“कॉरपोरेट कर्मचारियों की न्यायालय में व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट: पटना उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला”

 

पटना उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया, जिसमें महिंद्रा एंड महिंद्रा के तीन कर्मचारियों – सच्चिदानंद मिश्रा, रवींद्र कुमार और कौटिल्य – ने अदालत में व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट की मांग की। यह मामला क्रिमिनल मिसलेनियस नंबर 57101 (2019) से संबंधित था, जो नालंदा में दर्ज एक शिकायत मामले से उत्पन्न हुआ था।

मूल मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत दर्ज किया गया था। मामले की शुरुआत में, रंजीत कुमार सिंह (टी.के. इंजीनियरिंग वर्क्स के मालिक) ने इन तीनों कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। निचली अदालत ने 28 जून 2019 को एक आदेश पारित किया, जिसमें आरोपियों की वकील के माध्यम से उपस्थिति की अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था। यह निर्णय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 205 के तहत लिया गया था।

निचली अदालत ने यह फैसला इस आधार पर लिया कि आरोपियों के खिलाफ पहले से ही गैर-जमानती वारंट जारी किया जा चुका था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किलों को कभी भी कोई समन नहीं मिला था। 25 अक्टूबर 2016 को जारी किए गए समन की तामील का कोई प्रमाण भी अदालत के पास नहीं था। बिना समन की तामील के सबूत के ही गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया गया, जो कि एक अनुचित आदेश था।

वकील ने यह भी कहा कि धारा 205 के तहत प्रार्थना पर विचार करने में गैर-जमानती वारंट जारी होना कोई बाधा नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि उच्च न्यायालय ने कई बार यह कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 205 का प्रावधान “किसी उद्देश्य के लिए है, मनोरंजन के लिए नहीं”। मजिस्ट्रेट के पास हमेशा यह अधिकार होता है कि वह आरोपी से व्यक्तिगत उपस्थिति की मांग कर सके, भले ही धारा 205 के तहत उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली गई हो।

याचिकाकर्ताओं की स्थिति के बारे में बताया गया कि वे महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड के कर्मचारी थे/हैं। उनमें से एक ने नौकरी छोड़ दी है और अन्य याचिकाकर्ता अपने काम के सिलसिले में हमेशा विभिन्न और दूर-दराज के स्थानों पर दौरे पर व्यस्त रहते हैं। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि वे मुकदमे की प्रगति में सहयोग के लिए जब भी अदालत द्वारा आवश्यक समझा जाए, उपस्थित होने को तैयार हैं।

इस संदर्भ में, पटना उच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण निर्णय का उल्लेख किया गया – राम हर्ष दास बनाम बिहार राज्य (1998)। इस मामले में, अदालत की एक खंडपीठ ने टिप्पणी की थी कि जब आरोपी के खिलाफ पहली बार ही गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया हो, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 205 के तहत आवेदन स्वीकार्य नहीं होगा। धारा 205 का प्रयोग केवल उन मामलों में किया जा सकता है जहां समन जारी किया गया हो।

वर्तमान मामले में, शुरू में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ समन जारी किया गया था, लेकिन जब निचली अदालत ने जमानती वारंट जारी किया, उस समय रिकॉर्ड पर समन की तामील की कोई रिपोर्ट नहीं थी। इसी तरह, जब गैर-जमानती वारंट जारी किया गया, तब जमानती वारंट की तामील की कोई रिपोर्ट मौजूद नहीं थी। इसलिए, निचली अदालत का यह कारण कि गैर-जमानती वारंट जारी किया जा चुका है, इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में लागू नहीं होता।

न्यायमूर्ति बीरेंद्र कुमार ने इस मामले में एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को कानून के अनुसार आवश्यक आदेश पारित करने के लिए वापस भेज दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मजिस्ट्रेट के पास हमेशा यह अधिकार होता है कि वह मुकदमे की प्रगति के लिए आवश्यक होने पर किसी भी तारीख को आरोपी को उपस्थित होने के लिए कह सके। यह अधिकार धारा 205 के तहत आवेदन स्वीकार करने के बाद भी प्रयोग किया जा सकता है।

यह फैसला न्यायिक व्यवस्था में संतुलन का एक उदाहरण है, जहां एक तरफ आरोपियों की व्यावहारिक कठिनाइयों को समझा गया, और दूसरी तरफ न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को भी बनाए रखा गया। यह निर्णय इस बात का भी प्रमाण है कि कानून की व्याख्या में लचीलापन और व्यावहारिकता दोनों आवश्यक हैं। इस फैसले ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में उचित प्रक्रिया का पालन महत्वपूर्ण है, और बिना उचित कारण के कठोर कदम नहीं उठाए जाने चाहिए।

इस मामले से यह भी सिद्ध होता है कि व्यावसायिक जीवन की व्यस्तता और न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाया जा सकता है, बशर्ते दोनों पक्ष सहयोगात्मक रवैया अपनाएं। यह निर्णय विशेष रूप से कॉरपोरेट क्षेत्र के पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण है, जो अक्सर अपने काम की प्रकृति के कारण नियमित रूप से अदालती कार्यवाही में उपस्थित होने में कठिनाई का सामना करते हैं।

अंत में, यह फैसला न्यायिक विवेक का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां कानून की मूल भावना को बरकरार रखते हुए व्यावहारिक समाधान निकाला गया। इस निर्णय ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक कठोरता से बचना चाहिए, और हर मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए।

पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/NiM1NzEwMSMyMDE5IzEjTg==-d4Co2V–am1–vaE0=

 

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