यह मामला पटना उच्च न्यायालय में दायर किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता, दीपक कुमार, ने बिहार स्टेट फूड एंड सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन (BSFC) द्वारा उन्हें तीन वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट करने और किसी भी निविदा में भाग लेने से रोकने के आदेश को चुनौती दी। यह आदेश 09 सितंबर 2017 को जारी हुआ था।
मामले की पृष्ठभूमि:
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याचिकाकर्ता का कार्यक्षेत्र: याचिकाकर्ता, मधुबनी जिले के लिए ट्रांसपोर्ट-कम-हैंडलिंग एजेंट के रूप में काम कर रहे थे। उनके और BSFC के बीच 24 अक्टूबर 2016 को अनुबंध हुआ था, जो तीन वर्षों तक वैध था।
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विवाद की शुरुआत:
- 29 मार्च 2017 को, याचिकाकर्ता का एक ट्रक, जिसमें 500 बैग चावल (कुल 252 क्विंटल) लदा था, दरभंगा से जयनगर, मधुबनी के गोदाम जा रहा था।
- रास्ते में ट्रक को कुछ व्यक्तियों ने रोका, जिन्होंने कथित रूप से अवैध धन की मांग की।
- ट्रक चालक से ट्रक के कागजात ले लिए गए और इसे केओटीि ब्लॉक ऑफिस में जब्त कर लिया गया।
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जांच और एफआईआर:
- जब ट्रक को अगले दिन तौला गया, तो ट्रक में 500 बैग चावल बरकरार पाए गए। इसके बावजूद, ट्रक चालक के खिलाफ धारा 420/34 आईपीसी और आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 7 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
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कॉरपोरेशन का कदम:
- BSFC ने चावल की कीमत के रूप में याचिकाकर्ता से ₹8,23,209 की मांग की। यह राशि याचिकाकर्ता के बिल से काट ली गई।
- BSFC ने याचिकाकर्ता को ब्लैकलिस्ट कर दिया और अनुबंध समाप्त कर दिया।
याचिकाकर्ता के तर्क:
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ब्लैकलिस्टिंग का आधार:
- याचिकाकर्ता ने दावा किया कि ब्लैकलिस्टिंग का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया और उनके स्पष्टीकरण को सही तरीके से नहीं सुना गया।
- उन्होंने अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया कि ट्रक से चावल गायब होने के कोई सबूत नहीं थे।
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अनुचित व्यवहार:
- याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि BSFC ने केवल अनुमान के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया।
- धारा 4(d) के तहत ब्लैकलिस्टिंग केवल अनुमानित परिस्थितियों पर आधारित थी, न कि किसी ठोस साक्ष्य पर।
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अदालती आदेश की अनदेखी:
- जब चावल को छुड़ाने के लिए याचिकाकर्ता ने स्थानीय अदालत से संपर्क किया, तो आदेश के बावजूद चावल को BSFC के गोदाम में नहीं पहुंचाया गया।
BSFC का पक्ष:
- BSFC ने अनुबंध की धारा 4(d) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि अगर खाद्यान्न को समय पर नहीं पहुंचाया जाता है, तो इसे ब्लैक मार्केटिंग की कोशिश मानी जाएगी।
- BSFC ने दावा किया कि ब्लैकलिस्टिंग और अनुबंध समाप्त करने का निर्णय अनुबंध की शर्तों के अनुसार था।
अदालत का अवलोकन:
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ब्लैकलिस्टिंग का निर्णय दोषपूर्ण:
- न्यायालय ने पाया कि BSFC ने याचिकाकर्ता के उत्तर पर ठीक से विचार नहीं किया और ब्लैकलिस्टिंग का आदेश अवैध था।
- केवल अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति के व्यावसायिक अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
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चावल की बरामदगी और अदालती आदेश की अवमानना:
- चावल को BSFC के गोदाम तक पहुंचाने में देरी का कारण अधिकारियों की लापरवाही थी।
- न्यायालय ने BSFC और स्थानीय अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए और उनके खिलाफ जांच का निर्देश दिया।
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ब्लैकलिस्टिंग का कानूनी प्रभाव:
- न्यायालय ने कहा कि ब्लैकलिस्टिंग जैसे गंभीर निर्णय का आधार ठोस सबूत होना चाहिए।
- मूल अधिकारों (व्यवसाय करने के अधिकार) का हनन केवल वैध प्रक्रिया से ही किया जा सकता है।
अदालती आदेश:
- ब्लैकलिस्टिंग का आदेश रद्द कर दिया गया।
- BSFC को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता के उत्तर पर पुनर्विचार करें और मामले का निर्णय मध्यस्थता न्यायाधिकरण द्वारा दिए गए निर्णय के बाद ही लें।
- स्थानीय अधिकारियों की भूमिका की जांच का आदेश दिया गया, ताकि अदालत के आदेशों की अवहेलना करने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को दंडित किया जा सके।
इस मामले का महत्व:
- व्यावसायिक अधिकारों की सुरक्षा: यह मामला व्यावसायिक अनुबंधों में पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- अदालती आदेशों का पालन: न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारियों द्वारा अदालती आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
- ब्लैकलिस्टिंग के मानदंड: किसी भी व्यक्ति या संस्था को ब्लैकलिस्ट करने से पहले निष्पक्ष और ठोस जांच की आवश्यकता होती है।
यह निर्णय न्याय और प्रशासनिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTU3NSMyMDE5IzEjTg==-2n5j7Zq–am1–J–ak1–c=


