परीक्षा में कदाचार के कारण NIT पटना के प्रोफेसर की सेवा से बर्खास्तगी बरकरार — पटना उच्च न्यायालय, 2022

Shipra Sinha

Reviewed by: Shipra Sinha

License Number: BR/1674/2021

Shipra Sinha is a lawyer at Samvida Law Associates practicing family law and civil disputes. She represents clients in matrimonial matters, inheritance disputes, property-related family conflicts, and civil litigation before the Patna High Court and subordinate courts. Her practice handles family law proceedings and civil matters for individuals and families across Bihar.

इस मामले में NIT पटना के एक संकाय सदस्य ने Ph.D. परीक्षा में अनुचित साधनों का उपयोग करने के कारण की गई अपनी सेवा से बर्खास्तगी को चुनौती दी थी। पटना उच्च न्यायालय ने अनुशासनात्मक कार्यवाही को बरकरार रखा और हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। न्यायालय ने पाया कि कार्यवाही में कोई प्रक्रियात्मक अवैधता या पक्षपात नहीं था और यह भी माना कि दंड असंगत नहीं है। अंततः रिट याचिका खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता National Institute of Technology, Patna (NIT Patna) के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में Assistant Professor के रूप में कार्यरत थे। सेवा में रहते हुए ही उन्होंने उसी विभाग में Ph.D. कार्यक्रम में प्रवेश ले लिया।

मार्च 2014 में वे Ph.D. पाठ्यक्रम की Mid-Semester Examination में शामिल हुए। मूल्यांकन के दौरान एक परीक्षक ने उनकी उत्तर-पुस्तिका में गंभीर गड़बड़ी देखी। याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई उत्तर-पुस्तिका पर छपा कोड उस परीक्षा कक्ष में वितरित उत्तर-पुस्तिकाओं के कोड से मेल नहीं खाता था।

इस कारण से याचिकाकर्ता को एक नोटिस जारी किया गया जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने परीक्षा में अनुचित साधनों का उपयोग किया है। याचिकाकर्ता ने 29.04.2014 को उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि वे यह सत्यापित नहीं कर सके कि उनकी उत्तर-पुस्तिका पर छपा कोड कक्ष में अन्य उत्तर-पुस्तिकाओं के कोड से मेल खाता है या नहीं और इसलिए कदाचार का आरोप निराधार है।

मामले को NIT Patna की Unfair Means Committee को संदर्भित किया गया। समिति ने 13.03.2014 को आयोजित परीक्षाओं के अभिलेखों की जांच की। उसने पाया कि उस दिन की पूर्वाह्न सत्र में याचिकाकर्ता एक अन्य कक्ष में परीक्षक (invigilator) के रूप में तैनात थे। उस सत्र में एक विशेष कोड वाली 48 उत्तर-पुस्तिकाएँ जारी की गईं, लेकिन केवल 47 परीक्षार्थी उपस्थित हुए और 47 उत्तर-पुस्तिकाएँ वापस ली गईं। एक अनुपयोगी उत्तर-पुस्तिका गायब थी।

गायब उत्तर-पुस्तिका का कोड दोपहर सत्र में प्रयुक्त कोड से भिन्न था, जब याचिकाकर्ता स्वयं 13.03.2014 को Ph.D. पेपर “Power System Protection” में परीक्षार्थी के रूप में शामिल हुए। दोपहर सत्र में उन्होंने जो उत्तर-पुस्तिका जमा की, उस पर पूर्वाह्न सत्र की उसी गायब अनुपयोगी उत्तर-पुस्तिका का कोड अंकित था।

इस आधार पर समिति ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता ने पूर्वाह्न सत्र में परीक्षक रहते हुए अनुपयोगी उत्तर-पुस्तिका चोरी की, उसे उत्तरों से भर दिया और बाद में दोपहर की परीक्षा में उसे अपनी उत्तर-पुस्तिका के रूप में जमा कर दिया। यह देखते हुए कि वे स्वयं संकाय सदस्य भी थे, ऐसे आचरण को अत्यंत घोर कदाचार माना गया।

अनुचित साधनों का प्रयोग सिद्ध होने के कारण NIT Patna ने उनकी Ph.D. कोर्स में प्रवेश रद्द कर दिया और उन्हें संस्थान में Ph.D. कोर्स के लिए आवेदन करने से हमेशा के लिए प्रतिबंधित कर दिया। अपने उत्तर में याचिकाकर्ता ने उल्लेख किया कि इस कार्रवाई से उन्हें पहले ही मानसिक तनाव हुआ है और अनुरोध किया कि दंड देने के लिए आगे कोई विभागीय कार्यवाही शुरू न की जाए।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

उनके स्पष्टीकरण के बावजूद प्राधिकारी संतुष्ट नहीं हुए। 20.03.2015 की दिनांकित एक कारण बताओ नोटिस जारी की गई, जिसमें पूछा गया कि कदाचार के लिए उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। याचिकाकर्ता ने 31.03.2015 को उत्तर दिया, पुनः स्वयं को निर्दोष बताते हुए कहा कि उन्हें यह पता ही नहीं था कि उन्हें अलग कोड वाली उत्तर-पुस्तिका कैसे मिल गई।

इसके बाद औपचारिक विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। 21.09.2015 की दिनांकित आरोप-पत्र (memorandum of charges) याचिकाकर्ता को सौंपा गया। दो मुख्य आरोप तय किए गए:

पहला, कि 2014 में Mid-Semester Examination में परीक्षक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने पूर्वाह्न सत्र से एक खाली उत्तर-पुस्तिका अपने पास रख ली।

दूसरा, कि उन्होंने उसी उत्तर-पुस्तिका का उपयोग 13.03.2014 को दोपहर सत्र में अपने Ph.D. परीक्षा “Power System Protection” में किया। आरोप था कि वे उत्तर-पुस्तिका में पहले से लिखे हुए उत्तर लेकर आए और उसे एक bona fide परीक्षार्थी के रूप में जमा कर दिया।

आरोप-पत्र के साथ, याचिकाकर्ता को उन दस्तावेजों की सूची और गवाहों की सूची दी गई जिनके माध्यम से आरोपों को सिद्ध किया जाना था। उन्हें निर्देश दिया गया कि आरोप-पत्र प्राप्त होने के दस दिन के भीतर अपना उत्तर प्रस्तुत करें।

इसके पश्चात याचिकाकर्ता ने 28.09.2015 को NIT Patna के Director को पत्र लिखकर सूचीबद्ध दस्तावेजों की प्रतियां मांगीं ताकि वे अपना बचाव तैयार कर सकें। 07.10.2015 को उन्होंने Mid-Semester Examination का शेड्यूल और शिक्षकों का Invigilators’ Duty Chart भी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया।

याचिकाकर्ता के अनुसार ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। उनका आरोप था कि जांच जल्दबाजी में पूरी कर दी गई और उन्हें अपना बचाव करने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। Enquiry Officer ने 10.02.2016 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और याचिकाकर्ता को दोनों आरोपों में दोषी ठहराया।

जांच रिपोर्ट 28.02.2016 को याचिकाकर्ता को भेजी गई, जिसमें उनसे प्रस्तावित दंड की मात्रा के संबंध में अभ्यावेदन देने को कहा गया। अभिलेख के अनुसार यह संचार उन्हें 17.04.2017 को प्राप्त हुआ।

प्रतिवादियों ने न्यायालय के समक्ष कहा कि जांच पूरी होने के बाद याचिकाकर्ता ड्यूटी से अनुपस्थित रहने लगे। उनके उपलब्ध न होने के कारण NIT Patna के Board of Governors ने अपनी 12.12.2016 की बैठक में उनके अवगत कराने के लिए दैनिक समाचार पत्र में नोटिस प्रकाशित करने का निर्णय लिया।

Enquiry Officer की रिपोर्ट में दर्ज था कि घरेलू जांच की सभी औपचारिकताएँ पूरी की गई हैं और Board of Governors ने परिणाम को अनुमोदित कर दिया है। रिपोर्ट में पाया गया कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर पूर्वाह्न सत्र से एक खाली उत्तर-पुस्तिका ली और उसे दोपहर सत्र में अनधिकृत तथा बेईमान उपयोग के लिए रखा।

मामले को बाद में 15.02.2017 की चिट्ठी द्वारा Central Vigilance Commission (C.V.C.) को second-stage advice के लिए भेजा गया। C.V.C. ने पुष्टि की कि आरोप सिद्ध हो चुके हैं और उपयुक्त प्रमुख दंड (major penalty) देने की सलाह दी। याचिकाकर्ता को C.V.C. की सलाह के विरुद्ध अपना अभ्यावेदन देने के लिए आमंत्रित किया गया, परंतु ऐसा कोई अभ्यावेदन कभी दायर नहीं किया गया।

उनके बचाव को अविश्वसनीय मानते हुए अनुशासनिक प्राधिकारी ने सेवा से हटाने (removal from service) का दंड देने का निर्णय लिया। 05.10.2019 के आदेश द्वारा याचिकाकर्ता को इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग में Assistant Professor के पद से 15.10.2019 से प्रभावी रूप से हटा दिया गया।

पटना उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ता ने (i) 05.10.2019 के दंडादेश, (ii) 21.09.2015 के आरोप-पत्र, और (iii) उनसे उत्पन्न सभी अनुवर्ती कार्यवाहियों को चुनौती दी। उन्होंने कई आधार उठाए।

उन्होंने आरोप लगाया कि मांगे गए दस्तावेज उन्हें उपलब्ध नहीं कराए गए, अनुशासनात्मक कार्यवाही तुरंतबाजी में पूरी कर दी गई, Enquiry Officer (प्रतिवादी संख्या 4) व्यक्तिगत रूप से पक्षपाती थे क्योंकि वे Board of Governors के सदस्य भी थे और उन्होंने अपनी रिपोर्ट में दंड का सुझाव भी दिया था, और यह भी कि जांच Central Civil Services (Classification, Control and Appeal) Rules, 1965 के Rule 14 के तहत की गई, जो उनके अनुसार कार्यवाही शुरू होने के समय लागू ही नहीं था।

उन्होंने यह तर्क भी दिया कि उत्तर-पुस्तिका को पहले से नहीं लिखा जा सकता क्योंकि कोई भी परीक्षार्थी पहले से नहीं जानता कि प्रश्न क्या होंगे। अंत में उन्होंने कहा कि सेवा से हटाने का दंड कथित कदाचार की तुलना में अत्यधिक कठोर है।

न्यायालय ने सबसे पहले अनुचित साधनों से संबंधित तथ्यात्मक निष्कर्षों की जांच की। उसने ध्यान दिया कि 13.03.2014 को याचिकाकर्ता पूर्वाह्न सत्र में परीक्षक और दोपहर सत्र में परीक्षार्थी थे। पूर्वाह्न सत्र की एक अनुपयोगी उत्तर-पुस्तिका गायब थी। उस गायब उत्तर-पुस्तिका का कोड दोपहर सत्र में उपयोग किए गए कोड से भिन्न था। दोपहर सत्र में याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई उत्तर-पुस्तिका पर यही भिन्न कोड अंकित था। ये निष्कर्ष Unfair Means Committee की रिपोर्ट से लिए गए थे।

समिति ने यह भी नोट किया था कि याचिकाकर्ता ने एक ऐसे प्रश्न का उत्तर दिया जो दोपहर के प्रश्नपत्र में पूछा ही नहीं गया था, और यह कि उन्होंने परीक्षा शुरू होने के केवल तीस मिनट के भीतर ही अपनी उत्तर-पुस्तिका जमा करने का प्रयास किया। न्यायालय के लिए यह तथ्य इस निष्कर्ष को दृढ़ता से समर्थन देते थे कि उन्होंने चुराई हुई उत्तर-पुस्तिका पर पहले से उत्तर लिख रखे थे और उसे दोपहर की परीक्षा में लाए थे।

दस्तावेजों के प्रश्न पर न्यायालय ने देखा कि याचिकाकर्ता को उन दस्तावेजों की सूची दी गई थी जिनका उपयोग किया जाना था, जिनमें उनकी उत्तर-पुस्तिका, परीक्षकों की रिपोर्ट और Unfair Means Committee की निष्कर्ष-रिपोर्ट शामिल थीं। याचिकाकर्ता मुख्यतः invigilators’ duty chart और कुछ अन्य संबंधित अभिलेख चाहते थे। यह मान भी लिया जाए कि वे उपलब्ध नहीं कराए गए, तब भी न्यायालय ने माना कि इससे उन्हें कोई पूर्वाग्रह (prejudice) नहीं हुआ, क्योंकि कदाचार सिद्ध करने के लिए जो मुख्य दस्तावेज आवश्यक थे, वे उन्हें दे दिए गए थे और वे उस मामले से भली-भाँति अवगत थे जिसका उन्हें सामना करना था।

पक्षपात के आरोप के संबंध में न्यायालय ने इस दलील को अस्वीकार कर दिया। उसने पाया कि केवल Enquiry Officer और Board of Governors के सदस्य होने मात्र से व्यक्तिगत पक्षपात सिद्ध नहीं होता। Board of Governors में विभिन्न शैक्षणिक संकायों के सदस्य होते हैं और उनके निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। प्रतिवादी संख्या 4 द्वारा अपनी रिपोर्ट में दंड का सुझाव देना, सिद्ध कदाचार की गंभीरता के प्रति चिंता को ही दर्शाता है और इससे पक्षपात सिद्ध नहीं होता।

न्यायालय ने यह भी माना कि जांच जल्दबाजी में पूरी नहीं की गई थी। बल्कि, रिपोर्ट उन्हें पहले इसलिए नहीं सौंपी जा सकी क्योंकि याचिकाकर्ता ड्यूटी से अनुपस्थित थे, जिसके कारण अखबार में सार्वजनिक नोटिस जारी करना आवश्यक हो गया।

Central Civil Services (Classification, Control and Appeal) Rules, 1965 की प्रयोज्यता के संबंध में न्यायालय ने NITs को संचालित करने वाले Statutes की जांच की। National Institutes of Technology के प्रथम Statutes, दिनांक 23.04.2019 की धारा 24 में कहा गया था कि संस्थान के कर्मचारी Central Civil Services (Conduct) Rules, 1964 से शासित होंगे। धारा 25 में 21.07.2017 को किए गए संशोधन में यह स्पष्ट किया गया कि जब तक प्रत्येक संस्थान अपना स्वयं का code of conduct नहीं बना लेता, तब तक वह Central Civil Services (Classification, Control and Appeal) Rules, 1965 का पालन करेगा।

न्यायालय ने इस संशोधन को स्पष्टीकरणात्मक (clarificatory) करार दिया। उसने यह भी नोट किया कि Assistant Professor के रूप में याचिकाकर्ता की नियुक्ति 15.01.2014 को Ministry of Human Resource Development द्वारा जारी भर्ती नियमों के तहत हुई थी, जिनमें प्रावधान था कि Statutes द्वारा आच्छादित न किए गए मामलों में संबंधित Central Rules लागू होंगे। प्रथम Statutes की धारा 24(5) आचरण (conduct) को कवर करती थी, लेकिन अनुशासनात्मक कार्यवाही की प्रक्रिया या दंड लगाने की प्रक्रिया को नहीं। धारा 26 में भी कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं थी।

इसलिए Central Civil Services (Classification, Control and Appeal) Rules, 1965 में निहित प्रक्रिया और दंडों को याचिकाकर्ता पर, अन्य NIT कर्मचारियों की तरह, लागू किया गया। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ये नियम प्रक्रियात्मक प्रकृति के हैं, जो निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं और वास्तव में अनुशासनात्मक प्राधिकारियों पर ही दायित्व डालते हैं। न्यायालय ने पाया कि इन नियमों से याचिकाकर्ता को कोई हानि नहीं हुई; बल्कि उन्हें इन नियमों में निहित सुरक्षा-उपायों का लाभ मिला।

न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि आरोप-पत्र प्राप्त होने या जांच के दौरान याचिकाकर्ता ने कभी भी इन नियमों की प्रयोज्यता पर आपत्ति नहीं की। आपत्तियाँ पहली बार 29.08.2019 को उठाई गईं, जो 21.07.2017 को Statute में संशोधन किए जाने के बहुत बाद की बात है। यह देरी भी उनकी चुनौती को और कमजोर करती है।

न्यायालय इस तथ्य से अवगत था कि याचिकाकर्ता ने इससे पहले C.W.J.C. No. 19403 of 2016 के माध्यम से अपने Ph.D. प्रवेश की रद्दीकरण और स्थायी प्रतिबंध को चुनौती दी थी, जिसे 23.11.2017 को खारिज कर दिया गया था। इसके बावजूद न्यायालय ने स्वतंत्र रूप से यह विचार किया कि क्या सेवा से हटाने का दंड असंगत (disproportionate) था।

प्रशासनिक दंड के न्यायिक पुनरीक्षण पर स्थापित विधि लागू करते हुए न्यायालय ने Wednesbury test का हवाला दिया। न्यायालय ने माना कि उसकी भूमिका केवल यह जांचने तक सीमित है कि निर्णय अवैध तो नहीं, प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण तो नहीं, या उपलब्ध सामग्री पर कोई भी समझदार निर्णयकर्ता ऐसा दंड कभी नहीं दे सकता था, इतनी सीमा तक तो असंगत तो नहीं है।

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि सभी प्रासंगिक सामग्री पर विचार किया गया था और निर्णय bona fide था। अनुशासनात्मक प्राधिकारी के सामने कई वैकल्पिक दंड उपलब्ध थे, परंतु यह न्यायालय का काम नहीं है कि वह अपना पसंदीदा दंड चुनकर उसे आरोपित प्राधिकारी के निर्णय के स्थान पर रख दे।

यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता, जो कि संकाय सदस्य थे, ने परीक्षक (invigilator) के रूप में अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हुए अनुपयोगी उत्तर-पुस्तिका को अपने कब्जे में लिया और उसे Ph.D. परीक्षा में अपनी उत्तर-पुस्तिका के रूप में जमा किया, न्यायालय ने माना कि सेवा से हटाने का दंड उसकी अंतरात्मा को झकझोरने वाला नहीं है और न ही इसे विकृत (perverse) कहा जा सकता है। इसलिए हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं था।

तदनुसार, पटना उच्च न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी, बिना किसी लागत (costs) के आदेश के।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायालय शिक्षक द्वारा परीक्षा में किए गए कदाचार को अत्यंत गंभीरता से लेते हैं, विशेषकर जब यह invigilation जैसी आधिकारिक ड्यूटी के दुरुपयोग से जुड़ा हो। विश्वविद्यालयों और संस्थानों में कार्यरत संकाय सदस्यों और कर्मचारियों के लिए यह चेतावनी है कि परीक्षा-सामग्री के दुरुपयोग से सेवा से हटाने जैसे कठोरतम दंड का सामना करना पड़ सकता है।

यह यह भी स्पष्ट करता है कि जहां NIT जैसे राष्ट्रीय संस्थानों के अपने विस्तृत अनुशासनात्मक प्रावधान नहीं होते, वहाँ वे वैध रूप से Central Civil Services (Classification, Control and Appeal) Rules, 1965 का उपयोग कर सकते हैं। कर्मचारी बाद में यह दावा नहीं कर सकते कि ऐसे नियम लागू नहीं थे, यदि उन्होंने जांच के दौरान कभी आपत्ति नहीं की और उन्हें वास्तविक तौर पर कोई पूर्वाग्रह नहीं पहुँचा।

छात्रों और कर्मचारियों के लिए यह निर्णय यह समझाता है कि जहाँ उचित प्रक्रिया (due process) का पालन किया गया हो और उत्तर-पुस्तिका के कोड, ड्यूटी चार्ट और समिति की रिपोर्ट जैसी साक्ष्य स्पष्ट रूप से हेरफेर की ओर संकेत करती हों, वहाँ न्यायालय अनुशासनात्मक निष्कर्षों में आसानी से हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

कानूनी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या NIT Patna के Assistant Professor के विरुद्ध Ph.D. परीक्षा में अनुचित साधनों के उपयोग के संबंध में की गई विभागीय जांच में प्रक्रियात्मक खामियाँ, पक्षपात या दस्तावेजों की आपूर्ति न करने जैसी त्रुटियाँ थीं?
    उत्तर: पटना उच्च न्यायालय ने माना कि जांच घरेलू जांच की अपेक्षाओं के अनुरूप थी, कोई व्यक्तिगत पक्षपात सिद्ध नहीं हुआ, और कुछ दस्तावेज उपलब्ध न कराए जाने से याचिकाकर्ता को कोई पूर्वाग्रह (prejudice) नहीं पहुँचा।
  • प्रश्न: क्या अनुशासनात्मक कार्यवाही में NIT कर्मचारियों पर Central Civil Services (Classification, Control and Appeal) Rules, 1965 वैध रूप से लागू किए जा सकते थे?
    उत्तर: न्यायालय ने माना कि ये नियम सही रूप से लागू किए गए, क्योंकि NIT Statutes और भर्ती नियमों ने सेवा-शर्तों के लिए संबंधित Central Rules के उपयोग की अनुमति दी थी और बाद में Statute में किया गया संशोधन केवल स्पष्टीकरणात्मक था।
  • प्रश्न: क्या सेवा से हटाने का दंड, याचिकाकर्ता के विरुद्ध सिद्ध कदाचार की तुलना में असंगत (disproportionate) था?
    उत्तर: न्यायालय ने माना कि Wednesbury मानक लागू करने पर यह दंड अंतरात्मा को झकझोरने वाला नहीं है, विकृत (perverse) नहीं है, और न्यायिक पुनरीक्षण में इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • निर्णय में किसी विशेष पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णय का नाम या उद्धरण के साथ स्पष्ट उल्लेख या निर्भरता नहीं की गई है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 119 of 2020

मामले का शीर्षक: Alok Ranjan v. The National Institute of Technology Patna & Ors.

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार

निर्णय की तिथि: 07.02.2022

उद्धरण: 2022(1) PLJR 731

वकील: याचिकाकर्ता की ओर से – श्री शेखर सिंह, अधिवक्ता; श्री मनीष कुमार संख्या 2, अधिवक्ता। प्रतिवादियों की ओर से – श्री संजय कुमार गिरी, अधिवक्ता।

मामले की प्रकृति: विभागीय कार्यवाही और सेवा से हटाने के आदेश को चुनौती देते हुए सिविल रिट अधिकारिता के तहत दाखिल रिट याचिका।

निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTE5IzIwMjAjMSNO-WQkLdj22Txc=

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