मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 08.09.2016 को थाना साठी, जिला पश्चिम चम्पारण अंतर्गत ग्राम बसंतपुर के निकट स्थित छठिया घाट चबूतरा पर घटित एक हिंसक घटना से उत्पन्न हुआ। अभियोजन के अनुसार, सूचक मन्नान यादव अपने खेत की जाँच करने के बाद अपने पिता झपास यादव तथा चाचा झगरू यादव के साथ घाट पर बने चबूतरे पर बैठे थे।
लगभग शाम 5:15 बजे गांव के लोगों का एक समूह, जिसमें छहों अपीलकर्ता और अन्य सह-अभियुक्त शामिल थे, कथित तौर पर उन्हें घेरकर खड़ा हो गया। सूचक का कहना था कि यह हमला दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से चले आ रहे भूमि विवाद से जुड़ा हुआ था। उसके दादा ने “मिश्राजी और कोईना जी” से कुछ भूमि रजिस्ट्री करवाई थी, जिसके कारण बार‑बार झगड़े, पंचायतें और धमकियाँ होती रहती थीं।
हमले के दौरान आग्नेयास्त्रों तथा फर्सा, भाला और लाठी जैसे पारंपरिक हथियारों के प्रयोग का आरोप है। सूचक किसी तरह भाग निकला और पास के खेत में छिप गया, जबकि उसके पिता और चाचा पर बेरहमी से हमला किया गया। सहग्रामवासियों ने बाद में घायलों को पहले चनपटिया अस्पताल और फिर बेतिया ले जाने में मदद की। झपास यादव की मौत बेतिया ले जाते समय रास्ते में हो गई, और झगरू यादव की मौत एम.जे.के. अस्पताल, बेतिया में पटना रेफर करने के लिए एम्बुलेंस में उठाने के दौरान हुई।
सूचक मन्नान यादव का फर्दबयान 08.09.2016 को 23:50 बजे एम.जे.के. अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के पास दर्ज किए जाने के आधार पर, साठी थाना कांड सं. 118 वर्ष 2016, दिनांक 09.09.2016 को भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 341, 323, 324, 302 तथा 504 तथा आयुध अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत 11 नामजद अभियुक्तों और 4–5 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध पंजीकृत किया गया।
जांच के उपरांत, आरोपपत्र केवल छह अपीलकर्ताओं के विरुद्ध समर्पित किया गया तथा शेष सह‑अभियुक्तों के विरुद्ध जांच लंबित रखी गई। मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लेकर मामले को सेशन न्यायालय में विचारण हेतु प्रेषित कर दिया। सत्र वाद सं. 418 वर्ष 2017 में, भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 341/149, 302/149 तथा आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 27(3) के अंतर्गत आरोप तय किए गए।
दिनांक 22.04.2019 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, एफ.टी.सी.-II, पश्चिम चम्पारण, बेतिया ने छहों अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराया। दिनांक 26.04.2019 को न्यायालय ने प्रत्येक को धारा 147 भा.दं.सं. के अंतर्गत एक वर्ष का सश्रम कारावास तथा धारा 302 भा.दं.सं. के अंतर्गत प्रत्येक को 5,000 रुपये जुर्माने सहित आजीवन कारावास की सज़ा दी। जुर्माना अदा नहीं करने की स्थिति में उन्हें तीन माह अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना था। अपीलकर्ता गर्जन यादव को धारा 148 भा.दं.सं. के अंतर्गत अतिरिक्त दो वर्ष का सश्रम कारावास और अपीलकर्ता ध्रुव यादव को आयुध अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत तीन वर्ष का सश्रम कारावास और 5,000 रुपये जुर्माना दिया गया। सभी सजाएँ साथ‑साथ चलने वाली थीं।
छहों दंडित व्यक्तियों ने पटना उच्च न्यायालय में पृथक‑पृथक आपराधिक अपीलें (डी.बी.) दायर कीं, जिनकी एक साथ सुनवाई कर 11.09.2024 को खंडपीठ द्वारा निर्णय दिया गया।
न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या फैसला दिया
पटना उच्च न्यायालय ने विचारण अभिलेख का सावधानीपूर्वक परीक्षण किया: अभियोजन के नौ गवाह, बचाव पक्ष के पाँच गवाह, अनेक दस्तावेज जिनमें पोस्टमार्टम रिपोर्टें, प्राथमिकी, जब्ती सूची तथा पक्षकारों के बीच दर्ज पूर्व की अनेक प्राथमिकियाँ शामिल हैं।
अभियोजन की मुख्य कहानी सूचक (पी.डब्ल्यू.-6) तथा पाँच अन्य गैर‑सरकारी गवाहों (पी.डब्ल्यू.-1 से पी.डब्ल्यू.-5) से आई। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि ये गवाह या तो “संयोग से उपस्थित” (चांस गवाह) हैं या रुचि‑संपन्न रिश्तेदार हैं, अतः अविश्वसनीय हैं। उनका यह भी कहना था कि घटना के समय अपीलकर्ता अन्यत्र थे और इस हेतु उन्होंने कई अलिबाई गवाह प्रस्तुत किए।
खंडपीठ ने पहले साक्ष्य के आकलन के कुछ बुनियादी विधिक सिद्धांत स्पष्ट किए। उसने उल्लेख किया कि “चांस गवाह” स्वतः अविश्वसनीय नहीं हो जाता; बल्कि न्यायालय को यह देखना होता है कि घटना‑स्थल पर उसकी उपस्थिति स्वाभाविक तथा विश्वसनीय ढंग से समझाई गई है या नहीं। इसी प्रकार, मृतक के रिश्तेदारों की गवाही केवल रिश्तेदारी के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती; अदालतों को ऐसे साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय मात्र अतिरिक्त सावधानी बरतनी होती है।
न्यायाधीशों ने यह भी स्मरण कराया कि गवाहों के बयानों में हल्की विरोधाभास या चूक सामान्य बात है और अपने‑आप में अभियोजन के मामले को ध्वस्त नहीं करती। अवलोकन में सामान्य भूलें, समय के साथ स्मृति‑दोष, अपराध के समय दहशत तथा ग्रामीण गवाहों की देहाती पृष्ठभूमि जैसे कारकों को ध्यान में रखना ज़रूरी है।
जांच में खामियों के संबंध में न्यायालय ने कहा कि खराब या लापरवाह जांच भी, जब तक उससे वास्तविक prejuice (क्षति) न हो, अभियुक्त को बरी करने का आधार नहीं बन सकती। विचारण का निर्णय साक्ष्य के समग्र मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए, न कि जांच की पूर्णता या अपूर्णता पर।
इसके बाद खंडपीठ ने विशिष्ट साक्ष्यों पर लौटते हुए प्रत्येक महत्वपूर्ण गवाह का विस्तार से विश्लेषण किया।
सूचक मन्नान यादव (पी.डब्ल्यू.-6) ने न्यायालय में वही बातें दोहराईं जो उन्होंने अपने फर्दबयान में कही थीं। उन्होंने छठिया घाट चबूतरे पर अपने पिता और चाचा के साथ बैठे होने, सभी अपीलकर्ताओं और सह‑अभियुक्तों के वहाँ आने, अपीलकर्ता ध्रुव यादव द्वारा भूमि मामले को आगे बढ़ाने के कारण उन्हें मार देने की उकसाहट करने, तथा उनके पिता के पैर में पहली गोली चलाए जाने का विवरण दिया। उनका कहना था कि फायरिंग शुरू होते ही वे भागकर पास के खेतों में छिप गए और वहाँ से लाठी, भाला और फर्सा से आगे के प्रहार तथा फायरिंग होते देखी। लगभग आधे घंटे बाद लौटने पर उन्होंने अपने पिता को मृत और चाचा को बेहोश पाया तथा पुलिस को घटनास्थल पर मौजूद देखा।
जिरह में बचाव पक्ष ने उनसे उनके पिता और चाचा के पूर्व आपराधिक मामलों के बारे में सवाल पूछे, यह दिखाने की कोशिश में कि वे अपराधी थे और किसी पारिवारिक बँटवारे के विवाद में मारे गए। उन्होंने दोनों पक्षों के बीच पूर्व के मुकदमों की बात स्वीकार की और यह भी माना कि उनके पिता और चाचा पहले के एक हत्या मामले में जेल गए थे, किंतु उन्होंने दृढ़तापूर्वक यह इंकार किया कि उन्हें परिवार के ही किसी व्यक्ति ने मारा या अपीलकर्ताओं को झूठा फँसाया गया। उन्होंने यह सुझाव भी नकार दिया कि वे घटना‑स्थल पर उपस्थित नहीं थे या विशिष्ट अभियुक्तों को केवल दुश्मनी के कारण नामजद किया गया।
पी.डब्ल्यू.-1 तारा देवी, जो अशिक्षित घास काटने वाली और सूचक की बुआ हैं, ने कहा कि वह चबूतरे के पास घास काट रही थीं, तभी अभियुक्त लोग गन्ने के खेत से बंदूक, फर्सा और गड़ासा लेकर निकले। उन्होंने देखा कि वे “पीड़ितों को कसाई की तरह काट रहे थे” और फिर वह चिल्लाती हुई गांव की ओर भाग गईं। उन्होंने यह इंकार किया कि वे अपने विरुद्ध पूर्व में दर्ज कथित मामलों के कारण झूठी गवाही दे रही हैं। खेत के निकट उनकी उपस्थिति स्वाभाविक थी और अन्य साक्ष्यों के अनुरूप पाई गई।
पी.डब्ल्यू.-2 राजदेव पंडित ने कहा कि वे छठिया घाट स्थित अपनी बटाई की ज़मीन देखने गए थे, तभी उन्होंने ध्रुव यादव को बंदूक के साथ और अन्य लोगों को हथियारों के साथ देखा। उनके मुताबिक ध्रुव ने कहा कि झपास और झगरू ने उन्हें ज़मीन जोतने नहीं दिया, इसलिए उन्हें मार दो, और उसने गोली चलाई जो झपास के पैर में लगी। उन्होंने तीन गोली चलने की आवाज़ सुनी और बाद में दोनों पीड़ितों के मरने की खबर पाई। जिरह में उन्होंने अपना बयान कायम रखा, हालांकि वे यह याद नहीं रख सके कि किस अभियुक्त के पास कौन‑सा हथियार था—जिसे न्यायालय ने मामूली असंगति माना।
पी.डब्ल्यू.-3 मेघा यादव, जो मृतकों के चचेरे भाई हैं, ने गवाही दी कि मौके पर लगभग 18 लोग थे, जिनमें 11 अभियुक्त तथा कई घास काटने वाले और राहगीर शामिल थे। उन्होंने कहा कि ध्रुव और राजेंद्र यादव ने 5–10 “डिग” (छोटी दूरी) से फायर किए, जिनके छर्रे झगरू की जांघ से आरपार हो गए, और अन्य लोगों ने फर्सा और लाठी से हमला कर झपास के हाथ‑पाँव तोड़ दिए। उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनके परिवार और अपीलकर्ता ध्रुव के बीच पूर्व में आपराधिक मुकदमेबाज़ी रही है, परंतु यह दृढ़ता से नकारा कि मृतकों की हत्या परिवार के ही अंदरूनी लोगों ने की।
पी.डब्ल्यू.-4 बिनोद यादव, जो पास में भैंस चरा रहे थे, ने भी अभियोजन का पूर्ण समर्थन किया। उन्होंने कहा कि वे चीख‑पुकार सुनकर हमले को देखने गए, ध्रुव को पहली गोली चलाते देखा और सभी अपीलकर्ताओं को पहचाना। उन्होंने बताया कि पुलिस ने उनकी उपस्थिति में घटनास्थल से चार जिंदा कारतूस जब्त किए और उन्होंने जब्ती सूची पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने तारा देवी, मेघा, मन्नान और अन्य व्यक्तियों को चबूतरे के आसपास विशिष्ट स्थानों पर उपस्थित बताया और स्पष्ट किया कि उनका अभियुक्तों से कोई मुकदमा नहीं चल रहा।
पी.डब्ल्यू.-5 दिननाथ राय ने बताया कि वे अपने गांव से बिनोद के घर भैंस खरीदने गए थे और बिनोद के साथ चराई के स्थान तक गए। भैंस देखने के बाद वापस लौटते समय उन्होंने ध्रुव, गर्जन, रामदत, गुड्डू, रामपर्सन, शिवपर्सन और अन्य लोगों को गन्ने के खेत से बंदूक और अन्य हथियार लेकर निकलते देखा। उन्होंने ध्रुव की उकसाहट और झपास पर गोली चलाने, तथा उसके बाद लाठी, गरांसा और भाला से किए गए हमले का विवरण दिया। जिरह में उन्होंने क्षेत्र की स्थिति स्पष्ट की और यह दृढ़ता से नकारा कि वे घटना‑स्थल पर उपस्थित नहीं थे।
चिकित्सीय साक्ष्य के संदर्भ में पी.डब्ल्यू.-7 डॉ. संजय कुमार गुप्ता ने दोनों मृतकों का पोस्टमार्टम किया। झपास यादव के शरीर पर उन्होंने सिर पर फटा हुआ घाव, दोनों भुजाओं तथा बाएँ पैर पर अनेक घाव और फ्रैक्चर पाए, तथा पैर पर “भीतर की ओर मुड़ी हुई अनियमित किनारे वाली छिद्रित लसीरेटेड चोट” देखी, जो आग्नेयास्त्र की चोट के अनुरूप थी; इसके अतिरिक्त सख्त कुंद और तेज धारदार वस्तुओं से लगी चोटें भी पाईं। झगरू यादव के शरीर पर उन्होंने भुजा और पैर पर खरोंचें तथा फ्रैक्चर और जांघ तथा पैर पर छिद्रित लसीरेटेड घाव पाए, जो सख्त कुंद और तेज धारदार वस्तुओं से लगे थे। उन्होंने मत व्यक्त किया कि दोनों मामलों में मृत्यु रक्तस्राव और शॉक के कारण हुई तथा सभी चोटें पूर्वमृत (एंटेमॉर्टम) थीं। हालांकि, उन्होंने शवों से कोई छर्रा बरामद नहीं किया।
पी.डब्ल्यू.-8 डॉ. विजय कुमार, जिनके अधीन पोस्टमार्टम कार्य किया गया, ने पोस्टमार्टम रिपोर्टों पर चिकित्सकों के हस्ताक्षरों को सिद्ध किया और निष्कर्षों की पुष्टि की।
पी.डब्ल्यू.-9 मंज़र आलम, अनुसंधानकर्ता, ने घटनास्थल का वर्णन किया: छठिया घाट पर पीपल के पेड़ के नीचे एक चबूतरा, जो सिकरहना नदी के पास है; इसके उत्तर में ध्रुव यादव की ज़मीन, दक्षिण में मृतक झपास का गन्ने का खेत, पूर्व में नदी और पश्चिम में भोला यादव की ज़मीन है। उन्होंने घटनास्थल पर रक्त मिलने और बिनोद तथा ददन यादव की उपस्थिति में चार जिंदा कारतूस जब्त करने की पुष्टि की। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने तारा देवी, मेघा, राजदेव, दिननाथ और अन्य गवाहों के बयान घटनास्थल पर ही दर्ज किए और ये सभी सूचक के कथन का समर्थन करते थे।
बचाव पक्ष ने डी.डब्ल्यू.-1 से डी.डब्ल्यू.-5 तक के माध्यम से विभिन्न अपीलकर्ताओं के लिए अलिबाई स्थापित करने की कोशिश की, यह कहते हुए कि कोई न्यायालय में था, कोई सैदपुर में मज़दूरी कर रहा था और कोई सभापति यादव के घर विवाह वार्ता के लिए गया था। किंतु जिरह में ये गवाह तारीखों, मकान‑मालिकों के नाम, उपस्थित लोगों की संख्या और समयावधि जैसी बुनियादी बातों पर असमंजस में पाए गए। कुछ ने स्वीकार किया कि वे न्यायालय के समन पर नहीं, बल्कि विशिष्ट अपीलकर्ताओं के आग्रह पर गवाही देने आए हैं। एक बचाव गवाह ने यह भी बताया कि अपीलकर्ता ध्रुव उसका रिश्तेदार (उसकी बेटी के ससुर) हैं।
खंडपीठ ने इन बचाव गवाहों को अविश्वसनीय पाया और माना कि अलिबाई की दलील विधि द्वारा अपेक्षित कठोर मानदंडों के अनुसार सिद्ध नहीं हुई। उसने यह भी ध्यान दिया कि किसी भी अपीलकर्ता ने अपनी धारा 313 दं.प्र.सं. के तहत दर्ज बयान में ऐसे किसी अलिबाई का उल्लेख नहीं किया था; उन्होंने मात्र यह कहा था कि अभियोजन का साक्ष्य झूठा है।
समस्त सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि:
- छहों गैर‑सरकारी अभियोजन गवाह स्वाभाविक गवाह थे और घटना‑स्थल पर उनकी उपस्थिति का संतोषजनक एवं विश्वसनीय स्पष्टीकरण दिया गया।
- उनकी गवाहियाँ व्यापक रूप से सुसंगत थीं, विश्वास जगाती थीं और चिकित्सीय साक्ष्य एवं स्थल निरीक्षण से पुष्ट थीं।
- मामूली असंगतियों का उस मूल कहानी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा कि एक समूह ने आग्नेयास्त्र और धारदार हथियारों से हमला कर दोनों पीड़ितों की हत्या की।
- प्रेरणा स्पष्ट और प्रबल थी—दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से चला आ रहा भूमि विवाद और लगातार मुकदमेबाज़ी।
- जांच में ऐसी कोई गंभीर खामी नहीं थी जिससे उचित संदेह उत्पन्न हो; प्राथमिकी और इनक्वेस्ट रिपोर्ट समय पर तैयार हुईं, तथा प्राथमिकी मजिस्ट्रेट के पास भेजने में विलंब नहीं हुआ।
तदनुसार पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अभियोजन ने अपना मामला समस्त युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध कर दिया है। उसने सभी अपीलकर्ताओं के विरुद्ध धारा 147 तथा 302/149 भा.दं.सं. के तहत दोषसिद्धि, गर्जन यादव के विरुद्ध धारा 148 भा.दं.सं. तथा ध्रुव यादव के विरुद्ध आयुध अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषसिद्धि, और विचारण न्यायालय द्वारा दी गई सजाओं को बरकरार रखा। सभी चार आपराधिक अपीलें खारिज कर दी गईं और अपीलकर्ता निरंतर अभिरक्षा में रहने वाले हैं।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि विवाद से उत्पन्न हिंसक झगड़ों में फँसे परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि भले ही दोनों पक्षों के बीच लम्बे समय से दुश्मनी हो और अनेक क्रॉस‑केस दर्ज हों, यदि प्रत्यक्षदर्शियों की उपस्थिति स्वाभाविक हो और उनकी बातें एक‑दूसरे से मेल खाएँ, तो न्यायालय उन पर भरोसा कर सकता है।
पटना उच्च न्यायालय सरल शब्दों में समझाता है कि पीड़ित के रिश्तेदार और तथाकथित “चांस गवाह” स्वतः अविश्वसनीय नहीं होते। मुख्य बात यह है कि क्या उनका संस्करण चिकित्सीय साक्ष्य और स्थल की भौतिक वास्तविकताओं से मेल खाता है या नहीं। साधारण भूल‑चूक, विशेषकर गरीब और अशिक्षित ग्रामीण गवाहों की स्मृति में मामूली त्रुटियाँ, यदि मुख्य कहानी स्पष्ट है तो अभियुक्तों को बचाने का आधार नहीं बनतीं।
निर्णय यह भी रेखांकित करता है कि कहीं और होने (अलिबाई) का दावा करना गंभीर विषय है। ऐसी दलील को मज़बूत और विशिष्ट साक्ष्यों से समर्थित होना चाहिए। मित्रवत गवाहों के अस्पष्ट बयान, जिनमें पर्याप्त विवरण न हो या जिन्हें धारा 313 दं.प्र.सं. के तहत पूर्व में दर्ज बयानों में भी नहीं उठाया गया हो, स्वीकार नहीं किए जाएँगे।
इसी प्रकार के अपराधों के पीड़ितों के लिए यह निर्णय पुष्ट करता है कि समय पर रिपोर्ट करना, बयानों में निरंतरता रखना और जांच में सहयोग करना, वर्षों बाद भी दोषसिद्धि तक ले जा सकता है। अभियुक्तों के लिए यह याद दिलाने वाला है कि न्यायालय केवल तकनीकी खामियों या जांच की छोटी‑मोटी चूकों पर नहीं, बल्कि संपूर्ण साक्ष्य‑समूह पर दृष्टि रखकर निर्णय करेगा।
विधिक प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अपीलकर्ताओं की धारा 147 और 302/149 भा.दं.सं. तथा दो अपीलकर्ताओं की धारा 148 भा.दं.सं. और आयुध अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषसिद्धि टिकाऊ थी?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि प्रत्यक्षदर्शियों के सुसंगत बयानों, चिकित्सीय एवं अनुसंधान संबंधी साक्ष्य तथा स्पष्ट भूमि‑विवाद की प्रेरणा ने आरोपों को समस्त युक्तियुक्त संदेह से परे सिद्ध कर दिया। - प्रश्न: क्या रिश्तेदार और “चांस” गवाहों की गवाही तथा मामूली विरोधाभासों के कारण अभियोजन का मामला अविश्वसनीय हो गया?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल रिश्तेदारी की वजह से गवाह की विश्वसनीयता खत्म नहीं हो जाती, समझाई गई उपस्थिति वाले चांस गवाहों पर भरोसा किया जा सकता है, और जो छोटी‑मोटी विसंगतियाँ मामले की जड़ को प्रभावित नहीं करतीं, वे स्वाभाविक हैं और बरी करने का आधार नहीं हैं। - प्रश्न: क्या कथित जांच‑दोष और अपीलकर्ताओं की अलिबाई की दलील से उचित संदेह उत्पन्न हुआ?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि जांच में ऐसा कोई बड़ा दोष नहीं था जिससे अभियुक्तों को क्षति पहुँचे और यह भी कि अलिबाई की दलील ठोस साक्ष्य से सिद्ध नहीं हुई, विशेषकर इसलिए कि ऐसी दलील धारा 313 दं.प्र.सं. के तहत दर्ज बयानों में उठाई ही नहीं गई थी।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- निर्णय में चांस गवाह, रिश्तेदार गवाह, साक्ष्य में विरोधाभास, जांच‑दोष, अलिबाई की दलील और प्रमाण के मानक आदि विषयों पर उच्चतम न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों के अनेक निर्णयों का हवाला दिया गया है, जिनमें शामिल हैं:
- Ravi Mandal Vs. State of Uttrakhand, AIR 2023 SC 2554
- Baby @ Sebastian & Anr. Vs. Circle Inspector of Police, Adimaly, (2016) 13 SCC 333
- Jarnail Singh Vs. State of Punjab, (2009) 9 SCC 719
- Sarvesh Narain Shukla Vs. Daroga Singh, (2007) 13 SCC 360
- Acharaparambath Pradeepan Vs. State of Kerala, (2006) 13 SCC 643
- Sachchey Lal Tiwari Vs. State of U.P., (2004) 11 SCC 410
- Harjinder Singh Vs. State of Punjab, (2004) 11 SCC 253
- State of A.P. Vs. K. Srinivasulu Reddy, (2003) 12 SCC 660
- Shankarlal Vs. State of Rajasthan, (2004) 10 SCC 632
- Satbir Vs. Surat Singh, (1997) 4 SCC 192
- Abhishek Sharma Vs. State (NCT of Delhi), 2023 SCC OnLine SC 1358
- Yogesh Singh Vs. Mahabeer Singh & Ors., (2017) 11 SCC 195
- Mano Dutt and another Vs. State of Uttar Pradesh, (2012) 4 SCC 79
- State Vs. Saravanan, AIR 2009 SC 152
- State of U.P. Vs. Kishanpal, (2008) 16 SCC 73
- Namdeo Vs. State of Maharashtra, (2007) 14 SCC 150
- State of A.P. Vs. S. Rayappa, (2006) 4 SCC 512
- Pulicherla Nagaraju Vs. State of A.P., (2006) 11 SCC 444
- Harbans Kaur Vs. State of Haryana, (2005) 9 SCC 195
- Hari Obula Reddy and Ors. Vs. State of Andhra Pradesh, (1981) 3 SCC 675
- Piara Singh and Ors. Vs. State of Punjab, (1977) 4 SCC 452
- C. Muniappan & others Vs. State of T.N., (2010) 9 SCC 567
- State of U.P. Vs. Krishan Master, AIR 2010 SC 3071
- Appabhai & Anr. Vs. State of Gujrat, AIR 1988 SC 696
- Shivaji Sahebrao Bobade & Anr Vs. State Of Maharashtra, 1973 AIR 2622
- State of Madhya Pradesh Vs. Dal Singh, (2013) 14 SCC 159
- Smt. Shamim Vs. State (GNCT of Delhi), 2018 (4) PLJR 160
- S. Govidaarju Vs. State of Karnataka, 2013 (10) SCALE 454
- Narotam Singh vs. State Of Punjab And Anr., AIR 1978 SC 1542
- Leela Ram Vs. State of Haryana, (1999) 9 SCC 525
- Subal Ghorai and Ors. Vs. State of West Bengal, (2013) 4 SCC 607
- Ranjeet Kumar Ram @ Ranjeet Kumar Das Vs. The State of Bihar, 2015 (2) PCCR 416
- Sukhdeo Yadav & Ors. Vs. State of Bihar, (2001) 8 SCC 86
- Binay Kumar Singh Vs. State of Bihar, (1997) 1 SCC 283
- Kamal Prasad Vs. State of Chhattisgarh, (2023) 10 SCC 172
- Collector of Customs Vs. D. Bhoormal, (1972) 2 SCC 544
- Kali Ram Vs. State of HP, (1973) 2 SCC 808
- Dharm Das Wadhwani Vs. State of U.P., (1974) 4 SCC 267
- Dilavar Hussain Vs. State of Gujarat, (1991) 1 SCC 253
- Narender Kumar Vs. State (NCT of Delhi), (2012) 7 SCC 171
मामले का विवरण
मामला संख्या: Criminal Appeal (DB) No. 615 of 2019; Criminal Appeal (DB) No. 591 of 2019; Criminal Appeal (DB) No. 719 of 2019; Criminal Appeal (DB) No. 748 of 2019, जो सभी साठी थाना कांड सं. 118 वर्ष 2016 तथा सत्र वाद सं. 418 वर्ष 2017 से उत्पन्न हुए।
मामले का शीर्षक: Shambhu Yadav vs. The State of Bihar; Banka Yadav vs. The State of Bihar; Dhruv Yadav @ Dhrup Yadav & Ors. vs. The State of Bihar; Guddu Yadav vs. The State of Bihar.
उद्धरण: 2024 (4) PLJR 147.
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna.
पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति अशुतोष कुमार एवं माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार (सी.ए.वी. निर्णय माननीय श्री न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार द्वारा दिया गया)।
निर्णय की तारीख: 11.09.2024.
अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता: Criminal Appeal (DB) No. 615 of 2019 तथा No. 748 of 2019 में: श्री बिमलेश कुमार पांडेय, श्री विकास शुक्ल, श्री कृष्णकांत पांडेय, श्री मिथिलेश कुमार, सुश्री अंजली कुमारी, अधिवक्ता। Criminal Appeal (DB) No. 591 of 2019 में: श्री उमेश चंद्र वर्मा, श्री अभिषेक कुमार, सुश्री रश्मि झा, श्री हेमंत राय, अधिवक्ता। Criminal Appeal (DB) No. 719 of 2019 में: श्री उदय प्रताप सिंह, सुश्री भारती राय, श्री राजेश कुमार, अधिवक्ता।
राज्य के अधिवक्ता: सभी अपीलों में श्री अभिमन्यु शर्मा, ए.पी.पी.।
मामले का स्वरूप: भारतीय दंड संहिता और आयुध अधिनियम के अंतर्गत भूमि विवाद से संबंधित दोहरे हत्याकांड में दोषसिद्धि और सज़ा के विरुद्ध दायर आपराधिक अपीलें (खंडपीठ)।
निर्णय की प्रति का लिंक: पूरा पटना उच्च न्यायालय का निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के इच्छुक हों कि बिहार में कानूनी विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं, तो आप आगे की जानकारी के लिए Samvida Law Associates को फ़ॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।



