पटना उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया, जो पारिवारिक संपत्ति और वाद-पत्र में संशोधन से संबंधित था। यह मामला सावित्री कुंवर बनाम सुनील पांडेय और अन्य के बीच का था, जिसमें वाद-पत्र में किए गए एक संशोधन को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि सावित्री कुंवर, जो स्वर्गीय गणेश पांडेय की पत्नी थीं, ने पटना उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की। यह याचिका ससारम, रोहतास के सब-जज VI द्वारा 26 नवंबर 2018 को पारित एक आदेश के विरुद्ध थी। उक्त आदेश में टाइटल सूट नंबर 336/2017 में वादियों (सुनील पांडेय और अन्य) की ओर से दायर एक याचिका को स्वीकार किया गया था, जिसमें वाद-पत्र में कुछ संशोधन करने की मांग की गई थी।
सावित्री कुंवर की ओर से उपस्थित वकील ने तर्क दिया कि वह वादियों की सह-अंशधारक और पारिवारिक सदस्य हैं। स्वर्गीय गणेश पांडेय की विधवा होने के नाते उनका वाद संपत्ति में अधिकार है। लेकिन वादियों ने 13 मार्च 2018 को सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VI नियम 17 के तहत निचली अदालत में एक याचिका दायर की, जिसमें वाद-पत्र के पैरा 9 में संशोधन की मांग की गई। इस संशोधन में सावित्री कुंवर को प्रतिवादी मुरली पांडेय की भाभी के रूप में दर्शाया गया।
सावित्री कुंवर के वकील का कहना था कि संशोधन याचिका में किया गया दावा पूरी तरह से गलत है, क्योंकि सावित्री कुंवर स्वर्गीय गणेश पांडेय की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी हैं, न कि मुरली पांडेय की भाभी। उनका तर्क था कि वादियों द्वारा मांगा गया संशोधन दुर्भावनापूर्ण था और निचली अदालत को इसे खारिज कर देना चाहिए था।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने मामले की जांच करते हुए पाया कि संशोधन याचिका वादियों द्वारा प्रारंभिक चरण में दायर की गई थी, जब मुकदमे की सुनवाई शुरू भी नहीं हुई थी। न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VI नियम 17 के प्रावधानों का विश्लेषण किया, जो अदालत को किसी भी चरण में किसी भी पक्ष को अपने आवेदन में परिवर्तन या संशोधन करने की अनुमति देने का अधिकार देता है।
इस नियम के अनुसार, अदालत कार्यवाही के किसी भी चरण में किसी भी पक्ष को अपने आवेदन में बदलाव या संशोधन करने की अनुमति दे सकती है, बशर्ते यह उचित हो और ऐसे सभी संशोधन पक्षों के बीच वास्तविक विवाद के निर्धारण के लिए आवश्यक हों। हालांकि, इस नियम में एक परंतुक भी है जो कहता है कि सुनवाई शुरू होने के बाद कोई संशोधन आवेदन तब तक स्वीकार नहीं किया जाएगा, जब तक कि अदालत इस निष्कर्ष पर न पहुंचे कि पूरी तत्परता के बावजूद पक्ष सुनवाई शुरू होने से पहले मामले को नहीं उठा सकते थे।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आदेश VI नियम 17 का पहला भाग अदालत को आवेदन में संशोधन की अनुमति देने या न देने का विवेकाधिकार देता है। दूसरे भाग में ‘shall’ शब्द का प्रयोग अदालत के लिए यह अनिवार्य बनाता है कि वह ऐसे संशोधन आवेदन को स्वीकार करे, यदि संशोधन पक्षों के बीच वास्तविक विवाद के निर्धारण के लिए आवश्यक है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि आदेश VI नियम 17 का मुख्य उद्देश्य मुकदमेबाजी की बहुलता को रोकना है। चूंकि इस मामले में अभी सुनवाई शुरू नहीं हुई थी और याचिकाकर्ता (सावित्री कुंवर) को साक्ष्य प्रस्तुत करने और वादियों की ओर से परीक्षित गवाहों का प्रतिपरीक्षण करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा, इसलिए न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए चुनौती दिए गए आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
यह निर्णय कई मायनों में महत्वपूर्ण है:
1. यह दर्शाता है कि अदालतें वाद-पत्र में संशोधन की अनुमति देते समय उदार दृष्टिकोण अपनाती हैं, विशेषकर जब मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं हुई हो।
2. यह स्पष्ट करता है कि न्यायिक प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य पक्षों के बीच वास्तविक विवाद का निर्धारण करना है, न कि तकनीकी आधार पर मामलों को खारिज करना।
3. यह मुकदमेबाजी की बहुलता को रोकने के महत्व पर प्रकाश डालता है। एक ही मुद्दे पर कई मुकदमे न चलें, इसलिए प्रारंभिक चरण में संशोधन की अनुमति दी जाती है।
4. यह बताता है कि जब तक किसी पक्ष के अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त अवसर मौजूद हों, तब तक तकनीकी आधार पर संशोधन को रोकना उचित नहीं है।
इस प्रकार, यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में लचीलेपन और व्यावहारिक दृष्टिकोण का एक उदाहरण है। यह दर्शाता है कि अदालतें मामले की वास्तविक प्रकृति को समझने और उसका निर्धारण करने पर अधिक ध्यान देती हैं, बजाय इसके कि वे तकनीकी आधार पर मामलों को खारिज करें। यह फैसला विशेष रूप से पारिवारिक संपत्ति विवादों में महत्वपूर्ण है, जहां अक्सर पारिवारिक रिश्तों और संपत्ति में अधिकारों को लेकर जटिल मुद्दे सामने आते हैं।
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NDQjMzUzIzIwMTkjMSNO-9R–ak1–7mxPHiYc=


