बिहार सहकारी समितियाँ अधिनियम, 1935 – सरल शब्दों में व्याख्या

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अधिनियम संख्या, वर्ष एवं अद्यतन स्थिति

  • अधिनियम संख्या: 6 of 1935
  • प्रवर्तन तिथि: 29 मई 1935
  • प्रभाव क्षेत्र: संपूर्ण बिहार राज्य

अंतिम अद्यतन (इस संकलन के अनुसार):
मुख्य संशोधनों में प्रबंध समिति अवधि, सहकारी बैंकों, भूमि विकास बैंकों, PACS/बहुउद्देश्यीय समितियों, अधीक्षकाधिकार, अपदस्थीकरण एवं दंड संबंधी प्रावधान शामिल हैं। नवीनतम संशोधन हेतु बिहार राजपत्र/इंडिया कोड देखना आवश्यक है।

Official Clean PDF (Samvida Edition):
https://drive.google.com/file/d/128vcxF45040gsycJlmeSLyoes4KdmY91/view?usp=share_link

(यह प्रतिलिपि आधिकारिक राजपत्रित पाठ पर आधारित है, केवल पठनीयता हेतु स्वरूपित — शब्दार्थ/सार्थकता में कोई परिवर्तन नहीं।)

1) परिचय

बिहार सहकारी समितियाँ अधिनियम, 1935 राज्य में सहकारी संस्थाओं के पंजीकरण, प्रबंधन, लेखा-परीक्षा, विवाद समाधान और परिसमापन से सम्बन्धित प्रमुख विधि है। यह अधिनियम पंजाब कोऑपरेटिव एक्ट के आधार पर विकसित हुआ और कृषि आधारित ग्रामीण आवश्यकता के अनुसार क्रमिक रूप से संशोधित किया गया। आज यह PACS, डेयरी, सहकारी बैंकों, विपणन संघों, आवास समितियों तथा विभिन्न apex संस्थाओं के संचालन का मूल ढांचा प्रदान करता है।

यह कानून बिहार में सहकारी आंदोलन को मजबूत करने हेतु राज्य सरकार, रजिस्ट्रार, सदस्यों और समितियों की भूमिकाओं को स्पष्ट करता है।

2) अधिनियम की संरचना (Structure of the Act)

भाग / अध्यायविषयक्या शामिल है
अध्याय Iप्रारंभिकउपाधि, विस्तार, प्रमुख परिभाषाएँ—सहकारी वर्ष, पंजीकृत समिति, प्रबंध समिति, अधिकारी आदि।
अध्याय IIपंजीकरणरजिस्ट्रार की नियुक्ति/अधिकार, पंजीकरण की शर्तें, अस्वीकृति के विरुद्ध अपील।
अध्याय IIIनिगमित स्वरूप, कर्तव्य व विशेषाधिकारसमिति का कॉरपोरेट स्वरूप, सरकारी दायित्व (सहकारिता संवर्धन), प्रबंध समिति, पंजीकृत पता।
अध्याय IVनिधि, आरक्षित निधि, निवेश, लाभ-वितरणआरक्षित निधि निर्माण, निवेश, लाभ बाँटने की सीमाएँ, प्रथम प्रभार।
अध्याय Vलेखा-परीक्षा, निरीक्षण व जांचवार्षिक ऑडिट, निरीक्षण, इनक्वायरी, सरचार्ज व वसूली।
अध्याय VIप्रबंध समिति का विघटन/निलंबनसमिति का विघटन, प्रशासक की नियुक्ति, चुनाव की पुनर्स्थापना।
अध्याय VI-Aभूमि विकास बैंकपरिभाषाएँ, ऋण, बंधक, वसूली, संपत्ति विक्रय।
अध्याय VI-Bसहकारी बैंक एवं PACS विशेष प्रावधानRBI/DICGC निरीक्षण, विलय, मोरेटोरियम; PACS का परिसमापन/विलय।
अध्याय VIIदंड एवं प्रक्रियारिकॉर्ड न सौंपना, गलत सूचना, अवज्ञा, इत्यादि दंडनीय कार्य।
अध्याय VII-Aगिरफ्तारी / कुर्की (Distraint)कृषि उपज आदि की कुर्की द्वारा वसूली।
अध्याय VIIIविविधसार्वजनिक सेवक का दर्जा, अभिलेख प्रमाण, शुल्क/स्टाम्प छूट, नियम बनाने की शक्ति।

3) प्रमुख धाराएँ सरल रूप में

धारा 2 – परिभाषाएँ

“सहकारी वर्ष” 1 अप्रैल से 31 मार्च तक माना गया है। “अधिकारी”, “प्रबंध समिति”, “पंजीकृत समिति” जैसी परिभाषाओं का महत्व बाद की धाराओं में दिखता है।

उदाहरण:
गया जिले के किसी PACS की वार्षिक रिपोर्ट और चुनाव सहकारी वर्ष के अनुसार ही किए जाते हैं।

धारा 6–12 – पंजीकरण व रजिस्ट्रार

राज्य सरकार रजिस्ट्रार और अतिरिक्त/सहायक रजिस्ट्रार नियुक्त करती है।
नियमों, उपविधियों और शर्तों के अनुरूप होने पर समिति का पंजीकरण किया जाता है। अस्वीकृति पर 2 माह के भीतर अपील का प्रावधान है।

उदाहरण: पटना ग्रामीण क्षेत्र में नई डेयरी समिति यदि सभी दस्तावेज पूरे करती है, पर रजिस्ट्रार द्वारा कारणहीन अस्वीकृति मिलती है, तो राज्य सरकार अपील में पंजीकरण का निर्देश दे सकती है।

धारा 13–14 – निगमित स्वरूप

पंजीकरण के बाद समिति एक कॉरपोरेट बॉडी बन जाती है—संपत्ति रखने, मुकदमा करने/लड़ने और अनवरत अस्तित्व की क्षमता के साथ।

राज्य सरकार सहकारिता संवर्धन हेतु पूँजी निवेश, ऋण गारंटी आदि कर सकती है।

धारा 18–23 – आरक्षित निधि, निवेश, प्रथम प्रभार

  • लाभ का एक हिस्सा आरक्षित निधि में डालना अनिवार्य।
  • निधि को सरकार की स्वीकृत प्रतिभूतियों, बैंक या अन्य सहकारी संस्थाओं में निवेश किया जा सकता है।
  • समिति की बकाया राशि पर फसल/उपज पर प्रथम प्रभार (सरकारी राजस्व एवं किराया को छोड़कर) लागू हो सकता है।

उदाहरण:
समस्तीपुर के एक PACS द्वारा दिए गए बीज-उर्वरक ऋण की वसूली हेतु उस वर्ष की फसल पर प्रथम प्रभार लागू हो सकता है।

धारा 32 – पूर्व सदस्यों की उत्तरदायित्व

कोई सदस्य समिति छोड़ने या मृत्यु होने पर उस दिन तक की देनदारियों हेतु 2 वर्ष तक उत्तरदायी रहता है।

अध्याय V – लेखापरीक्षा, निरीक्षण, जांच

  • हर समिति का वार्षिक ऑडिट अनिवार्य।
  • गलत लेखांकन, कदाचार, गबन आदि पर रिपोर्ट तैयार की जाती है।
  • एक-तिहाई सदस्यों, कलेक्टर या रजिस्ट्रार द्वारा जांच शुरू हो सकती है।
  • सर्चार्ज द्वारा नुक़सान की व्यक्तिगत वसूली की जा सकती है।

धारा 41 – प्रबंध समिति का विघटन

रजिस्ट्रार कुप्रबंधन, चुनाव न कराना, अनियमितता और लापरवाही के कारण समिति को 6 माह तक भंग कर सकता है; विशेष परिस्थितियों में विस्तार संभव है।
प्रशासक नियुक्त होता है और पुनः चुनाव कराने की जिम्मेदारी रहती है।

धारा 48 – विवाद समाधान

सदस्यों और समिति, समितियों के बीच, अधिकारी–सदस्य संबंधी विवाद रजिस्ट्रार/मध्यस्थ (Arbitrator) द्वारा निपटाए जाते हैं।
सिविल कोर्ट का अधिकार सामान्यतः वर्जित है (Section 57)।

अध्याय VII-A – कुर्की द्वारा वसूली

देनदार किसान की फसल/उपज की कुर्की कर वसूली की प्रक्रिया—आवेदन, उद्घोषणा, बिक्री, वसूली एवं वितरण।

अध्याय VI-A एवं VI-B – भूमि विकास बैंक, सहकारी बैंक एवं PACS

RBI/DICGC विनियमन, विलय, पुनर्गठन, मोरेटोरियम जैसी बैंकिंग-प्रासंगिक प्रक्रियाएँ।
PACS की व्यवहारिक पुनर्रचना—गैर-लाभकारी समितियों का परिसमापन, विलय, नई समितियों का गठन।

4) बिहार में व्यावहारिक प्रभाव

सहकारी समितियों पर प्रभाव

  • कॉरपोरेट अस्तित्व, संपत्ति अधिकार और स्पष्ट प्रशासनिक संरचना।
  • नियमित ऑडिट, निरीक्षण और संभावित सर्चार्ज/विघटन।

सदस्यों/पदाधिकारियों पर प्रभाव

  • गलत लेखांकन, गबन या रिकॉर्ड न सौंपने पर दंडनीय परिणाम।
  • समिति छोड़ने पर भी 2 वर्ष तक देनदारी बनी रहती है।

सरकारी निकायों पर प्रभाव

  • प्रबंध समिति के विघटन, पुनर्गठन, विलय, परिसमापन आदि में रजिस्ट्रार/राज्य सरकार की प्रमुख भूमिका।
  • सहकारी बैंकों के मामलों में RBI की सहमति महत्वपूर्ण।

5) सामान्य प्रश्न (FAQs)

Q1. क्या बिहार में हर सहकारी संस्था को इसका पंजीकरण अनिवार्य है?
नहीं। लेकिन कॉरपोरेट दर्जा, लाभ-वितरण, सरकारी सहायता और विशेष वसूली अधिकार पाने के लिए इस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण आवश्यक है।

Q2. सदस्य–समिति विवाद कहाँ सुलझते हैं?
धारा 48 के अंतर्गत रजिस्ट्रार/मध्यस्थ के समक्ष। सामान्यतः सिविल कोर्ट में सीधे नहीं जाया जा सकता।

Q3. यदि 3 सहकारी वर्षों में चुनाव न हों तो क्या होता है?
प्रबंध समिति स्वतः मानी जाती है कि उसका कार्यकाल समाप्त हो गया, और रजिस्ट्रार प्रशासक नियुक्त करके चुनाव करवाता है।

Q4. पूर्व सदस्य पर देनदारियाँ कितने समय तक लागू रहती हैं?
2 वर्ष तक।

Q5. PACS के लिए विशेष नियम क्यों हैं?
क्योंकि PACS ग्रामीण कृषि ऋण तंत्र की आधारशिला हैं; उनके लिए अध्याय VI-B में विशेष प्रावधान हैं।

6) प्रमुख न्याय-निर्णय

1) दिनेश प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य (SC, 1995)

सुप्रीम कोर्ट ने प्रबंध समिति के 3 वर्षीय कार्यकाल की गणना, सरकार की नामांकन शक्ति और चुनाव विलंब की वैधता पर महत्वपूर्ण व्याख्या दी।

2) राम संजीवन प्रसाद यादव बनाम बिहार राज्य (Patna HC, 2016)

धारा 41 के तहत समिति विघटन में रजिस्ट्रार की “संतुष्टि”, ऑडिट रिपोर्टों की भूमिका और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर मार्गदर्शन।

7) संबंधित कानून

  • बिहार सहकारी समितियाँ नियमावली, 1959
  • बैंकिंग विनियमन अधिनियम (सहकारी बैंकों पर लागू प्रावधान)
  • सेक्टर-विशिष्ट सरकारी निर्देश (PACS, डेयरी, विपणन संघ आदि)

8) सारांश

यह अधिनियम बिहार में सहकारी आंदोलन की रीढ़ है—पंजीकरण से लेकर प्रबंधन, वित्त, लेखा-परीक्षा, विवाद समाधान, PACS व सहकारी बैंकों के विशेष नियम, और अंततः परिसमापन तक।
सदस्यों और पदाधिकारियों पर स्पष्ट उत्तरदायित्व निर्धारित हैं—गबन, गलत रिपोर्ट, रिकॉर्ड न सौंपने पर दंड और सर्चार्ज की व्यवस्था।
विवाद समाधान की विशेष प्रणाली (धारा 48) सिविल कोर्ट के स्थान पर तेज, विशेषज्ञ मंच प्रदान करती है।
किसानों, ग्रामीण संस्थाओं, क्रेडिट तंत्र और सहकारी बैंकों के लिए यह कानून अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(अंग्रेज़ी संस्करण ऊपर उपलब्ध है।)

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    “बिहार सहकारी समितियाँ अधिनियम 1935 – सरल शब्दों में समझाया गया – Samvida Law Associates”

🗣️ यह लेख Samvida Law Associates का एक सार्वजनिक प्रयास है ताकि बिहार के कानूनों को सरल भाषा में समझाया जा सके।

Disclaimer: यह लेख केवल सामान्य जानकारी प्रदान करता है। यह कानूनी सलाह नहीं है।

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