परिचय:
यह मामला बिहार राज्य सहकारी बैंक लिमिटेड द्वारा दाखिल याचिका से संबंधित है, जिसमें सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार द्वारा अपील की देरी को खारिज किए जाने का मुद्दा उठाया गया था। पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले में रजिस्ट्रार के आदेश को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि:
बिहार राज्य सहकारी बैंक ने सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के समक्ष अपील दायर की थी। यह अपील समय सीमा से बाहर थी और इस देरी के लिए रजिस्ट्रार से इसे माफ करने की प्रार्थना की गई। हालांकि, रजिस्ट्रार ने इस आधार पर अपील स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को देरी माफ करने का अधिकार नहीं है।
कानूनी प्रावधान और तर्क:
- बिहार सहकारी समितियां नियम, 1959: इस नियम की धारा 66 के अनुसार, रजिस्ट्रार को अपील और पुनर्विचार के अधिकार दिए गए हैं। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि रजिस्ट्रार पूर्ण न्यायालय नहीं है।
- न्यायालय के उदाहरण: सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के फैसलों, जैसे सकुरु बनाम तानाजी (AIR 1985 Supreme Court 1279) और सीता राम साह बनाम बिहार राज्य (1995 PLJR 396), में यह स्थापित किया गया है कि देरी माफी का अधिकार केवल न्यायालयों को है, न कि अर्ध-न्यायिक निकायों को।
- कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर का उपयोग: याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनकी देरी माफी की प्रार्थना सीपीसी के तहत की गई थी, न कि सीमा अधिनियम के तहत। लेकिन अदालत ने इसे अस्वीकार्य बताया।
अदालत का निर्णय:
पटना उच्च न्यायालय ने यह माना कि सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार न्यायालय की श्रेणी में नहीं आते और उन्हें देरी माफी का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रार के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है।
निष्कर्ष:
इस मामले ने यह स्पष्ट किया कि अर्ध-न्यायिक निकायों की सीमाएं क्या हैं और उन्हें न्यायालयों के समान अधिकार नहीं दिए जा सकते। यह निर्णय सहकारी समितियों और अन्य अर्ध-न्यायिक निकायों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।
पूरा
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjODY2NyMyMDE5IzEjTg==-4Qzv7072nSE=


