मामले की पृष्ठभूमि
मामला याचिकाकर्ता दीपक धानुक, निवासी शाहपुर, जिला भोजपुर, से संबंधित मादक पदार्थ और आपराधिक मामलों से उत्पन्न हुआ।
उस पर आरोप था कि वह NCB अपराध क्र.29/2021, NDPS विशेष मामला क्र.26/2021 में संलिप्त था, जो 28.11.2021 को 315 ग्राम अल्प्राजोलम, 270 ग्राम मॉर्फिन और 500 ग्राम “पत्थर” की बरामदगी से संबंधित था। उस पर यह भी आरोप था कि वह NCB अपराध क्र.04/2022, NDPS विशेष मामला क्र.71/2022 में संलिप्त था, जो 26.01.2022 को 380 ग्राम हेरोइन की बरामदगी से संबंधित था।
उसका नाम सह-अभियुक्त मदन सिंह सोनधिया और विकास कुमार के NDPS अधिनियम की धारा 67 के अंतर्गत दिए गए बयानों के आधार पर सामने आया, और बाद में उसके भाई विनोद धानुक के कथित इकबालिया बयान के आधार पर भी। इसके अतिरिक्त, शाहपुर थाना कांड सं.448 वर्ष 2023 भी दर्ज था, जो भारतीय दंड संहिता की धारा 341, 323, 325, 307, 504 सहपठित धारा 34 के अंतर्गत पंजीकृत था।
NDPS अपराधों की गंभीरता के बावजूद, याचिकाकर्ता को नियमित जमानत प्राप्त हो गई। NDPS विशेष मामला क्र.71/2022 (NCB मामला क्र.04/22) में 04.07.2023 को क्रिमिनल मिस. सं.37896 वर्ष 2023 में जमानत दी गई। NDPS मामला क्र.57/2022 (NCB मामला क्र.29/2021) में 19.07.2023 को क्रिमिनल मिस. सं.40976 वर्ष 2023 में जमानत दी गई। शाहपुर थाना कांड सं.448 वर्ष 2023 में बाद में 09.02.2024 को क्रिमिनल मिस. सं.5567 वर्ष 2024 में जमानत प्रदान की गई।
इन आपराधिक मामलों के लंबित रहने के दौरान, भारत सरकार, वित्त मंत्रालय (PITNDPS इकाई) के संयुक्त सचिव ने 01.09.2023 दिनांकित निवारक निरोध आदेश पारित किया, जो मादक औषधियों और मन:प्रभावी पदार्थों की अवैध तस्करी की रोकथाम अधिनियम, 1988 (PITNDPS) की धारा 3(1) के तहत था। इस आदेश द्वारा याचिकाकर्ता को कथित अवैध तस्करी में उसकी भूमिका के कारण निरुद्ध करने का प्रस्ताव किया गया।
28.09.2023 को, याचिकाकर्ता को शाहपुर थाना कांड सं.448 वर्ष 2023 में हिरासत में लिया गया और 09.02.2024 तक जेल में रहा। इसी अवधि के दौरान, 17.10.2023 को, निरोध आदेश तथा निरोध के आधारों की प्रति उसे जेल में तामील की गई।
इसके पश्चात सरकार ने 03.11.2023 को PITNDPS की धारा 9(b) के तहत मामले को परामर्श बोर्ड को संदर्भित किया। बोर्ड को संदर्भ की जानकारी 11.11.2023 को याचिकाकर्ता को तथा 09.11.2023 को परामर्श बोर्ड को दी गई।
याचिकाकर्ता की पत्नी बबिता देवी ने 30.11.2023 दिनांकित विस्तृत प्रतिवेदन पंजीकृत डाक से भारत सरकार के संयुक्त सचिव को भेजा, जिसमें निरोध आदेश को वापस लेने का निवेदन किया गया था। इस प्रतिवेदन को भारत सरकार के उप सचिव द्वारा जारी 20.12.2023 दिनांकित ज्ञापन द्वारा अस्वीकार कर दिया गया।
परामर्श बोर्ड ने याचिकाकर्ता की सुनवाई की, एक बार अपनी बैठक स्थगित की, और अंतत: 22.12.2023 को अपनी राय दर्ज की। उसी राय पर भरोसा करते हुए, भारत सरकार के उप सचिव ने 01.01.2024 दिनांकित आदेश PITNDPS की धारा 9(f) सहपठित धारा 11 के तहत पारित किया, जिसके द्वारा निरोध की अवधि निरोध की तिथि 17.10.2023 से एक वर्ष के लिए पुष्टि की गई।
कहा गया कि यह पुष्टि आदेश 02.01.2024 को याचिकाकर्ता को तामील किया गया तथा पुन: 09.01.2024 और 07.04.2024 को मंडल कारा, आरा, भोजपुर में उसे सूचित किया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने निरोध और पुष्टि आदेशों को निरस्त करने के लिए पटना उच्च न्यायालय में क्रिमिनल रिट क्षेत्राधिकार मामला सं.650 वर्ष 2024 दायर किया।
न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया
माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडेय की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनीं। न्यायालय ने रेखांकित किया कि निवारक निरोध का उद्देश्य भावी संभावित अपराध को रोकना है, न कि अतीत के कृत्यों के लिए दंड देना; अत: प्रत्येक कार्यवाहीगत सुरक्षा को सख्ती से पालन करना अनिवार्य है। किसी भी छोटी सी गलती का लाभ बंदी को दिया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह उभर कर रखा कि वह केवल आठवीं कक्षा तक पढ़ा हुआ है और अंग्रेजी नहीं जानता। इसके बावजूद, निरोध आदेश, निरोध के आधार, उन पर निर्भर दस्तावेज और पुष्टि संबंधी कार्यवाही सभी अंग्रेजी में थे। यह तर्क दिया गया कि प्रतिनिधित्व करने का युक्तिसंगत अवसर तभी संभव है जब सभी सामग्री उस भाषा में उपलब्ध कराई जाए जिसे बंदी समझता हो, और केवल मौखिक रूप से हिंदी में समझा देना, जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर हो, पर्याप्त नहीं है।
अधिवक्ता ने आगे यह भी इंगित किया कि 01.09.2023 दिनांकित निरोध आदेश तथा उसके आधार केवल 17.10.2023 को ही तामील किए गए। PITNDPS के तहत, निरोध के आधार यथाशीघ्र, सामान्यत: पाँच दिनों के भीतर, और अपवादात्मक परिस्थितियों में लिखित कारणों सहित अधिकतम पंद्रह दिनों के भीतर संप्रेषित किए जाने चाहिए। 46 दिनों की देरी, बिना किसी अपवादात्मक कारण को अभिलेख पर दर्ज किए, अधिनियम का उल्लंघन मानी गई।
यह भी तर्क दिया गया कि निरोध प्राधिकारी द्वारा जिन महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर भरोसा किया गया, जैसे जमानत प्रार्थनापत्र और जमानत आदेश, उनकी प्रतियां पूर्ण रूप से हिंदी अनुवाद सहित उपलब्ध नहीं कराई गईं। कुछ दस्तावेज, जैसे रासायनिक जांच रिपोर्ट, शिकायत, तलाश (तलाशी) मेमो, पत्राचार, और जमानत आदेश, अंग्रेजी में ही रहे। इससे, यह दलील दी गई, याचिकाकर्ता प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं कर सका, जो संविधान के अनुच्छेद 22(5) का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि कथित गतिविधियों और निवारक निरोध के बीच कोई “जीवंत और निकट संबंध” (live and proximate link) नहीं था। NDPS मामलों में जमानत मिलने के बाद निरोध के आधारों में यह नहीं दिखाया गया कि वह पुन: किसी मादक पदार्थ नेटवर्क से जुड़ा या समान गतिविधियों में लिप्त हुआ। परामर्श और निरोध प्राधिकारियों ने, यह कहा गया, इस तथ्य की उपेक्षा की कि कठोर धारा 37 NDPS अधिनियम के बावजूद उसे नियमित जमानत मिल चुकी थी।
एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती 30.11.2023 दिनांकित बबिता देवी के प्रतिवेदन के निपटारे से संबंधित थी। 20.12.2023 दिनांकित अस्वीकृति ज्ञापन में मात्र यह लिखा था कि प्रतिवेदन पर विचार कर उसे अस्वीकार कर दिया गया है। उसमें उसके तीन पृष्ठों और 19 अनुच्छेदों में किए गए किसी भी विस्तृत तर्क या बिंदु पर चर्चा या उत्तर नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार यह एक अव्याख्यात्मक (non-speaking) आदेश था, जो मस्तिष्क के अनुप्रयोग के अभाव और प्रतिवेदन पर त्वरित एवं निष्पक्ष विचार करने के संवैधानिक दायित्व के उल्लंघन को दर्शाता है।
याचिकाकर्ता ने परामर्श बोर्ड की 22.12.2023 दिनांकित राय को भी अव्याख्यात्मक बताते हुए चुनौती दी। बोर्ड ने केवल यह उल्लेख किया कि उसने संदर्भ और अभिलेखों पर विचार किया, बंदी को सुना, और यह राय बनाई कि निरोध के लिए पर्याप्त आधार हैं। इस राय में प्रतिवेदन, जमानत आदेश या किसी तथ्यात्मक पहलू की चर्चा नहीं थी, न ही PITNDPS की धारा 9(c) की अपेक्षा के अनुसार पृथक अनुच्छेद में अपने तर्क स्पष्ट किए गए।
दूसरी ओर, भारत संघ ने तर्क दिया कि रिट याचिका ग्राह्य नहीं है और यह दावा किया कि सभी कार्यवाहियां पूर्ण रूप से विधि के अनुकूल हैं। कहा गया कि 17.10.2023 को मंडल कारा, आरा में उपाधीक्षक की उपस्थिति में निरोध आदेश तथा सभी सहायक दस्तावेज याचिकाकर्ता को तामील किए गए। यह भी दावा किया गया कि याचिकाकर्ता को अंग्रेजी दस्तावेजों और कार्यवाहियों के बारे में हिंदी में अवगत करा दिया गया था।
भारत संघ ने आगे तर्क दिया कि सह-अभियुक्तों द्वारा NDPS अधिनियम की धारा 67 के तहत दिए गए स्वैच्छिक बयानों, तथा 25.01.2022 दिनांकित याचिकाकर्ता के कथित इकबालिया बयान से उसकी संलिप्तता स्पष्ट होती है। उन्होंने IPC धाराओं के अंतर्गत अपराध क्र.13 वर्ष 2022 सहित उसके तथाकथित आपराधिक पूर्ववृत्त तथा याचिकाकर्ता और उसके भाई से लगभग रु.1,86,40,000/- मूल्य की कथित अवैध स्थावर संपत्ति की जब्ती का भी हवाला दिया।
अभिलेख का विश्लेषण करने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने नोट किया कि NCB मामलों में याचिकाकर्ता को प्रत्यक्ष रूप से मादक पदार्थों के कब्जे में नहीं पकड़ा गया था; उसका नाम केवल अन्य अभियुक्तों और उसके भाई के बयानों में सामने आया। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि आपराधिक मुकदमे में उसका वास्तविक दायित्व परीक्षण का विषय होगा, जहां उसे पहले से ही NDPS अधिनियम की धारा 37 के बावजूद नियमित जमानत मिल चुकी है।
देरी के निर्णायक मुद्दे पर, न्यायालय ने पाया कि 01.09.2023 दिनांकित प्रस्तावित निरोध आदेश और उसके आधार वास्तव में केवल 17.10.2023 को ही तामील किए गए थे, जिससे लगभग 46 दिनों की देरी हुई। अधिनियम के अनुसार सेवा पाँच दिनों के भीतर की जानी थी, जिसे लिखित कारणों के साथ अधिकतम पंद्रह दिनों तक बढ़ाया जा सकता था, जो यहाँ अनुपस्थित थे। केवल इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने निरोध को चुनौती देने का पर्याप्त मामला बना दिया है।
दस्तावेजों की आपूर्ति और भाषा के प्रश्न पर, न्यायालय ने सामग्री का परीक्षण किया और पाया कि कुछ दस्तावेजों का हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराया गया था, किंतु कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसे रासायनिक जांच रिपोर्ट, शिकायतपत्र, पत्राचार, जमानत आदेश, फोरेंसिक रिपोर्ट, और जामा-तलाशी से संबंधित दस्तावेजों का अनुवाद नहीं किया गया था। 17.10.2023 को याचिकाकर्ता को हिंदी में मौखिक रूप से अवगत कराने के भारत संघ के दावे का कोई समसामयिक अभिलेख या याचिकाकर्ता के हस्ताक्षरित अनुमोदन से समर्थन नहीं मिला।
न्यायालय ने जोर देकर कहा कि जहां स्वतंत्रता दांव पर हो, वहां निष्पक्षता की मांग है कि सभी दस्तावेज उस भाषा में अनुवादित किए जाएं जिसे बंदी जानता हो। इसके बिना वह आरोपों को प्रभावी ढंग से समझ या चुनौती नहीं दे सकता। P.U. Abdul Rahiman और A. Ahmad Kutty सहित पूर्व निर्णयों तथा दिल्ली उच्च न्यायालय के Sharafat Sheikh और Jasvinder Kaur के निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने माना कि प्रमुख दस्तावेजों के न दिए जाने और अनुवाद न किए जाने से अनुच्छेद 22(5) का उल्लंघन हुआ।
न्यायालय ने आगे माना कि जमानत मिलने के बाद याचिकाकर्ता के पुन: समान मादक पदार्थ संबंधी अपराधों में संलिप्त होने की संभावना दर्शाने वाली कोई स्पष्ट सामग्री उपलब्ध नहीं थी, जो निवारक निरोध को उचित ठहरा सके। पूर्व आचरण और वर्तमान निरोध के बीच “जीवंत और निकट संबंध” की आवश्यकता के संबंध में Sushanta Kumar Banik में दिए गए तर्कों को न्यायालय ने लागू योग्य पाया।
परामर्श बोर्ड के संदर्भ में, न्यायालय ने PITNDPS की धारा 9(c) एवं 22.12.2023 दिनांकित बोर्ड की राय का पुनरुत्पादन किया। न्यायालय ने माना कि राय अस्पष्ट और अव्याख्यात्मक थी, उसमें बबिता देवी के प्रतिवेदन का उल्लेख या विश्लेषण नहीं था, और न ही अधिनियम की अपेक्षा के अनुसार पृथक अनुच्छेद में अपनी राय को निर्दिष्ट किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के Nenavath Bujji के निर्णय का हवाला देते हुए न्यायालय ने रेखांकित किया कि परामर्श बोर्डों को गहन, स्वतंत्र जांच करनी चाहिए और वे यांत्रिक ढंग से कार्य नहीं कर सकते।
न्यायालय ने 20.12.2023 दिनांकित बबिता देवी के प्रतिवेदन को अस्वीकार करने वाले ज्ञापन का भी मूल्यांकन किया। यह एक नितांत संक्षिप्त अस्वीकृति पाई गई, जिसमें उसके विस्तृत बिंदुओं पर किसी प्रकार की तर्कपूर्ण विचार-विमर्श नहीं था। Smt. Icchu Devi Choraria, Kamla Kanyalal Khushalani, Pramod Singla तथा ORYX Fisheries (जिसमें अर्ध-न्यायिक कार्यों में कारक-सम्बद्ध आदेशों के सिद्धांतों का सार दिया गया) जैसे पूर्व निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने माना कि इस प्रकार की अव्याख्यात्मक अस्वीकृति मनमानी है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है।
चूंकि परामर्श बोर्ड की अव्याख्यात्मक राय ही केंद्र सरकार के 01.01.2024 दिनांकित पुष्टि आदेश का आधार थी, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि पुष्टि आदेश भी मनमाना और अस्थिर है। केंद्र सरकार ने मात्र यह कहा कि उसने बोर्ड की राय पर विचार किया है, जबकि वह राय स्वयं ही कारणों से विहीन थी और प्रतिवेदन पर विचार का परावर्तन नहीं करती थी।
समग्र रूप से, न्यायालय ने अनेक कार्यवाहीगत और संवैधानिक उल्लंघन पाए—निरोध के आधारों की विलंबित सेवा, दस्तावेजों का अपूर्ण अनुवाद और आपूर्ति, प्रतिवेदन की अव्याख्यात्मक अस्वीकृति, तथा परामर्श बोर्ड की गैर-विचारित राय। निवारक निरोध मामलों में अपेक्षित कठोर दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने माना कि निरोध आदेश बरकरार नहीं रह सकता।
तदनुसार, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई। भारत सरकार के उप सचिव द्वारा 01.01.2024 को पारित वह निरोध आदेश, जिसके द्वारा पूर्ववर्ती निरोध आदेश की पुष्टि की गई थी, को रद्द और निरस्त कर दिया गया। यह आदेश दिया गया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। लंबित अंतरिम प्रार्थना-पत्रों का निस्तारण कर दिया गया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय PITNDPS या इसी प्रकार के कानूनों के तहत निवारक निरोध का सामना कर रहे किसी भी व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार को प्रक्रिया के प्रत्येक चरण का कड़ाई से पालन करना होगा। यदि निरोध के आधारों की सेवा में देरी हो, यदि दस्तावेज बंदी की समझ में आने वाली भाषा में न दिए जाएं, या यदि प्रतिवेदनों को बिना कारण बताए अस्वीकार कर दिया जाए, तो निरोध आदेश निरस्त किया जा सकता है।
यह निर्णय उन लोगों की रक्षा करता है जो गरीब या कम शिक्षित हो सकते हैं, जैसे कि याचिकाकर्ता, जिसने केवल आठवीं तक शिक्षा प्राप्त की थी और अंग्रेजी नहीं जानता था। यह पुष्टि करता है कि प्राधिकारीगण को हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराना होगा और जब स्वतंत्रता दांव पर हो तो केवल मौखिक व्याख्या पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने यह भी याद दिलाया है कि परामर्श बोर्ड केवल औपचारिक मुहर लगाने वाले निकाय (rubber stamp) नहीं हैं। उन्हें सभी सामग्री, जिसमें प्रतिवेदन भी शामिल हैं, पर विचार कर विस्तृत और कारणयुक्त राय देनी होती है। इससे निवारक निरोध की शक्तियों के दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा उपाय मजबूत होते हैं।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
प्रश्न: क्या 01.09.2023 दिनांकित निरोध आदेश और उसके आधारों की याचिकाकर्ता को लगभग 46 दिनों बाद सेवा PITNDPS की आवश्यकताओं का उल्लंघन है?
उत्तर: हाँ। कानून पाँच दिनों के भीतर सेवा की अपेक्षा करता है, जिसे लिखित कारणों सहित अधिकतम पंद्रह दिनों तक बढ़ाया जा सकता है। ऐसे कोई कारण नहीं दिखाए गए, अत: देरी के कारण निरोध आदेश अवैध हो गया।
प्रश्न: क्या सभी सहायक दस्तावेजों और निरोध के आधारों की हिंदी में आपूर्ति और अनुवाद न किए जाने से याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 22(5) के अंतर्गत प्रभावी प्रतिनिधित्व के संवैधानिक अधिकार का हनन हुआ?
उत्तर: हाँ। कई प्रमुख दस्तावेज अंग्रेजी में ही रहे; मात्र मौखिक व्याख्या पर्याप्त नहीं थी। इससे अनुच्छेद 22(5) तथा निष्पक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ।
प्रश्न: क्या 22.12.2023 दिनांकित परामर्श बोर्ड की राय तथा 01.01.2024 दिनांकित केंद्र सरकार द्वारा प्रतिवेदन की अस्वीकृति और पुष्टि आदेश विधिसम्मत थे?
उत्तर: नहीं। दोनों ही आदेश अव्याख्यात्मक और बिना कारण के थे, जो मस्तिष्क के उचित अनुप्रयोग के अभाव को दर्शाते हैं। परामर्श बोर्ड PITNDPS की धारा 9(c) का पालन करने में विफल रहा और ऐसी राय पर आधारित केंद्र सरकार की पुष्टि मनमानी घोषित की गई।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Union of India v. Meera Mohideen, (1995) 4 SCC 51
- A. Ahmad Kutty v. Union of India, (1990) 2 SCC 1
- P.U. Abdul Rahiman v. Union of India and Others, 1991 Supp. (2) SCC 274
- Sushanta Kumar Banik v. State of Tripura & Others, 2022 SCC OnLine SC 1333
- Bhawarlal Ganeshmalji v. State of Tamil Nadu, (1979) 1 SCC 465
- Kamarunissa v. Union of India, (1991) SCC 128
- Veeramani v. State of T.N., (1994) 2 SCC 337
- Taimoor Khan @ Bhola @ Tamoor v. Union of India, 2024 SCC OnLine Del 416
- Kamla Kanyalal Khushalani v. State of Maharashtra, (1981) 1 SCC 748
- Smt. Icchu Devi Choraria v. Union of India, (1980) 4 SCC 531
- Sharafat Sheikh v. Union of India and Another, 2022 SCC OnLine Del 2725
- Jasvinder Kaur v. Union of India & Others, 2022 SCC OnLine Del 510
- Nenavath Bujji Etc. v. State of Telangana and Others, AIR 2024 SC 1610
- Pramod Singla v. Union of India and Others, 2023 SCC OnLine SC 374
- ORYX Fisheries Private Limited v. Union of India and Others, (2010) 13 SCC 427
- Kranti Associates (ORYX Fisheries में संदर्भित)
- Smt. Icchu Devi Choraria में संदर्भित सर्वोच्च न्यायालय के कई पूर्ववर्ती निर्णय (Niranjan Singh, Shaikh Hanif, Dulal Roy, Nizamuddin, Mohd. Alam, Khudiram Das)
मामले का विवरण
मामला संख्या: क्रिमिनल रिट क्षेत्राधिकार मामला सं.650 वर्ष 2024 (पुलिस थाना कांड सं.29 वर्ष 2021, गवर्नमेंट ऑफिशियल कम्प., जिला भोजपुर से उद्भूत)
मामले का शीर्षक: दीपक धानुक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य
उल्लेख: 2024 (4) PLJR 715
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति पी. बी. बजंथरी एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडेय
निर्णय की तिथि: 14.08.2024 (CAV तिथि 09.08.2024)
अधिवक्ता:
- याचिकाकर्ता की ओर से: श्री रवीन्द्र कुमार, अधिवक्ता; श्री संदीप कुमार पांडेय, अधिवक्ता
- राज्य बिहार की ओर से: श्री पी. एन. शर्मा, ए.सी. टू ए.जी.
- भारत संघ की ओर से: श्री सुभोद कुमार झा, वरिष्ठ CGC; सुश्री पारुल प्रसाद, CGC; श्री आदित्य आनंद, अधिवक्ता; श्री शैलेश आनंद, अधिवक्ता
मामले का स्वरूप: PITNDPS अधिनियम, 1988 की धारा 3(1) के तहत निवारक निरोध आदेश तथा धारा 9(f) के तहत उसकी पुष्टि को चुनौती देने वाली आपराधिक रिट याचिका।
निर्णय का लिंक (पटना उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट): पूर्ण निर्णय देखने के लिए यहाँ क्लिक करें
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