कटार से किए गए हमले में मृत्यु पर हत्या की सजा बहाल — पटना उच्च न्यायालय, 2025

सारण के एक चाकूबाजी के मामले में सत्र न्यायालय के निर्णय को दो संबद्ध आपराधिक अपीलों के माध्यम से चुनौती दी गई। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि यह हमला हत्या की श्रेणी में आता है, न कि किसी हल्के अपराध में। न्यायालय ने दोषसिद्धि को “गैर इरादतन हत्या” से बदल कर “हत्या” कर दिया और दोषी की अपील खारिज कर दी। दोषसिद्ध व्यक्ति की जमानत रद्द कर दी गई और सज़ा निर्धारण के लिए उसे हिरासत में लेने का आदेश दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जिला सारण के तरैया थाना कांड सं. 54/2009 से उत्पन्न हुआ। 4 जून 2009 की शाम को गांव अंधरवरी में एक घटना हुई, जिसमें कमेश्वर राय को गंभीर चाकू की चोटें आईं और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

अभियोजन के अनुसार, सूचक कमेश्वर राय (जो बाद में मृतक हो गए) अपने पुत्र के साथ आटा पिसवा कर घर लौट रहे थे। एक ग्रामीण के घर के पास, पूर्व शत्रुता के कारण, एक अभियुक्त ने कथित रूप से उन पर कटार से हमला किया। उनकी फर्दबयान (बयान) उसी शाम लगभग 8:00 बजे रेफरल अस्पताल, तरैया के इमरजेंसी वार्ड में दर्ज की गई।

इस फर्दबयान के आधार पर, तरैया थाना कांड सं. 54/2009 दिनांक 4 जून 2009 को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 341, 324 और 307 के अंतर्गत एकमात्र अभियुक्त के विरुद्ध दर्ज किया गया। जांच के बाद, पुलिस ने दिनांक 25 सितंबर 2009 को आरोपपत्र सं. 77/2009 धारा 341, 323, 307 और 302 IPC के तहत समर्पित किया।

2/5 अक्टूबर 2009 को मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया और 5 दिसंबर 2009 को मामला सत्र न्यायालय में समर्पित कर दिया। सत्र वाद सं. 675/2009 दर्ज हुआ और 21 दिसंबर 2009 को अभियुक्त के विरुद्ध धारा 302 IPC (हत्या) का आरोप तय किया गया।

विचारण के दौरान, अभियोजन ने दस गवाहों का परीक्षण कराया और चिकित्सीय एवं जांच से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत किए। बचाव पक्ष ने मौखिक साक्ष्य नहीं दिया, परन्तु पांच दस्तावेज प्रदर्शित किए, जिनमें अस्पताल पत्र, मृतक का बेड-हेड टिकट, दूसरे मामले में प्रोटेस्ट याचिका तथा इलाज संबंधी एक रिपोर्ट शामिल थी।

दिनांक 22 नवंबर 2022 के निर्णय द्वारा, सत्र न्यायालय ने अभियुक्त को धारा 302 IPC के तहत हत्या के अपराध से बरी कर दिया, परन्तु उसे धारा 304 भाग II IPC (ऐसी गैर-इरादतन हत्या जो हत्या नहीं है) के तहत दोषी ठहराया और 24 नवंबर 2022 को उसे पांच वर्ष के कठोर कारावास एवं जुर्माने की सज़ा दी।

सूचक के पुत्र (अरुण यादव @ अरुण राय) ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302 IPC से बरी किए जाने और हल्की धारा में दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए आपराधिक अपील (DB) सं. 203/2023 दायर की। अभियुक्त (बैजनाथ सिंह) ने पूर्ण रूप से बरी किए जाने की मांग करते हुए आपराधिक अपील (SJ) सं. 119/2023 दायर की। दोनों अपीलें पटना उच्च न्यायालय की द्वैधपीठ के समक्ष आईं।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने अभियोजन और बचाव, दोनों पक्षों के समस्त साक्ष्यों का सावधानी से पुनः परीक्षण किया। न्यायालय ने स्वयं को केवल प्रस्तुत तर्कों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि यह पुनर्मूल्यांकन किया कि क्या अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे साबित किया है।

अभियोजन की कहानी सूचक की फर्दबयान से शुरू हुई, जो 4 जून 2009 को लगभग 8:00 बजे तरैया अस्पताल में दर्ज की गई। उसने कहा कि उसी दिन लगभग 6:30 बजे वह अपने पुत्र के साथ गांव अंधरवरी के चक्की से आटा पिसवा कर लौट रहा था। एक राजेंद्र राय के घर के पास, तरैया की ओर से एक मोटरसाइकिल आई और रुकी। अभियुक्त बैजनाथ सिंह उतरा और उसे मारने की नीयत से दो बार कटार से हमला किया—एक वार पिंजर (रीढ़/पसलियों के भाग) में और दूसरा कंधे पर। वह बेहोश होकर गिर पड़ा। अभियुक्त ने उसके पुत्र पर भी हमला करने की कोशिश की, जो भाग गया। अभियुक्त मोटरसाइकिल छोड़ कर फरार हो गया और ग्रामीणों ने सूचक को तरैया अस्पताल पहुंचाया। कारण के रूप में पूर्व दुश्मनी बताई गई।

उच्च न्यायालय ने नोट किया कि प्रारंभिक FIR धारा 341, 324, 307 IPC के तहत दर्ज हुई, परन्तु बाद में घायल की मृत्यु हो जाने और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट प्राप्त होने के पश्चात धारा 302 IPC के तहत भी आरोप लगाए गए।

सत्र न्यायालय ने यह स्वीकार किया था कि अभियुक्त ने सूचक को कटार से चोट पहुंचाई और लगभग 50 दिन बाद सूचक की मृत्यु हो गई। किंतु उसने निष्कर्ष निकाला कि धारा 300 IPC के तहत “हत्या” के आवश्यक अवयव सिद्ध नहीं हुए। सत्र न्यायालय ने माना कि मृत्यु घाव में संक्रमण और मवाद बनने से हुई, और यह भी कहा कि मृतक को समुचित इलाज नहीं मिला। धारा 299 IPC की व्याख्या 2 पर भरोसा करते हुए सत्र न्यायालय ने यह दृष्टिकोण अपनाया कि यदि उचित और विशेषज्ञ उपचार दिया गया होता तो मृत्यु टल सकती थी। इसलिए उसने धारा 302 के स्थान पर धारा 304 भाग II IPC (मृत्यु की संभावना के ज्ञान के साथ किया गया कृत्य) के तहत दोषसिद्धि की।

सूचक का पुत्र, जो DB अपील में अपीलकर्ता था, ने तर्क दिया कि सत्र न्यायालय ने धारा 299 IPC की व्याख्या 2 को गलत पढ़ा। उसके अनुसार, एक बार यह सिद्ध हो जाए कि अभियुक्त द्वारा पहुंचाई गई चोट से ही मृत्यु हुई है, तो यह कहना कि बेहतर इलाज से मृत्यु टल सकती थी, अभियुक्त की आपराधिक जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकता। उसने रेखांकित किया कि सत्र न्यायालय ने स्वयं स्वीकार किया था कि अभियुक्त ने जानबूझकर कटार से महत्वपूर्ण अंगों पर वार किया और अभियोजन ने हमले की तिथि, समय, स्थान और तरीका सिद्ध कर दिया है।

दूसरी ओर, अभियुक्त, जो SJ अपील में अपीलकर्ता और DB अपील में प्रतिवादी था, ने प्रारंभ में घटना-स्थल तथा सूचक के पुत्र की बतौर प्रत्यक्षदर्शी उपस्थिति पर प्रश्न उठाए। किंतु जब उसे उसकी अपनी प्रोटेस्ट याचिका (प्रदर्श-डी) से सामना कराया गया, जिसमें उसने स्वयं 4 जून 2009 को गांव अंधरवरी में हुई घटना का विवरण दिया था और उन गवाहों की उपस्थिति का भी उल्लेख किया था जिन्होंने बाद में अभियोजन के पक्ष में गवाही दी, तो उसने ये आपत्तियाँ आगे नहीं बढ़ाईं।

इसके बाद उसने अपना तर्क मृत्यु के कारण तक सीमित कर दिया। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय Imran Khan v. State of Madhya Pradesh, 1994 MPLJ 862 पर भरोसा करते हुए उसने कहा कि चाकू की चोट मृत्यु का “नजीदीकी कारण” (proximate cause) नहीं थी। उसके अनुसार, परिणामों की शृंखला टूट गई क्योंकि मृतक को Patna Medical College Hospital (PMCH) में केवल 40 दिन बाद भर्ती कराया गया और मृत्यु संक्रमण तथा मवाद के कारण हुई, न कि प्रत्यक्ष रूप से मूल चोट के कारण। उसका तर्क था कि यह एक “अप्रत्याशित जटिलता” थी और इतनी दूर की कड़ी है कि उसे हत्या के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।

राज्य ने सत्र न्यायालय की तथ्यात्मक निष्कर्षों का समर्थन किया, परन्तु “गैर-इरादतन हत्या जो हत्या नहीं है” की दोषसिद्धि का बचाव किया।

उच्च न्यायालय ने पहले प्रत्यक्षदर्शी गवाहों को परखा। PW-1 (बिंदा राउत), जो अंधरवरी का निवासी है, ने कहा कि वह घर पर था, तभी उसने देखा कि अभियुक्त ने कमेश्वर राय के पेट के दाहिने हिस्से पर कटार से प्रहार किया; उनकी आंत बाहर आ गई और बहुत अधिक रक्तस्राव हुआ। उसने पुष्टि की कि पीड़ित को पहले छपरा और फिर पटना ले जाया गया। किसी आकस्मिक झगड़े का संकेत नहीं था।

PW-2 (बहारण राय), एक अन्य ग्रामीण, ने कहा कि शोर सुनकर वह वहां पहुंचा और उसने मृतक और अभियुक्त के बीच कहा-सुनी देखी। अभियुक्त ने फिर कटार निकाला और मृतक पर हमला किया, जिससे तीन चोटें लगीं। उसने घटना स्थल को राम प्रवेश राय के घर के सामने बताया।

PW-3 (अरुण राय), मृतक का पुत्र और प्रमुख प्रत्यक्षदर्शी, ने स्पष्ट कहा कि वह और उसके पिता चक्की से आटा लेकर साइकिल से लौट रहे थे। राम प्रवेश राय के घर के पास, तरैया की ओर से अभियुक्त मोटरसाइकिल पर आया। गूलर के पेड़ से संबंधित पैसों को लेकर कहासुनी हुई। इसी पर अभियुक्त ने कटार निकाला और पहले उसके पिता के दाहिने कंधे पर और फिर पेट के बाएं हिस्से (स्टमक) पर वार किया। PW-3 ने अपने गमछे से घाव बांधने की कोशिश की, और जब उसने अभियुक्त को पकड़ने की कोशिश की, तो अभियुक्त ने उसी पर झपट्टा मारा, जिससे वह भाग गया। ग्रामीण इकट्ठा हुए और उसके पिता को तरैया अस्पताल ले गए। PW-3 ने पुष्टि की कि उसके पिता का बयान वहीं दर्ज हुआ और दोनों ने फर्दबयान पर हस्ताक्षर किए।

जिरह में PW-3 ने गांव अंधरवरी का नक्शा स्पष्ट किया और बताया कि राजेंद्र राय और राम प्रवेश राय के घरों के बीच केवल लगभग एक “लग्गी” (लगभग सात हाथ) की दूरी है। इससे फर्दबयान में राजेंद्र राय के घर और बाद की गवाही में राम प्रवेश राय के घर के उल्लेख के बीच हल्का अंतर स्वाभाविक हो गया। उच्च न्यायालय ने इसे कोई गंभीर विरोधाभास नहीं माना, बल्कि छोटे घरों के समूह का स्वाभाविक वर्णन माना।

PW-5 (सभा राय), एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी और मृतक का रिश्तेदार (गोतीया भाई), ने कहा कि गूलर के पेड़ के पैसे को लेकर बातचीत हो रही थी, तभी अभियुक्त ने कटार निकाली और मृतक के “पंजरा” (पसलियों वाले हिस्से) के बायीं ओर और फिर कंधे पर वार किया। उसने भी अभियुक्त द्वारा उसके और अरुण के पीछे दौड़ने और जमीन पर खून गिरने का वर्णन किया। उसके द्वारा आसपास के मकानों का विवरण अन्य गवाहों से मेल खाता है।

PW-6 (जांच अधिकारी) ने पुष्टि की कि उसने घटना-स्थल का निरीक्षण किया, जिसे उसने राम प्रवेश राय के घर के उत्तर में पक्की सड़क पर चिन्हित किया। उसने बयान दर्ज किए, पोस्टमार्टम रिपोर्ट प्राप्त की और आरोपपत्र दाखिल किया। उसने यह भी कहा कि मृतक जब आंशिक रूप से भरे हुए परंतु अभी भी मौजूद घावों के साथ घर (सीतलपट्टी) लौट आया था, तब उसने वहां मृतक का पुनर्बयान दर्ज किया, जिसके बाद उसकी स्थिति बिगड़ी और वह फिर पटना गया।

चिकित्सीय पक्ष में, PW-9 (रेफरल अस्पताल, तरैया के डॉक्टर) ने 4 जून 2009 को घायल का परीक्षण किया और पाया कि: बायीं ओर छाती के निचले हिस्से की पीठ पर 2” x 1” आकार का छाती गुहा तक गहरा कटाव घाव, और दाहिने कंधे के जोड़ पर एक अन्य कटाव घाव। उसने मरीज को समुचित इलाज के लिए सदर अस्पताल, छपरा रेफर किया और चोट रिपोर्ट (प्रदर्श 4) प्रमाणित की।

PW-7 (सदर अस्पताल, छपरा में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर) ने बाद में पेट पर कई संक्रमित और आंशिक रूप से भरे घाव पाए, जिन पर टांकों के निशान और खुला (गैपिंग) हिस्सा था। उन्होंने मत व्यक्त किया कि “घावों में संक्रमण, पेट के घाव के खुलने और आंतों की चोट के कारण उत्पन्न शॉक और थकावट मृत्यु के कारण थे” और ये चोटें छुरा (कटार) से लग सकती हैं। जिरह में उन्होंने स्वीकार किया कि संक्रमण अनेक कारणों से हो सकता है और उचित इलाज न मिलने से संक्रमण की संभावना बढ़ जाती है, लेकिन उन्होंने अपनी यह राय बरकरार रखी कि मृत्यु संक्रमण और मवाद बनने से हुई।

इसके बाद उच्च न्यायालय ने कारण-परिणाम (causation) और अपराध के वर्गीकरण के कानूनी प्रश्न पर ध्यान दिया। न्यायालय ने धारा 299 IPC सहित उसकी व्याख्या 2 को उद्धृत किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि जहां किसी शारीरिक चोट से मृत्यु होती है, वहां वह व्यक्ति, जिसने वह चोट पहुंचाई है, मृत्यु का कारण माना जाएगा “यद्यपि उचित उपचार और कौशलपूर्ण चिकित्सा से मृत्यु टाली जा सकती थी।”

न्यायालय ने पाया कि सत्र न्यायालय ने इस प्रावधान का गलत प्रयोग किया। व्याख्या 2 को इस रूप में पढ़ने के स्थान पर कि वह मृत्यु होने पर भी अभियुक्त की जिम्मेदारी तय करती है, सत्र न्यायालय ने गलत तरीके से समुचित इलाज के अभाव को हत्या से कम गंभीर अपराध मानने का आधार बना लिया।

द्वैधपीठ ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया। उसने जोर देकर कहा कि मृतक की मृत्यु उन्हीं घावों में संक्रमण और मवाद बनने से हुई, जो कटार के वार से लगे थे। यह कोई नया, स्वतंत्र कारण नहीं था, बल्कि आंत और पेट में लगी मूल गंभीर चोट का स्वाभाविक विकास था।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के Imran Khan मामले पर, पटना उच्च न्यायालय ने पैरा 11 का उद्धरण दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यदि मृत्यु ऐसी जटिलताओं से होती है जो उस चोट का “स्वाभाविक, संभावित या आवश्यक परिणाम” हैं और जिन्हें उसके परिणाम के रूप में समुचित रूप से सोचा जा सकता है, तो कहा जाएगा कि चोट ने ही मृत्यु का कारण बना। केवल तब जब कोई अप्रत्याशित जटिलता इस शृंखला को तोड़ दे, कारण-परिणाम का संबंध अत्यधिक दूरस्थ माना जा सकता है। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि इस मामले में संक्रमण और मवाद बनना पेट की गंभीर चाकू चोट का स्वाभाविक विकास था, कोई नया, स्वतंत्र दुष्कर्म नहीं। अतः कारण-परिणाम की शृंखला अक्षुण्ण रही और मृत्यु मूल हमले का निकट परिणाम रही।

इसके बाद न्यायालय ने विश्लेषण किया कि क्या यह मामला धारा 300 IPC के तहत “हत्या” में आता है। उसने देखा कि अभियुक्त ने कटार से दो वार किए, दोनों महत्वपूर्ण अंगों पर। एक वार कंधे पर था, जो गर्दन के हिस्से के पास होता है और सौभाग्य से केवल त्वचा तक सीमित रहा; दूसरा वार पेट और आंतों में अंदर तक गया, जो निस्संदेह एक महत्वपूर्ण अंग है।

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त ने जानबूझकर ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाई, जिसके बारे में वह जानता था कि वह मृत्यु का कारण बन सकती है, और यह कि वह चोट अपने साधारण क्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त थी। यह तथ्य कि वह कटार लेकर आया, दूसरे गांव में मृतक को रोका और कहासुनी के बाद बार-बार वार किए, यह दर्शाता है कि यह कोई अचानक हुई झड़प नहीं थी, बल्कि पूर्वविचारित और घातक चोट पहुंचाने की स्पष्ट मंशा थी।

पीठ ने धारा 300 IPC के पाँच अपवादों (उकसावे, निजी रक्षा के अधिकार का अतिक्रमण, लोक सेवक का कार्य, अचानक लड़ाई और 18 वर्ष से ऊपर व्यक्ति की सहमति) का सावधानी से परीक्षण किया और पाया कि कोई भी लागू नहीं होता। न तो कोई गंभीर और आकस्मिक उकसावा था, न कोई आत्मरक्षा, न सार्वजनिक कर्तव्य का प्रश्न, न बिना क्रूरता के पारस्परिक अचानक लड़ाई और न ही पीड़ित की सहमति।

तदनुसार, न्यायालय ने माना कि अभियुक्त का कृत्य धारा 300 IPC के तहत “हत्या” की परिभाषा में पूरी तरह आता है। सत्र न्यायालय ने इसे केवल धारा 304 भाग II IPC के तहत “गैर-इरादतन हत्या जो हत्या नहीं है” मानकर गलती की।

इस प्रकार, सूचक पक्ष द्वारा दायर आपराधिक अपील (DB) सं. 203/2023 स्वीकार कर ली गई। अभियुक्त की दोषसिद्धि को धारा 304 भाग II IPC से बदल कर धारा 302 IPC कर दिया गया। साथ ही, अभियुक्त द्वारा दायर आपराधिक अपील (SJ) सं. 119/2023 को निराधार पाते हुए खारिज कर दिया गया।

न्यायालय ने यह भी नोट किया कि अभियुक्त जमानत पर था। उसकी जमानत बॉन्ड रद्द कर दी गई, उसे हिरासत में लेकर बेउर जेल भेजने का आदेश दिया गया और सज़ा पर सुनवाई के लिए तिथि (7 मई 2025) निश्चित की गई तथा निर्देश दिया गया कि उस दिन अभियुक्त की पेशी कराई जाए।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय बिहार में गंभीर हमलों के मामलों में पीड़ित परिवारों और अभियुक्तों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

पहला, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति घातक हथियार से शरीर के महत्वपूर्ण भाग पर गंभीर चोट जानबूझकर करता है, तो केवल इस आधार पर कि मृत्यु कुछ समय बाद या संक्रमण व मवाद जैसी चिकित्सीय जटिलताओं के बाद हुई, वह हत्या की सजा से नहीं बच सकता। यदि मृत्यु मूल चोट से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है, तो हमलावर धारा 302 IPC के तहत हत्या के लिए उत्तरदायी रहेगा।

दूसरा, न्यायालय ने धारा 299 IPC की व्याख्या 2 की कार्यप्रणाली स्पष्ट की है। पीड़ितों के परिवारों को अक्सर यह तर्क सुनना पड़ता है कि “अस्पताल की लापरवाही” या “खराब इलाज” ने कारण-परिणाम की शृंखला तोड़ दी। न्यायालय ने पुनः पुष्टि की कि जब मूल चोट ही गंभीर और जीवन के लिए घातक हो, तो कानून ऐसे तर्कों के आधार पर अपराधी को लाभ नहीं देता।

तीसरा, यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि छोटे-छोटे अंतर—जैसे यह कि हमला एक भाई के घर के सामने हुआ या दूसरे के, जबकि दोनों घर साथ-साथ हों—यदि समग्र कहानी सुसंगत हो और चिकित्सीय साक्ष्य उसका समर्थन करते हों, तो अपने आप में अभियोजन का मामला कमजोर नहीं करते।

साधारण पाठकों के लिए, यह मामला यह रेखांकित करता है कि कटार लेकर चलना, किसी को रास्ते में रोकना और उसके पेट में वार करना अदालतों की नजर में प्रायः “हत्या” के रूप में देखा जाएगा, विशेषकर तब जब मंशा का स्पष्ट साक्ष्य हो और न तो कोई गंभीर उकसावा हो, न ही आत्मरक्षा की स्थिति।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या सूचक की मृत्यु, जो चाकू लगने के लगभग 50 दिन बाद पेट के घाव में संक्रमण और मवाद बनने के कारण हुई, को कानूनी रूप से अभियुक्त के खाते में लिखकर धारा 302 IPC के तहत हत्या की दोषसिद्धि कायम रखी जा सकती है?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि मृत्यु मूल कटार चोट के कारण ही हुई; संक्रमण और मवाद बनना उस चोट का स्वाभाविक परिणाम था। धारा 299 IPC की व्याख्या 2 और Imran Khan के सिद्धांतों के अनुसार कारण-परिणाम की शृंखला अक्षुण्ण रही, अतः अभियुक्त हत्या के लिए उत्तरदायी है।
  • प्रश्न: क्या प्रकरण के तथ्य केवल धारा 304 भाग II IPC के तहत “गैर-इरादतन हत्या जो हत्या नहीं है” मानने को सही ठहराते हैं, जैसा कि सत्र न्यायालय ने किया?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि अभियुक्त ने जानबूझकर कटार से दो वार महत्वपूर्ण अंगों पर किए, इस ज्ञान के साथ कि ऐसी चोटें मृत्यु का कारण बन सकती हैं और ये चोटें अपने साधारण क्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त थीं। धारा 300 IPC के किसी भी अपवाद का लाभ अभियुक्त को नहीं मिला। अतः अपराध धारा 302 IPC के तहत हत्या की श्रेणी में आता है।
  • प्रश्न: क्या समुचित या विशेषज्ञ चिकित्सा उपचार के अभाव का तर्क अभियुक्त की आपराधिक जिम्मेदारी को हत्या से कम गंभीर अपराध तक घटा सकता है?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने निर्णय दिया कि धारा 299 IPC की व्याख्या 2 के आलोक में, यह संभावना कि उचित इलाज से मृत्यु टल सकती थी, उस व्यक्ति की जिम्मेदारी को कम नहीं करती जिसने मूल जीवन-घातक चोट पहुंचाई थी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • न्यायालय ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के द्वैधपीठ निर्णय Imran Khan v. State of Madhya Pradesh, 1994 MPLJ 862, विशेष रूप से पैरा 11, पर भरोसा किया, जिसमें कारण-परिणाम और मृत्यु के निकट कारण के सिद्धांत स्पष्ट किए गए हैं।

मामले का विवरण

मामला संख्या:
Criminal Appeal (DB) No. 203 of 2023
Criminal Appeal (SJ) No. 119 of 2023
उत्पन्न: Taraiya P.S. Case No. 54 of 2009, District Saran

मामले के शीर्षक:
Criminal Appeal (DB) No. 203 of 2023: Arjun Yadav @ Arjun Rai v. The State of Bihar & Anr.
Criminal Appeal (SJ) No. 119 of 2023: Baijnath Singh v. The State of Bihar

न्यायालय:
High Court of Judicature at Patna

पीठ:
Hon’ble Mr. Justice Rajeev Ranjan Prasad
Hon’ble Mr. Justice Ashok Kumar Pandey

CAV निर्णय की तिथि: 05-05-2025

उद्धरण: 2025 (2) PLJR 856

वकील:
Criminal Appeal (DB) No. 203 of 2023 में:
अपीलकर्ता की ओर से: Ms. Nikita Mittal, Advocate
राज्य की ओर से: Mr. Mukeshwar Dayal, APP
प्रतिवादी सं. 2 की ओर से: Mr. Ansul, Senior Advocate
Criminal Appeal (SJ) No. 119 of 2023 में:
अपीलकर्ता की ओर से: Mr. Ansul, Senior Advocate
राज्य की ओर से: Mr. Mukeshwar Dayal, APP

मामले का प्रकार:
सत्र वाद सं. 675/2009 में दोषसिद्धि और सज़ा के निर्णय के विरुद्ध आपराधिक अपीलें, जिनमें अपराध का पुनर्वर्गीकरण धारा 304 भाग II IPC से धारा 302 IPC के तहत किया गया तथा अभियुक्त द्वारा अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी गई।

निर्णय का लिंक:
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