“पटना हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अनुचित म्युटेशन शुल्क पर रोक”

 

भूमिका

यह मामला पटना हाई कोर्ट में अर्विंद कुमार सिंह बनाम बिहार सरकार एवं अन्य के रूप में दायर किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता ने पटना नगर निगम द्वारा लगाए गए अत्यधिक म्युटेशन शुल्क को चुनौती दी थी।

मामले का संक्षिप्त विवरण

याचिकाकर्ता अर्विंद कुमार सिंह ने अपनी याचिका में पटना नगर निगम द्वारा 34,85,183 रुपये के म्युटेशन शुल्क की माँग को अवैध और अनुचित बताया।

मालिकाना हक़ और सम्पत्ति का स्थानांतरण

  • पटना के राजेन्द्र नगर स्थित प्लॉट नंबर 10-X (840 वर्ग गज) को 1966 में 99 साल की लीज़ पर श्री रमेश सिंह को दिया गया था।
  • 1999 में इस भूमि को याचिकाकर्ता के पिता ने खरीद लिया और 2002 में उनका नाम म्युटेशन में दर्ज हुआ।
  • पिता की मृत्यु (2007) के बाद, पारिवारिक विभाजन के तहत याचिकाकर्ता को संपत्ति का अधिकार मिला।
  • 2018 में, उन्होंने म्युटेशन के लिए आवेदन किया, जिसके जवाब में 2020 में भारी-भरकम शुल्क की माँग की गई।

याचिकाकर्ता का तर्क

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि:

  1. लीज़ डीड के अनुच्छेद 12 के अनुसार, दस वर्षों के बाद संपत्ति का स्थानांतरण करने पर किसी पूर्व अनुमति या शुल्क की आवश्यकता नहीं है।
  2. नगर निगम ने 1978 के भूमि निपटान नियमों का गलत तरीके से उपयोग करके अनुचित शुल्क की माँग की है।

नगर निगम और राज्य सरकार का पक्ष

नगर निगम ने 1978 के बिहार क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण अधिनियम के नियम 20 का हवाला दिया, जिसके अनुसार—

  • दस वर्षों के भीतर भूमि का हस्तांतरण करने के लिए प्राधिकरण की अनुमति आवश्यक होती है।
  • यदि अनुमति दी जाती है, तो कुल विक्रय मूल्य से प्राप्त लाभ पर 50% का म्युटेशन शुल्क देना पड़ता है।

पटना हाई कोर्ट का फैसला

  • कोर्ट ने संजय सिंह बनाम बिहार सरकार (2015) के फैसले को आधार बनाते हुए कहा कि:
    • लीज़ की शर्तों को बिना सहमति के बदला नहीं जा सकता।
    • यदि संपत्ति का हस्तांतरण 10 वर्षों के बाद हुआ है, तो शुल्क नहीं लिया जा सकता।
  • कोर्ट ने 24 सितंबर 2020 को जारी आदेश को रद्द कर दिया और नगर निगम को अनुचित शुल्क न वसूलने का निर्देश दिया।

निष्कर्ष

यह फैसला उन सभी नागरिकों के लिए राहत लेकर आया है, जो नगर निगम द्वारा अनुचित म्युटेशन शुल्क से परेशान थे। पटना हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लीज़ समझौते की मूल शर्तों को बदला नहीं जा सकता और सरकारी संस्थाओं को अपने ही नियमों का सही पालन करना होगा।

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