मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला गया जिला में दर्ज एफआईआर S.C./S.T. P.S. Case No. 08 of 2010 से उत्पन्न होता है। पुलिस मामला बाद में Sessions Trial No. 208 of 2015 के रूप में Exclusive Special Court, Special Judge (S.C./S.T. (POA) Act), Gaya के समक्ष विचारण हेतु भेजा गया।
अभियोजन के अनुसार, 01.03.2010 को लगभग शाम 5 बजे सूचनाकर्ता, जो कि अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाली एक महिला हैं, अपने घर पर थीं। आरोप था कि दो अभियुक्त, जिन्हें बाद में अपीलार्थी संख्या 2 और 3 के रूप में नामित किया गया, उनके घर में घुसने की कोशिश करने लगे। जब उन्होंने विरोध किया तो आरोप है कि उन्होंने उनकी जाति सूचक गालियाँ देकर अपमान किया।
एफआईआर में आगे कहा गया कि सभी अभियुक्त-अपीलार्थी बाद में लाठी और डंडा से लैस होकर आए, सूचनाकर्ता के घर की छत तोड़ दी, उन्हें और उनके परिजनों को जाति सूचक गालियाँ दीं तथा सूचनाकर्ता और उनकी पुत्रवधू के साथ मारपीट की।
इस एफआईआर के आधार पर अनुसंधान किया गया और आरोपपत्र समर्पित किया गया। मामला सत्र न्यायालय को समर्पित किया गया तथा भारतीय दंड संहिता और अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत विशेष न्यायाधीश द्वारा विचारित किया गया।
07.09.2016 के दोषसिद्धि निर्णय और दंडादेश द्वारा, विचारण न्यायालय ने सभी छह अभियुक्त-अपीलार्थियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 427 तथा Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act की धारा 3(1)(x)(xi) के तहत दोषसिद्ध किया।
उन्हें धारा 427 IPC के तहत एक वर्ष के साधारण कारावास की सजा दी गई। SC/ST (POA) Act की धारा 3(1)(x)(xi) के तहत प्रत्येक को तीन वर्ष के साधारण कारावास और 10,000/- रुपये जुर्माना की सजा दी गई, तथा जुर्माना अदा न करने की स्थिति में अतिरिक्त छह माह के साधारण कारावास का प्रावधान रखा गया।
इस दोषसिद्धि और सजा से आहत होकर, छहों दोषसिद्ध व्यक्तियों ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष Criminal Appeal (SJ) No. 866 of 2016 दायर की।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
यह अपील माननीय श्री न्यायमूर्ति प्रभात कुमार सिंह द्वारा सुनी गई। अपीलार्थियों की ओर से अधिवक्ता द्वारा और राज्य की ओर से माननीय अतिरिक्त लोक अभियोजक द्वारा पक्ष रखा गया। विधिवत समन की तामीली के बावजूद सूचनाकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।
उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण किया। अभियोजन ने कुल चार गवाहों को पेश किया था। ये चारों ही सूचनाकर्ता के निकट संबंधी थे।
P.W. 1 गया चौधरी थे, जो सूचनाकर्ता के पति हैं। न्यायालय ने नोट किया कि उनका बयान सामान्य और सर्वसमावेशी (omnibus) प्रकृति का था, जिसमें किसी विशेष अभियुक्त को कोई विशिष्ट कृत्य आरोपित नहीं किया गया था।
P.W. 2 सिकंदर चौधरी थे, जो P.W. 1 के भाई और सूचनाकर्ता के देवर (भाभी के देवर) हैं। न्यायालय ने देखा कि उनकी गवाही में अतिशयोक्ति थी तथा यह एफआईआर में दर्ज कथन की तुलना में भौतिक सुधारों (material improvements) से ग्रस्त थी।
P.W. 3 किरण देवी थीं, जो सूचनाकर्ता की पुत्रवधू और कथित रूप से घायल गवाह थीं। निर्णय में दर्ज है कि उनके बयान में अभियुक्तों द्वारा कथित रूप से ले जाए गए हथियारों के संबंध में सुधार दिखाई दिए।
P.W. 4 मुनकी देवी थीं, जो स्वयं सूचनाकर्ता हैं, और उन्होंने एफआईआर में वर्णित अभियोजन पक्ष की कहानी का समर्थन किया।
बचाव पक्ष की ओर से दो गवाहों की जिरह की गई: D.W. 1 कलावती देवी और D.W. 2 राजन चौधरी।
अपीलार्थियों की दलीलें
अपीलार्थियों के अधिवक्ता ने विचारण अभिलेख के आधार पर कई बिंदुओं पर दोषसिद्धि पर हमला किया।
सबसे पहले यह तर्क दिया गया कि न तो अन्वेषण अधिकारी की और न ही डॉक्टर की, अभियोजन द्वारा जिरह कराई गई। अपीलार्थियों के अनुसार, अन्वेषण अधिकारी की जिरह न होने से गंभीर प्रतिकूलता (prejudice) हुई क्योंकि बचाव पक्ष अभियोजन गवाहों से उनके पूर्व कथनों या अन्वेषण निष्कर्षों के आधार पर सही तरीके से जिरह नहीं कर सका। साथ ही, घटना स्थल और घटना की रीति (manner of occurrence) को भी उचित रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका।
डॉक्टर की जिरह और चोट के रिपोर्ट की प्रस्तुति के अभाव में, अपीलार्थियों ने तर्क दिया कि सूचनाकर्ता और उनकी पुत्रवधू पर हमला किए जाने के आरोप की पुष्टि नहीं हो सकी।
दूसरे, बचाव पक्ष ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला कि सभी अभियोजन गवाह सूचनाकर्ता के ही परिवार के सदस्य हैं और इस प्रकार अत्यधिक हितग्रही (interested) गवाह हैं। यह तर्क दिया गया कि उनकी गवाही, जो एफआईआर के मुकाबले अतिशयोक्ति और भौतिक सुधारों से युक्त है, अविश्वसनीय, संदिग्ध और अविश्वस्तनीय है।
तीसरे, अधिवक्ता ने एफआईआर दर्ज करने में सात दिन की देरी की ओर संकेत किया और यह तर्क दिया कि इस अत्यधिक देरी का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
चौथे, यह तर्क दिया गया कि कोई भी स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया, जबकि घटना कथित रूप से शाम 5 बजे त्योहार के मौसम में हुई थी जब सामान्यतः लोग आसपास रहते हैं।
पांचवें, अपीलार्थियों ने तर्क किया कि एफआईआर के अनुसार कथित घटना सूचनाकर्ता के घर के अंदर घटी। अतः उनके अनुसार, अभियोजन यह सिद्ध करने में असफल रहा कि कोई भी जानबूझकर जाति सूचक अपमान “public view” के भीतर हुआ, जो कि उस समय प्रचलित SC/ST (POA) Act की धारा 3(1)(x)(xi) का एक आवश्यक अवयव था।
इन आधारों पर अपीलार्थियों ने प्रस्तुत किया कि अभियोजन संदेह से परे मामला सिद्ध करने में विफल रहा और विचारण न्यायालय ने साक्ष्य में विद्यमान भौतिक विरोधाभासों की अनदेखी करते हुए उन्हें गलत तरीके से दोषसिद्ध कर दिया।
राज्य की ओर से प्रत्युत्तर
राज्य की ओर से उपस्थित माननीय अतिरिक्त लोक अभियोजक ने विचारण न्यायालय के निर्णय का समर्थन किया। उनका तर्क था कि अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य स्पष्ट रूप से अपीलार्थियों के दोष की ओर संकेत करते हैं, अभियोजन ने उनकी संलिप्तता सिद्ध कर दी है और धारा 427 IPC तथा SC/ST (POA) Act की धारा 3(1)(x)(xi) के तहत आरोप संदेह से परे सिद्ध हो चुके हैं। अतः राज्य के अनुसार, दोषसिद्धि में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
उच्च न्यायालय द्वारा साक्ष्य का मूल्यांकन
प्रतिद्वंद्वी पक्षों की दलीलों पर विचार करने और साक्ष्य व अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले।
सबसे पहले, न्यायालय ने नोट किया कि सभी अभियोजन गवाह सूचनाकर्ता के निकट संबंधी हैं और इस प्रकार अत्यधिक हितग्रही गवाह हैं। उनकी गवाही में एफआईआर के संस्करण की तुलना में भौतिक सुधार पाए गए। न्यायालय की दृष्टि में इससे उनकी गवाही अविश्वसनीय, संदिग्ध और अविश्वस्तनीय हो गई।
दूसरे, न्यायालय ने इस आरोप पर विचार किया कि घटना शाम 5 बजे त्योहार के मौसम में हुई थी। इसके बावजूद, अभियोजन कहानी का समर्थन करने या यह दिखाने के लिए कि घटना public view में हुई, कोई स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शी गवाह पेश नहीं किया गया।
न्यायालय ने इसे महत्वपूर्ण माना क्योंकि SC/ST (POA) Act की जिन धाराओं (धारा 3(1)(x)(xi)) के तहत दोषसिद्धि दर्ज की गई थी, उनके लिए आवश्यक है कि जाति सूचक गालियों द्वारा किया गया जानबूझकर अपमान या डराना-धमकाना public view में हो। इन परिस्थितियों में स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति का अर्थ, न्यायालय के विचार में, यह था कि अधिनियम के तहत अपराध का एक आवश्यक अवयव अनुपस्थित था।
तीसरे, न्यायालय ने अन्वेषण अधिकारी की जिरह न होने को गंभीरता से लिया। उसने माना कि इससे बचाव पक्ष को अत्यधिक प्रतिकूलता हुई क्योंकि बचाव पक्ष प्रलेखित साक्ष्य से वंचित रह गया और गवाहों को उनके पूर्व कथनों से सामना कराकर भौतिक विरोधाभासों की व्याख्या नहीं करा सका। साथ ही, बचाव पक्ष Evidence Act की धारा 145 के तहत उन्हें प्रभावी ढंग से प्रतिपरीक्षित (contradict) करने में भी असमर्थ रहा।
चौथे, न्यायालय ने देखा कि न तो डॉक्टर की जिरह की गई और न ही कोई चोट रिपोर्ट इस आरोप को पुष्ट करने के लिए प्रस्तुत की गई कि सूचनाकर्ता और उनकी पुत्रवधू पर हमला किया गया था।
पांचवें, साक्ष्य से यह भी प्रकट हुआ कि पक्षकारों के बीच पूर्व से ही दुश्मनी और भूमि विवाद विद्यमान था। ऐसे पृष्ठभूमि में, न्यायालय ने माना कि झूठा फँसाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
दंड प्रक्रिया में प्रमाण का मानदंड
पटना उच्च न्यायालय ने दंड विधि के स्थापित सिद्धांतों को दोहराया। उसने बल देकर कहा कि आपराधिक मामलों में, जहाँ अभियुक्तों के जीवन और स्वतंत्रता का प्रश्न हो, साक्ष्य का कठोर मानदंड अपेक्षित है। केवल यह पर्याप्त नहीं है कि अभियोजन की कहानी “सही हो सकती है”।
न्यायालय ने नोट किया कि मामला संदेह से परे सिद्ध होना चाहिए। मात्र संभावनाओं पर दोषसिद्धि आधारित नहीं की जा सकती। अभियुक्त की दोषसिद्धि सिद्ध करने का भार सदैव अभियोजन पर ही होता है। जब तक साक्ष्य न्यायालय को इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाता कि अभियोजन की कहानी “निश्चय ही सत्य है”, तब तक अभियुक्त संदेह का लाभ पाने का अधिकारी है।
इस मानदंड को तथ्यों पर लागू करते हुए, न्यायालय ने माना कि अभियोजन अपीलार्थियों का दोष संदेह से परे सिद्ध करने में “दुरंतर रूप से असफल” रहा।
अंतिम निर्णय
उपरोक्त निष्कर्षों के आलोक में, न्यायालय ने माना कि अपीलार्थी संदेह का लाभ पाने के अधिकारी हैं। अतः उसने Sessions Trial No. 208 of 2015, arising out of S.C./S.T. P.S. Case No. 08 of 2010 में Exclusive Special Court, Special Judge (S.C./S.T. (POA) Act), Gaya द्वारा 07.09.2016 को पारित दोषसिद्धि निर्णय और दंडादेश को, इन छह अपीलार्थियों के संदर्भ में, रद्द कर दिया।
न्यायालय ने मामले से संबंधित उनकी जमानत बांड की देयताओं से अपीलार्थियों को मुक्त कर दिया। परिणामस्वरूप, आपराधिक अपील स्वीकार कर ली गई और उसमें लंबित सभी अंतरिम याचिकाओं का निपटारा कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act और उससे संबंधित आपराधिक अपराधों के मामलों में यह पटना उच्च न्यायालय का निर्णय पीड़ितों और अभियुक्तों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
पहले, यह इस बात पर बल देता है कि न्यायालय दोषसिद्धि की पुष्टि से पहले मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्य की अपेक्षा करेंगे, विशेषकर तब जब सभी मुख्य गवाह निकट संबंधी हों और पूर्व से शत्रुता स्वीकार की गई हो। एफआईआर की तुलना में भौतिक सुधारों वाली हितग्रही गवाही को सावधानी से परखा जाएगा।
दूसरे, यह निर्णय अन्वेषण अधिकारी और चिकित्सकीय गवाहों की जिरह के महत्व को रेखांकित करता है। जब उन्हें पेश नहीं किया जाता, तो बचाव पक्ष अभियोजन मामले की परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण साधनों से वंचित हो जाता है। ऐसे अंतराल प्रायः युक्तिसंगत संदेह उत्पन्न कर सकते हैं और अभियुक्त की बरी होने का कारण बन सकते हैं।
तीसरे, कथित जाति सूचक अपमान के मामलों में, न्यायालय यह दोहराता है कि SC/ST (POA) Act की कुछ धाराओं के लागू होने के लिए अभियोजन को यह दिखाना होगा कि अपमान “public view” में किया गया था। केवल घर के अंदर गाली-गलौज के आरोप, बिना किसी स्वतंत्र गवाह के, पर्याप्त नहीं हो सकते।
अंततः, यह निर्णय यह भरोसा दिलाता है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था को संदेह से परे प्रमाण के मानदंड पर ही काम करना चाहिए, न कि संदेह या संभावनाओं पर। इससे सभी नागरिकों को लाभ होता है क्योंकि यह निष्पक्ष सुनवाई और आपराधिक आरोपों की सावधानीपूर्वक जांच को बढ़ावा देता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या अभियोजन ने संदेह से परे यह सिद्ध कर दिया था कि अपीलार्थियों ने IPC की धारा 427 के तहत शरारत (mischief) और SC/ST (POA) Act की धारा 3(1)(x)(xi) के तहत जाति आधारित अपराध किए?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि साक्ष्य अविश्वसनीय था, मुख्य गवाह हितग्रही थे और उन्होंने भौतिक सुधार किए थे, SC/ST Act का आवश्यक अवयव (public view) सिद्ध नहीं हुआ और अन्वेषण अधिकारी तथा डॉक्टर जैसे महत्वपूर्ण गवाहों की जिरह नहीं की गई। अतः अभियोजन संदेह से परे मामला सिद्ध करने में विफल रहा और अपीलार्थी संदेह का लाभ पाने के अधिकारी थे।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय के पाठ में किसी भी पूर्ववर्ती निर्णय का स्पष्ट रूप से उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं दिखाई देती।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Appeal (SJ) No. 866 of 2016; arising out of S.C./S.T. P.S. Case No. 08 of 2010; Sessions Trial No. 208 of 2015
मामला शीर्षक: Binni Singh & Ors. v. The State of Bihar & Anr.
उद्धरण: 2026 (3) PLJR 548
पीठ (Coram): Hon’ble Mr. Justice Prabhat Kumar Singh
पटना उच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि: 06.05.2026
विचारण न्यायालय: Exclusive Special Court, Special Judge (S.C./S.T. (POA) Act), Gaya
आरोपित अपराध: Indian Penal Code की धारा 427; Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act की धारा 3(1)(x)(xi)
अपील का परिणाम: दोषसिद्धि और दंडादेश रद्द; संदेह का लाभ देकर अपीलार्थियों को बरी किया गया; जमानत बांड की देयताएँ समाप्त; अपील स्वीकार।
अधिवक्ता: अपीलार्थियों की ओर से: Mr. Anil Kumar Saxena, Advocate. राज्य की ओर से: Mr. Sadanand Paswan, Additional Public Prosecutor. वैध समन के बावजूद सूचनाकर्ता/प्रतिवादी संख्या 2 की ओर से कोई उपस्थिति नहीं।
मामले का स्वरूप: SC/ST (POA) Act के तहत Special Judge द्वारा पारित दोषसिद्धि निर्णय और दंडादेश के विरुद्ध दायर एकल पीठ (single judge) में आपराधिक अपील।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के आधिकारिक निर्णय को देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
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