मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता को 18.02.2009 को पुलिस उप-निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। प्रासंगिक समय में, वे सारण जिले के जलालपुर थाना में पदस्थापित थे। वे जलालपुर थाना कांड सं. 112/2014 की जांच कर रहे थे, जो एक सरकारी विद्यालय के प्रधानाध्यापक एवं अन्य के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत दर्ज था।
दिनांक 18.11.2014 को, एक अभियुक्त (राजनी दुबे) के पति ने पुलिस अधीक्षक, सतर्कता ब्यूरो, पटना के समक्ष लिखित शिकायत दायर की। उसने आरोप लगाया कि जलालपुर थाना के प्रभारी थाना अध्यक्ष (एसएचओ) मनीष कुमार ने उसकी पत्नी की जमानत अर्जी लंबित रहने वाले न्यायालय को केस डायरी भेजने के बदले 30,000 रुपये की मांग की है।
इस शिकायत पर 19.11.2014 को सत्यापन किया गया। इसके बाद सतर्कता अन्वेषण ब्यूरो, पटना द्वारा एक ट्रैप टीम गठित की गई। 21.11.2014 को छापेमारी की गई और याचिकाकर्ता को कथित रूप से 20,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया। सतर्कता थाना कांड सं. 90/2014 दर्ज किया गया, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7/13(2) सहपठित धारा 13(1)(d) के अंतर्गत था।
एफआईआर के बाद, याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया गया। 03.01.2015 के पत्र संख्या 27 के तहत उनके विरुद्ध प्रपत्र-का के रूप में विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। उस समय याचिकाकर्ता न्यायिक अभिरक्षा में थे। उन्हें 16.01.2015 को रिहा किया गया।
रिहाई के पश्चात, याचिकाकर्ता ने 09.03.2015 को कारण बताओ जवाब दायर किया, जिसमें विशेष रूप से अनुरोध किया कि विभागीय जांच में जो भी गवाह गवाही देंगे, उन्हें जिरह करने की अनुमति दी जाए। बाद में उन्होंने 24.09.2018 को व्यवहार अधिकारी के समक्ष अपना विस्तृत प्रतिरक्षा कथन दर्ज किया और आरोपों से संबंधित आवश्यक दस्तावेजों की आपूर्ति का अनुरोध किया।
इसी बीच, पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी पत्र संख्या 5793 दिनांक 19.12.2017 के तहत जांच में एक प्रस्तुती अधिकारी (प्रेजेंटिंग ऑफिसर) की नियुक्ति की गई। व्यवहार अधिकारी ने पत्र संख्या 578 दिनांक 27.09.2018 के द्वारा अपना जांच प्रतिवेदन पुलिस अधीक्षक को भेजा, जिसमें सभी आरोपों को सिद्ध माना गया।
इस रिपोर्ट के आधार पर, सेवा से बर्खास्त करने के प्रस्ताव के साथ याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। उन्होंने विस्तृत उत्तर दायर किया, जिसमें उन्होंने विभागीय जांच में लिए गए अपने बचाव को दोहराया और ट्रैप केस के एक स्वतंत्र जब्ती-सूची गवाह के हलफनामे सहित कई शपथ-पत्रों पर भी भरोसा किया।
इसके बावजूद, पत्र संख्या 3340 दिनांक 17.11.2018 द्वारा सारण रेंज, छपरा के पुलिस उप महानिरीक्षक ने याचिकाकर्ता को उप-निरीक्षक के पद से बर्खास्त करने का आदेश पारित किया। यह आदेश उन्हें पत्र संख्या 4989 दिनांक 24.11.2018 तथा पत्र संख्या 2488 दिनांक 29.11.2018 के परिणामी आदेशों के माध्यम से सूचित किया गया।
विभागीय कार्यवाही की लंबित अवस्था के दौरान, याचिकाकर्ता ने सीडब्ल्यूजेसं 15117/2018 दायर किया था, जिसमें अनुरोध किया गया कि सतर्कता आपराधिक मामले के निपटारे तक विभागीय जांच स्थगित रखी जाए। तथापि, इस बीच बर्खास्तगी का आदेश पारित हो जाने के कारण वह रिट निरर्थक हो गया।
इसके बाद, याचिकाकर्ता ने बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए सीडब्ल्यूजेसं 9534/2019 दायर किया, जिसे 12.11.2020 को इस निर्देश के साथ निस्तारित किया गया कि प्राधिकारियाँ उसकी लंबित वैधानिक अपील का निर्णय करें। इस निर्देश के अनुपालन में, पुलिस अतिरिक्त महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) ने 16.02.2021 के आदेश द्वारा अपील खारिज कर दी। इसके परिणामस्वरूप पत्र संख्या 1498 दिनांक 13.03.2021 तथा पत्र संख्या 595 दिनांक 23.03.2021 के तहत आदेश जारी किए गए।
मूल बर्खास्तगी आदेश, अपीलीय आदेश तथा सभी संबंधित परिणामी आदेशों से आक्रांत होकर, याचिकाकर्ता ने वर्तमान सिविल रिट न्यायाधिकरण प्रकरण सं. 12321/2021 में पटना उच्च न्यायालय की शरण ली।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय, माननीय न्यायमूर्ति हरीश कुमार की पीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनीं। ध्यान सतर्कता ट्रैप को आपराधिक मामले के रूप में पुनर्मूल्यांकन पर नहीं, बल्कि इस बात की जांच पर केंद्रित था कि विभागीय जांच और दंडादेश विधिसम्मत एवं निष्पक्ष तरीके से किए गए थे या नहीं।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कई प्रमुख बिंदु उठाए। पहला, उन्होंने तर्क दिया कि सारण के पुलिस अधीक्षक, जिन्होंने आरोप पत्र जारी किया और अनुशासनात्मक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, वे उप-निरीक्षक के नियुक्ति या अनुशासनिक प्राधिकारी नहीं थे। अतः कार्यवाही की शुरुआत और बर्खास्तगी की अनुशंसा को अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया।
दूसरा, उन्होंने बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 (CCA Rules, 2005) के नियम 16, 17(2) और 18 के कथित उल्लंघन की ओर संकेत किया। विशेष जोर नियम 17(5)(c) पर था, जो जांच में विभाग का पक्ष रखने के लिए प्रस्तुती अधिकारी की नियुक्ति को अनिवार्य करता है।
रिकॉर्ड से स्पष्ट था कि 03.01.2015 का आरोप पत्र उस समय जारी किया गया जब याचिकाकर्ता न्यायिक अभिरक्षा में थे और उस समय कोई प्रस्तुती अधिकारी नियुक्त नहीं था। वास्तव में प्रस्तुती अधिकारी की नियुक्ति बहुत बाद में, 19.12.2017 को की गई, जब तक कि कुछ गवाहों की जिरह पहले ही व्यवहार अधिकारी द्वारा कर ली गई थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि इसका अर्थ है कि व्यवहार अधिकारी ने स्वयं प्रस्तुती अधिकारी की भूमिका निभाई, जो कि स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने आगे दावा किया कि बार-बार लिखित अनुरोधों के बावजूद उन्हें गवाहों से जिरह करने का वास्तविक अवसर नहीं दिया गया, और अभियोजन पक्ष के गवाहों की जिरह के समय उन्हें न तो सूचित किया गया और न ही सुना गया।
याचिकाकर्ता ने जांच प्रतिवेदन और दंडादेशों को भी एकपक्षीय और बिना बोलने वाले (non-speaking) आदेश के रूप में चुनौती दी। उनके अनुसार, जांच अधिकारी और अनुशासनिक प्राधिकारी ने उनके बचाव, जिसमें ट्रैप केस के एक स्वतंत्र जब्ती-सूची गवाह का हलफनामा भी शामिल था, पर विचार नहीं किया और यह भी नहीं बताया कि उनके संस्करण को क्यों अस्वीकार किया गया।
उन्होंने रेखांकित किया कि 30,000 रुपये की रिश्वत मांग की मूल शिकायत एसएचओ मनीष कुमार के विरुद्ध थी, उनके विरुद्ध नहीं। फिर भी, जहां एसएचओ को कथित रूप से केवल “ब्लैक मार्क” (चेतावनी) दी गई, वहीं उन्हें सेवा से बर्खास्त करने की चरम सजा दी गई।
इन तर्कों के समर्थन में, याचिकाकर्ता ने कई बाध्यकारी नज़ीरों पर भरोसा किया, विशेष रूप से:
- State of U.P. v. Saroj Kumar Sinha (2010) 2 SCC 772, जिसमें जांच अधिकारी की भूमिका को स्वतंत्र, अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारी के रूप में बताया गया है, जो अभियोजक और न्यायाधीश दोनों की भूमिका नहीं निभा सकता।
- Upendra Pandit v. State of Bihar, 2023 (4) PLJR 568, जिसमें नियम 17 के अंतर्गत प्रस्तुती अधिकारी की नियुक्ति न होने को गंभीर प्रक्रमगत दोष माना गया।
- Md. Giaaul Hak v. State of Bihar, 2024 (1) BLJ 94, जिसमें कहा गया कि यदि जांच अधिकारी वही कार्य करता है जो प्रस्तुती अधिकारी को करना चाहिए, तो जांच अवैध हो जाती है।
- M/s Kranti Associates Pvt. Ltd. v. Masood Ahmed Khan, (2010) 9 SCC 496, जिसमें अर्द्ध-न्यायिक आदेशों में कारण बताने की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला गया।
- T. Subramanian v. State of Tamil Nadu तथा B. Jayaraj v. State of Andhra Pradesh जैसे निर्णय, जो मांग एवं अवैध पारिश्रमिक की स्वैच्छिक स्वीकृति सिद्ध करने की आवश्यकता पर बल देते हैं, भले ही वे आपराधिक कानून के मामले हों।
दूसरी ओर, राज्य के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही पुलिस महानिदेशक के निर्देशों के अनुपालन में विधिवत प्रारंभ की गई थी। कहा गया कि याचिकाकर्ता को अपना बचाव करने का पूरा अवसर दिया गया, जिसमें दस्तावेजों की आपूर्ति और विस्तृत लिखित प्रतिरक्षा दाखिल करने का मौका शामिल था।
राज्य का यह भी कहना था कि 19.12.2017 को प्रस्तुती अधिकारी की नियुक्ति की गई और उनकी नियुक्ति के बाद गवाहों की जिरह याचिकाकर्ता को सूचना देकर की गई। विभागीय प्रकरण सं. 2/2015 का रिकॉर्ड न्यायालय के समक्ष पेश किया गया। राज्य ने यह बनाए रखा कि ट्रैप टीम के सदस्य और अन्य गवाह विभागीय जांच में उपस्थित हुए और उनकी गवाही, दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ मिलकर, 20,000 रुपये रिश्वत लेने के आरोप को सिद्ध करती है।
यह भी तर्क दिया गया कि एक बार जब जांच अधिकारी ने आरोप सिद्ध मान लिया और अनुशासनिक प्राधिकारी ने इस निष्कर्ष को स्वीकार कर लिया, तो न्यायालय, अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए, अपीलीय मंच की तरह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता। न्यायिक पुनरीक्षण की सीमित परिधि पर बल देने के लिए State of Rajasthan v. Bhupendra Singh, 2024 SCC OnLine SC 1908 तथा पूर्ववर्ती सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय जैसे P. Gunasekaran पर भरोसा किया गया।
इसके बाद न्यायालय ने प्रासंगिक विधिक सिद्धांतों का सावधानी से विश्लेषण किया। उसने स्वीकार किया कि भ्रष्टाचार का आरोप अत्यंत गंभीर है और सिद्ध होने पर कठोर दंड को उचित ठहरा सकता है। इस संदर्भ में न्यायालय ने Secretary, Ministry of Defence v. Prabhash Chandra Mirdha (AIR 2012 SC 2250) तथा Brajendra Singh Yambem v. Union of India (2016) 9 SCC 20 जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें भ्रष्टाचार संबंधी विभागीय कार्यवाही में न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप न करने पर बल दिया गया है।
हालांकि, न्यायालय ने रेखांकित किया कि गंभीर मामलों में भी राज्य को निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करना होता है और अनुशासनिक प्राधिकारी केवल आरोप की “गंभीरता” के आधार पर कार्य नहीं कर सकते। निष्पक्षता, नियमों का अनुपालन और प्राकृतिक न्याय का पालन अनिवार्य है।
तथ्यों की समीक्षा करते हुए, न्यायालय ने नोट किया:
- रिश्वत मांग की शिकायत विशेष रूप से एसएचओ मनीष कुमार के विरुद्ध थी, याचिकाकर्ता के विरुद्ध नहीं।
- आरोप पत्र उस समय दिया गया जब याचिकाकर्ता अभिरक्षा में थे।
- प्रस्तुती अधिकारी की नियुक्ति केवल 18/19.12.2017 को की गई, जबकि कम-से-कम दो महत्त्वपूर्ण गवाह — दोनों ट्रैप से जुड़े उपाधीक्षक — पहले ही व्यवहार अधिकारी द्वारा स्वयं जांचे जा चुके थे।
- पुलिस महानिरीक्षक ने पत्र संख्या 235 दिनांक 20.12.2017 द्वारा सभी पुलिस अधीक्षकों को विभागीय जांच में प्रस्तुती अधिकारी की नियुक्ति के लिए स्पष्ट निर्देश दिए थे और CCA Rules, 2005 के नियम 17(5)(c) के तहत उनकी भूमिका का विस्तार से उल्लेख किया था।
- जांच प्रतिवेदन (परिशिष्ट-9) में केवल एक पंक्ति में यह उल्लेख है कि प्रस्तुती अधिकारी को कार्यवाही में “सहायता के लिए प्रतिनियुक्त” किया गया, पर यह नहीं बताया गया कि उन्होंने वास्तव में क्या कार्य किया।
- प्रतिवेदन में केवल विभागीय गवाहों की गवाही का विवरण और याचिकाकर्ता के लिखित बचाव की पुनरावृत्ति है, परन्तु यह नहीं बताया गया कि याचिकाकर्ता के बचाव को क्यों अस्वीकार किया गया; कोई ठोस चर्चा या कारण नहीं दिए गए।
न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को Saroj Kumar Sinha और Kranti Associates द्वारा निर्धारित विधि के प्रतिकूल पाया। एक जांच अधिकारी को विभागीय प्रतिनिधि की तरह नहीं, बल्कि स्वतंत्र निर्णयकर्ता की तरह कार्य करना चाहिए और उसे प्रतिवेदन में यह प्रदर्शित करना चाहिए कि बचाव को समझा, तौला और फिर युक्तिसंगत कारणों के साथ अस्वीकार किया गया, विशेषकर जब परिणाम सेवा से बर्खास्तगी जैसा गंभीर हो।
प्रस्तुती अधिकारी के प्रश्न पर, न्यायालय ने माना कि भले ही अंततः नियुक्ति आदेश जारी हुआ हो, परंतु देर से नियुक्ति, साथ ही व्यवहार अधिकारी द्वारा स्वयं पहले के गवाहों की जिरह करना और उसके बाद प्रस्तुती अधिकारी की भूमिका का लगभग पूर्ण अभाव, CCA Rules, 2005 के नियम 17(5)(c) का गंभीर उल्लंघन है। पुलिस महानिरीक्षक के ही परिपत्र (पत्र सं. 235) ने स्पष्ट कर दिया था कि प्रस्तुती अधिकारी और जांच अधिकारी के कर्तव्य अलग-अलग हैं और इन भूमिकाओं के मिश्रण से जांच अवैध हो जाती है।
न्यायालय ने पुनः दोहराया कि “न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।” ऐसे मामले में, जहां याचिकाकर्ता ने जिरह का अवसर और दस्तावेजों की आपूर्ति मांगी, और जहां जांच प्रतिवेदन लंबा होने के बावजूद कारणरहित था, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता को अपना बचाव प्रस्तुत करने का निष्पक्ष और सार्थक अवसर नहीं दिया गया।
स्वयं भ्रष्टाचार के आरोप पर, न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि विभागीय मामलों में साक्ष्य का मानक “संभावनाओं का संतुलन” (preponderance of probabilities) होता है, न कि आपराधिक मुकदमों की तरह “संदेह से परे” (beyond reasonable doubt)। फिर भी, न्यायालय ने यह माना कि इस कम मानक पर भी, विभाग को यह प्रदर्शित करना होता है कि याचिकाकर्ता ने धनराशि को रिश्वत जानते हुए स्वेच्छा से स्वीकार किया। बचाव की पर्याप्त चर्चा और जांच प्रतिवेदन में उचित तर्कों के अभाव में, न्यायालय इस निष्कर्ष से संतुष्ट नहीं था कि इस कानूनी आवश्यकता का निष्पक्ष परीक्षण किया गया।
न्यायालय ने समान परिस्थितियों वाले अधिकारियों के साथ भिन्न व्यवहार पर भी ध्यान दिया: मूल शिकायत जिस एसएचओ के विरुद्ध थी, उसे केवल “ब्लैक मार्क” (चेतावनी के समकक्ष) दिया गया, जबकि याचिकाकर्ता को बर्खास्तगी जैसी चरम सजा दी गई। इसने मनमानी की समग्र धारणा को और मजबूत किया।
उपरोक्त के आलोक में, तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमित किंतु सार्थक न्यायिक पुनरीक्षण के सिद्धांतों को लागू करते हुए, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि इस मामले में विभागीय कार्यवाही वैधानिक नियमों के अनुपालन न होने तथा प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के कारण दूषित है। न्यायालय के मतानुसार यह कमी अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप की आवश्यक सीमा से ऊपर थी।
फलस्वरूप, न्यायालय ने रिट याचिका स्वीकार कर ली। उसने पत्र संख्या 3340 दिनांक 17.11.2018 (बर्खास्तगी आदेश), 16.02.2021 का अपीलीय आदेश, तथा पत्र संख्या 4989 दिनांक 24.11.2018, 2488 दिनांक 29.11.2018, 1498 दिनांक 13.03.2021 और 595 दिनांक 23.03.2021 सहित सभी परिणामी आदेशों को निरस्त कर दिया।
पिछले वेतन के प्रश्न पर, न्यायालय ने Deepali Gundu Surwase v. Kranti Junior Adhyapak (2013) 10 SCC 324 पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया है कि अवैध बर्खास्तगी के मामलों में पुनःस्थापन, सेवा की निरंतरता और पिछला वेतन प्रदान करना सामान्य नियम है, हालांकि यह विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। इन विचारों का संतुलन करते हुए, न्यायालय ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को सेवा की निरंतरता के साथ पुनःस्थापित किया जाए, परन्तु सेवामुक्त रहने की अवधि के लिए उन्हें उनके वेतन का केवल आधा भाग पिछला वेतन के रूप में दिया जाए।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय पुलिसकर्मियों और सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए, विशेष रूप से बिहार में, जो विभागीय जांचों का सामना कर रहे हैं, महत्त्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में भी राज्य मूलभूत निष्पक्ष प्रक्रिया के नियमों की अनदेखी नहीं कर सकता।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि:
- प्रस्तुती अधिकारी की विधिवत नियुक्ति होनी चाहिए और उसे वास्तव में अपनी भूमिका निभानी चाहिए। जांच अधिकारी अभियोजक और न्यायाधीश दोनों की भूमिका नहीं निभा सकता।
- कर्मचारियों को अपना बचाव करने का वास्तविक अवसर दिया जाना चाहिए, जिसमें गवाहों से जिरह करना और सभी प्रासंगिक दस्तावेज प्राप्त करना शामिल है।
- जांच प्रतिवेदन और दंडादेशों में कारण दिए जाने चाहिए। केवल बयान कॉपी कर देना और यह कह देना कि आरोप “सिद्ध” हैं, पर्याप्त नहीं है।
वे अधिकारी जो महसूस करते हैं कि एकपक्षीय विभागीय जांच के आधार पर उन्हें अनुचित रूप से बर्खास्त कर दिया गया है, उनके लिए यह मामला दिखाता है कि जहां वैधानिक नियमों और प्राकृतिक न्याय का स्पष्ट उल्लंघन होगा, वहां पटना उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।
निर्णय यह भी उजागर करता है कि समान रूप से स्थित अधिकारियों के साथ असमान व्यवहार, बिना किसी स्पष्टीकरण के, गंभीरता से देखा जाएगा, विशेषकर जब एक को मामूली चेतावनी दी जाती है और दूसरे को संबंधित आरोपों पर सेवा से बर्खास्त कर दिया जाता है।
विधिक प्रश्न और उत्तर
- प्रश्न: क्या उप-निरीक्षक के पद से याचिकाकर्ता की विभागीय जांच एवं बर्खास्तगी CCA Rules, 2005 तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप की गई थी?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि नियम 17(5)(c) के तहत प्रस्तुती अधिकारी की नियुक्ति और कार्यप्रणाली में अनुपालन नहीं हुआ, याचिकाकर्ता को अपना बचाव करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, और जांच प्रतिवेदन में उचित कारणों का अभाव था; इस प्रकार वैधानिक नियमों एवं प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन हुआ। - प्रश्न: क्या उच्च न्यायालय रिट क्षेत्राधिकार में भ्रष्टाचार संबंधी विभागीय कार्यवाही में निकाले गए निष्कर्षों और दंड में हस्तक्षेप कर सकता था?
उत्तर: हाँ, इस मामले में। यद्यपि न्यायालयों द्वारा रिट क्षेत्राधिकार में प्रायः साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जाता, परन्तु न्यायालय ने माना कि जांच प्रक्रिया में गंभीर प्रक्रमगत दोष एवं प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन के कारण अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप की सीमा पूरी हो गई थी। - प्रश्न: बर्खास्तगी एवं अपीलीय आदेशों के निरस्त होने के बाद, विशेषकर पुनःस्थापन और पिछला वेतन के संबंध में, याचिकाकर्ता को क्या राहत दी गई?
उत्तर: न्यायालय ने याचिकाकर्ता को सेवा की निरंतरता के साथ पुनःस्थापित करने का निर्देश दिया और सेवामुक्त रहने की अवधि के लिए उसके वेतन का 50% पिछला वेतन के रूप में देने का आदेश दिया।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Secretary, Ministry of Defence & Ors. v. Prabhash Chandra Mirdha, AIR 2012 SC 2250.
- Brajendra Singh Yambem v. Union of India & Anr., (2016) 9 SCC 20.
- Associated Provincial Picture Houses Ltd. v. Wednesbury Corporation, (1948) 1 KB 223; (1947) 2 All ER 680 (CA).
- Union of India & Ors. v. P. Gunasekaran, (2015) 2 SCC 610.
- Bharti Airtel Limited v. A.S. Raghavendra, (2024) 6 SCC 418.
- State of Andhra Pradesh v. S. Sree Rama Rao, AIR 1963 SC 1723.
- State of Andhra Pradesh v. Chitra Venkata Rao, (1975) 2 SCC 557.
- State Bank of India v. S.K. Sharma, (1996) 3 SCC 364.
- State of Rajasthan & Ors. v. Bhupendra Singh, 2024 SCC OnLine SC 1908.
- Boloram Bordoloi v. Lakhimi Gaolia Bank, (2021) 3 SCC 806.
- State of U.P. & Ors. v. Saroj Kumar Sinha, (2010) 2 SCC 772.
- M/s Kranti Associates Pvt. Ltd. & Anr. v. Masood Ahmed Khan & Ors., (2010) 9 SCC 496.
- Deepali Gundu Surwase v. Kranti Junior Adhyapak & Ors., (2013) 10 SCC 324.
- Uday Pratap Singh v. State of Bihar & Ors., 2017 (4) PLJR 195.
- Upendra Pandit v. State of Bihar & Ors., 2023 (4) PLJR 568.
- Md. Giaaul Hak v. State of Bihar, 2024 (1) BLJ 94.
- Shaughnessy v. United States, 345 US 206 (1953) (Jackson J).
- Kumayu Mandal Vikas Nigam Limited v. Girija Shankar, (2001) 1 SCC 182 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत)।
- T. Subramanian v. State of Tamil Nadu, AIR 2006 SC 836 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत)।
- B. Jayaraj v. State of Andhra Pradesh, (2014) 13 SCC 55 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत)।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 12321 of 2021
मामले का शीर्षक: Manoj Kumar Ram v. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2025 (2) PLJR 561
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Harish Kumar
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Sanjay Kumar Giri, Advocate; Mr. Mritunjay Harsh, Advocate.
- राज्य/प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Md. Nadim Seraj, Government Pleader 5; Mr. Dhurendra Kumar, Assistant Counsel to Government Advocate 5.
मामले का स्वरूप: सेवा से बर्खास्तगी तथा विभागीय अपील की अस्वीकृति को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिका (सतर्कता ट्रैप में भ्रष्टाचार के आरोप से संबंधित सेवा/अनुशासनिक मामला)।
निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment – CWJC No. 12321 of 2021
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