्ट समर्पित की, यह निष्कर्ष देते हुए कि प्रतिवादी संख्या 2 के आरोप पूरी तरह झूठे थे। कहा गया कि अतिक्रमण कार्यवाही से संबंधित अभिलेखों को उच्च न्यायालय के समक्ष परिशिष्ट P-3, P-4 और P-5 के रूप में दायर किया गया।
इन परिस्थितियों के आधार पर अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रतिवादी संख्या 2 ने दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से मामला दर्ज कराया और विशेष न्यायाधीश ने यांत्रिक ढंग से संज्ञान लिया, जो न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान है। इस संदर्भ में पटना उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णय Cr. Misc. No. 43748 of 2013 (Vinay Kumar vs. The State of Bihar & Anr.) पर भरोसा किया गया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 2 के अधिवक्ता ने अपील का विरोध किया। उसने प्रस्तुत किया कि कथित अपराधों के लिए अपीलकर्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। आगे यह भी कहा गया कि प्रतिवादी संख्या 2 की सास को अपीलकर्ताओं द्वारा बर्बरतापूर्वक पीटा गया और बाद में उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, तथा अन्वेषण अधिकारी ने जानबूझकर मृतका की पोस्ट–मॉर्टम रिपोर्ट छिपा ली।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद उच्च न्यायालय ने प्राथमिकी, केस डायरी तथा विवादित आदेश का सावधानीपूर्वक अवलोकन किया।
न्यायालय ने दर्ज किया कि यह निर्विवाद स्थिति थी कि जिला प्रशासन के अधिकारियों ने, कथित घटना स्थल पर, प्रतिवादी संख्या 2 के परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए अतिक्रमण को हटा दिया था।
प्राथमिकी के अनुसार, कथित मारपीट की घटना अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई वाले दिन ही, रात्रि लगभग 10:00 बजे घटी बताई गई। उसी कथित घटना में, सूचनाकर्त्री (प्रतिवादी संख्या 2) की सास, लीला देवी, को चोटें आने की बात कही गई।
उच्च न्यायालय ने इस आरोप की तुलना केस डायरी में उपलब्ध चिकित्सीय अभिलेख से की। केस डायरी के अनुसार, लीला देवी की चोट रिपोर्ट से यह स्पष्ट हुआ कि 05.05.2022 को 4:45 बजे अपराह्न उन्हें संबंधित अस्पताल में उपचार प्रदान किया गया था।
यह उपचार का समय अत्यंत महत्वपूर्ण था। न्यायालय ने तर्क किया कि यदि लीला देवी पर कथित हमला रात्रि 10:00 बजे हुआ होता, तो उनका प्रथम उपचार स्वाभाविक रूप से उस समय के बाद होना चाहिए था। किंतु चिकित्सीय अभिलेख में 4:45 बजे अपराह्न उपचार दर्ज था, जो कथित 10:00 बजे रात्रि की घटना से काफी पहले का समय है।
इसी आधार पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि लीला देवी को चोटें प्राथमिकी में दर्शाई गई घटना के समय से पहले ही लग चुकी थीं। न्यायालय के दृष्टिकोण से यह असंगति अकेले ही प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा अपीलकर्ताओं के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को झूठा साबित करने के लिए पर्याप्त थी।
इस पहलू के साथ–साथ, आधिकारिक अतिक्रमण–उन्मूलन कार्यवाही तथा अपीलकर्ताओं के पक्ष में पुलिस द्वारा समर्पित अंतिम प्रपत्र संबंधी प्रस्तुतियों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने पाया कि प्रतिवादी संख्या 2 ने दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से मामला दर्ज कराया।
न्यायालय ने आगे यह भी माना कि यदि ऐसे आरोपों पर अपीलकर्ताओं को मुकदमे का सामना करना पड़े, तो यह न्यायालय की प्रक्रिया का पूर्ण दुरुपयोग होगा।
उच्च न्यायालय द्वारा नोट किया गया एक और महत्वपूर्ण पहलू यह था कि विशेष न्यायाधीश ने किस प्रकार संज्ञान लिया। परीक्षण न्यायालय ने पुलिस के निष्कर्ष से भिन्न मत रखते हुए कथित अपराधों का संज्ञान ले लिया। किंतु, पटना उच्च न्यायालय के अवलोकनानुसार, यह कार्य “बिना कोई कारण बताए, यांत्रिक ढंग से” किया गया।
कारणों का अभाव इसीलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि जब कोई न्यायिक दंडाधिकारी या विशेष न्यायाधीश पुलिस की अंतिम रिपोर्ट से असहमत होकर संज्ञान लेता है, तो सामान्यतः आदेश में यह संकेत होना चाहिए कि पुलिस के निष्कर्ष को क्यों अस्वीकार किया जा रहा है। इस मामले में पटना उच्च न्यायालय को संज्ञान आदेश में ऐसा कोई तर्क नहीं मिला।
इन सभी कारकों को समग्र रूप से देखते हुए न्यायालय ने अपील में दम पाया। उसने यह माना कि संज्ञान आदेश विधि की दृष्टि से टिकाऊ नहीं है।
फलस्वरूप, पटना उच्च न्यायालय ने 31.05.2023 की विवादित वह आदेश, जिसके द्वारा अपीलकर्ताओं के विरुद्ध संज्ञान लिया गया था, निरस्त कर दिया। इसके परिणामस्वरूप उस संज्ञान आदेश के आधार पर अपीलकर्ताओं के विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई और आपराधिक अपील स्वीकृत कर ली गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो अतिक्रमण विवाद या इसी प्रकार के पड़ोसी झगड़े के बाद झूठे आपराधिक मामलों में फंस सकते हैं।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि जब चिकित्सीय अभिलेख तथा केस डायरी की प्रविष्टियां, प्राथमिकी में उल्लिखित समय तथा कथित घटनाक्रम का समर्थन नहीं करतीं, तो न्यायालय ऐसे मामले को झूठा तथा दुर्भावनापूर्ण मान सकता है। केवल इतना पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता बाद में हुई मारपीट का आरोप लगाए, यदि चोटें पहले की समयावधि में दर्ज हों।
निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि जब पुलिस ने अभियुक्तों के पक्ष में अंतिम प्रपत्र दे दिया हो, तो परीक्षण न्यायालय बिना सोच–विचार के यांत्रिक रूप से संज्ञान नहीं ले सकता। यदि न्यायाधीश पुलिस के निष्कर्ष से असहमत है, तो उसे कारण बताने होंगे। ऐसे कारणों के अभाव में आदेश को प्रक्रिया के दुरुपयोग के रूप में निरस्त किया जा सकता है।
बिहार में SC/ST अधिनियम तथा भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत मुकदमे का सामना कर रहे अभियुक्तों के लिए यह निर्णय यह संदेश देता है कि जहाँ अभिलेखीय सामग्री स्पष्ट रूप से प्राथमिकी का खंडन करती हो और निम्न अदालत ने मनन नहीं किया हो, वहाँ उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या विशेष न्यायाधीश, चोट के समय संबंधी प्राथमिकी के आरोपों के चोट रिपोर्ट से खंडित होने तथा पुलिस द्वारा अपीलकर्ताओं के पक्ष में अंतिम प्रपत्र समर्पित किए जाने की स्थिति में भी, अपीलकर्ताओं के विरुद्ध वैध रूप से संज्ञान ले सकते थे?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि चिकित्सीय अभिलेख से यह स्पष्ट था कि चोटें कथित घटना–समय से पहले लगी थीं, जिससे प्राथमिकी असत्य सिद्ध हुई, और विशेष न्यायाधीश ने बिना कारण बताए यांत्रिक रूप से संज्ञान लिया। संज्ञान आदेश निरस्त कर दिया गया। - प्रश्न: क्या प्रतिवादी संख्या 2 द्वारा दर्ज आपराधिक मामला न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान था?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने पाया कि मामला दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से दर्ज कराया गया था और ऐसे आरोपों पर अपीलकर्ताओं को मुकदमे का सामना कराना न्यायालय की प्रक्रिया का पूर्ण दुरुपयोग होगा।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामला
- Cr. Misc. No. 43748 of 2013 (Vinay Kumar vs. The State of Bihar & Anr.) – जिस पर अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने भरोसा किया।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Appeal (SJ) No. 4175 of 2023, arising out of Madhepura P.S. Case No. 428 of 2022; SC/ST Case No. 48 of 2022
मामले का शीर्षक: Shatrughan Bhagat & Ors. vs. The State of Bihar & Anr.
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Shailendra Singh
न्याय–निर्णय उद्धरण: 2024 (2) PLJR 445
अधिवक्ता: अपीलकर्ताओं की ओर से – Mr. Shailendra Kumar Singh, Advocate; राज्य की ओर से – Mr. Binay Krishna, Spl. P.P.; प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से – Mr. Sanjay Singh, Advocate
मामले का स्वरूप: SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 की धारा 14A(1) के तहत दायर आपराधिक अपील, जिसमें विशेष न्यायाधीश, SC/ST (POA) अधिनियम द्वारा पारित संज्ञान आदेश को चुनौती दी गई।
निर्णय की तिथि: 15.04.2024
निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MjQjNDE3NSMyMDIzIzEjTg==-t4CLPhHamLs=
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