भूमिका
यह मामला बेगूसराय जिले के बखरी थाना क्षेत्र में एक नाबालिग लड़की के यौन शोषण और जबरन वेश्यावृत्ति में धकेलने से संबंधित है। याचिकाकर्ता हनीफ उर रहमान ने पटना उच्च न्यायालय में एक आपराधिक रिट याचिका दायर कर पीड़िता की अवैध रिहाई को चुनौती दी।
पीड़िता को 8 फरवरी 2020 को एक दलाल के घर से पुलिस ने बचाया था, जहां उसे जबरदस्ती देह व्यापार में धकेला जा रहा था। कोर्ट में पेश किए गए सबूतों में गर्भावस्था परीक्षण किट, एचआईवी की दवाइयाँ, शराब की बोतलें और कंडोम भी मिले थे। हालांकि, POCSO अदालत ने 19 फरवरी 2020 को बिना पर्याप्त जांच के पीड़िता को एक महिला मीना खातून के हवाले कर दिया, जो खुद को पीड़िता की माँ बता रही थी।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मीना खातून की पहचान संदिग्ध थी और उसे आरोपी व्यक्तियों से मिलीभगत का संदेह था। पटना उच्च न्यायालय ने POCSO अदालत की इस लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी की और पूरे मामले की पुन: जांच के आदेश दिए।
मामले का संक्षिप्त विवरण
1. याचिकाकर्ता और प्रतिवादी
याचिकाकर्ता:
- हनीफ उर रहमान, जो इस मामले के मुखबिर (Informant) हैं और उन्होंने पुलिस को सूचना दी थी।
प्रतिवादी:
- बिहार सरकार
- मीना खातून, जो खुद को पीड़िता की माँ बताती हैं।
- बिहार पुलिस
- चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC), बेगूसराय
- बालिका गृह, बेगूसराय के अधीक्षक
2. मामला कैसे शुरू हुआ?
- 8 फरवरी 2020 को पुलिस ने बेगूसराय जिले के इस्माइलनगर वार्ड नं. 8 में छापा मारा, जहाँ एक नाबालिग लड़की जबरन देह व्यापार में धकेली जा रही थी।
- पुलिस ने दो महिलाओं – सुनीता देवी और मीरा देवी – को गिरफ्तार किया, जो लड़की को धंधे में धकेलने की दोषी थीं।
- छापे के दौरान पुलिस को 100 इस्तेमाल न किए गए कंडोम, 11 इस्तेमाल किए हुए कंडोम, गर्भावस्था परीक्षण किट और एचआईवी की दवाइयाँ मिलीं।
- पीड़िता ने पुलिस को बताया कि उसे बचपन में पटना से अगवा किया गया था और तब से उसे जबरन इस धंधे में डाला गया।
3. पुलिस जांच के निष्कर्ष
- पीड़िता ने बताया कि सुनीता देवी, मीरा देवी, पूनम उर्फ तनुजा और मंटून नट उसे ग्राहकों को सौंपते थे और पैसे खुद रख लेते थे।
- यदि वह मना करती तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था।
- उसने एक और नाबालिग लड़की के बारे में जानकारी दी, जिसे पूनम देवी छापेमारी से पहले ही कहीं और ले गई थी।
- इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया, जिनमें अपहरण, बलात्कार, मानव तस्करी और साजिश से जुड़े आरोप शामिल थे।
4. अदालत में क्या हुआ?
- 12 फरवरी 2020 को मीना खातून नाम की महिला ने POCSO अदालत में आवेदन देकर दावा किया कि वह पीड़िता की माँ है और अपनी बेटी से मिलने की अनुमति मांगी।
- POCSO अदालत ने बिना कोई उचित जांच किए मीना खातून को पीड़िता से मिलने की अनुमति दे दी।
- 15 फरवरी 2020 को जब पीड़िता से मीना खातून को पहचानने को कहा गया, तो उसने उसे नहीं पहचाना।
- इसके बावजूद, 19 फरवरी 2020 को POCSO अदालत ने पीड़िता को मीना खातून को सौंप दिया।
पटना उच्च न्यायालय का निर्णय
1. POCSO अदालत की लापरवाही उजागर
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- POCSO अदालत ने बिना उचित जांच के मीना खातून को पीड़िता की कस्टडी दे दी।
- कानून के अनुसार, पीड़िता को पहले चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) के सामने पेश किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
- POCSO अदालत ने जांच के बिना ही मीना खातून को सही मान लिया, जबकि पीड़िता ने पहले उसे पहचानने से इनकार कर दिया था।
- इससे आरोपी व्यक्तियों को पीड़िता को प्रभावित करने और सबूत नष्ट करने का अवसर मिला।
2. कोर्ट का फैसला
- POCSO अदालत के फैसले को गलत और अवैध करार दिया गया।
- POCSO अदालत को निर्देश दिया गया कि भविष्य में किसी भी पीड़ित नाबालिग की रिहाई से पहले सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।
- पीड़िता की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उसे तुरंत पुनः बालिका गृह में भेजने का आदेश दिया गया।
इस फैसले के प्रभाव
1. बाल संरक्षण में सख्ती जरूरी
- POCSO अदालतों को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि नाबालिग पीड़ितों की रिहाई के मामलों में पूरी जांच हो।
- चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) की भूमिका को और मजबूत करने की जरूरत है।
- संवेदनशील मामलों में जल्दबाजी में फैसले लेने से अपराधियों को फायदा हो सकता है।
2. पुलिस को और सतर्क रहने की जरूरत
- इस मामले में पुलिस ने अच्छी जांच की, लेकिन अदालत के फैसले ने आरोपी को फायदा पहुंचाया।
- अब पुलिस को सुनिश्चित करना होगा कि POCSO मामलों में न्यायालय उचित जांच करने के बाद ही आदेश जारी करे।
3. महिला और बाल अधिकार संगठनों के लिए चेतावनी
- इस केस से साफ हो गया कि महिला और बाल तस्करी से जुड़े मामलों में कई बार आरोपी कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग कर सकते हैं।
- NGO और बाल सुरक्षा संगठनों को इस तरह के मामलों में सतर्क रहकर कानूनी प्रक्रिया की निगरानी करनी होगी।
निष्कर्ष
यह मामला बिहार में यौन तस्करी और नाबालिगों के शोषण से जुड़े गंभीर मुद्दों को उजागर करता है। पटना उच्च न्यायालय ने POCSO अदालत की लापरवाही को उजागर किया और पीड़िता की सुरक्षा को प्राथमिकता देने का आदेश दिया।
इस फैसले से यह साफ हो गया कि नाबालिग पीड़ितों की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए अदालतों को कानून के अनुसार सख्त प्रक्रिया अपनानी चाहिए। यह फैसला भविष्य में इस तरह के मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTYjMTYwIzIwMjEjMSNO-1KvXAn745Gc=


