अतिक्रमण कारण-पत्र (शो-कॉज़ नोटिस) बरकरार, अपीलें खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Sakshi Bhatnagar

Reviewed by: Sakshi Bhatnagar

License Number: BR/2891A/2019

Sakshi Bhatanagar is a lawyer at Samvida Law Associates practicing criminal law. She represents clients in criminal proceedings before the Patna High Court and subordinate courts, handling bail applications, criminal appeals, NDPS matters, and customs-related cases. Her practice focuses on criminal defense and litigation across multiple forums in Bihar.

पटना उच्च न्यायालय ने पूर्णिया में सार्वजनिक भूमि पर कथित अतिक्रमण के लिए जारी कारण-पत्र (शो-कॉज़ नोटिस) रद्द करने से इंकार कर दिया। दुकानदारों और निवासियों ने इन नोटिसों को चुनौती दी थी और दीर्घकालीन कब्जे तथा पूर्व में मिले अनुकूल आदेशों का दावा किया था। न्यायालय ने कहा कि ऐसे नोटिसों के खिलाफ दायर रिट याचिकाएं समय से पूर्व हैं और वास्तविक तथ्यगत विवादों को सर्किल अधिकारी या सिविल न्यायालय के समक्ष ले जाया जाना चाहिए। अपीलों को खारिज कर दिया गया, लेकिन आपत्तियाँ दाखिल करने और आगे उपचार प्राप्त करने के लिए समय दिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

ये लेटर्स पेटेंट अपीलें पटना उच्च न्यायालय के एक माननीय एकल न्यायाधीश द्वारा तय की गई तीन रिट याचिकाओं से उत्पन्न हुईं। रिट याचिकाएँ थीं C.W.J.C. No.17688 of 2022 (37 याचिकाकर्ताओं के साथ), C.W.J.C. No.17689 of 2022 (2 याचिकाकर्ताओं के साथ) और C.W.J.C. No.8727 of 2024 (1 याचिकाकर्ता के साथ)।

सभी याचिकाकर्ता पूर्णिया नगर और आसपास के क्षेत्रों के व्यक्ति हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे सोनौली चौक, गुलाबबाग तथा आसपास की स्थानीयताओं में या उनके आस-पास स्थित संरचनाओं के कब्जाधारी हैं। वे उस समय उच्च न्यायालय पहुँचे जब बिहार पब्लिक लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट, 1956 के तहत पूर्णिया पूर्व सर्किल अधिकारी के समक्ष लंबित अतिक्रमण वादों में उनके विरुद्ध कारण-पत्र (शो-कॉज़ नोटिस) जारी किए गए।

एक समूह के रिट याचिकाकर्ताओं के अनुसार, कुछ संरचनाएँ बिना समुचित नोटिस के, और कथित रूप से एनक्रोचमेंट एक्ट का विधिवत पालन किए बिना ही ध्वस्त कर दी गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वही भूमि के टुकड़े पहले भी कार्यवाहियों के अधीन रहे हैं और वे अथवा उनके पूर्ववर्तियों ने उन कार्यवाहियों में सफलता पूर्वक प्रतिरोध किया था।

माननीय एकल न्यायाधीश ने कारण-पत्रों में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। इसके बजाय, न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे सर्किल अधिकारी के समक्ष उपस्थित हों, अपनी आपत्तियाँ दाखिल करें, और वहीं पर उनके दावे तय किए जाएँ, जिसमें उनकी यह प्रारंभिक आपत्ति भी शामिल हो कि सारगर्भित (समरी) बेदखली अनुमन्य नहीं है। नोटिसों को रद्द करने से इनकार से आहत होकर, वर्तमान अपीलकर्ताओं ने लेटर्स पेटेंट अपीलें दायर कीं।

न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया

खंडपीठ ने, माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा बोले गए निर्णय में, जिसमें माननीय श्री न्यायमूर्ति पार्थ सारथी ने सहमति व्यक्त की, तीन व्यापक पहलुओं की जाँच की: चुनौती का स्वरूप (केवल कारण-पत्रों तक सीमित), पुराने मामलों से उत्पन्न पुनर्विचार-निषेध (res judicata) की दलील, और यह आरोप कि जहाँ शीर्षक (टाइटल) विवादित है वहाँ राज्य एनक्रोचमेंट एक्ट के अंतर्गत सारगर्भित शक्तियों का उपयोग नहीं कर सकता।

पहले, न्यायालय ने उल्लेख किया कि तीनों रिट याचिकाएँ, और इस प्रकार अपीलें भी, बिहार पब्लिक लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट, 1956 के तहत जारी किए गए कारण-पत्रों के विरुद्ध निर्देशित थीं। बेदखली का कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया था। एक मामले में जबरन ध्वस्तीकरण का अतिरिक्त आरोप था, लेकिन मुख्य कानूनी हमला फिर भी नोटिसों पर ही था।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इसी भूमि पर पूर्व में दो बार बेदखली की कार्यवाही चलाई गई थी: एक बार 1953 में और पुनः 1970 के दशक में। 1953 में, तब के बिहार लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट, 1950 के तहत मामले शुरू किए गए थे। अपर अनुमंडलीय पदाधिकारी (Additional S.D.O.), पूर्णिया ने यह माना कि नोटिसधारी अनधिकृत कब्जाधारी नहीं थे या, यदि थे भी, तो 1952 के संशोधित अधिनियम के तहत सारगर्भित बेदखली अनुमन्य नहीं थी। यद्यपि कलेक्टर ने इस निष्कर्ष को पलट दिया, पर आयुक्त और तत्पश्चात रेवेन्यू बोर्ड ने पुनः S.D.O. की खोजों को बहाल कर दिया।

विवाद का दूसरा चरण पटना उच्च न्यायालय के समक्ष Ritlal Chaudhary and Others v. The District Magistrate, Purnea, 1997 (25) BLJR 581 नामक रिट याचिका में आया। वहाँ 37 याचिकाकर्ताओं ने गुलाबबाग वार्ड, पूर्णिया नगरपालिका क्षेत्र में स्थायी आवासीय सह व्यावसायिक संरचनाओं का दावा किया, जो कथित रूप से 1950 से पूर्व से अस्तित्व में थीं और जिन्हें नगरपालिका की स्वीकृति प्राप्त थी।

उस मामले में, लेटरल प्रोजेक्ट डिवीजन No.1, बहादुरगंज, पूर्णिया के कुछ अधिकारियों ने 1975 में दौरा किया, याचिकाकर्ताओं के परिसर के हिस्सों का सीमांकन किया और ध्वस्तीकरण का निर्देश दिया। Ritlal Chaudhary में न्यायालय ने यथास्थिति (status quo) बनाए रखने का आदेश दिया और अंततः यह माना कि याचिकाकर्ताओं को बलपूर्वक बेदखल नहीं किया जा सकता। बेदखली केवल विधि-सम्मत प्रक्रिया के द्वारा, किसी उपयुक्त विधान, जिसमें सिविल प्रक्रिया संहिता भी शामिल है, के तहत ही की जा सकती है।

वर्तमान अपीलकर्ताओं ने इन पुराने मामलों पर भारी भरोसा किया। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि चूँकि पूर्ववर्ती प्राधिकारियों और उच्च न्यायालय ने सारगर्भित बेदखली को अनुमन्य नहीं माना था, राज्य को पुनर्विचार-निषेध (res judicata) के सिद्धांत द्वारा फिर से एनक्रोचमेंट एक्ट के तहत कार्यवाही शुरू करने से रोका गया है। उन्होंने कहा कि जहाँ संपत्ति पर “अधिकार की झलक” (semblance of right) हो, वहाँ शीर्षक और कब्जे से जुड़े प्रश्न इतने जटिल होते हैं कि उन्हें सारगर्भित कार्यवाही में नहीं बल्कि सिविल न्यायालय में ले जाया जाना चाहिए।

इसे समर्थन देने के लिए उन्होंने कई नज़ीरें उद्धृत कीं, जिनमें वे निर्णय शामिल थे जिनमें कहा गया कि मनमाना ध्वस्तीकरण विधिसम्मत डिक्री द्वारा की जाने वाली बेदखली का विकल्प नहीं हो सकता, कि दीर्घकालीन स्थिर कब्जे को विधि का पालन किए बिना बाधित नहीं किया जा सकता, और कि पूर्व के निर्णय बाद की कार्यवाहियों में भी पुनर्विचार-निषेध के रूप में लागू हो सकते हैं।

दूसरी ओर, राज्य की ओर से उपस्थित महाधिवक्ता ने यह दलील दी कि वर्तमान मामला राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (N.H.A.I.) की भूमि पर अतिक्रमण से संबंधित है। कहा गया कि सड़क, जो मूल रूप से 170 फीट चौड़ी थी, पूर्णिया नगर के अंदर इन अतिक्रमणों के कारण घटकर 60 फीट रह गई है। राज्य ने यह रुख रखा कि राजस्व अभिलेखों में जमाबंदी N.H.A.I. के नाम चल रही है, और अपीलकर्ताओं के पास कोई अधिकार या शीर्षक नहीं है।

राज्य ने आगे तर्क दिया कि ऐसा कोई सामग्री नहीं है जो यह दिखाए कि वर्तमान कब्जाधारी वे कानूनी उत्तराधिकारी हैं जिन्होंने 1953 की कार्यवाही लड़ी थी। न ही उन्होंने यह स्थापित किया कि जिन संपत्तियों का अभी प्रश्न है, वे वही हैं। उत्तराधिकार और संपत्ति की समानता का स्पष्ट प्रमाण बिना, अपीलकर्ता पूर्व आदेशों का लाभ उठाकर पुनर्विचार-निषेध का दावा नहीं कर सकते। यह भी रेखांकित किया गया कि स्वयं N.H.A.I. को रिट याचिकाओं में पक्षकार नहीं बनाया गया था।

माननीय एकल न्यायाधीश ने जिलाधिकारी के प्रत्युत्तर हलफनामे से यह दर्ज किया था कि एक राजा पी.सी. लाल द्वारा कथित रूप से जारी कबूलियतें कब्जाधारियों के पक्ष में विवादित थीं। कलेक्टर के अनुसार, न तो जिला बोर्ड, पूर्णिया और न ही N.H.A.I. ने भूमि को रिट याचिकाकर्ताओं या उनके पूर्वजों के पक्ष में बसाया था, और याचिकाकर्ता अनधिकृत कब्जाधारी थे। नगर निगम ने भी इस रुख का समर्थन किया।

एकल न्यायाधीश ने यह भी नोट किया कि अधिकांश याचिकाकर्ताओं ने कोई सहायक दस्तावेज संलग्न नहीं किए थे। बड़ी संख्या में याचिकाकर्ता थे जो अलग-अलग दावों और संरचनाओं के तहत अलग-अलग भूखंडों पर कब्जे में प्रतीत होते थे। C.W.J.C. No.17688 of 2022 में, केवल प्रथम याचिकाकर्ता द्वारा एक किराया रसीद (Annexure-1) दाखिल की गई थी। किसी अन्य याचिकाकर्ता ने कोई शीर्षक या किरायेदारी कागजात दाखिल नहीं किए।

खंडपीठ ने माना कि इससे अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हुईं। प्रथम, एक रिट याचिका में अनेक याचिकाकर्ता थे जो यद्यपि समान कानूनी प्रतिवेदन कर रहे थे, परंतु विभिन्न स्रोतों से अलग-अलग भूमि के टुकड़ों पर अधिकार का दावा कर रहे थे, जिससे पक्षकारों का अनुचित संयुक्तिकरण (mis-joinder) हुआ। द्वितीय, एक आवश्यक पक्ष, अर्थात N.H.A.I., जिसका नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज था, को पक्षकार नहीं बनाया गया था, जिससे आवश्यक पक्षकार का अभाव (non-joinder) उत्पन्न हुआ। तृतीय, उत्तराधिकार और संपत्ति की समानता के सबूत के अभाव में, पूर्व की कार्यवाहियों को वर्तमान अपीलकर्ताओं पर लागू करना असंभव था।

इसके बाद न्यायालय ने यह प्रश्न देखा कि किस स्थिति में रिट याचिका द्वारा कारण-पत्रों को चुनौती दी जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Union of India & Anr. v. Kunisetty Satyanarayana, (2006) 12 SCC 28, और Oryx Fisheries Private Limited v. Union of India & Ors., (2010) 13 SCC 427 पर भरोसा करते हुए, खंडपीठ ने पुनः दोहराया कि किसी कारण-पत्र के विरुद्ध दायर रिट प्रायः समय से पूर्व और अव्यवहार्य (not maintainable) होते हैं। केवल उन विरले मामलों में, जहाँ नोटिस पूर्णत: अधिकार-क्षेत्र से परे हो या स्पष्ट रूप से अवैध हो, उच्च न्यायालय हस्तक्षेप करेगा।

स्वयं कारण-पत्र किसी के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता। कथित क्षति तब ही उत्पन्न होती है जब कोई अंतिम प्रतिकूल आदेश पारित किया जाता है। इस सिद्धांत को लागू करते हुए न्यायालय ने माना कि वर्तमान अवस्था में एनक्रोचमेंट एक्ट के तहत जारी नोटिसों को रद्द करना उपयुक्त नहीं है। अपीलकर्ताओं के पास अभी भी सर्किल अधिकारी के समक्ष आपत्तियाँ दाखिल करने और दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर है।

यह दलील कि जहाँ शीर्षक का वास्तविक विवाद हो वहाँ एनक्रोचमेंट एक्ट के तहत सारगर्भित बेदखली अनुमन्य नहीं है, पर खंडपीठ ने यह अवलोकन किया कि ऐसे कानूनी तर्क स्वयं प्राधिकारी के समक्ष उठाए जा सकते हैं। न्यायालय ने इस स्तर पर अपीलकर्ताओं द्वारा उद्धृत नज़ीरों को अस्वीकार नहीं किया, पर यह कहा कि उन निर्णयों पर तभी विचार किया जा सकता है जब अपीलकर्ता पहले भूमि पर कुछ prima facie, bona fide अधिकार दिखा दें।

महत्वपूर्ण रूप से, खंडपीठ ने पूर्ववर्ती खंडपीठ निर्णय Ritlal Chaudhary का परीक्षण किया। यह स्पष्ट किया गया कि उस पूर्व निर्णय ने केवल बिना किसी कार्यवाही के बलपूर्वक, आकस्मिक (peremptory) ध्वस्तीकरण को रोका था। उसने एनक्रोचमेंट एक्ट के उपयोग को निषिद्ध नहीं किया था। उलटे, उसने स्पष्ट रूप से कहा था कि बेदखली किसी भी उपयुक्त विधान, जिसमें सिविल प्रक्रिया संहिता भी शामिल है, के तहत की जा सकती है। अतः, उचित प्रक्रिया अपनाए जाने की शर्त पर, एनक्रोचमेंट एक्ट के तहत नई कार्यवाही शुरू किए जाने पर कोई पुनर्विचार-निषेध लागू नहीं होता।

न्यायालय ने आगे इंगित किया कि 1950 के दशक की पहली कार्यवाहियाँ एक भिन्न अधिनियम के अंतर्गत की गई थीं और उनमें सीधे तौर पर वर्तमान अपीलकर्ता पक्षकार नहीं थे। चूँकि उन्होंने न तो अपने को मूल पक्षकारों के उत्तराधिकारी के रूप में और न ही भूमि के एक ही होने के रूप में कोई सामग्री प्रस्तुत की, वे अभी तक उन आदेशों को अपने पक्ष में बाध्यकारी मानकर भरोसा नहीं कर सकते।

इन निष्कर्षों के आलोक में, खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश द्वारा अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण रिट अधिकार-क्षेत्र का प्रयोग करने से इंकार को बरकरार रखा। साथ ही, खंडपीठ ने प्रशासनिक स्तर पर निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु कुछ संरक्षण और निर्देश भी दिए।

न्यायालय ने अपीलकर्ताओं को निर्णय के अपलोड होने की तिथि से एक माह के भीतर कारण-पत्रों के विरुद्ध विधिवत आपत्तियाँ दाखिल करने की अनुमति दी। एनक्रोचमेंट एक्ट के तहत प्राधिकारी (सर्किल अधिकारी या सक्षम अधिकारी) को निर्देशित किया गया कि वे प्रत्येक अपीलकर्ता को अलग-अलग नोटिस जारी करें और अलग-अलग भूखंडों के लिए अलग-अलग कार्यवाही चलाएँ।

न्यायालय ने कहा कि प्राधिकारी को प्रत्येक मामले में यह प्रथमदृष्टया (prima facie) राय बनानी होगी कि सारगर्भित कार्यवाही अनुमन्य है या नहीं। विशेष रूप से, उसे यह देखना होगा कि क्या संबंधित याचिकाकर्ता ने संपत्ति पर किसी प्रकार के अधिकार की झलक स्थापित की है। केवल ऐसी विचारणा के बाद, और प्रत्येक अपीलकर्ता या उनके अधिकृत प्रतिनिधि को व्यक्तिगत सुनवाई देने के पश्चात ही, कोई बोलता हुआ (speaking) आदेश पारित किया जा सकता है।

यदि किसी व्यक्तिगत अपीलकर्ता के विरुद्ध कोई प्रतिकूल आदेश पारित किया जाता है, तो प्राधिकरणों को एक माह तक “अपने हाथ रोके” रखना होगा। यह विराम इस उद्देश्य से है कि प्रभावित व्यक्ति, यदि चाहे, तो उपयुक्त कार्यवाही, जिसमें वैधानिक अपीलें या सिविल वाद शामिल हैं, शुरू कर सके।

जहाँ तक एक रिट याचिका में यह आरोप है कि ध्वस्तीकरण पहले ही बिना समुचित नोटिस के कर दिया गया था, खंडपीठ ने माना कि ऐसे दावे को सक्षम सिविल न्यायालय के समक्ष स्थापित करना होगा। यदि व्यक्तिगत अपीलकर्ता चाहें, तो क्षतिपूर्ति के लिए सिविल वाद दायर कर सकते हैं। उच्च न्यायालय ने इन अपीलों में उस तथ्यात्मक प्रश्न का निर्णय नहीं किया।

अंत में, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने अपीलकर्ताओं के कथित उत्तराधिकार या संपत्तियों पर उनके दावों के गुण-दोष पर कोई मत व्यक्त नहीं किया है। ऐसे सभी प्रश्न उपयुक्त प्राधिकारी या न्यायालय द्वारा तय किए जाने के लिए खुले रहेंगे। इन अवलोकनों और आरक्षणों के साथ, लेटर्स पेटेंट अपीलों को निरस्त कर दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो सरकारी दावेदारी वाली भूमि पर रहते या व्यापार करते हैं, खासकर बिहार के राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे। यह स्पष्ट करता है कि पटना उच्च न्यायालय सामान्यतः बिहार पब्लिक लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट के तहत कारण-पत्र (शो-कॉज़ नोटिस) के स्तर पर कार्यवाहियों को नहीं रोकेगा।

यदि किसी को ऐसा नोटिस प्राप्त होता है, तो यह निर्णय स्पष्ट कर देता है कि उसे पहले सर्किल अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपने दस्तावेज और तर्क पेश करने होंगे। केवल यदि उसके दावे में कोई वास्तविक आधार दिखता है और इसके बावजूद प्राधिकारी बेदखली का आदेश देता है, तभी वह उच्च प्राधिकार या न्यायालयों के समक्ष जा सकता है।

निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि पूर्व में दिए गए वे आदेश जो जबरन बेदखली से निवासियों की रक्षा करते थे, अपने आप राज्य को बाद में एनक्रोचमेंट एक्ट जैसे विधिसम्मत उपायों के उपयोग से नहीं रोकते। पुराने निर्णय तभी मदद करेंगे जब वर्तमान कब्जाधारी यह सिद्ध कर सकें कि वे पूर्ववर्ती वादों में विजयी पक्षों के कानूनी उत्तराधिकारी हैं और भूमि वही है।

इसके साथ ही, निर्णय कुछ संरक्षण भी प्रदान करता है: प्राधिकारी को व्यक्तिगत सुनवाई देनी होगी, कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा, और प्रतिकूल आदेश के बाद ज़बरदस्ती की कार्यवाही करने से पहले एक माह प्रतीक्षा करनी होगी ताकि व्यक्ति अपीलीय या सिविल मंचों पर जा सके। पहले से ध्वस्त संरचनाओं के संबंध में दावे भी बंद नहीं किए गए हैं, पर उन्हें क्षतिपूर्ति हेतु सिविल न्यायालय में ले जाना होगा।

कानूनी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या पटना उच्च न्यायालय, रिट अधिकार-क्षेत्र में, बिहार पब्लिक लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट, 1956 के तहत जारी कारण-पत्रों को इन परिस्थितियों में रद्द कर सकता है?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि ऐसे नोटिसों के विरुद्ध रिट याचिकाएँ सामान्यतः समय से पूर्व होती हैं। अपीलकर्ताओं को पहले एनक्रोचमेंट एक्ट के प्राधिकारी के समक्ष आपत्तियाँ दाखिल करनी होंगी, जो उनके दावों पर निर्णय करेगा।
  • प्रश्न: क्या 1950 के दशक की पूर्ववर्ती कार्यवाहियाँ और Ritlal Chaudhary का निर्णय, उसी भूमि पर नई अतिक्रमण कार्यवाहियों को रोकने के लिए पुनर्विचार-निषेध (res judicata) के रूप में लागू होते हैं?
    उत्तर: इस स्तर पर नहीं। न्यायालय को ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि वर्तमान अपीलकर्ता पूर्व पक्षकारों के उत्तराधिकारी हैं या कि भूमि समान है, और यह स्पष्ट किया गया कि Ritlal Chaudhary ने केवल बिना विधि-सम्मत प्रक्रिया के बलपूर्वक बेदखली को रोका था।
  • प्रश्न: क्या जब दीर्घकालीन कब्जाधारी अधिकार का दावा करते हैं, तब राज्य को अनिवार्य रूप से सिविल न्यायालय जाना चाहिए और एनक्रोचमेंट एक्ट के तहत सारगर्भित बेदखली का सहारा नहीं ले सकता?
    उत्तर: न्यायालय ने कोई पूर्ण निषेध नहीं लगाया। उसने माना कि एनक्रोचमेंट एक्ट का प्राधिकारी पहले यह जाँच करेगा कि क्या कब्जाधारियों ने अधिकार की कोई झलक दिखाई है; यदि नहीं, तो सारगर्भित कार्यवाही आगे बढ़ सकती है, जो आगे उपलब्ध कानूनी उपचारों के अधीन होगी।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Ritlal Chaudhary and Others v. The District Magistrate, Purnea, 1997 (25) BLJR 581.
  • Commissioner of Central Excise, Haldia v. M/s Krishna Wax Private Ltd., (2020) 12 SCC 572.
  • Union of India & Anr. v. Kunisetty Satyanarayana, (2006) 12 SCC 28.
  • Oryx Fisheries Private Limited v. Union of India & Ors., (2010) 13 SCC 427.
  • M/s Hindusthan Petroleum Corporation v. State of Bihar, AIR 1996 Patna 163.
  • Amrit Varsha Hindi Dainik v. Bihar State Agriculture Marketing Board and Another, 1999 (1) PLJR 1.
  • Sopan Sukhdev Sable v. Assistant Charity Commissioner, (2004) 3 SCC 137.
  • Krisha Ram Mahale v. Shobha Venkat Rao, (1989) 4 SCC 131.
  • Gulabchand Chotalal Parikh v. State of Gujarat, AIR 1965 SC 1153.

मामले का विवरण

मामला संख्या:

  • Letters Patent Appeal No. 899 of 2024 in C.W.J.C. No.17688 of 2022
  • Letters Patent Appeal No. 883 of 2024 in C.W.J.C. No.17689 of 2022
  • Letters Patent Appeal No. 926 of 2024 in C.W.J.C. No.727 of 2023 (as per heading in judgment body)

मामले का शीर्षक:

  • Hari Kishan Sharma @ Hari Maharaj & Ors. v. The State of Bihar & Ors. (L.P.A. No. 899 of 2024)
  • Bijay Kumar Poddar & Anr. v. The State of Bihar & Ors. (L.P.A. No. 883 of 2024)
  • Arjun Kumar Sah v. The State of Bihar & Ors. (L.P.A. No. 926 of 2024)

कोरम:

  • Hon’ble the Chief Justice (K. Vinod Chandran, CJ)
  • Hon’ble Mr. Justice Partha Sarthy

उद्धरण: 2024(4) PLJR 527

अधिवक्ता:

  • अपीलकर्ताओं की ओर से L.P.A. No. 899 of 2024 में: Mr. Y.V. Giri, Senior Advocate; Ms. Shrishti Singh, Advocate
  • अपीलकर्ताओं की ओर से L.P.A. No. 883 of 2024 में: Mr. Y.V. Giri, Senior Advocate; Ms. Shrishti Singh, Advocate
  • अपीलकर्ताओं की ओर से L.P.A. No. 926 of 2024 में: Mr. Siya Ram Sahi, Senior Advocate; Mr. Kameshwar Pd. Singh, Advocate; Mr. Jitendra Kumar Pandey, Advocate
  • राज्य की ओर से सभी अपीलों में: Mr. P.K. Shahi, Advocate General; Mr. Vivek Prasad, GP-7; Mr. Arun Kumar Bhagat, AC to AAG-12 (in L.P.A. No. 926 of 2024)
  • नगर निगम, पूर्णिया की ओर से: Mr. Prince Kumar Mishra, Advocate

मामले का स्वरूप: बिहार पब्लिक लैंड एनक्रोचमेंट एक्ट, 1956 के तहत कारण-पत्रों और कथित ध्वस्तीकरण कार्यवाहियों को चुनौती देते हुए संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर रिट याचिकाओं की खारिजी के विरुद्ध लेटर्स पेटेंट अपीलें।

निर्णय की तिथि: 07-10-2024

निर्णय की लिंक: Patna High Court Judgment – 07.10.2024


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