प्रकरण की पृष्ठभूमि
पंजीकृत ट्रस्ट ने खगड़िया, बिहार में श्यामलाल चंद्रशेखर मेडिकल कॉलेज & एसपीएनएम हॉस्पिटल नामक चिकित्सा महाविद्यालय एवं संबद्ध अस्पताल की स्थापना की। ट्रस्ट ने 16.09.2023 को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (MARB) के समक्ष नया चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित करने तथा एमबीबीएस पाठ्यक्रम में छात्रों को प्रवेश देने के लिए अनुमति-पत्र (Letter of Permission) हेतु आवेदन किया।
प्रारंभिक रूप से आवेदन शैक्षणिक वर्ष 2024–25 के लिए 150 एमबीबीएस सीटों का था, जो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019 की धारा 28(1) एवं (2) के अंतर्गत दायर हुआ था। आवेदन की जांच के बाद MARB ने 04.04.2024 की शो कॉज नोटिस (कारण बताओ सूचना) जारी की, जिसमें मुख्य रूप से आवेदन शुल्क (जीएसटी सहित), बैंक गारंटी तथा यूजी-एमएसआर 2023 के अनुसार बेड स्ट्रेंथ से संबंधित कमियों की ओर संकेत किया गया।
महाविद्यालय ने 09.04.2024 को उत्तर दिया, आवश्यक शपथपत्र दाखिल किया और स्पष्ट रूप से 150 के स्थान पर केवल 100 एमबीबीएस सीटों के लिए अनुमति मांगने का विकल्प चुना। उसने अनुरोध किया कि आगे की प्रक्रिया और निरीक्षण 100 सीटों के मानकों के अनुसार ही किया जाए। MARB ने फिर उसी आधार पर कार्यवाही आगे बढ़ाई।
28.06.2024 को MARB की असेसमेंट टीम ने 100 सीटों के लिए महाविद्यालय का भौतिक निरीक्षण किया। एक मानक मूल्यांकन प्रपत्र (Standard Assessment Form) और निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की गई। 03.07.2024 को NMC द्वारा आभासी (वर्चुअल) सुनवाई दी गई, जिसमें महाविद्यालय के प्रतिनिधि उपस्थित हुए, लेकिन वे रिपोर्ट में दर्शाई गई कमियों पर समिति को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाए।
04.07.2024 को MARB ने नए महाविद्यालय के लिए अस्वीकृति-पत्र (Letter of Disapproval) जारी किया। महाविद्यालय ने 18.07.2024 को धारा 28(5) के तहत NMC के समक्ष पहला अपील दायर की, जिसे NMC ने 07.08.2024 को खारिज कर दिया। इसके बाद महाविद्यालय ने धारा 28(6) के अंतर्गत भारत सरकार (Union of India) के समक्ष दूसरी अपील दायर की, जिसकी सुनवाई 29.08.2024 को हुई और 30.09.2024 को इसे अस्वीकार कर दिया गया।
महाविद्यालय ने इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में W.P.(C) सं. 14137/2024 याचिका दायर की, परंतु क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के अभाव में 14.10.2024 को वह याचिका खारिज कर दी गई। अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर याचिका भी 21.10.2024 को यह स्वतंत्रता देते हुए खारिज कर दी गई कि वह अधिकार क्षेत्र वाले उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। तत्पश्चात वर्तमान रिट याचिका पटना उच्च न्यायालय में दायर की गई।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय के समक्ष मूल विवाद यह था कि 100 एमबीबीएस सीटों के लिए नए चिकित्सा महाविद्यालय को अनुमति न देने का निर्णय विधिसंगत और निष्पक्ष था या नहीं। न्यायालय ने नोटिसों, निरीक्षणों, अपीलों की क्रमिक कार्यवाही तथा NMC अधिनियम, 2019 की धारा 28 और यूजी-एमएसआर 2023 के अधीन कानूनी आवश्यकताओं की बारीकी से जांच की।
04.07.2024 की MARB द्वारा जारी अस्वीकृति-पत्र में निम्न प्रमुख कमियों का उल्लेख था:
- फैकल्टी की 39% कमी।
- रेज़िडेंट/ट्यूटर की 39.5% कमी।
- सीटी स्कैन मशीन उपलब्ध नहीं।
- मान्य रक्त बैंक लाइसेंस नहीं।
- केवल एक डिलीवरी दर्ज।
इन्हीं आधारों पर MARB ने नए चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना अस्वीकार कर दी। 07.08.2024 की प्रथम अपील के निर्णय में NMC ने फैकल्टी तथा AEBAS डेटा में “ग्रॉस डिफिशिएंसी” (घोर कमी) का उल्लेख करते हुए MARB के निर्णय को बरकरार रखा। उसने यह भी दर्ज किया कि महाविद्यालय ने 50 सीटों पर विचार करने का अनुरोध किया था, परंतु कहा कि वह इसके लिए भी पात्र नहीं है।
दूसरी अपील में भारत सरकार ने दर्ज किया कि:
- 100 सीटों के लिए अपेक्षित 85 फैकल्टी और 65 SR/Tutor के स्थान पर केवल 39 फैकल्टी (7 प्रोफेसर, 9 एसोसिएट प्रोफेसर, 23 असिस्टेंट प्रोफेसर) और 22 SR/Tutor पाए गए।
- सिर्फ 3 डिलीवरी (2 सामान्य, 1 ऑपरेशन द्वारा) थीं।
- निरीक्षण के समय सीटी स्कैन और रक्त बैंक उपलब्ध नहीं थे।
इन तथ्यों पर विचार करने के बाद भारत सरकार ने 30.09.2024 को दूसरी अपील खारिज कर दी।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि प्राधिकारियों ने NMC अधिनियम की धारा 28(3) का उल्लंघन किया, जिसके अनुसार MARB को योजना अस्वीकृत करने से पहले शो कॉज नोटिस के माध्यम से खामियों को दूर करने का अवसर देना अनिवार्य है। उनका कहना था कि:
- 04.04.2024 की शो कॉज नोटिस केवल प्रारंभिक 150 सीटों के प्रस्ताव और स्व-मूल्यांकन से संबंधित थी, 28.06.2024 को 100 सीटों के लिए किए गए निरीक्षण के बाद पाई गई कमियों से नहीं।
- निरीक्षण के बाद कोई भी शो कॉज नोटिस जारी नहीं की गई, जिसमें निरीक्षण-आधारित कमियों को विशिष्ट रूप से दर्शाकर उन्हें दूर करने के लिए समय दिया जाता।
- भारत सरकार ने स्वयं दूसरी अपील के आदेश में दर्ज किया कि “MARB द्वारा कोई शो कॉज नोटिस जारी नहीं की गई”, फिर भी अपील को अस्वीकार कर दिया।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी प्रस्तुत किया कि 25.01.2023 की NMC पत्र के अनुसार निर्णय लेने के लिए AEBAS, HMIS और CCTV डेटा का उपयोग किया जाना है। उन्होंने यह रेखांकित किया कि:
- महाविद्यालय के 149 फैकल्टी सदस्य AEBAS पोर्टल पर विधिवत पंजीकृत थे, जो 100 सीटों के लिए यूजी-एमएसआर 2023 के अंतर्गत अपेक्षित 85 फैकल्टी से अधिक है।
- कमी की गणना केवल निरीक्षण दिवस पर भौतिक उपस्थिति के आधार पर की गई, जबकि महाविद्यालय नया था और अभी पाठ्यक्रम प्रारंभ भी नहीं हुआ था; ऐसा कोई नियम नहीं है कि सभी फैकल्टी को उसी दिन शारीरिक रूप से उपस्थित होना अनिवार्य है।
- स्वयं निरीक्षण रिपोर्ट में 2 सामान्य डिलीवरी और 1 ऑपरेशन (सीज़ेरियन) दर्ज हैं, जबकि अस्वीकृति-पत्र में गलत रूप से केवल एक डिलीवरी लिखी गई।
सीटी स्कैन और रक्त बैंक के संदर्भ में याचिकाकर्ताओं ने निम्न दस्तावेज प्रस्तुत किए:
- रक्त केंद्र के लिए आवेदन 11.12.2023 को दायर हुआ; 06.06.2024 और 16.07.2024 को निरीक्षण किया गया; और 22.08.2024 को लाइसेंस प्रदान किया गया।
- सीटी स्कैन मशीन 01.08.2024 से स्थापित और कार्यशील थी।
याचिकाकर्ताओं ने भेदभाव का आरोप भी लगाया कि इसी दिन, 30.09.2024 को, भारत सरकार ने तीन समान स्थिति वाले महाविद्यालयों (P.A. Sangma International Medical College, KPC Medical College & Hospital, और School of Medical Sciences, Sri Satya Sai University of Technology & Medical Science) की दूसरी अपीलें, गंभीर कमियों के बावजूद, केवल उनके उपक्रमों और शपथपत्रों के आधार पर, बिना अनुपालन निरीक्षण के स्वीकार कर लीं।
उत्तरदाताओं का पक्ष यह था कि:
- NMC अधिनियम की धारा 57 के अंतर्गत बनाई गई विनियमों को विधिक बल प्राप्त है और उनका कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए।
- महाविद्यालय में फैकल्टी और रेज़िडेंट की भारी कमी थी, AEBAS और निरीक्षण दोनों के अनुसार, और मूल्यांकन के समय कार्यशील रक्त बैंक और सीटी स्कैन उपलब्ध नहीं थे।
- न्यायालय को चिकित्सा शिक्षा के मानकों के बनाए रखने के मामलों में विशेषज्ञ निकाय की तरह बैठकर समीक्षा नहीं करनी चाहिए, और इस संबंध में Anand Yadav तथा Zahoor Ahmed जैसे निर्णयों पर भरोसा किया गया।
- 2024–25 के लिए अस्वीकृति के बाद महाविद्यालय को 19.12.2024 की सार्वजनिक सूचना के तहत 2025–26 के लिए नया आवेदन करना चाहिए था, जो उसने नहीं किया।
न्यायालय ने पहले NMC अधिनियम की धारा 28(3) पर ध्यान केंद्रित किया। प्रावधान की उक्त प्रावधान (प्रोवाइज़ो) स्पष्ट रूप से कहती है कि किसी योजना को अस्वीकृत करने से पूर्व MARB “shall” (करना ही होगा) दोषों को दूर करने का अवसर देगा। न्यायालय ने इसे अनिवार्य (mandatory) शर्त माना। उसने पाया कि:
- 28.06.2024 को 100 सीटों के लिए किए गए भौतिक निरीक्षण के बाद, उन निरीक्षण-आधारित कमियों की विशिष्ट सूची सहित कोई शो कॉज नोटिस जारी नहीं की गई।
- 04.04.2024 की नोटिस पूर्ववर्ती 150 सीटों के आवेदन और निरीक्षण-पूर्व जांच से संबंधित थी, न कि बाद की 100 सीटों की मूल्यांकन प्रक्रिया से; अतः उसे धारा 28(3) के तहत अनिवार्य नोटिस नहीं माना जा सकता।
- भारत सरकार ने स्वयं अपनी दूसरी अपील के आदेश में स्वीकार किया कि MARB द्वारा कोई शो कॉज नोटिस जारी नहीं की गई, फिर भी उसने इस दोष को उचित महत्व न देते हुए अपील अस्वीकार कर दी।
न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों (Swamy Devi Dayal Hospital & Dental College तथा Royal Medical Trust सहित) पर भरोसा किया, जिनमें यह प्रतिपादित है कि जहां कमियां इंगित की जाती हैं, वहां विधि द्वारा निर्धारित समयावधि के भीतर अनुपालन रिपोर्ट देने का अवसर और आवश्यकता पड़ने पर अनुपालन सत्यापन प्रदान किया जाना चाहिए।
फैकल्टी स्ट्रेंथ के प्रश्न पर न्यायालय ने यह नोट किया कि:
- यूजी-एमएसआर 2023 के अनुसार 100 एमबीबीएस सीटों के लिए 85 फैकल्टी आवश्यक हैं।
- असेसर्स की रिपोर्ट में यह दर्ज है कि 149 फैकल्टी AEBAS पर दर्ज (पंजीकृत) थे।
- स्वयं NMC पहले यह इंगित कर चुका था कि निर्णय लेने के लिए AEBAS, HMIS और CCTV डेटा का उपयोग किया जाएगा।
- विशेषकर ऐसे नए महाविद्यालय के मामले में, जहां पाठ्यक्रम अभी आरंभ होना शेष है, ऐसा कोई विशिष्ट नियम नहीं है कि सभी फैकल्टी निरीक्षण के दिन शारीरिक रूप से उपस्थित हों।
इन आधारों पर न्यायालय ने याचिकाकर्ता का यह तर्क स्वीकार किया कि AEBAS पंजीकरण और लागू विनियमों के आलोक में, फैकल्टी कमी का आधार विधिसंगत रूप से टिकाऊ नहीं है।
सीटी स्कैन और रक्त बैंक के संबंध में न्यायालय ने नोट किया कि स्वयं उत्तरदाताओं ने यह स्वीकार किया कि ये सुविधाएं अस्तित्व में आ चुकी थीं और चालू हो चुकी थीं, तथा लाइसेंस और इंस्टॉलेशन की तिथियां अभिलेख पर थीं। अतः, विधिवत शो कॉज और सुधार का अवसर दिए बिना, ये बिंदु पूर्ण अस्वीकृति को न्यायोचित नहीं ठहरा सकते।
न्यायालय ने यह भी पाया कि प्राधिकारियों ने:
- निर्धारित समयसीमाओं का पालन नहीं किया, जिससे महाविद्यालय को हानि हुई और उसने पूरा 2024–25 सत्र खो दिया।
- भेदभावपूर्ण तरीके से कार्य किया, क्योंकि अन्य महाविद्यालयों की दूसरी अपीलें समान अथवा अधिक कमियों के बावजूद मात्र उपक्रमों और शपथपत्रों के आधार पर स्वीकार की गईं, जबकि याचिकाकर्ता महाविद्यालय को ऐसा ही व्यवहार नहीं दिया गया।
- “आदर्श मुकदमेबाज” (model litigant) की भांति कार्य नहीं किया, जबकि राज्य अंग होने के नाते उनसे निष्पक्ष और समुचित आचरण की अपेक्षा की जाती है।
न्यायालय ने व्यापक जनहित पर विशेष जोर दिया: चिकित्सकों की भारी कमी है; महाविद्यालय ने अवसंरचना तैयार कर ली है और स्वीकृत फैकल्टी की नियुक्ति कर दी है; यदि छात्रों को अनुमति नहीं दी जाती, तो ये संसाधन और शिक्षक निष्क्रिय पड़े रहेंगे, जो स्वास्थ्य सेवा संकट के समय संसाधनों की बर्बादी है।
साथ ही न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह विशेषज्ञ मानकों पर प्रश्न नहीं उठा रहा है और न ही चिकित्सा मानकों पर अपने विचारों को प्रतिस्थापित कर रहा है। वह केवल विधिक और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता लागू कर रहा है, जिसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (audi alteram partem और nemo debet esse judex in propria causa) भी सम्मिलित हैं।
न्यायालय ने यह घोषित किया कि MARB का 04.07.2024 का अस्वीकृति आदेश, NMC का 07.08.2024 का प्रथम अपील आदेश तथा भारत सरकार द्वारा 30.09.2024 को दूसरी अपील की अस्वीकृति “प्रत्यक्ष विधि-विरुद्धता और मनमानी” से ग्रस्त हैं और अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों के विपरीत हैं।
चूंकि 2024–25 शैक्षणिक वर्ष पहले ही बीत चुका था, न्यायालय ने यह सिद्धांत लागू किया कि न्यायालय का कोई कार्य किसी को हानि नहीं पहुंचाना चाहिए (actus curiae neminem gravabit)। उसने यह घोषित किया कि 16.09.2023 को दायर महाविद्यालय के मूल आवेदन को अब 2025–26 शैक्षणिक वर्ष के आवेदन के रूप में माना जाए, ताकि प्रभावी राहत दी जा सके।
इसके बाद न्यायालय ने विस्तृत निर्देश जारी किए:
- महाविद्यालय का 16.09.2023 का 100 एमबीबीएस सीटों के लिए आवेदन शैक्षणिक वर्ष 2025–26 का आवेदन माना जाएगा।
- MARB को न्यायालय के आदेश प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर इस आवेदन को स्वीकार कर उसकी प्रक्रिया प्रारंभ करनी होगी।
- NMC को बीस दिनों के भीतर विशेष निरीक्षण/भौतिक मूल्यांकन करना होगा, ताकि यह सत्यापित हो सके कि पूर्व की सभी कमियां दूर कर दी गई हैं और 2025–26 के मानदंड पूरे हो रहे हैं या नहीं।
- NMC को निरीक्षण की अनुमानित तिथि के बारे में पूर्व में ही महाविद्यालय को सूचित करना होगा।
- अनुमति-पत्र (Letter of Permission) प्रदान करने की पूरी प्रक्रिया 31.08.2025 तक, अर्थात 2025–26 शैक्षणिक वर्ष के प्रारंभ से पहले पूर्ण की जानी होगी।
- यदि विशेष निरीक्षण में कोई नई कमियां पाई जाती हैं, तो शो कॉज नोटिस जारी कर एक माह का समय सुधार के लिए दिया जाएगा और उसके बाद पुन: निरीक्षण होगा।
- यदि कमियां ऐसी प्रकृति की हों जिन्हें एक माह में दूर नहीं किया जा सकता, तो NMC/प्राधिकारी को, अन्य समान रूप से स्थित संस्थानों की भांति, महाविद्यालय के उपक्रम/शपथपत्र के आधार पर 2025–26 के लिए 100 एमबीबीएस सीटों का अनुमति-पत्र प्रदान करना होगा।
- प्राधिकारीगण को अनुमति प्रदान करने के लिए NMC अधिनियम और लागू दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करना होगा।
- महाविद्यालय को 2025–26 के लिए सभी पूर्वापेक्षाएँ पूरी करनी होंगी और निर्धारित शुल्क मानकों के अनुरूप जमा करना होगा।
इन निष्कर्षों और निर्देशों के साथ, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई और सभी लंबित प्रार्थनापत्रों का निस्तारण कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन सभी नए और प्रस्तावित चिकित्सा महाविद्यालयों के लिए महत्वपूर्ण है जो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और MARB से संबंधित मामलों में उलझे हैं। यह स्पष्ट करता है कि प्राधिकारी धारा 28(3) NMC अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन किए बिना केवल आवेदन अस्वीकार नहीं कर सकते।
पटना उच्च न्यायालय का निष्कर्ष है कि निरीक्षण के बाद और अस्वीकृति से पूर्व विधिवत शो कॉज नोटिस देना अनिवार्य है। महाविद्यालयों को कमियां दूर करने का निष्पक्ष अवसर दिया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया का पालन न करने से, कमियां वास्तव में मौजूद होने पर भी, अस्वीकृति आदेश अवैध हो सकता है।
निर्णय यह भी दर्शाता है कि फैसले एकतरफा या भेदभावपूर्ण नहीं हो सकते। यदि अन्य महाविद्यालयों को केवल उपक्रमों और दस्तावेजों के आधार पर आगे बढ़ने दिया जा रहा है, तो समान परिस्थिति वाले महाविद्यालयों को ठोस कारण बताए बिना वही सुविधा देने से वंचित नहीं किया जा सकता।
छात्रों और परिवारों के लिए यह प्रकरण यह दिखाता है कि जब किसी वास्तविक संस्था के पास अवसंरचना और फैकल्टी होते हुए भी उसे अनुचित या विलंबित निर्णयों के कारण बाहर रखा जाता है, तब न्यायालय हस्तक्षेप करने को तैयार हैं। साथ ही न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित किया है कि चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम मानक विशेषज्ञों के नियंत्रण में बने रहें, जिसके लिए उसने सीधे प्रवेश देने के बजाय नए सिरे से निरीक्षण और अनुपालन सत्यापन का आदेश दिया।
विधिक प्रश्न एवं उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या MARB/NMC 100 एमबीबीएस सीटों के लिए निरीक्षण के बाद धारा 28(3) के अंतर्गत अनिवार्य शो कॉज नोटिस दिए बिना नए चिकित्सा महाविद्यालय की योजना अस्वीकृत कर सकते थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि धारा 28(3) अनिवार्य है। 28.06.2024 के 100 सीटों के निरीक्षण के बाद कोई विधिवत शो कॉज नोटिस जारी नहीं की गई, इसलिए अस्वीकृति और अपीलीय आदेश अवैध थे और निरस्त किए जाने योग्य थे। - प्रश्न: क्या कथित फैकल्टी, सीटी स्कैन, रक्त बैंक और डिलीवरी संबंधी कमियां, बिना आगे अनुपालन का अवसर दिए, सीधे अस्वीकृति को उचित ठहराती थीं?
उत्तर: नहीं, कम-से-कम इस प्रकरण में जिस प्रकार से किया गया, वह उचित नहीं था। न्यायालय ने पाया कि 149 फैकल्टी AEBAS पर पंजीकृत थे, जबकि आवश्यकता 85 की थी, सीटी स्कैन और रक्त केंद्र कार्यशील हो चुके थे, और ऐसा कोई नियम नहीं था कि सभी फैकल्टी निरीक्षण दिवस पर शारीरिक रूप से उपस्थित हों। विधिवत शो कॉज और अनुपालन प्रक्रिया के बिना ये आधार अस्वीकृति बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे। - प्रश्न: जब संबंधित शैक्षणिक वर्ष (2024–25) पहले ही समाप्त हो चुका हो, तब कौन-सी राहत दी जानी चाहिए?
उत्तर: न्यायालय ने निर्देश दिया कि 16.09.2023 की मूल आवेदन को शैक्षणिक वर्ष 2025–26 के लिए माना जाए, सख्त समय-सीमा के अंतर्गत नया निरीक्षण और अनुपालन की प्रक्रिया कराई जाए, और 31.08.2025 तक 100 एमबीबीएस सीटों के लिए अनुमति-पत्र पर विचार किया जाए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner, (1978) 1 SCC 405.
- Rameshwar Prasad (VI) v. Union of India, (2006) 2 SCC 1.
- Swamy Devi Dayal Hospital & Dental College v. Union of India, 2014 (13) SCC 506.
- Royal Medical Trust v. Union of India, (2015) 10 SCC 19.
- Anand Yadav v. State of Uttar Pradesh, AIR 2020 SC 5383 (उत्तरदाताओं द्वारा उद्धृत)।
- Zahoor Ahmed v. Sheikh Imtiyaz Ahmed, (2019) 2 SCC 404 (उत्तरदाताओं द्वारा उद्धृत)।
- राजस्थान उच्च न्यायालय का निर्णय, S.B. Civil Writ Petition No. 16822/2024, दिनांक 16.10.2024 (याचिकाकर्ताओं द्वारा निर्भर)।
प्रकरण का विवरण
प्रकरण संख्या: सिविल रिट अधिकार-क्षेत्र प्रकरण सं. 16800 वर्ष 2024
वाद शीर्षक: मधुरी सेवा न्यास & अन्र. बनाम यूनियन ऑफ इंडिया & ओर्स.
न्यायालय: पटना उच्च न्यायालय
कोरम: माननीय श्री न्यायमूर्ति अंजनी कुमार शरण
निर्णय की तिथि: 20.03.2025
उद्धरण: 2025 (2) PLJR 824
पक्षकारों के अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: श्री चितरंजन सिन्हा, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री अरुण कुमार, अधिवक्ता।
- भारत संघ की ओर से: श्री के.एन. सिंह, ASG; श्री आलोक कुमार, CGC।
- राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग एवं इसकी बोर्डों की ओर से: श्री कुमार प्रिया रंजन, वरिष्ठ स्थायी परामर्शदाता; श्री सुधर्शन भारद्वाज, अधिवक्ता; श्री संदीप कुमार, अधिवक्ता।
प्रकरण की प्रकृति: संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका, जिसमें नए चिकित्सा महाविद्यालय की स्थापना हेतु आवेदन की अस्वीकृति को चुनौती देते हुए MBBS प्रवेश के लिए अनुमति-पत्र (Letter of Permission) जारी करने हेतु रिट ऑफ मैन्डमस की मांग की गई।
निर्णय की प्रति का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTY4MDAjMjAyNCMxI04=-LYInMIrBYaw=
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने में रुचि रखते हों
कि बिहार में हो रहे विधिक विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप समविदा लॉ एसोसिएट्स को आगे की अद्यतन सूचनाओं के लिए फॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।


