मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कृषि विभाग, बिहार सरकार में कृषि समन्वयक के पद पर नियुक्ति से उत्पन्न हुआ।
याचिकाकर्त्री ने हैदराबाद स्थित एक कृषि विश्वविद्यालय से बी.एससी. ( उद्यान विज्ञान ) की डिग्री प्राप्त की थी और पूर्व में 17.05.2010 से 18.07.2011 तक अनुबंध के आधार पर जिला कृषि कार्यालय, मधुबनी में विषय वस्तु विशेषज्ञ (सब्जेक्ट मैटर स्पेशलिस्ट) के रूप में कार्य किया था। बाद में वह पद समाप्त कर दिया गया और कृषि विज्ञान में स्नातक व्यक्तियों को कृषि समन्वयक के रूप में संलग्न किया जाने लगा। क्योंकि वह उद्यान विज्ञान की स्नातक थी, उसे उस समय संलग्न नहीं किया गया।
याचिकाकर्त्री पिछड़ा वर्ग (अनुसूची-II, नॉन-क्रीमी लेयर) से संबंधित है। 29.04.2015 को बिहार कर्मचारी चयन आयोग ने 4391 कृषि समन्वयकों की नियुक्ति के लिए विज्ञापन संख्या 02010115 जारी किया। इन पदों में से 781 पद अत्यंत पिछड़ा वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए और 131 पद पिछड़ा वर्ग की महिला अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित थे।
अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता मान्यता प्राप्त संस्था से कृषि विज्ञान, पशु विज्ञान, कृषि अभियांत्रिकी, उद्यान विज्ञान, वानिकी या डेयरी प्रौद्योगिकी में स्नातक की डिग्री थी। स्नातक परीक्षा के लिए अधिकतम 70 अंक (प्रतिशत के आधार पर) और कार्य-अनुभव के लिए अनुभव के वर्षों के अनुसार अधिकतम 30 अंक दिए जाने थे।
अभ्यर्थियों को 05.05.2015 से 29.05.2015 के बीच ऑनलाइन आवेदन करना था और बैंक चालान के माध्यम से शुल्क जमा करना था। साथ ही, आवेदन पत्र की हार्ड कॉपी और सहायक दस्तावेज आयोग को पंजीकृत डाक से भेजना भी अनिवार्य था। विज्ञापन की धारा 4 में आरक्षण के संबंध में विस्तृत शर्तें दी गई थीं, जिनमें परामर्श के समय जाति तथा नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना भी शामिल था।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्त्री ने समय पर आवेदन किया, शुल्क जमा किया और अपना ऑनलाइन आवेदन-पत्र प्रस्तुत किया। उसके स्नातक में 70.70% अंक थे। विज्ञापन की गणना पद्धति के अनुसार, उसने शैक्षणिक योग्यता के लिए 49.49 अंक (70.70 x 0.7) और एक वर्ष के प्रासंगिक अनुभव के लिए 10 अंक, कुल मिलाकर 59.49 अंक का दावा किया।
ऑनलाइन आवेदन के बाद उसने हार्ड कॉपी और दस्तावेज पंजीकृत डाक से भेजे। आयोग ने बाद में 17.03.2016 को प्रवेश-पत्र और परामर्श-पत्र अपलोड किए। उसे रोल संख्या 21509280 आवंटित की गई और 08.04.2016 को परामर्श के लिए बुलाया गया, साथ ही सभी प्रमाण-पत्रों की मूल प्रतियां लाने का निर्देश दिया गया।
वह 08.04.2016 को उपस्थित हुई और उसके दस्तावेजों की जांच की गई। आयोग ने बाद में 05.08.2016 को ज्ञापन संख्या 2198 द्वारा सफल अभ्यर्थियों का परिणाम प्रकाशित किया, परन्तु उसका नाम उसमें नहीं था, जबकि उसके अनुसार उससे कम अंक वाले अभ्यर्थी चयनित हो गए थे।
उसने 07.08.2016 को आयोग के अध्यक्ष/सचिव को अभ्यावेदन देकर यह आग्रह किया कि उसे महिला पिछड़ा वर्ग (WBC) अभ्यर्थी के रूप में माना जाए और परिणाम को संशोधित किया जाए।
इसी बीच, कई अन्य अभ्यर्थियों ने परामर्श और परिणाम में अनियमितताओं की शिकायत की। कुछ ने पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिकाएं दायर कीं, जिनमें CWJC संख्या 13658/2016 भी शामिल थी। उन वादों की लंबित अवस्था के दौरान कृषि विभाग ने आयोग की संस्तुतियों के आधार पर 24.01.2017 की ज्ञापन संख्या 75 द्वारा आगे का परिणाम जारी किया। इस सूची में याचिकाकर्त्री को कृषि समन्वयक पद पर नियुक्ति के लिए सफल दिखाया गया, परंतु उसे सामान्य श्रेणी की अभ्यर्थी के रूप में माना गया। उसका नाम क्रम संख्या 2001 पर दर्शाया गया।
इसके बाद प्राधिकारियों ने कृषि विभाग के माध्यम से आगे परामर्श कराने का निर्णय लिया। द्वितीय परामर्श आयोजित किया गया और 14.02.2017 की प्रेस विज्ञप्ति द्वारा 87 संस्तुत अभ्यर्थियों को 15.02.2017 को BOMETI, पटना में मूल प्रमाण-पत्र, स्वयं सत्यापित प्रतियां और 100 रुपये के गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर पर हलफनामा सहित उपस्थित होने के लिए बुलाया गया। याचिकाकर्त्री का रोल नंबर भी इसमें शामिल था।
वह 15.02.2017 को BOMETI में विधिवत उपस्थित हुई और उसके प्रमाण-पत्रों, जिनमें जाति प्रमाण-पत्र भी शामिल थे, की जांच की गई।
30.05.2017 को CWJC संख्या 13658/2016 और समरूप वादों में उच्च न्यायालय ने आयोग को अभ्यर्थियों की आपत्तियों पर विचार कर उन्हें बोलता आदेश (स्पीकिंग ऑर्डर) के माध्यम से निपटाने का निर्देश दिया। आयोग ने तब अपनी वेबसाइट के माध्यम से 24.05.2017 से 07.06.2017 के बीच आपत्तियां आमंत्रित कीं।
आगे, 14.07.2017 की सूचना ज्ञापन संख्या 1510 द्वारा, आयोग ने उन अभ्यर्थियों को, जिन्होंने परामर्श के समय पिछड़ा वर्ग अनुसूची-II (नॉन-क्रीमी लेयर) प्रमाण-पत्र जमा किए थे, लेकिन जिन्हें सामान्य श्रेणी में दिखाया गया था, से यह अपेक्षा की कि वे 17.07.2017 से 20.07.2017 के बीच व्यक्तिगत रूप से निर्धारित प्रपत्र में घोषणा-पत्र जमा करें। याचिकाकर्त्री ने 19.07.2017 को यह घोषणा-पत्र जमा किया।
किन्तु, 24.08.2017 के आदेश (ज्ञापन संख्या 2223) द्वारा आयोग ने उसके पिछड़ा वर्ग अनुसूची-II (नॉन-क्रीमी लेयर) दावे के संबंध में उसकी आपत्ति अस्वीकार कर दी। यह निष्कर्ष निकाला गया कि उसने परामर्श के समय नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया था, अतः उसे सामान्य श्रेणी की अभ्यर्थी माना जाना था। 24.11.2017 को आयोग ने तृतीय परिणाम (ज्ञापन संख्या 3743) जारी किया जिसमें उसे BC/WBC श्रेणी के अंतर्गत सफल नहीं दिखाया गया।
पीड़ित होकर, उसने 29.11.2017 को सचिव को तथा 04.12.2017 को अध्यक्ष को अभ्यावेदन देकर दोहराया कि उसने सभी दस्तावेज, जिनमें जाति तथा नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र और हलफनामे भी शामिल थे, प्रस्तुत किए थे, फिर भी उसके आरक्षित श्रेणी के दावे को अस्वीकार कर दिया गया।
उसे बाद में पता चला कि 24.11.2017 के परिणाम के विरुद्ध कुछ अपात्र अभ्यर्थियों की ताज़ा आपत्तियों के बाद आयोग ने 29.12.2017 को चतुर्थ सूची (ज्ञापन संख्या 40321) बिना पुनः आपत्तियां आमंत्रित किए जारी की। इस सूची में भी वह चयनित नहीं हुई, जबकि एक अन्य महिला पिछड़ा वर्ग अभ्यर्थी, मनिषा कुमारी (रोल संख्या 21511951) को 48.72 के कुल अंक के साथ सफल दिखाया गया।
तत्पश्चात उसने वर्तमान रिट याचिका के माध्यम से पटना उच्च न्यायालय की शरण ली, जिसमें आयोग के 24.08.2017 के आदेश, 29.12.2017 की संशोधित परिणाम-सूची तथा कृषि विभाग के 08.01.2018 के नियुक्ति पत्र अनुसूची को निरस्त करने की मांग की। उसने यह निर्देश भी चाहा कि उसे पिछड़ा वर्ग अनुसूची-II (नॉन-क्रीमी लेयर) महिला अभ्यर्थी माना जाए, उसका नाम परिणाम में शामिल किया जाए और उसे नियुक्ति-पत्र जारी किया जाए।
उसके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उसने वास्तव में परामर्श के समय नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र और हलफनामा प्रस्तुत किए थे, किंतु आयोग के आंतरिक प्रपत्र में नॉन-क्रीमी लेयर वाले कॉलम के अंतर्गत आयोग ने क्रॉस लगा कर यह अंकित कर दिया कि प्रमाण-पत्र संलग्न नहीं है। उनका दावा था कि उसे गलत ढंग से सामान्य श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके कारण उसका चयन नहीं हुआ, जबकि उससे कहीं कम अंक वाली महिला पिछड़ा वर्ग अभ्यर्थी को नियुक्त किया गया। उन्होंने यह भी इंगित किया कि उसे बार-बार परामर्श के लिए बुलाया गया और उसकी स्थिति के प्रति सहानुभूति दिखाई जानी चाहिए क्योंकि अब वह सरकारी सेवा के लिए आयु-सीमा पार कर चुकी है।
आयोग ने अपने प्रतिउत्तर हलफनामे में दृढ़तापूर्वक कहा कि परामर्श की तारीख 08.04.2016 को याचिकाकर्त्री ने कोई नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया था। आयोग के अधिवक्ता ने विज्ञापन की धारा 4 पर भरोसा किया, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि पिछड़ा वर्ग और अत्यंत पिछड़ा वर्ग से संबंधित अभ्यर्थियों को ऐसा जाति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना होगा जिसमें यह भी अंकित हो कि वे नॉन-क्रीमी लेयर से हैं, और यदि ऐसा प्रमाण-पत्र परामर्श के समय प्रस्तुत नहीं किया गया तो उन्हें सामान्य श्रेणी का माना जाएगा और उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।
न्यायालय ने धारा 4 को विस्तार से उद्धृत किया, जिसमें यह भी कहा गया था कि ऑनलाइन प्रपत्र में भरी गई आरक्षण श्रेणी बाद में बदली नहीं जा सकेगी और जो ओबीसी/एमबीसी अभ्यर्थी परामर्श के समय उपयुक्त प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं करेंगे उन्हें अनारक्षित श्रेणी का माना जाएगा।
आयोग ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्त्री 08.04.2016 को नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने में विफल रही, इसलिए बाद में की गई उसकी आपत्तियां और घोषणाएं इस दोष को दूर नहीं कर सकतीं। यह भी प्रस्तुत किया गया कि शशि भूषण यादव नामक एक अभ्यर्थी के समान मामले में, CWJC संख्या 727/2018 में एकल न्यायाधीश ने प्रारंभ में उसे राहत दी थी, परंतु खंडपीठ ने LPA संख्या 1311/2019 में उस आदेश को निरस्त कर आयोग की स्थिति को बरकरार रखा।
माननीय न्यायमूर्ति राजीव रॉय ने याचिकाएं, दस्तावेज और तर्कों की समीक्षा की। उन्हें आयोग का पक्ष वाजिब प्रतीत हुआ। विज्ञापन की आरक्षण संबंधी धारा को “अत्यंत स्पष्ट” बताया गया: ओबीसी/एमबीसी अभ्यर्थियों को ऐसा जाति प्रमाण-पत्र देना आवश्यक था जिसमें नॉन-क्रीमी लेयर की स्थिति का उल्लेख हो; यद्यपि ऑनलाइन प्रपत्र जमा करते समय ऐसे प्रमाण-पत्र संलग्न करना आवश्यक नहीं था, परन्तु परामर्श के समय उन्हें प्रस्तुत करना अनिवार्य था। उनके अभाव में अभ्यर्थी को सामान्य श्रेणी का माना जाएगा और उसे आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाएगा।
न्यायालय ने आयोग के प्रतिउत्तर हलफनामे के परिशिष्ट-A पर भरोसा किया, जिसमें यह दर्ज था कि 08.04.2016 को याचिकाकर्त्री उपस्थित हुई और अन्य दस्तावेज प्रस्तुत किए, परंतु नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया। इसी आधार पर उसे पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत नहीं माना गया और सामान्य श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया गया। वह प्रथम और द्वितीय परामर्श में सामान्य श्रेणी की अभ्यर्थी के रूप में उपस्थित हुई, परंतु सामान्य श्रेणी की कट-ऑफ उसके कुल अंकों से अधिक चली जाने के कारण उसे समायोजित नहीं किया जा सका।
न्यायालय ने माना कि वह मनिषा कुमारी के चयन को चुनौती नहीं दे सकती, जिसने परामर्श के समय विधिवत दस्तावेज प्रस्तुत किए, WBC श्रेणी में विचारित हुई और सफल घोषित की गई। एक बार जब याचिकाकर्त्री को विधिसम्मत रूप से सामान्य श्रेणी की अभ्यर्थी माना गया, तो वह अपनी स्थिति की तुलना किसी आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी से नहीं कर सकती।
कानूनी दृष्टि से, न्यायालय ने LPA संख्या 1311/2019 (Bihar Staff Selection Commission बनाम Shashi Bhushan Yadav एवं अन्य) में खंडपीठ के निर्णय पर चर्चा की। उस मामले में खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Ram Kumar Gijroya बनाम Delhi Subordinate Services Selection Board, (2016) 4 SCC 754 तथा पटना उच्च न्यायालय के निर्णय Dr. Santosh Kumar बनाम State of Bihar, 2017 (1) PLJR 786 का परीक्षण किया था।
खंडपीठ ने जाति प्रमाण-पत्रों और नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्रों के बीच भेद स्पष्ट किया। किसी व्यक्ति की जाति जन्म से ही स्थिर रहती है, जबकि नॉन-क्रीमी लेयर की स्थिति पारिवारिक आय पर निर्भर करती है जो बदलती रहती है। अतः जहाँ Ram Kumar Gijroya के अनुसार कभी-कभी जाति प्रमाण-पत्र की विलंबित प्रस्तुति को स्वीकार किया जा सकता है, वहीं वही तर्क नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्रों पर लागू नहीं हो सकता, जिन्हें अद्यतन होना और विज्ञापन की शर्तों के अनुसार प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है।
खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Mahendra Singh बनाम Union of India, 2022 SCC OnLine SC 909 का भी उल्लेख किया, जिसमें यह रेखांकित किया गया कि अभ्यर्थियों और प्राधिकारियों दोनों को भर्ती संबंधी निर्देशों का कठोरता से पालन करना चाहिए और उनसे विचलन की अनुमति नहीं दी जा सकती।
Shashi Bhushan Yadav के मामले में खंडपीठ ने यह ठहराया कि अभ्यर्थी ने परामर्श के समय कोई वैध नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया था और 31.12.2012 का प्रमाण-पत्र 2015–2016 की चयन प्रक्रिया के लिए मान्य नहीं माना जा सकता। खंडपीठ ने आयोग के निर्णय को सही ठहराते हुए LPA को स्वीकार किया और एकल न्यायाधीश का आदेश रद्द कर दिया।
माननीय न्यायमूर्ति राजीव रॉय ने स्पष्ट रूप से खंडपीठ के इसी दृष्टिकोण का अनुसरण किया। उन्होंने दोहराया कि चूंकि नॉन-क्रीमी लेयर की स्थिति आय से जुड़ी है, जो समय के साथ बदलती रहती है, अतः ओबीसी/एमबीसी आरक्षण चाहने वाले अभ्यर्थियों को परामर्श के समय हाल का और वैध नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य है। याचिकाकर्त्री ऐसा करने में विफल रही; अतः आयोग द्वारा उसे सामान्य श्रेणी की अभ्यर्थी मानना उचित था।
न्यायालय ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्त्री अब आयु-सीमा पार कर चुकी है और उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त की, यह कहते हुए कि यह उसका “दुर्भाग्य” है कि वह समय पर आवश्यक प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं कर सकी और नतीजतन आरक्षण का लाभ खो बैठी तथा सामान्य श्रेणी में भी अंतिम सूची में स्थान नहीं बना पाई।
किन्तु, सहानुभूति स्पष्ट भर्ती नियमों और बाध्यकारी नज़ीर पर भारी नहीं पड़ सकती। अतः न्यायालय ने रिट याचिका खारिज कर दी। अंत में न्यायालय ने उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उसे सरकारी सेवा के बाहर अन्य अवसरों की तलाश करने को प्रोत्साहित किया, यह उल्लेख करते हुए कि वह एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से उद्यान विज्ञान की स्नातक है।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार कर्मचारी चयन आयोग और समान निकायों द्वारा संचालित सरकारी भर्तियों में भाग लेने वाले सभी ओबीसी और एमबीसी अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है।
यह स्पष्ट कर देता है कि यदि परामर्श के चरण पर नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत नहीं किया जाता, तो अभ्यर्थी को सामान्य श्रेणी का मान लिया जाएगा, भले ही उसने आवेदन प्रपत्र में ओबीसी वाला कॉलम भरा हो और भले ही बाद में वह प्रमाण-पत्र या घोषणा-पत्र देने की कोशिश करे।
पटना उच्च न्यायालय ने खंडपीठ और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अनुसरण करते हुए जाति की स्थिति (जो परिवर्तित नहीं होती) और नॉन-क्रीमी लेयर की स्थिति (जो वर्तमान आय पर निर्भर करती है) के बीच स्पष्ट रेखा खींच दी है। चूंकि आय परिवर्तनीय है, इसलिए प्रमाण-पत्र अद्यतन होना चाहिए और ठीक उसी समय दिया जाना चाहिए, जैसा कि विज्ञापन में अपेक्षित है।
यह मामला यह भी दर्शाता है कि केवल इस आधार पर न्यायालय चयन सूची में दखल नहीं देगा कि किसी आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी के कम अंक होने के बावजूद उसका चयन हो गया। यदि प्रक्रिया संबंधी शर्तें पूरी नहीं की गई हैं, तो उच्च अंक भी सहायक नहीं होंगे।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: जो अभ्यर्थी परामर्श के समय नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने में विफल रहा हो, क्या वह बाद में स्वयं को पिछड़ा वर्ग (नॉन-क्रीमी लेयर) अभ्यर्थी के रूप में माने जाने और कम अंक वाले अन्य अभ्यर्थियों पर नियुक्ति का दावा कर सकता है?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि विज्ञापन की स्पष्ट शर्तों के अनुसार नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र परामर्श के समय प्रस्तुत करना अनिवार्य है। ऐसा न करने पर अभ्यर्थी को सामान्य श्रेणी का माना जाएगा और वह बाद में आरक्षित श्रेणी का लाभ नहीं ले सकेगा। - प्रश्न: क्या बाद में दायर की गई आपत्तियां, घोषणाएं या पूर्व न्यायालयी आदेशों पर निर्भरता, नियत समय पर नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने की आवश्यकता को दरकिनार कर सकती हैं?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने LPA संख्या 1311/2019 में खंडपीठ के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शन पर भरोसा करते हुए कहा कि भर्ती संबंधी निर्देशों का कठोरता से पालन अनिवार्य है। बाद की आपत्तियां परामर्श के समय आवश्यक प्रमाण-पत्र न देने की कमी को दूर नहीं कर सकतीं। - प्रश्न: क्या कोई अभ्यर्थी, जिसे प्रमाण-पत्र संबंधी आवश्यकताओं का पालन न करने के कारण सामान्य श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया गया हो, अपने अंकों की तुलना किसी आरक्षित श्रेणी के चयनित अभ्यर्थी से कर उसके चयन को चुनौती दे सकता है?
उत्तर: नहीं। एक बार किसी अभ्यर्थी को वैध कारणों से सामान्य श्रेणी का माना गया, तो वह किसी ऐसे आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी के चयन को चुनौती नहीं दे सकता, जिसने आवश्यक दस्तावेज विधिवत प्रस्तुत किए हों, भले ही उसके अंक कम हों।
न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण
- Ram Kumar Gijroya बनाम Delhi Subordinate Services Selection Board & Another, (2016) 4 SCC 754
- Dr. Santosh Kumar बनाम The State of Bihar through the Chief Secretary & Others, 2017 (1) PLJR 786
- Bihar Staff Selection Commission, Bihar, Patna through its Chairman बनाम Shashi Bhushan Yadav & Others, LPA संख्या 1311/2019 (पटना उच्च न्यायालय)
- Mahendra Singh बनाम Union of India & Others, 2022 SCC OnLine SC 909
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 1087 of 2018
मामले का शीर्षक: Bibha Kumari बनाम The State of Bihar & Others
उद्धरण: 2024 (4) PLJR 917
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रॉय
निर्णय की तारीख: 22.09.2023
वकील:
- याचिकाकर्त्री की ओर से: श्री संजीव शंकर, अधिवक्ता
- राज्य प्रतिवादियों की ओर से: श्री राघवनंद, GA-11; श्री प्रभात कुमार, AC to GA-11
- बिहार कर्मचारी चयन आयोग की ओर से: श्री ज्ञान शंकर, अधिवक्ता
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका (दीवानी), जिसमें कृषि समन्वयक पद पर चयन प्रक्रिया एवं चयन में आरक्षण लाभ न दिए जाने को चुनौती दी गई।
पूर्ण निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment in CWJC No. 1087 of 2018
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