मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला दिघा से दीदारगंज तक गंगा ड्राइववे के निर्माण से उत्पन्न हुआ है। इस परियोजना के लिए सारण जिला प्रशासन को निर्देश दिया गया था कि वे सोनेपुर सर्किल, ग्राम सबलपुर, थाना संख्याँ 110 में स्थित 129.93 एकड़ भूमि सड़क निर्माण विभाग को उपलब्ध कराएँ।
कुल आवश्यकता में से 88.99 एकड़ सरकारी भूमि, जो थाना संख्याँ 110 में थी, को राजस्व विभाग, बिहार से अनुमोदन प्राप्त करने के बाद सड़क निर्माण विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया। विवाद शेष 40.24 एकड़ असर्वेक्षित भूमि से संबंधित है, जो उसी थाना क्षेत्र में स्थित है।
इन 40.24 एकड़ भूमि पर 99 राययतों ने अपने अधिकार एवं स्वामित्व का दावा किया। जिला भू‑अर्जन पदाधिकारी, सारण के कार्यालय ने उपसमाहर्ता भूमि सुधार (डीसीएलआर), सोनेपुर, सारण से इन दावों पर प्रतिवेदन माँगा। डीसीएलआर ने सभी 99 राययतों को नोटिस जारी कर उनसे अपने दावे सिद्ध करने को कहा। नोटिस के बाद 131 आवेदक उपस्थित हुए और दस्तावेज प्रस्तुत किए।
दस्तावेजों की तुलना राजस्व अभिलेखों से करने और मौके पर जांच करने के बाद डीसीएलआर सोनेपुर ने 131 दावेदारों को तीन व्यापक श्रेणियों में पाया। प्रथम, 48 दावेदारों के पक्ष में जमाबंदी थी, परंतु ये प्रविष्टियाँ सक्षम प्राधिकारी के किसी आदेश के बिना थीं और जाली तथा संदिग्ध प्रतीत होती थीं। द्वितीय, 19 दावेदारों के लिए जिनके नाम पर जमाबंदी थी, उनके अनुकूल वास्तविक भूमि भू‑भाग में विद्यमान ही नहीं था। तृतीय, शेष 64 दावेदारों के नाम पर कोई जमाबंदी थी ही नहीं।
डीसीएलआर सोनेपुर ने 02.03.2015 के पत्र द्वारा उन सभी संदिग्ध जमाबंदी प्रविष्टियों के विरुद्ध रद्दीकरण कार्यवाही आरंभ करने की अनुशंसा की, जो जालसाजी से निर्मित प्रतीत हो रही थीं। इसके आधार पर रद्दीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। हल्का कर्मचारी से, सर्किल निरीक्षक के माध्यम से, जमाबंदी संख्या 282/1, जो याचिकाकर्ता से संबंधित थी, के संबंध में प्रतिवेदन माँगा गया।
हल्का कर्मचारी ने प्रतिवेदित किया कि ग्राम सबलपुर, थाना संख्याँ 110 असर्वेक्षित है, जिसके कारण खाता एवं खेसरा संख्याएँ न होने से सही भूमि की पहचान करना कठिन था। यह भी पाया गया कि जमाबंदी सक्षम प्राधिकारी के किसी आदेश और किसी प्रकरण संख्या के बिना ही बना दी गई थी।
सर्किल पदाधिकारी ने अभिलेख एवं जांच प्रतिवेदन डीसीएलआर को प्रेषित किए, जिन्होंने जमाबंदी रद्द करने की अनुशंसा की और प्रकरण को अपर कलेक्टर, सारण के पास अग्रेषित कर दिया। अपर कलेक्टर ने 21.03.2015 के आदेश द्वारा जमाबंदी रद्दीकरण प्रकरण संख्याँ 29/14-15 में याचिकाकर्ता की जमाबंदी रद्द कर दी।
इसके उपरांत, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, बिहार के उप सचिव ने 07.09.2015 के पत्र द्वारा जिलाधिकारी, सारण से स्पष्टीकरण माँगा। प्रकरण अभिलेखों की जाँच करने पर कलेक्टर ने पाया कि अपर कलेक्टर ने संबद्ध पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिए बिना आदेश पारित किया था, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल था।
कलेक्टर ने तत्पश्चात 21.03.2015 के अपर कलेक्टर के आदेश को निरस्त कर दिया और नई सुनवाई आरंभ की। याचिकाकर्ता को 31.12.2015 को नोटिस जारी की गई। याचिकाकर्ता जमाबंदी रद्दीकरण प्रकरण संख्याँ 29/14-15 से उत्पन्न वाद, विविध प्रकरण संख्याँ 24 / 2015 में उपस्थित हुआ। पक्षकारों को सुनने के बाद कलेक्टर ने 05.05.2016 का आदेश पारित किया, जिसके द्वारा पुनः याचिकाकर्ता की जमाबंदी रद्द कर दी गई। इसी आदेश और संपूर्ण प्रक्रिया को वर्तमान रिट याचिका में चुनौती दी गई।
न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया
याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय से कई प्रकार की राहतें माँगीं। प्रथम, उसने कलेक्टर‑cum‑जिला पदाधिकारी द्वारा विविध प्रकरण संख्याँ 24 / 2015 में दिनांक 05.05.2016 को पारित आदेश, जो ज्ञापन संख्याँ 781 दिनांक 12.05.2016 में निहित है, को रद्द करने की प्रार्थना की, जिसके द्वारा उसकी “दखलकार राययत” के रूप में दर्ज जमाबंदी रद्द कर दी गई थी और उसे अपने विक्रय विलेखों की वैधता के संबंध में सक्षम प्राधिकारी से संपर्क करने को कहा गया था।
द्वितीय, उसने यह घोषित करने की मांग की कि जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही का आरंभ, जमाबंदी रद्दीकरण प्रकरण संख्याँ 29/14-15 में 21.03.2015 का अपर कलेक्टर का आदेश और उसके पश्चात पारित सभी आदेश बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम, 2011 के प्रतिकूल हैं। उसका आरोप था कि ये कार्यवाहियाँ मनमानी एवं दुर्भावनापूर्ण हैं और इनका उद्देश्य गंगा हाईवे परियोजना के लिए उसकी राययती भूमि के अधिग्रहण पर मिलने वाले मुआवजे से उसे वंचित करना है।
तृतीय, उसने यह घोषणा चाही कि गंगा हाईवे के लिए उसकी राययती भूमि का अधिग्रहण केवल भूमिअधिग्रहण कानून के अंतर्गत विधिसम्मत अधिग्रहण की प्रक्रिया से तथा विधिवत मुआवजा अदा करने के बाद ही किया जा सकता है।
चतुर्थ, उसने यह रोक आदेश चाहा कि मामले के अंतिम निर्णय तक, अथवा कम से कम उस भूमि के लिए बाजार मूल्य पर मुआवजा दिए जाने तक, जिसकी जमाबंदी रद्द कर दी गई है, उसकी भूमि पर परियोजना हेतु अधिग्रहण न किया जाए।
तथ्यगत रूप से, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उसकी भूमि ग्राम सबलपुर, थाना संख्याँ 110 में प्रस्तावित हाईवे क्षेत्र में स्थित है और अंचल अमीन एवं सर्किल पदाधिकारी की अनुशंसाओं के आधार पर इसे परियोजना हेतु नापा‑जोखा कर लिया जा रहा है तथा लिया जा रहा है। उनका कहना था कि जिला पदाधिकारी के पास जमाबंदी रद्द करने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है, विशेषतः स्वप्रेरणा से (सुओ मोटू) कार्यवाही में, और यह कार्रवाई बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम, 2011 की धारा 9(6) का उल्लंघन है।
उन्होंने आगे प्रस्तुत किया कि जमाबंदी रद्दीकरण का वास्तविक उद्देश्य गंगा हाईवे परियोजना के लिए उसकी भूमि के अधिग्रहण पर मिलने वाले मुआवजे से उसे वंचित करना था। उनके अनुसार, उसकी भूमि केवल विधिसम्मत भूमिअधिग्रहण प्रक्रिया का पालन कर तथा मुआवजा अदा करने के उपरांत ही ली जा सकती थी, किंतु अधिकारियों ने इस दायित्व से बचने के लिए विवादित आदेश पारित कर दिया।
अधिवक्ता ने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले जब अधिकारियों ने कथित रूप से बिना किसी अधिग्रहण कार्यवाही के उसकी भूमि अपने कब्जे में ले ली और उसे वहाँ जाने से रोक दिया, तब उसने व अन्य ने CWJC संख्याँ 21520 / 2013 दायर की थी। उस रिट को 03.07.2014 को निपटाया गया। उस पूर्व वाद में न्यायालय ने प्रतिवादियों को समुचित जांच करने का निर्देश दिया था। यह भी निर्देश दिया गया था कि यदि याचिकाकर्ता को भूमि का स्वामी पाया जाए, तो उसे उस भूमि पर जाने से न रोका जाए, और यदि भूमि उसकी पाई जाए, तो विधि के अनुसार उसे उचित मुआवजा दिया जाए।
याचिकाकर्ता की अब की शिकायत यह थी कि उस आदेश का पालन करते हुए समुचित जांच और भौतिक सत्यापन करने तथा उसे नोटिस देने के बजाय, अधिकारियों ने उसकी अधिकारों को निष्फल करने हेतु स्वप्रेरणा से (सुओ मोटू) जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही आरंभ कर दी।
उसने तर्क दिया कि बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत रद्दीकरण कार्यवाही न तो अपर कलेक्टर द्वारा स्वप्रेरणा से (सुओ मोटू) आरंभ की गई थी और न ही निर्धारित विधि से दायर किसी आवेदन पर; बल्कि केवल सर्किल पदाधिकारी एवं डीसीएलआर की अनुशंसा पर की गई। उसका कहना था कि अपर कलेक्टर का उसकी जमाबंदी रद्द करने वाला आदेश एकपक्षीय (एक्स‑पार्टी) है और उसे किसी सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित किया गया, अतः वह अवैध, मनमाना एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के प्रतिकूल है।
आगे, अधिनियम की धारा 9(6) का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि कलेक्टर के पास जमाबंदी रद्दीकरण कार्यवाही में अपर कलेक्टर के निर्णय की स्वप्रेरणा से पुन: समीक्षा करने की कोई शक्ति नहीं है। कलेक्टर की शक्ति केवल अपीलीय है, जिसे 30 दिन के भीतर दायर अपील पर ही प्रयोग किया जा सकता है। उनके अनुसार, यहाँ कोई ऐसी अपील दायर ही नहीं की गई थी। फिर भी कलेक्टर ने अपर कलेक्टर का आदेश निरस्त कर दिया और फिर सर्किल पदाधिकारी एवं डीसीएलआर की वही रिपोर्टों के आधार पर पुनः याचिकाकर्ता की जमाबंदी रद्द कर दी। यह, उनके अनुसार, अधिकार क्षेत्र से परे था।
इसके उत्तर में राज्य ने, प्रति‑शपथपत्र के माध्यम से, भिन्न रुख अपनाया। राज्य ने उप सचिव के 07.09.2015 के पत्र की ओर ध्यान आकृष्ट किया, जिसमें कलेक्टर, सारण से स्पष्टीकरण माँगा गया था। कलेक्टर ने अपर कलेक्टर के कार्यालय से अभिलेख मँगाए और परीक्षण के उपरांत पाया कि अपर कलेक्टर ने 21.03.2015 का आदेश प्रभावित पक्षकारों को सुने बिना पारित किया था, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन था।
कलेक्टर ने इसीलिए अपर कलेक्टर का आदेश निरस्त कर नई सुनवाई आरंभ की। याचिकाकर्ता को नोटिस जारी की गई, जो विविध प्रकरण संख्याँ 24 / 2015 में उपस्थित हुआ और अपना प्रतिरक्षा‑पत्र दायर किया। सभी पक्षों को सुनने और दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद कलेक्टर ने 05.05.2016 का विस्तृत तथा कारणयुक्त आदेश पारित किया, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता की जमाबंदी रद्द कर दी गई। राज्य ने इस कार्रवाई को पूर्व के त्रुटिपूर्ण आदेश के विधिसम्मत संशोधन के रूप में न्यायोचित ठहराया और तर्क दिया कि चूँकि जमाबंदी बिना किसी विधिवत जमाबंदी कार्यवाही के बनाई गई थी, इसलिए उसे रद्द किया जाना उचित था।
इसके बाद उच्च न्यायालय ने वैधानिक ढाँचे की ओर रुख किया। न्यायालय ने ध्यान दिलाया कि बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम, 2011 की धारा 9, बिहार भू‑दखल अभिलेख नियमावली, 2012 के नियम 13 के साथ पढ़ी जाने पर, जमाबंदी रद्दीकरण को नियंत्रित करती है। न्यायालय ने धारा 9 को पूर्ण रूप से उद्धृत किया। इस प्रावधान के तहत “अपर कलेक्टर” को यह अधिकार है कि वह किसी भी जमाबंदी, जो कानून या कार्यपालक निर्देशों के उल्लंघन में बनाई गई हो, के संबंध में स्वप्रेरणा से, या आवेदन पर, या किसी सरकारी विभाग से प्राप्त संदर्भ पर जांच करे। इच्छुक पक्षकारों को उपस्थित होने, साक्ष्य प्रस्तुत करने और सुनवाई का उचित अवसर देकर अपर कलेक्टर ऐसी जमाबंदी रद्द कर सकता है, उस जमाबंदी के आधार पर दावा कर रहे व्यक्ति को बेदखल कर सकता है और वैध स्वामी अथवा अभिरक्षक को कब्जा दिला सकता है।
धारा 9 यह भी स्पष्ट करती है कि किसी भी जमाबंदी को इच्छुक पक्षकारों को उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना रद्द नहीं किया जा सकता, और कि रद्दीकरण हेतु आवेदन उस अपर कलेक्टर के समक्ष दायर किए जाने हैं जिसके अधिकार क्षेत्र में वह भूमि स्थित है। जमाबंदी रद्दीकरण की कार्यवाही प्रारंभ करने तथा जांच के उपरांत आदेश पारित करने का अधिकार अपर कलेक्टर को ही है।
इन प्रावधानों के सरल पाठ से न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि केवल अपर कलेक्टर ही जमाबंदी रद्द करने के लिए सक्षम प्राधिकारी है। यह वैधानिक व्यवस्था जिला कलेक्टर‑cum‑जिला पदाधिकारी को ऐसी रद्दीकरण शक्ति प्रदान नहीं करती।
इसी आधार पर, पक्षकारों की दलीलों एवं अभिलेखों के परीक्षण के उपरांत, पटना उच्च न्यायालय ने माना कि कलेक्टर‑cum‑जिला पदाधिकारी, सारण, छपरा द्वारा 05.05.2016 को पारित विवादित आदेश अधिकार क्षेत्र से रहित था। चूँकि धारा 9 स्पष्ट रूप से रद्दीकरण की शक्ति अपर कलेक्टर में निहित करती है, कलेक्टर इस भूमिका को ग्रहण ही नहीं कर सकता था।
न्याय के हित में, न्यायालय ने केवल पूर्ववर्ती अपर कलेक्टर के आदेश को बहाल नहीं किया, क्योंकि उस आदेश की भी यह कहकर आलोचना हुई थी कि वह बिना सुनवाई के पारित किया गया था। इसके बजाय, न्यायालय ने 21.03.2015 का अपर कलेक्टर, सारण, छपरा द्वारा जमाबंदी रद्दीकरण प्रकरण संख्याँ 29/14-15 में पारित आदेश तथा उसी प्रकरण से उत्पन्न विविध प्रकरण संख्याँ 24 / 2015 में कलेक्टर‑cum‑जिला पदाधिकारी द्वारा 05.05.2016 को पारित आदेश, जो ज्ञापन संख्याँ 781 दिनांक 12.05.2016 में निहित है, दोनों को रद्द कर दिया।
मामले को अपर कलेक्टर, सारण, छपरा (प्रतिवादी संख्याँ 7) को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया गया। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि अपर कलेक्टर सभी सम्बद्ध पक्षकारों को सुनवाई का अवसर प्रदान करें, दस्तावेजों की जाँच करें और तत्पश्चात विधि के अनुरूप विस्तृत एवं कारणयुक्त आदेश पारित करें, जो उच्च न्यायालय के निर्णय की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन माह के भीतर पारित किया जाना चाहिए।
इन निर्देशों के साथ, रिट याचिका को उल्लिखित सीमा तक स्वीकार किया गया, जिसमें न्यायालय ने सीधे स्वामित्व या मुआवजे पर निर्णय देने के बजाय मुख्यतः अधिकार‑क्षेत्र एवं प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित किया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय उन भूमि धारकों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी जमाबंदी रद्द की जा रही है, विशेषतः उन क्षेत्रों में जहाँ हाईवे जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि ली जा रही है।
पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम, 2011 की धारा 9 के अंतर्गत केवल अपर कलेक्टर को ही जमाबंदी रद्द करने की वैधानिक शक्ति है। यदि कोई अन्य प्राधिकारी, जिसमें जिला पदाधिकारी भी शामिल है, जमाबंदी रद्द करता है, तो ऐसे आदेशों को अधिकार‑क्षेत्र विहीन बताते हुए चुनौती दी जा सकती है।
न्यायालय ने यह भी दोहराया कि जमाबंदी रद्द करने से पहले, अधिकारियों को अभिलेखों में दर्ज व्यक्तियों को नोटिस देनी होगी और उन्हें समुचित सुनवाई का अवसर देना होगा। यहाँ तक कि जब जाली जमाबंदी या संदिग्ध प्रविष्टियों के आरोप हों, तब भी कानून का पालन किया जाना आवश्यक है।
बिहार के भू‑स्वामियों के लिए यह निर्णय यह पुष्टि करता है कि उनके भूमि अभिलेखों को सहज रूप से अथवा गलत प्राधिकारी द्वारा निरस्त नहीं किया जा सकता। यदि जमाबंदी को मुआवजा देने से बचने या बिना विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए कब्जा लेने के उद्देश्य से रद्द किया जाता है, तो उच्च न्यायालय ऐसे आदेशों में हस्तक्षेप कर उन्हें रद्द कर सकता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या कलेक्टर‑cum‑जिला पदाधिकारी, बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम, 2011 के अंतर्गत किसी व्यक्ति की जमाबंदी रद्द कर सकता है?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अधिनियम की धारा 9 के तहत केवल अपर कलेक्टर ही जमाबंदी रद्द करने के लिए सक्षम है। इसीलिए 05.05.2016 का कलेक्टर का आदेश अधिकार‑क्षेत्र से परे था और उसे रद्द कर दिया गया। - प्रश्न: जब जमाबंदी को बिना उचित प्राधिकारी या बिना सुनवाई के रद्द कर दिया गया हो, तब क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर: न्यायालय ने अपर कलेक्टर का पूर्ववर्ती आदेश और कलेक्टर का आदेश, दोनों को रद्द कर दिया और प्रकरण को अपर कलेक्टर के पास वापस भेज दिया, यह निर्देश देते हुए कि वे सभी सम्बंधित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दें, दस्तावेजों पर विचार करें और एक विस्तृत, कारणयुक्त आदेश निश्चित समय सीमा के भीतर पारित करें।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में किसी अन्य प्रतिवेदित वाद‑विवरण का उल्लेख या उस पर निर्भरता नहीं है। न्यायालय की तर्क‑पद्धति बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम, 2011 की धारा 9 तथा बिहार भू‑दखल अभिलेख नियमावली, 2012 के नियम 13 पर आधारित है।
मामले का विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 13189 of 2016
मामले का शीर्षक: Amresh Kumar बनाम The State of Bihar & Ors.
उद्धरण: 2024(4) PLJR 591
न्यायालय: उच्च न्यायालय, पटना
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति रुद्र प्रकाश मिश्र
निर्णय की तिथि: 05.08.2024
अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री अरुण कुमार; प्रतिवादी/राज्य की ओर से श्री साजिद सलीम खान (SC25)
वाद का स्वरूप: नागरिक रिट अधिकार‑क्षेत्र के अंतर्गत दायर रिट याचिका, जिसमें जमाबंदी रद्दीकरण संबंधी आदेशों को चुनौती दी गई और गंगा ड्राइववे परियोजना के लिए आवश्यक भूमि के संदर्भ में राययती भूमि तथा मुआवजा अधिकारों के संरक्षण की मांग की गई।
प्रासंगिक अधिनियम एवं नियम: बिहार भू‑दखल अभिलेख (म्युटेशन) अधिनियम, 2011 (विशेष रूप से धारा 9); बिहार भू‑दखल अभिलेख नियमावली, 2012 (विशेष रूप से नियम 13); याचिकाओं में भूमिअधिग्रहण कानून और मुआवजा से संबंधित प्रावधानों का उल्लेख, किंतु निर्णय में विस्तृत वैधानिक उद्धरण नहीं।
पूर्ण निर्णय का लिंक: https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/MTUjMTMxODkjMjAxNiMxI04=-LHGVsrh30cw=
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