“गुम्टी विवाद: हमले और गलत निरोध के मामले में न्यायिक प्रक्रिया”

 

पटना उच्च न्यायालय के इस मामले में, नवलेश यादव ने एक आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के खिलाफ याचिका दायर की। मामला लखीसराय जिले के हलसी थाना क्षेत्र से संबंधित था, जिसमें उसे और उसके सह-अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 341/323/337/504/34 के तहत आरोपित किया गया था।

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने उन्हें धारा 337 और 504 से बरी किया, लेकिन धारा 323 और 341 के तहत दोषी पाया गया। अदालत ने उन्हें अपराध सुधार अधिनियम, 1958 की धारा 3 के तहत लाभ देते हुए चेतावनी के साथ रिहा कर दिया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कई महत्वपूर्ण तर्क दिए। उन्होंने बताया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) और गवाहों के बयान में कई विसंगतियां हैं। जैसे, FIR में दावा किया गया कि आरोपी ने सूचनाकर्ता, उसके बेटे और भाई को मारा, लेकिन गवाहों के बयान में केवल भाई और बेटे पर हमले का उल्लेख था।

अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि डॉक्टर और जांच अधिकारी को नहीं बुलाया गया, जिससे हमले की पुष्टि नहीं हो सकी। गवाहों के बयानों में भी स्थान और हमले को लेकर अलग-अलग जानकारी दी गई।

राज्य के अधिवक्ता ने इन तर्कों का खंडन करते हुए कहा कि अदालत ने सावधानीपूर्वक साक्ष्यों का मूल्यांकन किया है। उन्होंने बताया कि गवाहों ने लगातार हमले का बयान दिया है और क्रॉस-जांच में इसे नहीं डगमगाया गया।

न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि अदालत केवल यह देखेगी कि निचली अदालतों के तर्क साक्ष्यों के अनुरूप हैं या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि धारा 323 और 341 के तहत केवल यह साबित करना होता है कि हमला जान बूझकर किया गया था।

अंततः, उच्च न्यायालय ने निचली अदालतों के निर्णय को बरकरार रखा और याचिका को खारिज कर दिया।

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