निर्णय की सरल व्याख्या
पटना उच्च न्यायालय ने बिहार राज्य सजा रिमिशन बोर्ड के उन आदेशों को रद्द कर दिया जिनमें आजीवन कारावास की सजा काट रहे बंदियों की समयपूर्व रिहाई (premature release) की अर्जी को अस्वीकार कर दिया गया था। न्यायालय ने कहा कि राज्य बोर्ड ने इन मामलों को गलत नीति के आधार पर खारिज किया है और अब उन्हें सही नीति के अनुसार दोबारा विचार करना होगा।
यह फैसला माननीय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद द्वारा 22 दिसंबर 2022 को दो आपराधिक रिट याचिकाओं—Cr.W.J.C. No. 861 of 2021 और Cr.W.J.C. No. 1310 of 2022—में दिया गया। दोनों याचिकाओं में समान मुद्दा था कि सजा रिमिशन बोर्ड ने 2002 की नीति लागू करके रिहाई की अर्जी ठुकराई, जबकि 2002 की नीति वास्तव में 2007 तक लागू ही नहीं हुई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे और लगभग 20 वर्ष जेल में बिता चुके थे। उन्होंने समयपूर्व रिहाई की अर्जी दी थी। जेल प्रशासन ने इस प्रस्ताव को राज्य सजा रिमिशन बोर्ड के पास भेजा, लेकिन बोर्ड ने पुलिस और ट्रायल कोर्ट के कथित “नकारात्मक मत” के आधार पर अर्जी को अस्वीकार कर दिया।
राज्य का तर्क था कि 10 दिसंबर 2002 की रिमिशन नीति (2002 नीति) लागू थी और उस नीति के अनुसार “योजनाबद्ध या संगठित हत्या” (planned or organized murder) करने वाले दोषियों को समयपूर्व रिहाई का लाभ नहीं दिया जा सकता।
याचिकाकर्ता का तर्क था:
- 2002 की नीति 2007 तक लागू नहीं हुई थी।
- 2002 और 2007 के बीच जिन दोषियों के मामले आए, उन्हें 1984 की नीति के तहत रिहाई का लाभ दिया गया।
- ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहीं नहीं कहा था कि हत्या “योजनाबद्ध या संगठित” थी। इसलिए बोर्ड का यह कहना गलत था।
न्यायालय ने राज्य से जवाब मांगा तो यह स्वीकार किया गया कि सजा रिमिशन बोर्ड की पहली बैठक 25 सितंबर 2007 को हुई थी। उससे पहले तक जेल अधीक्षक (Superintendent) पुराने 1984 नियमों के तहत मामलों पर विचार करते थे। इस अवधि में जिन दोषियों के मामले आए, उन्हें भी उसी नीति के आधार पर राहत मिली थी।
इससे यह साबित हुआ कि 2002 की नीति कागज पर तो थी, लेकिन व्यवहार में 2007 तक लागू नहीं हुई थी। इसलिए 2006 में दोषसिद्ध याचिकाकर्ता को 1984 की नीति के अनुसार ही देखा जाना चाहिए था।
न्यायालय ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट के निर्णय में “योजनाबद्ध हत्या” का कोई उल्लेख नहीं है। केवल डिक्शनरी से शब्दों का अर्थ निकालकर किसी व्यक्ति को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जब तक ट्रायल कोर्ट ने विशेष रूप से यह नहीं कहा कि अपराध “संगठित” या “पूर्व नियोजित” था, तब तक ऐसी धारणा नहीं बनाई जा सकती।
न्यायालय ने पुलिस रिपोर्ट को भी अस्पष्ट और अटकलों पर आधारित बताया। रिपोर्ट में कहा गया था कि रिहाई पर “कुछ अनहोनी” हो सकती है। लेकिन इस तरह की आशंका मात्र को रिहाई रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता। दूसरी ओर, प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट में कहा गया कि बंदी का जेल में आचरण अच्छा रहा है। न्यायालय ने कहा कि प्रोबेशन अधिकारी का आकलन अधिक विश्वसनीय होता है क्योंकि वह जेल में कैदी के व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से देखता है।
इन सभी कारणों से न्यायालय ने बोर्ड का निर्णय रद्द कर दिया और आदेश दिया कि:
“राज्य सजा रिमिशन बोर्ड एक माह के भीतर बैठक करे और याचिकाकर्ता के मामले पर सही नीति के अनुसार पुनर्विचार करे।”
इस निर्णय से यह सिद्ध हुआ कि रिमिशन या समयपूर्व रिहाई राज्य का उपकार नहीं, बल्कि न्यायसंगत प्रक्रिया से मिलने वाला अधिकार है।
निर्णय का महत्व और इसका प्रभाव आम जनता या सरकार पर
यह फैसला न केवल जेल प्रशासन के लिए बल्कि आम जनता के लिए भी महत्वपूर्ण है।
- न्याय में समानता का सिद्धांत: अदालत ने दोहराया कि समान परिस्थितियों में लोगों को अलग-अलग नीति से नहीं देखा जा सकता। अगर किसी को 1984 नीति के तहत राहत मिली, तो उसी अवधि के दूसरे दोषियों को भी वही लाभ मिलना चाहिए।
- सरकार के लिए मार्गदर्शन: प्रशासनिक विलंब या नीति लागू होने में देरी का खामियाजा किसी कैदी को नहीं भुगतना चाहिए। यह फैसला सरकार को याद दिलाता है कि नीतियों के संक्रमणकाल में भी समानता और पारदर्शिता जरूरी है।
- पुलिस रिपोर्ट की विश्वसनीयता: न्यायालय ने कहा कि केवल अनुमान या आशंका आधारित पुलिस रिपोर्ट को अंतिम मानकर किसी की स्वतंत्रता सीमित नहीं की जा सकती।
- अच्छे आचरण को महत्व: यदि बंदी का जेल में व्यवहार अच्छा रहा है और पुनर्वास की संभावना है, तो उसे दूसरा मौका मिलना चाहिए।
कानूनी मुद्दे और निर्णय (बुलेट में)
- क्या 2002 की नीति उन दोषियों पर लागू होगी जिनके मामले 2007 से पहले आए?
❌ नहीं। न्यायालय ने कहा कि जब तक रिमिशन बोर्ड 2007 में कार्यशील नहीं हुआ, तब तक 1984 की नीति ही लागू मानी जाएगी। - क्या “योजनाबद्ध हत्या” का आधार ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष के बिना लिया जा सकता है?
❌ नहीं। यदि ट्रायल कोर्ट ने इसे योजनाबद्ध नहीं बताया, तो प्रशासन खुद से यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता। - क्या अस्पष्ट पुलिस रिपोर्ट के आधार पर रिहाई रोकी जा सकती है?
❌ नहीं। केवल “संभावना” या “आशंका” से किसी कैदी के अधिकार पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। - क्या समान परिस्थितियों वाले दोषियों को अलग-अलग नीति से देखा जा सकता है?
❌ नहीं। समानता का सिद्धांत (Article 14) इसका विरोध करता है।
पार्टियों द्वारा संदर्भित निर्णय
- Surendra Mahto v. State of Bihar, 2021 (4) PLJR 393
- Dr. G. Sadasivan Nair v. Cochin University of Science & Technology, (2022) 4 SCC 404
- Ram Chander v. State of Chhattisgarh, 2022 SCC OnLine SC 500
- Division Bench: Cr.W.J.C. No. 748 of 2017 (Chandra Kant Kumar case)
न्यायालय द्वारा उपयोग में लाए गए निर्णय
- Chandra Kant Kumar v. State of Bihar (Cr.W.J.C. No. 748 of 2017) — जिसमें कहा गया था कि बोर्ड 2007 में बना, इसलिए 2002 से 2007 के बीच के मामलों में 1984 नीति लागू होगी।
- Surendra Mahto v. State of Bihar, 2021 (4) PLJR 393 — इसी तर्क को अपनाते हुए राहत दी गई थी।
- Dr. G. Sadasivan Nair, (2022) 4 SCC 404 — समानता के सिद्धांत पर जोर देने वाला सुप्रीम कोर्ट का निर्णय।
मामले का शीर्षक
Criminal Writ Jurisdiction Case No. 861 of 2021 with Criminal Writ Jurisdiction Case No. 1310 of 2022
केस नंबर
Cr.W.J.C. No. 861 of 2021; Cr.W.J.C. No. 1310 of 2022
उद्धरण (Citation)
2023 (1) PLJR 384
न्यायमूर्ति गण का नाम
माननीय न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद
वकीलों के नाम और किनकी ओर से पेश हुए
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री विजय कुमार सिंह, अधिवक्ता
- राज्य की ओर से: श्री प्रभु नारायण शर्मा, AC to AG
निर्णय का लिंक
MTYjODYxIzIwMjEjNCNO-VaoFI4yRvpI=
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