न्यायालय ने पाया कि प्राधिकारियों ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया और उचित वैधानिक आधार के बिना कार्यवाही की।
जब्ती आदेश को रद्द कर दिया गया और राज्य को ट्रक के बीमित मूल्य का भुगतान करने का निर्देश दिया गया, जो एक वैधानिक दंड के अधीन होगा।
ट्रक के पहले ही नीलाम हो जाने के कारण, ट्रक मालिक को वाहन के बदले धनराशि प्राप्त होगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 26.12.2022 को पंजीकरण संख्या MH-04JU-0423 वाले एक कंटेनर ट्रक की जब्ती से उत्पन्न हुआ। इस वाहन से 477 लीटर भारतीय निर्मित विदेशी शराब बरामद की गई।
उसी दिन, पातेपुर थाना कांड संख्या 346 वर्ष 2022, बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 की धारा 30(a), 32(2), 41(1) के अंतर्गत, मालिक और अन्य पकड़े गए आरोपितों के विरुद्ध दर्ज किया गया। ट्रक के चालक और खलासी को घटनास्थल पर ही पकड़ लिया गया था।
दिनांक 27.12.2022 को पातेपुर थाना के थाना प्रभारी द्वारा मेमो संख्या 1347/22 के माध्यम से जप्त वाहन की जब्ती (कुर्की) के लिए एक प्रस्ताव भेजा गया। इस प्रस्ताव के आधार पर मद्य निषेध जब्ती प्रकरण संख्या 04 वर्ष 2023 आरंभ किया गया।
दिनांक 20.02.2023 को अतिरिक्त अवर समाहर्ता, महुआ (प्रतिवादी संख्या 5) ने मद्य निषेध जब्ती प्रकरण संख्या 04 वर्ष 2023 में ट्रक की जब्ती का आदेश पारित किया और उसकी नीलामी की अनुशंसा की। बाद में, 29.09.2023 के आदेश द्वारा, महुआ, वैशाली के अवर समाहर्ता ने वाहन को एक सन्दीप कुमार के पक्ष में 2.2 लाख रुपये में नीलाम कर दिया।
याचिकाकर्ता, जो महाराष्ट्र निवासी तथा ट्रक के पंजीकृत स्वामी हैं, ने सिविल रिट अधिकारिता मामले संख्या 18561 वर्ष 2023 में पटना उच्च न्यायालय की शरण ली। उन्होंने यह कहते हुए जब्ती और नीलामी को चुनौती दी कि उन्हें कभी कोई नोटिस नहीं दिया गया और यह कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के प्रावधानों के प्रतिकूल है।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वे कंटेनर ट्रक के bona fide (सद्भावनापूर्ण) स्वामी हैं और इसे एक परिवहन कंपनी को किराये पर दिया था, जो चालक और खलासी के माध्यम से इसका संचालन कर रही थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने वाहन को प्रतिवादी संख्या 7 को किराये पर दिया था और जब्ती की जानकारी उन्हें लगभग तीन महीने बाद मिली जब अनुबंधधारी ने उन्हें सूचित किया।
याचिकाकर्ता के अनुसार, 26.12.2022 को जब्ती के बाद, प्राधिकारियों ने केवल थाना प्रभारी के प्रस्ताव के आधार पर जब्ती की कार्यवाही शुरू कर दी। जबकि परिवहन अभिलेखों से उनका स्वामित्व आसानी से सत्यापित किया जा सकता था, फिर भी उन्हें तलाशने या संपर्क करने का कोई समुचित प्रयास नहीं किया गया। इसके बजाय, जब्ती प्राधिकारी ने केवल बिहार के एक स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशन के माध्यम से नोटिस जारी किया।
याचिकाकर्ता मुंबई में रहते हैं और ट्रक के पास राष्ट्रीय परमिट था। उनका कहना था कि बिहार के एक स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित नोटिस को उनके लिए पर्याप्त नोटिस नहीं माना जा सकता। उनका यह भी कहना था कि जिला परिवहन पदाधिकारी, वैशाली ने उनके नाम और पते संबंधी कोई सत्यापन रिपोर्ट अग्रेषित नहीं की, और संपूर्ण प्रक्रिया से यह स्पष्ट होता है कि उत्पाद कानून के तहत वाहनों की जब्ती और नीलामी के मामलों को संभालने में अधिकारियों का रवैया लापरवाहीपूर्ण था।
दूसरी ओर, राज्य ने की गई कार्रवाई का बचाव किया। राज्य का कहना था कि जब्ती और नीलामी, बिहार के सभी जिलाधिकारियों को तत्कालीन अतिरिक्त सचिव, मद्य निषेध, उत्पाद एवं निबंधन विभाग द्वारा 25.01.2023 को निर्गत पत्र संख्या 633 के निर्देशों के तहत चल रही सामूहिक कार्यवाहियों का एक हिस्सा थी। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता अपने अधिकारों के प्रति सतर्क नहीं थे और उन्होंने बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद नियमावली, 2021 के नियम 12A के तहत अपने वाहन की मुक्ति हेतु प्रपत्र-IV में कोई आवेदन नहीं दिया।
निर्णय देने से पहले, पटना उच्च न्यायालय ने बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 तथा बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद नियमावली, 2021 के संबंधित वैधानिक प्रावधानों का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया। विशेष रूप से उसने अधिनियम की धाराओं 47, 57B, 58, 61, 92, 93, 95 तथा नियमावली के नियम 12A का संदर्भ लिया।
धारा 47 उन व्यक्तियों के दंड से संबंधित है, जो किसी वाहक (परिवहन साधन) पर नियंत्रण या उसका उपयोग करने की स्थिति में होते हुए, उसे अधिनियम के तहत किसी अपराध के कमीशन के लिए जानबूझकर प्रयुक्त होने की अनुमति देते हैं। धारा 57B (जो 2022 में जोड़ी गई) कलेक्टर द्वारा निर्धारित दंड राशि के भुगतान पर जब्त वाहन या परिसरों की रिहाई की अनुमति देती है और यह प्रावधान लंबित जब्ती कार्यवाहियों पर भी लागू होता है।
धारा 58, जब्ती की प्रक्रिया निर्धारित करती है। यह अनिवार्य करती है कि जब्ती करने वाला अधिकारी तुरंत जिला कलेक्टर को रिपोर्ट भेजे। रिपोर्ट प्राप्त होने पर, यदि कलेक्टर इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अधिनियम के तहत कोई अपराध किया गया है, तो वह जब्ती का आदेश दे सकता है, परंतु ऐसा केवल धारा 58(3) के अंतर्गत संबंधित व्यक्ति को उचित सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद ही किया जा सकता है।
धारा 61 के अनुसार, धारा 58 के अंतर्गत पारित जब्ती आदेश के अंतिम रूप से प्रभावी हो जाने पर, संपत्ति सभी भार-मुक्त रूप से राज्य सरकार में निहित हो जाती है। धाराएँ 92 और 93 उत्पाद विभाग की अपील और पुनरीक्षण की रूपरेखा प्रदान करती हैं, जबकि धारा 95 राज्य सरकार को नियम बनाने का अधिकार देती है, जिसके अंतर्गत बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद नियमावली, 2021 बनाई गई है।
नियम 12A (जो 2022 में ही जोड़ा गया) दंड के भुगतान पर वाहनों एवं वाहक साधनों की रिहाई से संबंधित है। यह स्वामी द्वारा प्रपत्र-IV में आवेदन की अपेक्षा करता है। साथ ही यह प्रावधान करता है कि यदि वाहन स्वामी का पता नहीं चलता या जब्ती की तिथि से 15 दिन के भीतर वह आगे नहीं आता, तो कलेक्टर अधिनियम के अनुसार वाहन की जब्ती एवं नीलामी की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
महत्वपूर्ण रूप से, नियम 12A(2) के अनुसार दंड निर्धारण करते समय प्राधिकारी को बरामद की गई शराब की मात्रा, वाहन स्वामी की संलिप्तता तथा बीमित मूल्य पर समुचित विचार करना अनिवार्य है। किसी भी स्थिति में दंड बीमित मूल्य के 10% से कम या 5 लाख रुपये से अधिक नहीं हो सकता।
इस वैधानिक ढाँचे से, न्यायालय ने वाहन की वैध जब्ती और जब्ती-आधारित कुर्की (कॉन्फिस्केशन) के लिए दो केंद्रीय शर्तें (युग्म पूर्वापेक्षाएँ) निकालीं:
पहली, यह कि वाहन का उपयोग अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध के कमीशन में किया गया हो, सामान्यत: अवैध शराब या मादक पदार्थों के परिवहन में (जैसा कि धारा 30 में आवृत है)। दूसरी, यह कि वाहन स्वामी की सहमति, जानकारी या सांठगांठ हो, या कम से कम इतना सामग्री हो कि स्वामी को आरोपी के रूप में पेश किया जा सके, जैसे धारा 47 के अंतर्गत उसकी संलिप्तता को आरोपित करना।
न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल इस तथ्य से कि किसी वाहन से शराब बरामद हुई है, स्वामी को दंडित करने या वाहन को जब्त/कुर्क करने का आधार नहीं बनता। स्वामी की संलिप्तता को या तो प्रत्यक्ष आरोपी के रूप में या अवैध परिवहन में अनुमति या सांठगांठ के साक्ष्य के माध्यम से सिद्ध किया जाना आवश्यक है।
इसी संदर्भ में, न्यायालय ने 07.02.2020 की एक सरकारी पत्र (पत्र संख्या 13/HC-06-55/2020-670) का भी उल्लेख किया, जो गृह विभाग सह मद्य निषेध, उत्पाद और निबंधन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव द्वारा सभी जिला कलेक्टरों एवं संबंधित अधिकारियों को जारी किया गया था। यह पत्र, पटना उच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती निर्णयों के आलोक में जारी हुआ था और इसमें स्पष्ट किया गया था कि जिन वाहनों से कोई शराब बरामद नहीं होती, उन्हें जब्त नहीं किया जाएगा, और यदि केवल चालक नशे में हो परन्तु उससे कोई शराब बरामद न हो, तो केवल चालक के विरुद्ध ही अधिनियम के अंतर्गत अभियोजन चलाया जाएगा। इससे यह प्रतीत होता है कि राज्य स्वयं मानता है कि जब्ती वास्तविक बरामदगी और विधिसम्मत आधार से ही जुड़ी होनी चाहिए।
मौजूदा मामले के तथ्यों पर लौटते हुए, न्यायालय ने पाया कि 26.12.2022 को ट्रक से 477 लीटर शराब बरामद होने पर ट्रक को जब्त कर लिया गया और चालक एवं खलासी को पकड़ लिया गया। चूँकि याचिकाकर्ता पंजीकृत स्वामी थे, अतः उनका नाम पुलिस कांड में आरोपी के रूप में शामिल कर लिया गया, यद्यपि वे घटनास्थल पर उपस्थित नहीं थे। तथापि, अभिलेखों में केवल वाहन के पंजीकरण उनके नाम पर होने के अतिरिक्त, उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संलिप्तता का कोई आरोप नहीं था।
इसके बाद न्यायालय ने जब्ती की प्रक्रिया की जाँच की। उसने पाया कि प्राधिकारियों ने, याचिकाकर्ता का नाम और पता जिला परिवहन पदाधिकारी से सत्यापित करने का कष्ट नहीं किया, जबकि यह किया जा सकता था। इसके विपरीत, उन्होंने बिहार के एक “तुच्छ” स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित नोटिस पर ही भरोसा कर लिया, जबकि स्वामी मुंबई में रहते थे और वाहन के पास राष्ट्रीय परमिट था। न्यायालय ने इसे केवल औपचारिकता माना, न कि धारा 58(3) के अनुसार सुनवाई का वास्तविक एवं युक्तिसंगत अवसर देने का प्रयास।
न्यायालय ने वाहन के बीमित मूल्य पर भी ध्यान दिया। बीमा कागजात से यह स्पष्ट था कि जब्ती की तिथि (26.12.2022) को ट्रक का बीमित मूल्य 21 लाख रुपये था। नीलामी की तिथि 29.09.2023 को बीमित मूल्य 9,47,893 रुपये था। इसके बावजूद, वाहन मात्र 2.2 लाख रुपये में नीलाम कर दिया गया, जिसे न्यायालय ने “throwaway price” (बहुत ही कम/औने-पौने दाम) की संज्ञा दी।
19.03.2025 को, इसी रिट याचिका की पूर्ववर्ती कार्यवाहियों में, पटना उच्च न्यायालय पहले ही यह अवलोकन कर चुका था कि अधिकारियों ने नीलामी मूल्य निर्धारण में गलती की है। उसने निबंधन एवं मद्य निषेध विभाग, पटना के प्रधान सचिव को संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध एक आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। साथ ही, बिहार राज्य को यह आदेश दिया गया था कि वह 8 सप्ताह के भीतर 21 लाख रुपये (जब्ती के समय का बीमित मूल्य) न्यायालय के रजिस्ट्री में जमा करे।
राज्य ने इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विशेष अनुमति याचिका (नागर) संख्या 12926/2025 में चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने 07.05.2025 को इस विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप उच्च न्यायालय के निर्देश यथावत रहे।
इसके बाद, पटना उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में, राज्य ने एक प्रत्युत्तर हलफनामा दाखिल किया, जिसमें यह उल्लेख किया गया कि 21,00,000/- रुपये की राशि का डिमांड ड्राफ्ट (DD संख्या 634446 दिनांक 12.05.2025, पंजाब नेशनल बैंक) माननीय उच्च न्यायालय, पटना के रजिस्ट्रार जनरल के पक्ष में जारी किया गया है।
इन समस्त तथ्यों पर विचार करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि वाहन की विधिसम्मत जब्ती और जब्ती-आधारित कुर्की के लिए आवश्यक युग्म पूर्वापेक्षाएँ इस मामले में पूर्ण नहीं हुईं। यद्यपि ट्रक से शराब बरामद हुई, परंतु याचिकाकर्ता की सहमति, जानकारी या सांठगांठ को दर्शाने वाला कोई ठोस सामग्री उपलब्ध नहीं था। साथ ही, जब्ती से पूर्व उचित सुनवाई के अवसर की वैधानिक अनिवार्यता का स्पष्ट उल्लंघन हुआ।
न्यायालय ने यह घोषित किया कि 20.02.2023 का जब्ती आदेश मनमाना है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन करता है और याचिकाकर्ता के संपत्ति के संवैधानिक अधिकार, अनुच्छेद 300A, का हनन करता है, जो बिना विधि के प्राधिकार के संपत्ति से वंचित किए जाने से संरक्षण प्रदान करता है। न्यायालय ने माना कि बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016, इस मामले के तथ्यों पर, जिस प्रकार से जब्ती और कुर्की की गई, उसकी अनुमति नहीं देता।
चूँकि वाहन पहले ही नीलाम हो चुका था और उसे वस्तुरूप में वापस नहीं दिया जा सकता था, न्यायालय ने एक मौद्रिक उपाय (धनराशि-आधारित राहत) तैयार की। उसने पटना उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि 21 लाख रुपये की राशि वाला डिमांड ड्राफ्ट, जो जब्ती की तिथि के अनुसार बीमित मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है, याचिकाकर्ता के पक्ष में जारी किया जाए।
उसी समय, न्यायालय ने यह तथ्य भी ध्यान में रखा कि वास्तव में वाहन से 477 लीटर शराब बरामद हुई थी। धारा 57B और नियम 12A की दंड संबंधी रूपरेखा को लागू करते हुए, न्यायालय ने याचिकाकर्ता को अधिकतम 5,00,000/- रुपये का दंड संबंधित प्राधिकारी के समक्ष जमा करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता को यह भी निर्देशित किया गया कि वे उक्त जमा की रसीद, 21 लाख रुपये की रिहाई के लिए, रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष प्रस्तुत करें।
न्यायालय ने लचीलापन भी प्रदान किया: याचिकाकर्ता को 8 सप्ताह के भीतर 5 लाख रुपये राज्य कोष में जमा करने होंगे। वैकल्पिक रूप से, राज्य द्वारा पहले से जमा 21 लाख रुपये की राशि में से 5 लाख रुपये सरकार को और शेष 16 लाख रुपये याचिकाकर्ता को दिए जा सकते हैं, यदि 5 लाख रुपये के दंड के भुगतान को इस प्रकार समायोजित किया जाए।
इन निर्देशों के साथ, रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन वाहन स्वामियों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके ट्रक या वाणिज्यिक वाहन, बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के अंतर्गत जब्त कर लिए जाते हैं।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार, स्वामी को उचित रूप से सूचना दिए बिना और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर प्रदान किए बिना, केवल जब्ती और नीलामी की औपचारिक कार्यवाही नहीं कर सकती। जब परिवहन अभिलेखों में स्वामी की पहचान और पता उपलब्ध हो, तो किसी दूरस्थ जिले के स्थानीय समाचार पत्र में औपचारिक प्रकाशन पर्याप्त नोटिस नहीं माना जाएगा।
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि केवल इस आधार पर कि किसी वाहन से शराब बरामद हुई है, स्वामी को स्वतः दंडित नहीं किया जा सकता और न ही उसका वाहन खोया हुआ माना जा सकता। प्राधिकारियों को यह दिखाना होगा कि स्वामी की संलिप्तता, सहमति या सांठगांठ थी, या उन्होंने अवैध उपयोग को बढ़ावा दिया। यदि स्वामी ने वाहन महज किराये पर दिया हो और अपराध में उसकी कोई भूमिका न हो, तो बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के वाहन को जब्त करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 300A का उल्लंघन होगा।
एक अन्य व्यावहारिक पहलू न्यायालय का मूल्यांकन और दंड के प्रति दृष्टिकोण है। कई लाख रुपये मूल्य वाले वाहन को बिना उचित प्रक्रिया के उसके मूल्य के छोटे से अंश पर नीलाम करना, अधिकारियों को आपराधिक कार्रवाई के प्रति और राज्य को भारी क्षतिपूर्ति के प्रति उजागर कर सकता है। साथ ही, न्यायालय ने यह भी पुष्टि की कि जब वास्तव में शराब बरामद हो, तब भी अधिनियम के तहत पर्याप्त दंड लगाया जा सकता है, भले ही पूर्ण जब्ती को रद्द कर दिया जाए।
ट्रक स्वामियों और परिवहन संचालकों के लिए, पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय यह दर्शाता है कि वे मनमानी जब्ती और कम मूल्य पर की गई नीलामी को चुनौती दे सकते हैं, विशेषकर जब उन्हें उचित नोटिस या सुनवाई नहीं दी गई हो और अपराध में उनकी संलिप्तता सिद्ध न हो।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
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प्रश्न: क्या बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के अंतर्गत, याचिकाकर्ता के ट्रक की जब्ती और नीलामी, बिना उचित नोटिस और स्वामी की संलिप्तता के प्रमाण के, वैध और विधिक रूप से सही थी?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि जब्ती आदेश मनमाना था, अनुच्छेद 14 और 300A का उल्लंघन करता था और विधि के प्राधिकार के बिना था। न्यायालय ने जब्ती को रद्द कर दिया और वैधानिक दंड के अधीन, मौद्रिक क्षतिपूर्ति का आदेश दिया। -
प्रश्न: बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के अंतर्गत किसी वाहन की वैध जब्ती और कुर्की के लिए किन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि दो पूर्वापेक्षाएँ पूर्ण होनी चाहिए: (1) वाहन का उपयोग अधिनियम के उल्लंघन में शराब या मादक पदार्थों के परिवहन के लिए किया गया हो, और (2) स्वामी की सहमति, जानकारी या सांठगांठ हो, या कम से कम उसे आरोपी के रूप में पेश करने के लिए पर्याप्त आधार हो। इसके अतिरिक्त, धारा 58(3) के अधीन स्वामी को उचित सुनवाई का अवसर दिया जाना अनिवार्य है। -
प्रश्न: जब जब्त वाहन पहले ही नीलाम हो चुका हो, तब न्यायालय को दंडात्मक प्रावधानों और संपत्ति के अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाना चाहिए?
उत्तर: न्यायालय ने वाहन के बीमित मूल्य (21 लाख रुपये) का भुगतान स्वामी को क्षतिपूर्ति के रूप में करने का निर्देश दिया, साथ ही स्वामी पर 5 लाख रुपये के अधिकतम वैधानिक दंड का भार रखा, जिसे या तो अलग से जमा करना था या न्यायालय में जमा 21 लाख रुपये में से समायोजित किया जाना था।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय के इस अंश में किसी विशेष पूर्ववर्ती वाद का नाम या संदर्भ संख्या (citation) उल्लेखित नहीं है। न्यायालय ने सामान्य रूप से पटना उच्च न्यायालय के “विभिन्न न्यायिक निर्णयों” तथा उन निर्णयों के आलोक में 07.02.2020 को जारी एक सरकारी पत्र का उल्लेख किया है, परंतु किसी विशिष्ट प्रतिवेदित वाद का नाम नहीं बताया है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकारिता मामला संख्या 18561 वर्ष 2023
वाद का शीर्षक: Sharad Navnath Gange v. The State of Bihar & Ors.
उद्धरण (Citation): 2025 (2) PLJR 431
पीठ (Coram): माननीय कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश; माननीय श्री न्यायमूर्ति एस. बी. Pd. सिंह (CAV निर्णय माननीय श्री न्यायमूर्ति एस. बी. Pd. सिंह द्वारा)
निर्णय की तिथि: 01.09.2025
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
वकील:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री देव प्रकाश सिंह
- प्रतिवादी (राज्य) की ओर से: श्री माधव Pd. यादव (GP 23)
मामले का स्वरूप: बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम, 2016 के अंतर्गत मद्य निषेध जब्ती प्रकरण में जब्ती एवं नीलामी आदेश को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिका।
चुनौतीित आदेश: प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा मद्य निषेध जब्ती प्रकरण संख्या 04/2023 में पारित 20.02.2023 का आदेश तथा महुआ, वैशाली के अवर समाहर्ता द्वारा पारित 29.09.2023 का परिणामी नीलामी आदेश।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के इस पूर्ण निर्णय को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
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