दत्तक पुत्री के सेवानिवृत्ति लाभ के अधिकार को बरकरार रखा गया — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Sakshi Bhatnagar

Reviewed by: Sakshi Bhatnagar

License Number: BR/2891A/2019

Sakshi Bhatanagar is a lawyer at Samvida Law Associates practicing criminal law. She represents clients in criminal proceedings before the Patna High Court and subordinate courts, handling bail applications, criminal appeals, NDPS matters, and customs-related cases. Her practice focuses on criminal defense and litigation across multiple forums in Bihar.

इस मामले में एक मृत सरकारी चपरासी की दत्तक पुत्री ने पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान न होने को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उसके पक्ष में सभी स्वीकृत लाभ जारी करें। न्यायालय ने यह माना कि एक वैध उत्तराधिकार प्रमाणपत्र का सम्मान किया जाना चाहिए, भले ही व्यक्तिगत विधि के तहत दत्तक ग्रहण पर विवाद हो। अब प्राधिकारियों के पास भुगतान करने के लिए आठ सप्ताह का समय है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता स्वर्गीय कमरुन खातून की दत्तक पुत्री हैं। कमरुन खातून बेगूसराय के अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय में कार्यालय चपरासी के रूप में कार्यरत थीं और बाद में उन्हें बेगूसराय प्रखंड के कार्यालय में पदस्थापित किया गया था।

उन्हें स्वयं अपने पति स्वर्गीय मोहम्मद निज़ामुद्दीन की मृत्यु के बाद अनुकंपा के आधार पर नियुक्त किया गया था। उनके पति भी बेगूसराय के अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय में चपरासी के पद पर कार्यरत थे।

कमरुन खातून की मृत्यु 05.12.2018 को सरकारी सेवा में रहते हुए हुई। उनकी मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता ने पेंशन, ग्रेच्युटी, अवकाश नकदीकरण, भविष्य निधि, समूह बीमा एवं अन्य देयों सहित सभी मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान के लिए प्राधिकारियों से संपर्क किया।

दिनांक 25.06.2019 को याचिकाकर्ता ने अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ), बेगूसराय के समक्ष एक प्रार्थना पत्र दाखिल किया और अपनी दिवंगत मां के सभी अंतिम भुगतानों के भुगतान का अनुरोध किया।

इस पर कार्यवाही करते हुए एसडीओ, बेगूसराय ने पत्र संख्या 1107, दिनांक 15.07.2019 द्वारा अंचल पदाधिकारी, बेगूसराय को सेवानिवृत्ति देयों के भुगतान हेतु परिवार सूची अथवा परिवार प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया। चूँकि मामले में प्रगति नहीं हुई, याचिकाकर्ता ने परिवार सूची प्रमाणपत्र, मदरसा शिक्षा बोर्ड का शैक्षणिक प्रमाणपत्र तथा उनके मौखिक दत्तक ग्रहण से संबंधित कागजात जैसे आवश्यक दस्तावेजों के साथ एक अन्य प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

इन दस्तावेजों की प्राप्ति पर, एसडीओ, बेगूसराय ने एक अन्य पत्र, संख्या 1821 दिनांक 21.10.2019 जारी कर अंचल पदाधिकारी को सभी दस्तावेजों की बारीकी से जांच कर स्पष्ट प्रतिवेदन देने का निर्देश दिया, ताकि स्वीकृत मृत्यु-सह-सेवानिवृत्त लाभों को स्वीकृत किया जा सके।

इसके अनुपालन में अंचल पदाधिकारी ने राजस्व लिपिक को जांच करने के लिए कहा। राजस्व लिपिक ने 20.11.2019 की तिथि वाली जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत की। उस जांच में स्थानीय लोगों एवं ग्रामीणों ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता को स्वर्गीय कमरुन खातून और उनके पति स्वर्गीय मोहम्मद निज़ामुद्दीन द्वारा दत्तक लिया गया था। राजस्व लिपिक ने नोटरी पब्लिक के समक्ष निष्पादित घोषणा-सह-इच्छापत्र तथा दत्तक ग्रहण विलेख के पंचनामा का भी उल्लेख किया।

इन कदमों और दस्तावेजों के बावजूद, याचिकाकर्ता को कोई भी अंतिम या सेवानिवृत्ति लाभ प्रदान नहीं किया गया। कोई अन्य विकल्प न होने पर, उन्होंने स्वर्गीय मोहम्मद निज़ामुद्दीन की संपत्ति के संबंध में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्राप्त करने हेतु माननीय उप न्यायाधीश 1, बेगूसराय के समक्ष उत्तराधिकार वाद संख्या 02/2021 दायर किया।

दिनांक 18.04.2023 के आदेश द्वारा दीवानी न्यायालय ने याचिकाकर्ता को स्वर्गीय मोहम्मद निज़ामुद्दीन की संपत्ति का उत्तराधिकारी घोषित किया और उसे दो जमानतदारों के साथ 15 लाख रुपये का सुरक्षा बंधपत्र निष्पादित करने का निर्देश दिया। भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 373 के तहत उनके पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी किया गया और उसकी प्रति उच्च न्यायालय के समक्ष परिशिष्ट-पी/5 के रूप में प्रस्तुत की गई।

यह उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्राप्त कर प्राधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करने के बाद भी याचिकाकर्ता को कोई अंतिम या सेवानिवृत्ति देय प्राप्त नहीं हुआ। अतः उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत पटना उच्च न्यायालय की शरण ली और विशेष रूप से जिला पदाधिकारी, बेगूसराय के विरुद्ध सभी मृत्यु-सह-सेवानिवृत्त लाभों के स्वीकृति एवं भुगतान हेतु निर्देश की मांग की।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति हरीश कुमार की अध्यक्षता में, दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और प्रस्तुत अभिलेखों का परीक्षण किया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि वह स्वर्गीय कमरुन खातून की दत्तक पुत्री हैं, जिनकी मृत्यु 05.12.2018 को सेवा में रहते हुए हुई थी। याचिकाकर्ता ने जोर देकर कहा कि बिहार पेंशन नियमावली, 1950 तथा बिहार सरकार द्वारा जारी अधिसूचनाओं के तहत, पेंशन एवं अन्य सेवा लाभों के उद्देश्य से दत्तक संतान की स्थिति प्राकृतिक संतान के समान ही है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि ये नियम एवं अधिसूचनाएँ स्पष्ट रूप से दत्तक पुत्रों एवं पुत्रियों को उदारीकृत पेंशन लाभों के लिए “परिवार” का हिस्सा मानती हैं। उन्होंने आगे तर्क दिया कि जहाँ यह संदेह हो कि वास्तविक विधवा, विधुर या पात्र संतान कौन है, वहाँ प्राधिकारियों को सक्षम न्यायालय द्वारा जारी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र पर ही कार्य करना होता है।

उन्होंने इंगित किया कि याचिकाकर्ता पहले ही भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धाराएँ 372 और 373 के तहत सक्षम दीवानी न्यायालय से ऐसा उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुकी हैं, जिसमें उन्हें स्वर्गीय मोहम्मद निज़ामुद्दीन की उत्तराधिकारी घोषित किया गया है। इस प्रमाणपत्र को किसी ने चुनौती नहीं दी है और कोई प्रतिद्वंद्वी दावा भी नहीं है।

याचिकाकर्ता ने यह भी इच्छा व्यक्त की कि यदि भविष्य में किसी सक्षम प्राधिकार या अपीलीय न्यायालय द्वारा कोई आदेश उनके विरुद्ध पारित होता है, तो वह उसका पालन करेंगी।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से, जो अधिवक्ता श्री अनिल कुमार द्वारा प्रतिवादी संख्या 2 एवं 3 की ओर से प्रस्तुत हुए, एक प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल किया गया। राज्य ने तर्क दिया कि अविनियमित (अनरजिस्टर्ड) दत्तक ग्रहण विलेख के आधार पर याचिकाकर्ता का दावा स्वीकार्य नहीं है। यह दलील दी गई कि मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत दत्तक ग्रहण का कोई प्रावधान नहीं है, अतः दत्तक ग्रहण को ही मान्यता नहीं दी जा सकती।

राज्य ने यह भी इंगित किया कि पहले याचिकाकर्ता के पक्ष में जारी परिवार प्रमाणपत्र (प्रमाणपत्र संख्या 288 दिनांक 04.06.2019) को रद्द कर दिया गया था, क्योंकि अपने आवेदन में उन्होंने यह उल्लेख नहीं किया था कि वह स्वर्गीय कमरुन खातून की दत्तक पुत्री हैं। यद्यपि उन्होंने हलफनामा दायर किया था, किंतु कथित रूप से उन्होंने दत्तक ग्रहण की बात का खुलासा नहीं किया था।

इसके अतिरिक्त, एसडीओ, बेगूसराय ने पत्र संख्या 3437 दिनांक 19.12.2020 द्वारा उन्हें यह निर्देश दिया था कि वह दत्तक पुत्री होने के अपने दावे के समर्थन में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करें। राज्य ने यह भी प्रस्तुत किया कि स्वर्गीय कमरुन खातून ने सामान्य भविष्य निधि नियमों के तहत नामांकन प्रपत्र में दो चचेरे भाइयों/बहनों को नामित किया था, न कि याचिकाकर्ता को। इस आधार पर राज्य ने तर्क किया कि याचिकाकर्ता किसी भी अंतिम या सेवानिवृत्त लाभ की अधिकारिणी नहीं हैं।

न्यायालय ने सबसे पहले यह नोट किया कि याचिकाकर्ता स्वयं को स्वर्गीय कमरुन खातून तथा स्वर्गीय मोहम्मद निज़ामुद्दीन की दत्तक पुत्री बता रही हैं और उन्होंने नोटरी पब्लिक के समक्ष निष्पादित घोषणा-सह-इच्छापत्र तथा मौखिक दत्तक ग्रहण से संबंधित पंचनामा प्रस्तुत किया है। न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि तर्क के लिए यदि यह मान भी लिया जाए कि मोहम्मदन विधि के तहत दत्तक ग्रहण का कोई प्रावधान न होने संबंधी राज्य की दलील सही है, तब भी प्राधिकारियों को सेवा शर्तों एवं सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान को विनियमित करने वाले सांविधिक नियमों और सरकारी दिशा–निर्देशों की उपेक्षा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

इसके बाद न्यायालय ने वित्त विभाग, बिहार सरकार द्वारा संकल्प संख्या 1918 दिनांक 04.06.1986 के माध्यम से जारी दिशा–निर्देशों का संदर्भ दिया। ये दिशा–निर्देश यह निर्धारित करते हैं कि पारिवारिक पेंशन एवं अंतिम देयों के वास्तविक दावेदार का निर्धारण कैसे किया जाएगा।

संकल्प में कहा गया है कि यह दावेदार की जिम्मेदारी है कि वह विभाग या कार्यालय के प्रधान को यह संतुष्ट करे कि वह मृत सरकारी सेवक की विधवा, विधुर या पात्र संतान है और अपनी पहचान पेंशन भुगतान आदेश या अन्य दस्तावेज जैसे प्रासंगिक अभिलेख प्रस्तुत कर सिद्ध करे। जहाँ ऐसे अभिलेख उपलब्ध न हों, वहाँ दावेदार से न्यायालय का उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, या किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष हलफनामे के साथ घोषणा, या पेंशन स्वीकृत प्राधिकारी को स्वीकार्य दो सहायक दस्तावेजों सहित हलफनामा प्रस्तुत करने को कहा जा सकता है।

इस संकल्प को लागू करते हुए न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता पहले ही भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 372 के तहत दीवानी न्यायालय के समक्ष गई थीं और न्यायालय ने अधिनियम की धारा 373 के तहत उनके पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी किया था। उत्तराधिकार प्रमाणपत्र अभिलेख पर उपलब्ध था और याचिकाकर्ता ने उस न्यायालय के निर्देशानुसार आवश्यक सुरक्षा बंधपत्र एवं जमानतदार प्रस्तुत कर दिए थे।

उच्च न्यायालय ने यह नोट किया कि सक्षम न्यायालय द्वारा जारी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र विवादित नहीं था और न ही किसी अन्य व्यक्ति ने दत्तक ग्रहण के दस्तावेजों या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के आधार पर याचिकाकर्ता के हक पर कोई आपत्ति दर्ज की थी।

इसके बाद न्यायालय ने दो चचेरे भाइयों/बहनों के पक्ष में किए गए नामांकन संबंधी राज्य की दलील पर विचार किया। न्यायालय ने अती रज़िया देवी बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एंड अदर्स, 2016 SCC Online Pat 339 में विभाजन पीठ के फैसले का संदर्भ दिया। उस मामले में न्यायालय ने यह माना था कि नामांकन का उद्देश्य मुख्य रूप से राज्य को यह सक्षम बनाना है कि वह नामांकित व्यक्ति को भुगतान कर अपना दायित्व पूरा करे और एक वैध निर्गमन प्राप्त कर ले। यदि कोई भी नामांकित व्यक्ति के अधिकार पर आपत्ति नहीं करता, तो राज्य नामांकित व्यक्ति को भुगतान कर सकता है। परंतु जहाँ कोई व्यक्ति नामांकित व्यक्ति की स्थिति या अधिकार को चुनौती देता है, वह उचित न्यायालय की शरण ले सकता है।

अती रज़िया देवी के मामले में विभाजन पीठ ने स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया था कि जहाँ स्थिति एवं अधिकार विवादित हों, वहाँ नामांकित व्यक्ति वास्तविक मालिक के लिए मात्र न्यासी होता है। केवल नामांकन के आधार पर न तो स्वामित्व उत्पन्न होता है और न ही नामांकित व्यक्ति विधिक रूप से संपत्ति प्राप्त करने वाला बन जाता है। वह राशि को वास्तविक विधिक हकदार व्यक्ति के लिए न्यास में रखता है।

वर्तमान मामले में उच्च न्यायालय ने देखा कि याचिकाकर्ता पहले ही सक्षम दीवानी न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्राप्त कर चुकी हैं, जिससे उनका उत्तराधिकारी होने का अधिकार स्थापित हो चुका है। इस प्रमाणपत्र के आलोक में दो चचेरे भाइयों/बहनों के पक्ष में नामांकन पर आधारित दलील टिक नहीं सकती। पूर्ववर्ती निर्णय के अनुसार नामांकित व्यक्ति की स्थिति केवल न्यासी की है, न कि पूर्ण स्वामी की।

इन सभी तथ्यों पर विचार करते हुए न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि प्राधिकारीगण पर यह कानूनी दायित्व है कि वे याचिकाकर्ता के दावे पर बिहार सरकार द्वारा जारी नियमों, विनियमों एवं दिशा–निर्देशों के अनुरूप विचार करें। चूँकि याचिकाकर्ता के पास वैध और निर्विवाद उत्तराधिकार प्रमाणपत्र है, अतः उन्हें अपनी दिवंगत माता के अंतिम तथा सेवानिवृत्त लाभों एवं अन्य देयों की वास्तविक प्राप्तकर्ता के रूप में माना जाना चाहिए।

तदनुसार, न्यायालय ने प्रतिवादी प्राधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मृत कर्मी के सभी स्वीकृत अंतिम एवं सेवानिवृत्त लाभों एवं अन्य देयों को याचिकाकर्ता के पक्ष में स्वीकृत करें। इन लाभों को न्यायालय के आदेश की प्रति प्राप्त होने या उसके प्रस्तुत किए जाने की तिथि से अधिमानतः आठ सप्ताह के भीतर जारी किया जाना है।

रिट याचिका स्वीकार की गई और व्ययों के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार में मृत सरकारी कर्मचारियों के पारिवारिक सदस्यों के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर उन स्थितियों में जहाँ पेंशन एवं अन्य देयों के वास्तविक दावेदार के संबंध में भ्रम या विवाद हो।

पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जब किसी व्यक्ति के पास सक्षम दीवानी न्यायालय द्वारा जारी वैध उत्तराधिकार प्रमाणपत्र हो, तो प्राधिकारी व्यक्तिगत विधि के आधार पर या किसी प्रतिस्पर्धी नामांकन के आधार पर सेवानिवृत्ति लाभों से इनकार नहीं कर सकते। उत्तराधिकार प्रमाणपत्र यह तय करने के लिए एक मजबूत और पर्याप्त दस्तावेज है कि भुगतान किसे किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने यह भी पुनः पुष्टि की कि बिहार सरकार के अपने दिशा–निर्देश उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, हलफनामे एवं अन्य निर्दिष्ट दस्तावेजों को पारिवारिक पेंशन एवं देयों के वास्तविक दावेदार के निर्धारण के आधार के रूप में मान्यता देते हैं। यह विशेष रूप से उन मामलों में सहायक है जहाँ अभिलेख अधूरे हों या पारिवारिक संबंधों पर विवाद हो।

ऐसे दत्तक संतानों और अन्य आश्रितों के लिए जो नामांकित व्यक्तियों के रूप में दर्ज नहीं हैं, यह निर्णय यह दर्शाता है कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए दीवानी न्यायालय का रुख करना अंतिम एवं सेवानिवृत्ति लाभ सुनिश्चित करने का एक प्रभावी उपाय हो सकता है। सरकारी विभाग ऐसे प्रमाणपत्रों का सम्मान करने और उन पर यथोचित समय के भीतर कार्यवाही करने के लिए बाध्य हैं।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या प्राधिकारी किसी मृत मुस्लिम सरकारी कर्मचारी की दत्तक पुत्री को दत्तक ग्रहण पर प्रश्न उठाकर और अन्य संबंधियों के पक्ष में किए गए नामांकन पर निर्भर होकर अंतिम एवं सेवानिवृत्ति लाभ से वंचित कर सकते हैं?
    उत्तर: नहीं। जब सक्षम दीवानी न्यायालय द्वारा दावेदार के पक्ष में उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी कर दिया गया हो और कोई प्रतिद्वंद्वी दावेदार न हो, तो सरकारी दिशा–निर्देशों के तहत प्राधिकारी कानूनी रूप से बाध्य हैं कि उसे मृत कर्मचारी के अंतिम एवं सेवानिवृत्त देयों की वास्तविक प्राप्तकर्ता मानें।
  • प्रश्न: जब कोई अन्य व्यक्ति मृत कर्मचारी के लाभों पर बेहतर विधिक अधिकार स्थापित कर दे, तो नामांकित व्यक्ति की क्या स्थिति रहती है?
    उत्तर: अती रज़िया देवी के मामले में, और वर्तमान मामले में उसका पालन करते हुए, यह कहा गया है कि नामांकित व्यक्ति केवल वास्तविक मालिक के लिए न्यासी होता है और मात्र नामांकन के द्वारा वह स्वामी नहीं बन जाता। जहाँ उत्तराधिकार प्रमाणपत्र किसी अन्य व्यक्ति को विधिक उत्तराधिकारी ठहराता है, वहाँ केवल नामांकन के आधार पर किया गया दावा उस अधिकार को परास्त नहीं कर सकता।
  • प्रश्न: किन दस्तावेजों पर प्राधिकारियों को विचार करना चाहिए जब अभिलेख स्पष्ट न हों और पारिवारिक पेंशन एवं सेवानिवृत्ति लाभों के वास्तविक दावेदार का निर्णय करना हो?
    उत्तर: वित्त विभाग संकल्प संख्या 1918 दिनांक 04.06.1986 के अनुसार, प्राधिकारियों को न्यायालय द्वारा जारी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र अथवा निर्दिष्ट हलफनामों एवं सहायक दस्तावेजों जैसे कागजातों पर विचार करना अनिवार्य है और दावेदार द्वारा प्रस्तुत किसी वैध उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की अनदेखी नहीं की जा सकती।

न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण

  • Ati Razia Devi Vs. The State of Bihar and Ors., 2016 SCC Online Pat 339

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 1233 of 2024

मामले का शीर्षक: Nazara Khatoon @ Najra Khatun v. The State of Bihar through the District Magistrate, Begusarai & Ors.

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar

निर्णय की तिथि: 06-08-2024

उद्धरण: 2024(4) PLJR 571

अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Mukesh Kumar Sinha, Advocate
  • राज्य/प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Anil Kumar, AC to SC-8
  • महालेखापरीक्षक की ओर से: Mr. Ram Kinker Choubey, Advocate

मामले की प्रकृति: मृत सरकारी कर्मचारी के मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान के संबंध में निर्देश की मांग करते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिका।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय तक पहुँचने के लिए यहाँ क्लिक करें

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