भूमि गंवाने वाले को वैकल्पिक आवासीय प्लॉट का आदेश — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

इस मामले में, एक भूमि गंवाने वाले व्यक्ति ने पटना उच्च न्यायालय से यह निर्देश देने का अनुरोध किया कि बिहार राज्य आवास बोर्ड उसे एक आवासीय प्लॉट दे। न्यायालय ने यह माना कि एक बार प्लॉट आवंटित हो जाने के बाद, यदि बोर्ड कब्जा देने में विफल रहा है, तो वह वैकल्पिक प्लॉट देने से इंकार नहीं कर सकता। न्यायालय ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया कि बाद में याचिकाकर्ता की पत्नी ने अलग से आवास बोर्ड का प्लॉट खरीद लिया था। आवास बोर्ड को निर्देश दिया गया है कि वह बहादुरपुर में एक विशेष रिक्त प्लॉट को निश्चित समय सीमा के भीतर आवंटित करे।

मामले की पृष्ठभूमि

पटना के बहादुरपुर स्थित याचिकाकर्ता की भूमि, जिसका क्षेत्रफल 0.045 एकड़ है, प्लॉट संख्या 740, खाता संख्या 256, थाना संख्या 10 में स्थित, वर्ष 1979 में बिहार राज्य आवास बोर्ड के लिए अधिग्रहित की गई थी। इस अधिग्रहण का मुआवजा भू-अर्जन पदाधिकारी के माध्यम से अदा किया गया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, उनकी भूमि लिए जाने के बाद वे भूमिहीन हो गए और उन्होंने बिहार राज्य आवास बोर्ड से पटना के बहादुरपुर क्षेत्र में आवासीय प्लॉट के आवंटन के लिए आवेदन किया। उनके आवेदन का पंजीकरण किया गया और एक रसीद जारी की गई।

आवास बोर्ड ने अपनी मिडिल इनकम ग्रुप (MIG) योजना के तहत आवेदनों का निपटारा लॉटरी के आधार पर किया। इसी आधार पर, और उनके भूमि गंवाने वाले के दर्जे को ध्यान में रखते हुए, MIG प्लॉट संख्या 10M/116, दिघा हाउसिंग कॉलोनी, पटना, उन्हें पत्र संख्या 671 दिनांक 20.07.1991 के द्वारा आवंटित किया गया।

हालांकि, याचिकाकर्ता को किसी भी प्लॉट का भौतिक कब्जा प्राप्त नहीं हुआ। बाद में दिघा में हुआ यह आवंटन व्यापक स्तर के विवादों और दिघा अधिग्रहित भूमि निपटारा अधिनियम, 2010 से प्रभावित हो गया। इस रिट याचिका में याचिकाकर्ता की शिकायत यह थी कि उनकी भूमि अधिग्रहित होने के बावजूद उन्हें कोई प्लॉट नहीं मिला और उन्होंने भूमि गंवाने वाले के रूप में बहादुरपुर में वैकल्पिक प्लॉट की मांग की।

न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने यह जांचा कि क्या भूमि गंवाने वाले के रूप में याचिकाकर्ता को बिहार राज्य आवास बोर्ड विनियम के तहत प्राथमिकता के आधार पर आवंटन का अधिकार है, और क्या आवास बोर्ड ने व्यवहार में इस अधिकार का सम्मान करने में विफलता की।

याचिकाकर्ता ने बिहार राज्य आवास बोर्ड विनियम के नियम 10(क)(1) की ओर इशारा किया, जो आवास योजनाओं के लिए जिनकी भूमि अधिग्रहित की गई है, ऐसे व्यक्तियों को आवंटन में प्राथमिकता देता है। उनका तर्क था कि इस प्रावधान के अनुसार बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी में, जब उनकी मूल भूमि वहां अधिग्रहित कर ली गई, उन्हें एक प्लॉट मिलने का अधिकार था।

उन्होंने आगे कहा कि यद्यपि आवास बोर्ड ने उन्हें दिघा हाउसिंग कॉलोनी में MIG प्लॉट संख्या 10M/116 आवंटित किया था, किंतु राजीव नगर/दिघा क्षेत्रों में अधिग्रहण से संबंधित विवादों के कारण उन्हें कभी भौतिक कब्जा नहीं मिला। बाद में बोर्ड की बैठकों में यह प्रस्ताव विचाराधीन रहा कि उनके आवंटन को बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी में स्थानांतरित कर दिया जाए, परंतु इसे कभी लागू नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता ने यह भी रेखांकित किया कि अन्य समान रूप से स्थित भूमि गंवाने वालों के साथ कैसा व्यवहार किया गया। उन्होंने कहा कि प्रतीक्षा सूची में क्रम संख्या 23 और 24 पर रखे गए कुछ व्यक्तियों, अर्थात् नंद लाल तिबड़ीवाल और अशोक कुमार साह, को उच्च न्यायालय द्वारा C.W.J.C. No. 4969 of 1996 में दिनांक 24.09.1998 के आदेश के बाद प्लॉट प्राप्त हुए, जिसे सर्वोच्च न्यायालय तक कायम रखा गया। इसी प्रकार, अंगीरी देवी तथा अंजीर देवी नामक दो व्यक्तियों को, C.W.J.C. No. 10340 of 2003 में न्यायालय का रुख करने के बाद, प्लॉट आवंटित किए गए।

अपने मामले में, याचिकाकर्ता का आरोप था कि आवास बोर्ड ने अपने दूसरे प्रति-शपथपत्र में उनके मामले को उन पूर्व मामलों से अलग दिखाने की कोशिश की और नई दलील यह ली कि वे अयोग्य हैं क्योंकि उनकी पत्नी बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी में एक MIG प्लॉट की स्वामिनी हैं। यह आपत्ति बिहार राज्य आवास बोर्ड विनियम, 1983 के विनियम 8(घ) पर आधारित थी।

दूसरी ओर, आवास बोर्ड का तर्क था कि उसने पहले ही याचिकाकर्ता को भूमि गंवाने वाले के रूप में “प्राथमिकता” का लाभ दे दिया था, जब उसने पत्र दिनांक 20.07.1991 के द्वारा दिघा हाउसिंग कॉलोनी में MIG प्लॉट संख्या 10M/116 उन्हें आवंटित किया था। बोर्ड के अनुसार, यह आवंटन याचिकाकर्ता को विधिवत रूप से सूचित कर दिया गया था, किंतु उन्होंने न तो अनुमानित कीमत की प्रारंभिक राशि जमा की और न ही उक्त प्लॉट के लिए बोर्ड के साथ कोई अनुबंध निष्पादित किया।

इसके बजाय, 09.02.2001 को याचिकाकर्ता ने दिघा के प्लॉट के स्थान पर बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी में MIG प्लॉट के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। बोर्ड का कहना था कि उनकी यह बाद की मांग अधिकार स्वरूप नहीं मानी जा सकती।

आवास बोर्ड ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की पत्नी ने बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना में MIG प्लॉट संख्या 8M/28 में एक आवास इकाई फ्री-होल्ड आधार पर खरीदी है। 1983 के विनियमों के विनियम 8 के अंतर्गत, किसी व्यक्ति को तभी घर या साइट आवंटित की जानी है जब वह स्वयं, उसके पति/पत्नी तथा आश्रित अवयस्क बच्चे, जिस नगर क्षेत्र या हाउसिंग एस्टेट के लिए वे आवेदन कर रहे हैं, उसके आठ किलोमीटर के भीतर कोई भूमि या मकान न रखते हों।

इसी आधार पर बोर्ड का मत था कि विनियम 8(घ) के अनुसार, याचिकाकर्ता बहादुरपुर में किसी नए आवंटन या पुनःआवंटन के लिए पात्र नहीं हैं, क्योंकि उनके परिवार के पास पहले से ही एक ऐसी आवास इकाई है।

बोर्ड ने न्यायालय के समक्ष दिघा भूमि से संबंधित पृष्ठभूमि भी रखी। उसने कहा कि दिघा में लगभग 1024.42 एकड़ भूमि राज्य सरकार द्वारा आवास बोर्ड के लिए अधिग्रहित की गई थी, जिसका उद्देश्य शहरी आवास सुविधाओं का विकास था। यद्यपि इस अधिग्रहण को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा, परंतु समय के साथ लगभग 600 एकड़ भूमि कथित रूप से व्यक्तियों और सोसाइटियों द्वारा अवैध रूप से अधिगृहित कर ली गई।

इन समस्याओं के समाधान के लिए दिघा अधिग्रहित भूमि निपटारा अधिनियम, 2010 अधिनियमित किया गया, जिसके बाद दिघा अधिग्रहित भूमि निपटारा नियम, 2014 और दिघा अधिग्रहित भूमि निपटारा योजना, 2014 बनाई गई। 2010 के अधिनियम की धारा 4 में पूर्व आवंटनों को रद्द करने और जमा राशि ब्याज सहित लौटाने का प्रावधान किया गया, तथा धारा 5 में घोषित किया गया कि पूर्व के आवंटन निरस्त समझे जाएंगे।

इन विधिक परिवर्तनों के तहत, बोर्ड ने कहा कि उसने याचिकाकर्ता से दिघा हाउसिंग कॉलोनी में MIG प्लॉट संख्या 10M/116 के लिए जमा किसी भी राशि की वापसी हेतु फॉर्म-सी प्रस्तुत करने को कहा था। बोर्ड ने यह भी उल्लेख किया कि एक पूर्व मामले C.W.J.C. No. 3991 of 1987 में, जिन लोगों की भूमि अधिग्रहित की गई थी, उनकी वरिष्ठता सूची अभिलेख पर लाई गई थी और उनकी मांगों की जांच के लिए एक समिति गठित की गई थी। बाद में, भूमि की कमी के कारण ऐसे सभी 45 व्यक्तियों को प्लॉट देना संभव न होने पर, बोर्ड ने उनकी राशि लौटाने का निर्णय लिया। उन आवंटियों में से कुछ, जैसे रामाश्रय प्रसाद और श्रीमती शारदा सिन्हा, ने भी उच्च न्यायालय की शरण ली और उनके मामले अभी भी लंबित हैं।

अंततः, बोर्ड ने यह दलील दी कि बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी में शेष बचे किसी भी अवितरित MIG प्लॉट को सख्ती से 1983 के विनियमों के अनुरूप ही आवंटित किया जा सकता है, न कि केवल पूर्व उम्मीदों के आधार पर।

वर्तमान मामले की सुनवाई के दौरान, आवास बोर्ड ने पटना के बहादुरपुर क्षेत्र में रिक्त प्लॉटों की एक सूची प्रस्तुत की। याचिकाकर्ता ने यह निवेदन किया कि बोर्ड द्वारा राजीव नगर/दिघा में उन्हें दशकों तक मूल प्लॉट का कब्जा न दे पाने के कारण, इस सूची में से किसी भी एक रिक्त प्लॉट को पूर्व आवंटन के बदले में उन्हें दिया जाए।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, न्यायालय ने यह नोट किया कि याचिकाकर्ता की मूल मांग राजीव नगर/दिघा में पहले से आवंटित प्लॉट के बदले वैकल्पिक प्लॉट की थी। न्यायालय ने स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता भूमि गंवाने वाले हैं और इस प्रकार बिहार राज्य आवास बोर्ड विनियम के नियम 10(क)(1) के तहत प्राथमिकता आवंटन के पात्र हैं।

न्यायालय का तर्क था कि एक बार बोर्ड ने याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करते हुए और उन्हें पात्र पाते हुए राजीव नगर में प्लॉट आवंटित कर दिया, तो बोर्ड को अपने ही कब्जा देने में असफल रहने का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। बोर्ड की ओर से कब्जा देने में असमर्थता या विफलता को अब इस आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि उन्हें वैकल्पिक प्लॉट से वंचित किया जाए।

इसके बाद न्यायालय ने उस विशेष आपत्ति की जांच की, जो याचिकाकर्ता की पत्नी द्वारा बाद में आवास बोर्ड का प्लॉट खरीदने पर आधारित थी। न्यायालय ने नोट किया कि याचिकाकर्ता को मूल आवंटन 20.07.1991 को किया गया था। उस समय उनकी पत्नी के पास कोई संपत्ति नहीं थी। बाद में, लगभग 2001 के आसपास, जब याचिकाकर्ता ने एक शपथपत्र दिया कि उनके या उनके परिवार के किसी सदस्य के नाम कोई भूमि नहीं है और वे भूमि गंवाने वाले हैं, तब उनकी पत्नी द्वारा खरीद की गई।

न्यायालय ने यह माना कि बोर्ड के विनियम किसी आवंटी के परिवार के सदस्य को बाद के वर्षों में संपत्ति खरीदने से प्रतिबंधित नहीं करते। इसलिए यह आपत्ति कि याचिकाकर्ता की पत्नी ने मूल आवंटन के लगभग 20 वर्ष बाद एक प्लॉट खरीदा, उनके अर्जित विधिक अधिकार को निष्फल करने के रूप में स्वीकार नहीं की जा सकती।

न्यायालय के दृष्टिकोण में, पत्नी द्वारा यह बाद की संपत्ति क्रय, याचिकाकर्ता के उस विधिक अधिकार को समाप्त नहीं करती जो उन्हें भूमि गंवाने वाले के दर्जे के कारण और एक विशिष्ट प्लॉट (MIG 10M/116) के उनके पक्ष में आवंटन के कारण, भले ही बिना कब्जा दिए, पहले ही अर्जित हो चुका था।

इस निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद, न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ऐसे प्लॉट के हकदार हैं जो रिक्त हो, किसी प्रकार के भार या मुकदमेबाजी से मुक्त हो और जिसका तात्कालिक कब्जा आवास बोर्ड द्वारा उन्हें सौंपा जा सके।

बोर्ड द्वारा प्रस्तुत रिक्त प्लॉटों की सूची को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने निर्णय दिया कि रिट याचिका स्वीकार की जानी चाहिए। न्यायालय ने निर्देश दिया कि बहादुरपुर, पटना स्थित प्लॉट संख्या 8M/22, जो रिक्त प्लॉटों की सूची में क्रम संख्या 1 पर दर्ज है, याचिकाकर्ता को आवंटित किया जाए।

न्यायालय ने आदेश दिया कि यह आवंटन उस दिनांक से 15 दिनों के भीतर कर दिया जाए, जिस दिन आवास बोर्ड को इस निर्णय की प्रति प्राप्त हो या दिखाई जाए। आगे यह भी निर्देश दिया गया कि इस आवंटन से संबंधित सभी आवश्यक कागजी कार्रवाई अगले दो महीनों के भीतर पूरी कर ली जाए। आदेश की एक प्रति अनुपालन के लिए बिहार राज्य आवास बोर्ड के प्रबंध निदेशक को भेजे जाने का भी निर्देश दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन भूमि गंवाने वालों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी भूमि आवास परियोजनाओं के लिए ली जाती है लेकिन जिन्हें वादा किए गए प्लॉट कभी नहीं मिलते। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि एक बार किसी आवास प्राधिकरण द्वारा भूमि गंवाने वाले को प्लॉट आवंटित कर दिए जाने के बाद, वह केवल इस आधार पर वैकल्पिक प्लॉट से इंकार नहीं कर सकता कि मूल प्लॉट का कब्जा देने में वह स्वयं विफल रहा।

निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि पति/पत्नी द्वारा बाद में अलग आवास इकाई की खरीद स्वचालित रूप से उस पूर्व अधिकार को निरस्त नहीं करती, जो भूमि गंवाने वाले को प्रथम आवंटन के समय प्राप्त हो चुका था। किसी अन्य संपत्ति का स्वामित्व न होने से संबंधित विनियमों को न्यायपूर्ण और तार्किक ढंग से पढ़ा जाना चाहिए।

बिहार में जिन लोगों की भूमि बिहार राज्य आवास बोर्ड की योजनाओं के लिए अधिग्रहित की गई है और जो वर्षों से प्लॉट की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनके लिए यह निर्णय यह दर्शाता है कि न्यायालय केवल धनवापसी के प्रस्ताव पर छोड़ देने के बजाय, बोर्ड को स्पष्ट, रिक्त प्लॉट समयबद्ध कार्यक्रम के साथ उपलब्ध कराने का निर्देश दे सकता है।

कानूनी मुद्दे और उनके उत्तर

  • मुद्दा: क्या भूमि गंवाने वाला, जिसे पहले प्लॉट आवंटित हो चुका है परंतु जिसके लिए कभी कब्जा नहीं दिया गया, बिहार राज्य आवास बोर्ड से वैकल्पिक प्लॉट पाने का हकदार है?
    उत्तर: हां। न्यायालय ने माना कि बोर्ड अपने ही कब्जा देने में विफल रहने का लाभ नहीं उठा सकता; भूमि गंवाने वाले के रूप में और पूर्व आवंटन के आधार पर याचिकाकर्ता वैकल्पिक रिक्त प्लॉट का हकदार है।
  • मुद्दा: क्या याचिकाकर्ता की पत्नी द्वारा बाद में आवास बोर्ड का प्लॉट खरीद लेने से, 1983 के विनियमों के विनियम 8 के तहत, याचिकाकर्ता वैकल्पिक प्लॉट पाने से अयोग्य हो जाते हैं?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि विनियम किसी आवंटन हो जाने के बाद परिवार के सदस्यों द्वारा की गई बाद की खरीद पर रोक नहीं लगाते, और ऐसी बाद की खरीद याचिकाकर्ता के अर्जित विधिक अधिकार को निष्फल नहीं करती।
  • मुद्दा: बहादुरपुर हाउसिंग कॉलोनी में शेष रिक्त प्लॉटों के साथ, याचिकाकर्ता के दावे के आलोक में, कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए?
    उत्तर: न्यायालय ने निर्देश दिया कि ऐसे ही एक प्लॉट, अर्थात् बहादुरपुर स्थित प्लॉट संख्या 8M/22, को भूमि गंवाने वाले के रूप में उनकी प्राथमिकता स्थिति को मान्यता देते हुए, निश्चित समय सीमा के भीतर याचिकाकर्ता को आवंटित किया जाए।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • निर्णय में यह दर्ज है कि याचिकाकर्ता ने C.W.J.C. No. 4969 of 1996 तथा C.W.J.C. No. 10340 of 2003 का, और आवास बोर्ड ने C.W.J.C. No. 3991 of 1987, C.W.J.C. No. 6643 of 2012 तथा C.W.J.C. No. 6336 of 2002 का उल्लेख किया, किंतु इस निर्णय में न्यायालय की तर्कशृंखला किसी विशिष्ट प्रकाशित प्रकरण या उद्धरण पर नाम से निर्भर नहीं करती और न ही उसका विश्लेषण करती है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 7538 of 2021

मामले का शीर्षक: श्री बज किशोर प्रसाद बनाम द स्टेट ऑफ बिहार एवं अन्य

उद्धरण: 2024(4) PLJR 562

न्यायालय: हाइ कोर्ट ऑफ ज्यूडीकेचर ऐट पटना

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति संदीप कुमार

निर्णय की तिथि: 19-01-2024

वकील: याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री बिनय कुमार चौबे; प्रतिवादियों की ओर से श्री सुभाष प्रसाद सिंह (GA-3)

प्रतिवादी: मुख्य सचिव के माध्यम से बिहार राज्य तथा नगरीय विकास विभाग और बिहार राज्य आवास बोर्ड के अधिकारी

मामले का स्वरूप: भूमि गंवाने वाले को मिडिल इनकम ग्रुप आवासीय प्लॉट के आवंटन और कब्जा दिलाने के लिए रिट ऑफ मैंडेमस की मांग करने वाली रिट याचिका

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment CWJC No. 7538 of 2021

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