यह मामला दीनेश बनाम बिहार सरकार का है, जिसमें याचिकाकर्ता (दीनेश), जो बिहार सरकार के प्रेस और फॉर्म विभाग में कर्मचारी थे, ने अपनी सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती दी। याचिका में आरोप लगाया गया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप तथ्यों से मेल नहीं खाते और उन्हें उनके मजदूर संघ में सक्रिय भागीदारी के कारण निशाना बनाया गया।
मामले के प्रमुख तथ्य:
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आरोप और जांच:
- याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया गया था कि वह 7 अप्रैल 2009 से लगातार गैरहाजिर थे और सहकारी समिति के सदस्यों द्वारा धन की हेराफेरी की गई।
- याचिकाकर्ता ने कहा कि वह 31 मार्च 2010 से 23 जनवरी 2011 तक निलंबित थे, और इस अवधि को गैरहाजिरी के रूप में नहीं गिना जा सकता।
- जांच अधिकारी ने आरोप संख्या 3 को खारिज कर दिया और अन्य आरोपों पर निर्णय दिया।
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सेवा समाप्ति का आदेश:
- विभागीय प्राधिकारी ने बिहार सेवा कोड की धारा 76 के तहत याचिकाकर्ता को सेवा से बर्खास्त कर दिया, जिसमें कहा गया है कि कोई कर्मचारी यदि बिना अनुमति के लगातार पांच साल तक अनुपस्थित रहता है तो उसे बर्खास्त किया जा सकता है।
- आरोप पत्र में उल्लेखित अनुपस्थिति की अवधि 7 अप्रैल 2009 से 24 अगस्त 2013 थी, जो पांच साल से कम है।
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याचिकाकर्ता का पक्ष:
- याचिकाकर्ता का कहना था कि मजदूर संघ के संयुक्त सचिव के रूप में उनकी सक्रियता के कारण उन्हें निशाना बनाया गया।
- उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें अपने कार्यस्थल पर जान से मारने की धमकियाँ मिल रही थीं, जिसके कारण उन्होंने स्थानांतरण की मांग की थी।
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अदालत की टिप्पणियां:
- उच्च न्यायालय ने पाया कि विभागीय प्राधिकारी ने आरोपों से परे जाकर निर्णय लिया, जो उचित प्रक्रिया का उल्लंघन है।
- अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने आरोप पत्र में उल्लिखित अवधि (7 अप्रैल 2009 से 24 अगस्त 2013) के बजाय 7 अप्रैल 2009 से 23 जून 2014 तक अनुपस्थिति को आधार बनाया।
अदालत का निर्णय:
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सेवा समाप्ति का आदेश रद्द:
- अदालत ने 23 जून 2014 का सेवा समाप्ति आदेश रद्द कर दिया, क्योंकि यह तथ्यों और कानून के अनुसार गलत था।
- अपीलीय प्राधिकारी द्वारा 17 अप्रैल 2015 को दिया गया आदेश भी रद्द कर दिया गया।
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मामले की पुनः जांच का निर्देश:
- मामले को अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास पुनर्विचार के लिए भेजा गया।
- याचिकाकर्ता को निलंबन के रूप में माना जाएगा और उन्हें निलंबन के दौरान का लाभ दिया जाएगा।
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प्रक्रिया का पालन:
- अदालत ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सभी बिंदुओं पर विचार करें और निष्पक्षता से निर्णय लें।
महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
यह मामला दर्शाता है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के दौरान प्रक्रिया का पालन करना और आरोपों के दायरे में रहकर निर्णय लेना कितना महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने अपने आदेश में न केवल नियमों के पालन की आवश्यकता पर जोर दिया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि कर्मचारी के अधिकारों का हनन न हो।
पूरा
फैसला पढ़ने के लिए यहां
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https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjNTk5NSMyMDE1IzEjTg==-Nrv9hWv5Km0=


