मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जिला मुजफ्फरपुर के करजा थाना कांड संख्या 79 वर्ष 2001 से उत्पन्न हुआ। विवाद सूचक के निकट संबंधियों (अग्नात) के बीच विवादित भूमि पर स्थित शीशम के पेड़ों को लेकर था।
अभियोजन के अनुसार, इन पेड़ों को लेकर लंबे समय से झगड़ा चल रहा था। सूचक ने पिछले वर्ष तीन शीशम के पेड़ कटवाए थे। उनमें से एक पेड़ के चोरी हो जाने का आरोप था। जब सूचक शेष दो पेड़ ले जा रहा था, तब सभी अभियुक्तों ने उसे रोक दिया। यह तय हुआ कि भूमि की विधिवत मापी कर वास्तविक मालिक की पहचान होने के बाद ही पेड़ दिए जाएंगे।
घटना के दिन, दोनों पक्षों की उपस्थिति में भूमि की मापी की गई। मापी गई भूमि सूचक के हिस्से में पाई गई। इसके उपरांत, सभी लोग दोपहर लगभग 1 बजे घर लौट रहे थे।
उसी समय, वर्तमान अपीलकर्ता ने कथित रूप से कहा कि वह मापी को नहीं मानेगा। सूचक के पुत्र मिथिलेश सिंह ने इसका विरोध किया। अभियोजन का कहना है कि इसके बाद अपीलकर्ता ने मिथिलेश के कंधे पर चाकू से प्रहार किया। जब सूचक ने अपने पुत्र को बचाने का प्रयास किया, तो एक सह-अभियुक्त ने कथित रूप से उसे पकड़ लिया और अपीलकर्ता ने सूचक की पीठ पर चाकू से वार किया। जब दूसरा पुत्र कृष्णा सिंह सूचक को उठाने आया, तब सभी अभियुक्तों ने, जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल था, कथित रूप से उस पर हमला किया।
इसी आधार पर एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ। अन्वेषण के बाद, मामला मुजफ्फरपुर के माननीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, तृतीय के न्यायालय में सत्र वाद संख्या 399 वर्ष 2002 के रूप में विचारण के लिए भेजा गया।
दिनांक 01.12.2015 के निर्णय तथा 05.12.2015 के दंडादेश द्वारा, विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 307 एवं 341 के अधीन दोषी ठहराया। उसे धारा 307 के अधीन पाँच वर्ष का कठोर कारावास तथा रु. 10,000/- जुर्माने की सजा दी गई, और जुर्माना न देने की स्थिति में दो माह का साधारण कारावास; तथा धारा 341 के अधीन एक माह का साधारण कारावास दिया गया।
अपीलकर्ता ने इस दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए पटना उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील (एसजे) संख्या 46 वर्ष 2016 दाखिल की। अपील की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह द्वारा की गई। अपीलकर्ता की ओर से अमाइकस क्यूरी के रूप में श्री अभास चंद्र उपस्थित हुए तथा राज्य की ओर से श्री एस.ए. अहमद, ए.पी.पी., उपस्थित हुए। उच्च न्यायालय ने 06.05.2026 को मौखिक निर्णय सुनाया।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
उच्च न्यायालय ने इस बात की गहन समीक्षा की कि विचारण कैसे संचालित हुआ, दोनों पक्षों द्वारा क्या साक्ष्य प्रस्तुत किए गए और क्या हत्या के प्रयास एवं गलत तरीके से रोकने के अपराध में दोषसिद्धि के लिए आवश्यक “उचित संदेह से परे” वाले विधिक मानक की पूर्ति हुई या नहीं।
अभियोजन ने कुल मिलाकर नौ साक्षियों की गवाही कराई।
पी.डब्ल्यू. 1, कृष्णा सिंह, सूचक का पुत्र है। वह घायल साक्षी है और उसने घटना एवं चोटों के संबंध में अभियोजन के पक्ष का समर्थन किया।
पी.डब्ल्यू. 2, विजय सिंह, को प्रत्यक्षदर्शी बताया गया, जिसने अभियोजन का समर्थन किया, लेकिन बाद में बचाव पक्ष ने यह इंगित किया कि उसे अनुमाने (hearsay) साक्षी के रूप में लिया गया।
पी.डब्ल्यू. 3, राम प्रवेश सिंह, को अभियोजन ने प्रतिकूल घोषित कर दिया, अर्थात् उन्होंने न्यायालय में अभियोजन के संस्करण का समर्थन नहीं किया।
पी.डब्ल्यू. 4, राम नरेश सिंह, ने अभियोजन के मामले का पूर्ण समर्थन नहीं किया। उनके साक्ष्य में हमले के तरीके के संबंध में अभियोजन की कहानी से भिन्न महत्वपूर्ण बातें थीं।
पी.डब्ल्यू. 5, नवल किशोर सिंह, स्वयं सूचक हैं। उच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि वे हमले के तरीके के संबंध में अभियोजन की कहानी की पूर्ण पुष्टि नहीं कर सके और उनकी गवाही में महत्वपूर्ण दोष एवं कमियाँ थीं।
पी.डब्ल्यू. 6, प्रदीप सिंह, एक औपचारिक साक्षी थे, जिन्होंने हस्ताक्षर एवं दस्तावेजों को प्रमाणित किया।
पी.डब्ल्यू. 7, मिथिलेश कुमार सिंह, सूचक का एक अन्य पुत्र, भी घायल साक्षी है और उसने अभियोजन की कहानी का समर्थन किया।
पी.डब्ल्यू. 8, डॉ. धिरेन्द्र प्रसाद सिंह, ने घायलों का परीक्षण किया। महत्वपूर्ण रूप से, उन्होंने पाया कि सभी चोटें साधारण प्रकृति की थीं और किसी कठोर एवं कुंद वस्तु से लगी थीं, न कि चाकू जैसे धारदार हथियार से।
पी.डब्ल्यू. 9, गुड्डू कुमार, एक अन्य औपचारिक साक्षी थे, जिन्होंने संबंधित अधिकारियों की लिखावट और हस्ताक्षर पहचान कर औपचारिक प्रदर्शों को सिद्ध किया।
दूसरी ओर, बचाव पक्ष ने चार साक्षी प्रस्तुत किए: डी.डब्ल्यू. 1 रंजन कुमार, डी.डब्ल्यू. 2 रंधीर कुमार, डी.डब्ल्यू. 3 मुकेश सिंह और डी.डब्ल्यू. 4 अजीत सिंह।
इन साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराया था। अपील में, बचाव पक्ष ने, अमाइकस क्यूरी के माध्यम से, इस दोषसिद्धि को कई आधारों पर चुनौती दी।
पहला, यह तर्क दिया गया कि अन्वेषण अधिकारी (आई.ओ.) की गवाही बिल्कुल नहीं हुई। इसके कारण बचाव पक्ष आई.ओ. की केस डायरी में दर्ज बयानों का उपयोग कर साक्षियों की गवाही में निहित विरोधाभासों की ओर संकेत नहीं कर सका। साथ ही, घटना स्थल एवं घटना की वास्तविक रूपरेखा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की ठीक से जाँच संभव नहीं हो सकी।
दूसरा, बचाव पक्ष ने कहा कि पी.डब्ल्यू. 2 केवल अनुमाने साक्षी है और वह घटना को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध नहीं कर सकता। पी.डब्ल्यू. 4 ने अभियोजन का समर्थन नहीं किया। पी.डब्ल्यू. 1 और पी.डब्ल्यू. 7, यद्यपि घायल हैं, लेकिन दोनों ही सूचक के पुत्र हैं और इस प्रकार अत्यंत स्वार्थसिद्धि से प्रेरित साक्षी हैं। पी.डब्ल्यू. 5, सूचक, ने ऐसा संस्करण दिया जो गंभीर दोषों से ग्रस्त था और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अभियोजन का पूर्ण समर्थन नहीं करता था। अतः कोई विश्वसनीय स्वतंत्र साक्षी उपलब्ध नहीं था।
तीसरा, पी.डब्ल्यू. 8 चिकित्सक की चिकित्सीय गवाही स्पष्ट रूप से दिखाती है कि चोटें साधारण प्रकृति की थीं और कठोर एवं कुंद वस्तु से लगी थीं, जबकि अभियोजन का मामला था कि चोटें चाकू के वार से लगीं। नेत्रसाक्षी तथा चिकित्सीय साक्ष्य के बीच यह असंगति इस बात पर गंभीर संदेह उत्पन्न करती है कि चोटें कैसे और किसके द्वारा लगीं।
इन आधारों पर, बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि अभियोजन घटना को उचित संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है और धारा 307 एवं 341 भा.दं.सं. के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती।
इसके विपरीत, राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक ने विपरीत तर्क दिया। राज्य का कहना था कि अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य स्पष्ट रूप से अपीलकर्ता के दोष की ओर संकेत करते हैं। यह दलील दी गई कि अपीलकर्ता को हमले करने वाले व्यक्ति के रूप में ठीक से पहचाना गया है और अभियोजन साक्षियों ने आरोपों को उचित संदेह से परे सिद्ध कर दिया है। इसलिए, राज्य के अनुसार, विचारण न्यायालय ने अपीलकर्ता को सही रूप से दोषी ठहराया है।
इसके बाद पटना उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों के तर्कों तथा अभिलेख की समीक्षा की।
न्यायालय ने चिकित्सक की गवाही को विशेष महत्व दिया। न्यायालय ने विशेष रूप से दर्ज किया कि चिकित्सक ने सभी चोटों को साधारण प्रकृति की तथा कठोर एवं कुंद वस्तु से लगी पाया। यह बात चाकू से हमले की अभियोजन कहानी से मेल नहीं खाती। धारा 307 भा.दं.सं. (हत्या का प्रयास) के अपराध में चोटों की प्रकृति एवं प्रयुक्त हथियार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। चोटों का साधारण होना और धारदार हथियार से न लगना अभियोजन के संस्करण को गंभीर रूप से कमजोर करता है।
न्यायालय ने यह भी देखा कि सभी महत्वपूर्ण साक्षी अत्यधिक स्वार्थसिद्धि से प्रेरित हैं। पी.डब्ल्यू. 1 और पी.डब्ल्यू. 7 सूचक के पुत्र हैं और स्वयं घायल भी हैं। सूचक पी.डब्ल्यू. 5 ने भी अभियोजन का पूर्ण समर्थन नहीं किया। पी.डब्ल्यू. 3 प्रतिकूल हो गए और पी.डब्ल्यू. 4 की गवाही अभियोजन की कहानी से भिन्न हो गई। इन कारणों से तथा उनकी गवाही में निहित महत्वपूर्ण विरोधाभासों के चलते न्यायालय ने उनके साक्ष्य को अविश्वसनीय, संदिग्ध एवं अविश्वस्तनीय माना।
न्यायालय ने आगे यह भी उल्लेख किया कि दोनों पक्ष अग्नात हैं और उनके बीच भूमि विवाद होना स्वीकार है। घटना भूमि मापी के समय घटी और यह आकस्मिक रूप से घटित होती प्रतीत होती है। पूर्व शत्रुता भी स्वीकार है। ऐसे परिप्रेक्ष्य में, जबकि साक्ष्य पहले से ही कमजोर हों, झूठे फँसाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सबसे महत्वपूर्ण रूप से, अन्वेषण अधिकारी की गैर-परीक्षा को न्यायालय ने बचाव पक्ष के लिए गंभीर पूर्वाग्रहकारी माना। आई.ओ. की अनुपस्थिति में बचाव पक्ष गवाहों को उनके पूर्व बयानों से सामना नहीं करवा सका, न ही वह अभियोजन की कहानी के अनुसार घटना स्थल और घटना के तौर-तरीके की ठीक से जाँच कर सका। अभियोजन के मामले में यह कमी न्यायालय के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
उच्च न्यायालय ने इसके बाद आपराधिक मुकदमों से संबंधित स्थापित विधि को दोहराया: चूँकि अभियुक्त के जीवन और स्वतंत्रता का प्रश्न होता है, इसलिए अभियोजन पर यह दायित्व है कि वह अपना मामला उचित संदेह से परे सिद्ध करे। यह पर्याप्त नहीं है कि कहानी “सच हो सकती है”; न्यायालय को विश्वास होना चाहिए कि वह “सच ही होनी चाहिए”। यह भार हमेशा अभियोजन पर रहता है और कभी भी अभियुक्त पर स्थानांतरित नहीं होता।
इस मानक को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि अभियोजन अपीलकर्ता के अपराध को उचित संदेह से परे सिद्ध करने में “सर्वथा विफल” रहा है। अभियोजन के संस्करण में गंभीर संदेह होने के कारण अपीलकर्ता संदेह का लाभ पाने का अधिकारी है।
तदनुसार, उच्च न्यायालय ने करजा थाना कांड संख्या 79 वर्ष 2001 से उत्पन्न सत्र वाद संख्या 399 वर्ष 2002 में मुजफ्फरपुर के माननीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, तृतीय द्वारा पारित 01.12.2015 की दोषसिद्धि तथा 05.12.2015 के दंडादेश को, अपीलकर्ता के संबंध में, निरस्त कर दिया।
अपीलकर्ता को मामले से संबंधित जमानत बांड की देयता से मुक्त कर दिया गया। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि अमाइकस क्यूरी श्री अभास चंद्र (AUIN-101556) को उनकी विधिक सहायता के लिए पटना उच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति, पटना द्वारा रु. 10,000/- व्यावसायिक शुल्क के रूप में भुगतान किया जाए। अपील स्वीकृत की गई और लंबित सभी अंतरिम याचिकाओं का निपटारा कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन सामान्य लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक भूमि विवादों से उत्पन्न आपराधिक मामलों में उलझ जाते हैं। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराधों में सजा केवल कमजोर, स्वार्थसिद्धि से प्रेरित और विरोधाभासी साक्ष्यों के आधार पर नहीं दी जा सकती।
जहाँ सभी प्रमुख साक्षी निकट संबंधी हों और भूमि को लेकर लंबे समय से शत्रुता हो, वहाँ न्यायालय साक्ष्यों की विशेष सावधानी एवं संगति के साथ जाँच करेगा। यदि चिकित्सीय साक्ष्य खतरनाक हथियार से हमले के दावे का समर्थन नहीं करता, और अन्वेषण अधिकारी की गवाही नहीं होती, तो संदेह का लाभ अभियुक्त को दिया जाएगा।
गाँवों के लोगों और वादकारियों के लिए यह निर्णय दो बातें रेखांकित करता है। पहली, संपत्ति विवादों में आपराधिक कानून को हथियार के रूप में तब तक प्रयोग नहीं किया जा सकता जब तक अभियोजन घटना को ठोस और निष्पक्ष रूप से सिद्ध न कर दे। दूसरी, ठीक से अन्वेषण करना और सभी महत्वपूर्ण अधिकारियों, जिनमें आई.ओ. भी शामिल हैं, की पूर्ण गवाही कराना अत्यावश्यक है; अन्यथा मामला अपीलीय स्तर पर विफल हो सकता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या अभियोजन यह सिद्ध कर सका कि भूमि विवाद की घटना से उत्पन्न धारा 307 एवं 341 भा.दं.सं. के अपराध अपीलकर्ता द्वारा उचित संदेह से परे किए गए?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि चोटें साधारण थीं और कथित चाकू हमले से असंगत थीं, प्रमुख साक्षी अत्यंत स्वार्थसिद्धि से प्रेरित थे और उनकी गवाही में महत्वपूर्ण विरोधाभास थे, अन्वेषण अधिकारी की गवाही नहीं हुई, तथा पूर्व शत्रुता स्वीकार थी, जिससे गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ। फलतः अपीलकर्ता को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में किसी पूर्ववर्ती निर्णय का नाम या उद्धरण के साथ उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं की गई है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: आपराधिक अपील (एसजे) संख्या 46 वर्ष 2016, करजा थाना कांड संख्या 79 वर्ष 2001 से उत्पन्न, सत्र वाद संख्या 399 वर्ष 2002।
मामले का शीर्षक: परमा सिंह बनाम द स्टेट ऑफ बिहार
उद्धरण: 2026(3) PLJR 623
न्यायालय: हाई कोर्ट ऑफ जूडिकेचर एट पटना
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह
निर्णय की तिथि: 06.05.2026
वकील: अपीलकर्ता की ओर से अमाइकस क्यूरी श्री अभास चंद्र; राज्य की ओर से श्री एस.ए. अहमद, ए.पी.पी।
मामले का स्वरूप: भारतीय दंड संहिता की धारा 307 एवं 341 के अंतर्गत दोषसिद्धि एवं सजा के विरुद्ध आपराधिक अपील।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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