“पिता-पुत्र के रिश्ते का विवाद: डीएनए टेस्ट की मांग पर पटना उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय”

 

बेगूसराय के एक परिवार से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले में पटना उच्च न्यायालय ने एक ऐसा निर्णय दिया, जो पारिवारिक विवादों में डीएनए परीक्षण के उपयोग के संबंध में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया। यह मामला सिविल मिसलेनियस संख्या 1699/2019 के रूप में दर्ज किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि बेगूसराय जिले के राजेंद्र नगर मोहल्ले से जुड़ी है, जहाँ एक संपत्ति विवाद में पिता-पुत्र के रिश्ते का मामला सामने आया। मूल रूप से यह विवाद एक परिवार के भीतर संपत्ति के बंटवारे को लेकर शुरू हुआ, जो बाद में पारिवारिक रिश्तों की वैधता के प्रश्न में बदल गया।

मामले के मुख्य पक्षकार थे:

1. याचिकाकर्ता पक्ष:

   – राम सेवक महतो (पिता)

   – पिंटू कुमार (पुत्र)

   – चिंटू कुमार (पुत्र)

2. प्रतिवादी पक्ष:

   – रंजीत कुमार महतो

   – संजीव कुमार महतो

विवाद की शुरुआत तब हुई जब रंजीत कुमार महतो और संजीव कुमार महतो ने राम सेवक महतो के पुत्र होने का दावा करते हुए संपत्ति में हिस्सा मांगा। इस दावे को चुनौती देते हुए राम सेवक महतो और उनके अन्य दो पुत्रों (पिंटू कुमार और चिंटू कुमार) ने कहा कि रंजीत और संजीव उनके पुत्र नहीं हैं, बल्कि केवल किरायेदार हैं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि रंजीत और संजीव राम सेवक महतो की पहली पत्नी के पुत्र हैं, जो बाद में एक अन्य व्यक्ति राजेंद्र महतो (मालटीपिपरा, बरौनी निवासी) से विवाह कर चुकी थीं। इस आधार पर, उन्होंने निचली अदालत में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 75 और 151 के तहत एक याचिका दायर की, जिसमें डीएनए परीक्षण कराने की मांग की गई।

निचली अदालत (सब जज प्रथम, बेगूसराय) ने 21 सितंबर 2019 को इस याचिका को खारिज कर दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने पटना उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

माननीय न्यायमूर्ति विकास जैन ने मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान दिया:

1. दस्तावेजी साक्ष्य का महत्व:

   – याचिकाकर्ताओं ने अपने दावे के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया

   – दूसरी ओर, प्रतिवादियों (रंजीत और संजीव) ने ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत किए जो प्रथम दृष्टया उन्हें राम सेवक महतो का पुत्र सिद्ध करते थे

2. डीएनए परीक्षण का मुद्दा:

   – न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डीएनए परीक्षण का आदेश साक्ष्य जुटाने के एक साधन के रूप में नहीं दिया जा सकता

   – यह एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि डीएनए परीक्षण का आदेश केवल विशेष परिस्थितियों में ही दिया जा सकता है

न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाई और याचिका को खारिज कर दिया। यह निर्णय कई कारणों से महत्वपूर्ण है:

1. कानूनी प्रक्रिया में साक्ष्य का महत्व:

   – यह स्पष्ट करता है कि न्यायालय में दावों को सिर्फ आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध करना होता है

   – दस्तावेजी साक्ष्य की प्राथमिकता को रेखांकित करता है

2. डीएनए परीक्षण का उपयोग:

   – यह स्पष्ट करता है कि डीएनए परीक्षण एक विशेष कानूनी उपकरण है, जिसका उपयोग बिना किसी ठोस आधार के नहीं किया जा सकता

   – यह परीक्षण साक्ष्य जुटाने का एक सामान्य साधन नहीं है

3. पारिवारिक विवादों में न्यायिक दृष्टिकोण:

   – न्यायालय ने संवेदनशील पारिवारिक मामलों में सतर्क दृष्टिकोण अपनाया

   – बिना ठोस आधार के परिवार के सदस्यों के बीच संबंधों को चुनौती देने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया

यह निर्णय समाज के लिए कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:

1. पारिवारिक रिश्तों की गरिमा:

   – रिश्तों को बिना ठोस आधार के चुनौती नहीं दी जानी चाहिए

   – पारिवारिक विवादों में कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए

2. कानूनी प्रक्रिया का महत्व:

   – न्यायालय में दावों को उचित साक्ष्य के साथ प्रस्तुत करना आवश्यक है

   – सिर्फ आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है

3. वैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग:

   – डीएनए जैसे वैज्ञानिक परीक्षणों का उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए

   – ऐसे परीक्षणों का आदेश देने से पहले न्यायालय पर्याप्त आधार चाहता है

इस निर्णय का समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा:

1. पारिवारिक विवादों में:

   – लोग बिना ठोस आधार के पारिवारिक संबंधों को चुनौती देने से बचेंगे

   – विवादों को सुलझाने में दस्तावेजी साक्ष्यों का महत्व बढ़ेगा

2. कानूनी प्रक्रिया में:

   – वकील और वादी डीएनए परीक्षण की मांग करने से पहले अधिक सावधानी बरतेंगे

   – साक्ष्य जुटाने के वैकल्पिक तरीकों पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा

3. सामाजिक संदर्भ में:

   – पारिवारिक रिश्तों की गरिमा को बनाए रखने में मदद मिलेगी

   – विवादों को सुलझाने में वैज्ञानिक तरीकों के उपयोग पर स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलेंगे

यह मामला भारतीय न्यायिक प्रणाली में पारिवारिक विवादों के निपटारे का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। यह दर्शाता है कि न्यायालय पारिवारिक मामलों में कैसे संतुलित दृष्टिकोण अपनाता है और साथ ही वैज्ञानिक परीक्षणों के उपयोग के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश प्रदान करता है।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
क्लिक करें:

https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NDQjMTY5OSMyMDE5IzEjTg==-uKLpC1s3NBc=


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