मामले की पृष्ठभूमि
विवाद पटना के मेनपुरा स्थित एक छोटे भूखंड से संबंधित है, जहां शिवपुरी नाला के दोनों ओर आवासीय मकान और दुकानें स्थित हैं।
विपक्षी पक्ष सं. 1 (जो वाद में वादी हैं) ने अपने भाइयों (प्रोफार्मा प्रतिवादी सं. 5 और 6) के साथ मिलकर, 7.5 डेसिमल भूमि, खाता सं. 1457 और 1459, दिनांक 12.06.1982 के पंजीकृत बिक्री विलेख द्वारा क्रय की। बाद में उनके नाम 2007 के जमाबंदी सं. 10391 में राजस्व अभिलेखों में दर्ज (म्यूटेशन) कर दिए गए।
क्रय के बाद यह तथ्य सामने आया कि उक्त भूमि का एक भाग राज्य द्वारा 20 फीट चौड़ी नाली और दो 10 फीट चौड़े मार्गों के लिए अधिगृहीत कर लिया गया था। इसके कारण मूल प्लॉट दो भागों में बंट गया। वादी पक्ष ने एक मकान और चार दुकानें बनवाईं: नाली और मार्ग के दक्षिणी हिस्से में मकान तथा उत्तरी हिस्से में चार दुकानें।
सन् 1994 में पारिवारिक विभाजन हुआ। वादपत्र के अनुसार, नाली के उत्तरी भाग का मकान तथा दक्षिणी भाग की एक दुकान वादी के हिस्से में आई, जबकि शेष तीन दुकानें उसके भाइयों (प्रोफार्मा प्रतिवादियों) के साथ संयुक्त रहीं।
इन चार दुकानों के ठीक उत्तर में, सर्वे प्लॉट सं. 1459 के एक हिस्से पर, प्रतिवादी सं. 4 के विक्रेता ने, जो वर्तमान दीवानी पुनरीक्षण में याचिकाकर्ता हैं, लगभग 1987 के आसपास तीन-मंज़िला मकान बनाया। याचिकाकर्ता ने बाद में 03.07.2010 को वह संपत्ति क्रय कर ली।
वादी का आरोप है कि याचिकाकर्ता के बिक्री विलेख में 2 धुर और 18 धुरकी “अधिक” क्षेत्रफल गलत रूप से जोड़ दिया गया, जबकि विक्रेता के पास वह अतिरिक्त भूमि न तो स्वामित्व में थी और न ही कब्जे में। इसी आधार पर, वादपत्र के अनुसार, याचिकाकर्ता ने उस अतिरिक्त भाग पर दावा करना शुरू किया और वादी पर अतिक्रमण का आरोप लगाया।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने उपसमाहर्ता भू-सुधार (D.C.L.R.), सदर, पटना के समक्ष बिहार भूमि विवाद निपटारा वाद सं. 93/2011-12 दायर किया। उसने दावा किया कि वादी ने उसके घर की भूमि और सड़क के हिस्से पर अतिक्रमण कर वहां दुकानें बना ली हैं। वादी के भाई, यद्यपि सह-क्रेता थे, प्रारंभ में पक्षकार नहीं बनाए गए; केवल वादी और उसके पति को ही पक्षकार बनाया गया।
20.03.2012 को D.C.L.R. ने वाद स्वीकृत करते हुए विवादित भूमि से सभी चार दुकानों को हटाने का निर्देश दिया। वादी ने आयुक्त, पटना के समक्ष वाद सं. 173/2012 में अपील की, जिसे 28.02.2013 / 21.03.2013 के आदेशों से खारिज कर दिया गया।
इसके पश्चात वादी ने पटना उच्च न्यायालय में C.W.J.C. सं. 10125/2013 दायर किया। वह रिट याचिका 15.05.2013 को इस स्वतंत्रता के साथ खारिज कर दी गई कि वादी बिहार भूमि अधिकरण (Bihar Land Tribunal) में जा सकती है। उसने B.L.T. वाद सं. 321/2013 दायर किया, जिसे 14.06.2013 को इस आधार पर वापस लिए जाने के रूप में खारिज कर दिया गया कि अधिकरण ने धारा 4, बिहार भूमि विवाद निपटारा अधिनियम के अंतर्गत मामले को बाधित माना और संकेत दिया कि उचित उपाय कहीं और है।
इसके बाद वादी ने संशोधन याचिका M.J.C. सं. 3436/2013 दायर की, जिसमें C.W.J.C. सं. 10125/2013 में पारित उच्च न्यायालय के आदेश में संशोधन का अनुरोध किया गया। 11.07.2013 को इस न्यायालय ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पटना को पक्षकारों के बिक्री विलेखों की वास्तविकता की जांच करने और भूमि माप हेतु सर्वे पुनरीक्षण आयुक्त नियुक्त करने का निर्देश दिया। बाद में 25.07.2013 के आदेश से इस संशोधन याचिका को खारिज कर दिया गया।
तदुपरांत वादी ने उक्त 11.07.2013 और 25.07.2013 के आदेशों के विरुद्ध L.P.A. सं. 1052/2013 दायर किया। खंडपीठ ने यह कहते हुए उन आदेशों को अधिकार-क्षेत्रहीन (without jurisdiction) माना कि वे पहले से निपटाए जा चुके रिट याचिका में पारित किए गए थे, जबकि न्यायालय functus officio हो चुका था।
इसी बीच, वादी ने पुनः अधिकरण और आयुक्त के आदेशों को चुनौती देते हुए C.W.J.C. सं. 18093/2013 दायर किया। यह रिट 19.09.2013 को खारिज कर दी गई। बाद में खंडपीठ ने, वादी द्वारा वैकल्पिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता मांगने पर, L.P.A. सं. 1289/2013 को 21.10.2013 को वापस लेने की अनुमति के साथ खारिज कर दिया।
अलग से, वादी के भाई (प्रोफार्मा प्रतिवादी) ने मूल D.C.L.R. आदेश दिनांक 20.03.2012 के विरुद्ध C.W.J.C. सं. 16583/2013 दायर किया। उच्च न्यायालय ने 05.12.2013 को उस D.C.L.R. आदेश को निरस्त करते हुए उन्हें पक्षकार बनाकर पुनः सुनवाई का निर्देश दिया।
पुनः सुनवाई के बाद, D.C.L.R. ने 10.12.2014 को भूमि विवाद वाद सं. 93/2011-12 में पुनः याचिकाकर्ता (प्रतिवादी सं. 4) के पक्ष में निर्णय देते हुए वादी और उसके भाइयों को अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया। प्रोफार्मा प्रतिवादियों ने तब आयुक्त, पटना के समक्ष भूमि विवाद अपील सं. 633/2015 और 21/2015 दायर कीं।
चूंकि वादी के अनुसार विवाद भूमि के शीर्षक से संबंधित है – जो केवल दीवानी न्यायालय ही तय कर सकता है – अतः उसने उप न्यायाधीश-1, पटना के समक्ष शीर्षक वाद सं. 463/2015 दायर किया। इसमें उसने अनुसूची-II भूमि पर अपने शीर्षक और कब्जे की घोषणा, यह घोषणा कि अनुसूची-II उसकी 12.06.1982 को क्रय की गई रायती भूमि का हिस्सा है, 10.12.2014 के D.C.L.R. आदेश को शून्य और अपने प्रति गैर-बाध्यकारी घोषित करने तथा निर्माणों के ध्वस्तीकरण पर अस्थायी निषेधाज्ञा की प्रार्थना की।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
दीवानी वाद दायर होने के बाद, प्रतिवादी सं. 4 (वर्तमान याचिकाकर्ता) उपस्थित हुआ और दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के अंतर्गत वादपत्र को प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकृत करने का आवेदन दायर किया।
उसने निचली अदालत के समक्ष तर्क दिया कि वादी ने पूर्व की अनेक वाद-व्यवस्थाओं, जिनमें पटना उच्च न्यायालय में विभिन्न रिट याचिकाएं और लेटर्स पेटेंट अपीलें, बिहार भूमि अधिकरण की कार्यवाही और बिहार भूमि विवाद निपटारा अधिनियम के अंतर्गत पारित आदेश शामिल हैं, के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपा लिया है। उसके अनुसार उच्च न्यायालय पहले ही प्रमुख मुद्दों का निस्तारण कर चुका है, जिससे वादी के पास अब कोई कारण-कार्रवाई शेष नहीं रह गई।
याचिकाकर्ता ने यह भी इंगित किया कि वादपत्र के पैरा 19 में वादी ने स्वीकार किया है कि उसके विक्रेता की 7.5 डेसिमल भूमि में से 5 डेसिमल नाली और मार्गों के लिए अधिगृहीत हो गई। इस प्रकार उसके पास केवल 2.5 डेसिमल बचनी चाहिए। फिर भी, पूर्व में प्लीडर कमिश्नर की माप रिपोर्ट के अनुसार वह कथित रूप से इससे अधिक भूमि पर कब्जे में है। उसने इस बात पर जोर दिया कि सीमा-विवाद बिहार भूमि विवाद निपटारा अधिनियम के अंतर्गत उसके पक्ष में तय हो चुका है और वाद कष्टदायक, निराधार तथा अप्रासंगिक या कल्पित कथनों पर आधारित है।
हालांकि, निचली अदालत ने 08.06.2016 के अपने आदेश से उसके आदेश VII नियम 11 के आवेदन को खारिज कर दिया। न्यायालय ने यह ध्यान दिलाया कि प्रतिवादी के आवेदन में स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया गया कि आदेश VII नियम 11 की किस उपधारा के अंतर्गत उसे दायर किया गया है, जबकि प्रत्येक उपधारा वादपत्र अस्वीकृति के लिए पृथक आधार प्रदान करती है। न्यायालय ने माना कि न तो वादपत्र का कोई भाग आदेश VII नियम 11 के दायरे में आता है, और न ही प्रतिवादी के आवेदन में वादपत्र अस्वीकृति का कोई वैध आधार प्रकट होता है।
असंतुष्ट होकर, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल पुनरीक्षण सं. 133/2016 दायर किया। वह स्वयं उपस्थित हुआ और निचली अदालत के आदेश पर कई आधारों पर प्रहार किया।
उसका आग्रह था कि उच्च न्यायालय ने पूर्व रिट कार्यवाहियों में पहले ही यह दर्ज कर दिया था कि L.A. सं. 50/1975-76 में भूमि अधिग्रहण के बाद, वादी के विक्रेता के पास अपनी स्वामित्व भूमि से अधिक भूमि बेचने का कोई अधिकार नहीं बचा था। उसने C.W.J.C. सं. 3901/2014 में दिनांक 19.09.2014 के आदेश तथा C.W.J.C. सं. 5340/2015 (निर्णीत 22.07.2015) पर भरोसा किया, जिसमें वादी की रिट याचिका खारिज हुई थी, और उससे उत्पन्न L.P.A. का निर्णय 11.04.2017 को हुआ, जिसमें कार्यवाही का दुरुपयोग और न्यायालय का समय नष्ट करने के लिए उस पर 50,000/- रुपये का दंड लगाया गया। उसके अनुसार, ऐसे सभी आदेशों का वादपत्र में उल्लेख न कर, वादी ने गंभीर दमन (gross concealment) किया।
उसने पटना उच्च न्यायालय के निर्णय Bhagirath Prasad Singh @ Bachcha Babu बनाम Ram Narayan Rai @ Ram Narayan Singh एवं अन्य, (2013) 1 PLJR 738 पर भरोसा किया, जिसमें महत्वपूर्ण तथ्यों के दमन को वादपत्र अस्वीकृति का आधार माना गया था। उसने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Sopan Sukhdeo Sable एवं अन्य बनाम Assistant Charity Commissioner एवं अन्य, (2004) 3 SCC 137, T. Arivandandam बनाम T.V. Satyapal एवं अन्य, (1977) 4 SCC 467 तथा पटना उच्च न्यायालय के सिविल पुनरीक्षण (Alok Ranjan Pandey एवं अन्य बनाम Ram Bachan Choudhary एवं अन्य, 2015 SCC OnLine Pat 10057) का भी हवाला दिया, यह तर्क देने के लिए कि न्यायालयों को आदेश VII नियम 11 CPC के अंतर्गत निराधार वादों को आरंभिक स्तर पर ही अलग कर देना चाहिए।
दूसरी ओर, वादी (विपक्षी पक्ष सं. 1) के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए किसी भी आधार का समावेश आदेश VII नियम 11 की किसी उपधारा में नहीं होता। उन्होंने बल देकर कहा कि शीर्षक विवादों का अंतिम निस्तारण न तो रिट न्यायालयों द्वारा, और न ही बिहार भूमि विवाद निपटारा अधिनियम के अंतर्गत की गई कार्यवाहियों द्वारा हो सकता है; ऐसे विवादों का निर्णय केवल सक्षम दीवानी न्यायालय ही कर सकता है।
उन्होंने Maheshwar Mandal एवं अन्य बनाम The State of Bihar एवं अन्य, (2014) 3 PLJR 281 पर भरोसा किया, जिसमें इस न्यायालय ने माना कि बिहार भूमि विवाद निपटारा अधिनियम के अंतर्गत D.C.L.R. और अन्य प्राधिकारी दीवानी शीर्षक के प्रश्नों पर निर्णय देने के अधिकार-क्षेत्र से रहित हैं। उन्होंने यह भी निवेदन किया कि आदेश VII नियम 11 के आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय केवल वादपत्र को देख सकता है, प्रतिवादी की प्रतिरक्षा या उसके दस्तावेजों को नहीं। इस स्तर पर वादपत्र की समस्त कथनों को सत्य मानना होता है और वाद तभी अस्वीकृत किया जा सकता है जब वह कोई कारण-कार्रवाई प्रस्तुत न करता हो या अपने आप में कानून द्वारा बाधित हो।
न्यायमूर्ति खेतिम रज़ा ने इसके बाद विधिक स्थिति का विस्तार से उल्लेख किया। आदेश VII नियम 11 CPC केवल कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही वादपत्र की अस्वीकृति की अनुमति देता है: जब वादपत्र कोई कारण-कार्रवाई प्रकट नहीं करता, जब मांगा गया राहत कम मूल्यांकित हो या अपर्याप्त स्टाम्प पर हो और सुधार न किया गया हो, जब वाद अपने आप में ही वादपत्र से स्पष्ट रूप से कानून द्वारा बाधित प्रतीत हो, जब वादपत्र प्रतिलिपि में दायर न किया गया हो, अथवा जब समन की सेवा से संबंधित नियम 9 का पालन न किया गया हो।
महत्वपूर्ण रूप से, न्यायालय ने माना कि महत्वपूर्ण तथ्यों का दमन अपने आप में नियम 11 में उल्लिखित किसी भी आधार में नहीं आता। न तो दमन, न मिथ्याप्रस्तुति, न ही यहां तक कि कपट, और न ही न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को नियम 11 में वादपत्र अस्वीकृति के प्रत्यक्ष आधार के रूप में उल्लेखित किया गया है। केवल उपधारा (a) और (d) कारण-कार्रवाई के अभाव और कानून द्वारा बाधा की बात करती हैं, और इनका परीक्षण केवल वादपत्र और उसके साथ दायर दस्तावेजों के आधार पर ही किया जाना है।
इस सिद्धांत के समर्थन में न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों पर भरोसा किया, जिनमें Saleem Bhai एवं अन्य बनाम State of Maharashtra एवं अन्य, (2003) 1 SCC 557, Dahiben बनाम Arvind Bhai Kalyanji Bhanusali, (2020) SCC OnLine SC 563 तथा Liverpool & London S.P. & I Assn. Ltd. बनाम M.V. Sea Success I एवं अन्य, (2007) 5 SCC 614 शामिल हैं। इन निर्णयों में रेखांकित किया गया है कि आदेश VII नियम 11 के आवेदन पर निर्णय करते समय केवल वादपत्र में किए गए कथनों को, जो समग्र रूप से और सत्य मानकर पढ़े जाते हैं, ही परखा जा सकता है। इस स्तर पर न्यायालय उनकी सत्यता की जांच नहीं कर सकता, न ही प्रतिवादी के संस्करण पर भरोसा कर सकता है।
तथ्यों के दमन के संदर्भ में न्यायालय ने T. Arivandandam (1977) 4 SCC 467 का विश्लेषण किया। उस वाद में यह जोर दिया गया था कि यदि एक सार्थक पठन से वादपत्र स्पष्ट रूप से कष्टदायक और निराधार प्रतीत हो तथा कोई स्पष्ट वाद-अधिकार (right to sue) प्रकट न करता हो, तो न्यायालय को आदेश VII नियम 11 के अंतर्गत उसे अस्वीकृत कर देना चाहिए और, आवश्यकता पड़ने पर, आदेश X CPC के तहत पक्षकार से जिरह कर ऐसे “चतुर मसौदा-लेखन” को उजागर करना चाहिए, जो केवल कारण-कार्रवाई का भ्रम पैदा करता है।
न्यायमूर्ति रज़ा ने स्पष्ट किया कि मात्र तथ्यों का दमन अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि कोई कारण-कार्रवाई नहीं है। यह कि क्या तथ्य दबाए गए हैं, सामान्यतया तभी आंका जा सकता है जब वादपत्र की तुलना लिखित कथन और साक्ष्य से की जाए, न कि आरंभिक नियम 11 के चरण में। अतः केवल दमन से प्रतिवादी को वादपत्र को कारण-कार्रवाई के अभाव के आधार पर अस्वीकृत कराने का स्वचालित अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
इसके बाद न्यायालय ने शीर्षक वाद सं. 463/2015 के वादपत्र की जांच की। उसने पाया कि वादी ने स्पष्ट रूप से यह बताया है कि कारण-कार्रवाई कैसे और कब उत्पन्न हुआ: विशेष रूप से 21.10.2013 को, जब उच्च न्यायालय ने L.P.A. सं. 1289/2013 को वैकल्पिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता के साथ वापस लेने की अनुमति दी, और “अंततः” 13.09.2015 को, जब उसे सलाह दी गई कि केवल दीवानी वाद ही सक्षम और वैध उपाय है। यह कारण-कार्रवाई अंततः सिद्ध होता है या नहीं, इसका परीक्षण आदेश VII नियम 11 के तहत नहीं किया जा सकता; इस स्तर पर न्यायालय इसे सत्य मानता है।
साथ ही, उच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि महत्वपूर्ण तथ्यों का दमन गंभीर विषय है और न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग का रूप ले सकता है। किंतु, नियम 11 की संरचना को देखते हुए, न्यायालय ने माना कि ऐसे मामलों में बेहतर उपाय आदेश X CPC और आदेश XIV नियम 1(5) में निहित शक्तियों का प्रयोग करना है।
आदेश X CPC न्यायालय को प्रथम सुनवाई के समय पक्षकारों से मौखिक पूछताछ कर विवादित बिंदुओं को स्पष्ट करने की शक्ति देता है। आदेश X नियम 2 के अंतर्गत दर्ज किए गए कथन अभिलेख का हिस्सा बन जाते हैं और मुद्दों के निर्धारण तथा प्रारंभिक बिंदुओं पर निर्णय करते समय उन पर भरोसा किया जा सकता है। आदेश XIV नियम 1(5) आगे यह कहता है कि अभिलेख पढ़ने और आदेश X के अंतर्गत पक्षकारों की पूछताछ के बाद न्यायालय को उन महत्वपूर्ण प्रस्तावों की पहचान करनी चाहिए, जिन पर पक्षकारों में असहमति है, और फिर मुद्दे निर्धारित करने चाहिए।
न्यायमूर्ति रज़ा ने निष्कर्ष निकाला कि वर्तमान जैसे मामलों में – जहां प्रतिवादी द्वारा दमन और प्रक्रिया के दुरुपयोग के आरोप लगाए जाते हैं – न्यायालय को प्रथम सुनवाई पर आदेश X के अंतर्गत पक्षकारों की पूछताछ कर उनके बयान दर्ज करने चाहिए और फिर, आवश्यक हो तो, आदेश XIV के अंतर्गत प्रारंभिक मुद्दों को निर्धारित कर उनका निर्णय करना चाहिए।
इस प्रकार, उच्च न्यायालय ने यह माना कि निचली अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के T. Arivandandam निर्णय के दूसरे हिस्से का समुचित अवलोकन नहीं किया, जिसमें “भ्रमात्मक” कारण-कार्रवाई से निपटने के लिए आदेश X के प्रयोग पर बल दिया गया है।
इसी तर्क के आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने उप न्यायाधीश-1, पटना का 08.06.2016 का आदेश निरस्त कर दिया। उसने निचली अदालत को “कानून के अनुसार” मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया, जिसका अर्थ यह है कि जहां आवश्यक हो, आदेश X CPC के प्रावधानों को लागू करते हुए तथा आदेश XIV नियम 1(5) के अंतर्गत किसी भी प्रारंभिक मुद्दे, जिसमें कथित दमन भी शामिल हो, पर विचार करते हुए निर्णय दिया जाए, परंतु केवल वादपत्र के मुख पर कारण-कार्रवाई प्रस्तुत होने के बावजूद आदेश VII नियम 11 का दुरुपयोग कर वाद को समय से पहले समाप्त न किया जाए।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार के भूमिधारकों और वादकारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके विवाद राजस्व प्राधिकारियों से दीवानी न्यायालयों तक पहुंचते हैं।
पहला, यह स्पष्ट करता है कि कोई व्यक्ति, भले ही D.C.L.R., आयुक्त, अधिकरण या रिट अधिकार-क्षेत्र में कई दौर की कार्यवाहियों में हार चुका हो, तब भी वह शीर्षक के निर्णय के लिए दीवानी न्यायालय का रुख कर सकता है, बशर्ते कि वादपत्र स्वयं कारण-कार्रवाई प्रकट करता हो और अपने आप में कानून द्वारा स्पष्ट रूप से बाधित न हो।
दूसरा, यह वास्तविक वादियों की रक्षा करता है ताकि मात्र प्रतिवादी द्वारा दमन या पूर्व वाद-व्यवस्था का आरोप लगाने भर से उनका वाद आरंभिक स्तर पर ही खारिज न हो जाए। आदेश VII नियम 11 के आवेदन पर निर्णय करते समय न्यायालय को केवल वादपत्र और उसके साथ दायर दस्तावेजों की जांच करनी होती है।
तीसरा, यह इस संरक्षण को संतुलित करते हुए, परीक्षण न्यायालयों को आदेश X CPC के तहत उनकी शक्ति और कर्तव्य की याद दिलाता है: कि वे प्रारंभिक चरण में ही पक्षकारों से प्रश्न पूछें, उनके बयान दर्ज करें और प्रथम सुनवाई में ही झूठे या दुरुपयोगपूर्ण दावों की पहचान करें। इससे उन प्रतिवादियों को लाभ मिलता है जो बार-बार या उत्पीड़क वादों की शिकायत करते हैं।
चौथा, अधिवक्ताओं और साधारण नागरिकों के लिए यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि बिहार भूमि विवाद निपटारा अधिनियम के अंतर्गत राजस्व प्राधिकारियों के आदेश शीर्षक संबंधी प्रश्नों का अंतिम निस्तारण नहीं कर सकते। केवल दीवानी न्यायालय ही स्वामित्व पर बाध्यकारी निर्णय दे सकता है, यद्यपि उसकी प्रक्रिया में अधिक समय लग सकता है।
समग्र रूप से, यह निर्णय बिहार की अधीनस्थ न्यायालयों को यह मार्गदर्शन देता है कि प्रारंभिक आपत्तियों, विशेषकर जहां पूर्व रिट या भूमि विवाद कार्यवाहियां और कथित दमन शामिल हों, से कैसे निपटना है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या शीर्षक की घोषणा और D.C.L.R. आदेशों को चुनौती देने संबंधी दीवानी वाद को आदेश VII नियम 11 CPC के अंतर्गत केवल इस आधार पर प्रारंभिक स्तर पर अस्वीकृत किया जा सकता है कि वादी ने महत्वपूर्ण तथ्यों का दमन किया और पहले राजस्व प्राधिकारियों तथा रिट कार्यवाहियों में वाद-व्यवस्थाएं कीं?
उत्तर: नहीं। तथ्यों का दमन अपने आप में आदेश VII नियम 11 के अंतर्गत आधार नहीं है। चूंकि वादपत्र स्पष्ट रूप से कारण-कार्रवाई प्रकट करता है और किसी कथित दमन का परीक्षण केवल पक्षकारों और साक्ष्य की जांच के बाद ही किया जा सकता है, अतः वाद को दाखिले के चरण पर अस्वीकृत नहीं किया जा सकता। - प्रश्न: यदि किसी वादपत्र को प्रक्रिया का दुरुपयोग या केवल “भ्रमात्मक” कारण-कार्रवाई उत्पन्न करने वाला बताया जाए, तो निचली अदालत को कैसे निपटना चाहिए?
उत्तर: T. Arivandandam के अनुसरण में, न्यायालय को प्रथम सुनवाई में आदेश X CPC के अंतर्गत पक्षकार से पूछताछ कर उसके बयान दर्ज करने चाहिए और फिर, आवश्यकता पड़ने पर, आदेश XIV नियम 1(5) के अंतर्गत प्रारंभिक मुद्दे निर्धारित कर उनका निर्णय करना चाहिए, बजाय इसके कि सीधे आदेश VII नियम 11 के तहत वादपत्र को अस्वीकृत कर दिया जाए। - प्रश्न: आदेश VII नियम 11 CPC के आवेदन पर निर्णय लेते समय न्यायालय को किस सामग्री पर विचार करना चाहिए?
उत्तर: केवल वादपत्र में किए गए कथनों पर, जिन्हें समग्र रूप से और वादी द्वारा दायर दस्तावेजों के साथ पढ़ा जाता है, विचार किया जा सकता है। लिखित कथन में की गई प्रतिरक्षा या प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज इस चरण पर अप्रासंगिक हैं।
न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण
- Bhagirath Prasad Singh @ Bachcha Babu बनाम Ram Narayan Rai @ Ram Narayan Singh एवं अन्य, (2013) 1 PLJR 738 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत)।
- Sopan Sukhdeo Sable एवं अन्य बनाम Assistant Charity Commissioner एवं अन्य, (2004) 3 SCC 137।
- T. Arivandandam बनाम T.V. Satyapal एवं अन्य, (1977) 4 SCC 467।
- Alok Ranjan Pandey एवं अन्य बनाम Ram Bachan Choudhary एवं अन्य, 2015 SCC OnLine Pat 10057।
- Maheshwar Mandal एवं अन्य बनाम The State of Bihar एवं अन्य, (2014) 3 PLJR 281।
- Saleem Bhai एवं अन्य बनाम State of Maharashtra एवं अन्य, (2003) 1 SCC 557।
- Dahiben बनाम Arvind Bhai Kalyanji Bhanusali, (2020) SCC OnLine SC 563।
- Liverpool & London S.P. & I Assn. Ltd. बनाम M.V. Sea Success I एवं अन्य, (2007) 5 SCC 614।
- Bhau Ram बनाम Janak Singh एवं अन्य, 2012 (6) SCALE 530, साथ ही पूर्ववर्ती सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय: C. Natarajan बनाम Ashim Bai एवं अन्य, (2007) 14 SCC 183; Ram Prakash Gupta बनाम Rajeev Kumar Gupta एवं अन्य, (2007) 10 SCC 59; Hardesh Ores (P) Ltd. बनाम Hede & Company, (2007) 5 SCC 614; तथा Mayar H.K. Ltd. एवं अन्य बनाम Vessel M.V. Fortune Express एवं अन्य, (2006) 3 SCC 100।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल पुनरीक्षण सं. 133/2016
मामले का शीर्षक: Captain Rajesh Kumar बनाम Pramila Singh एवं अन्य
कोरम: माननीय श्री न्यायमूर्ति खेतिम रज़ा
उल्लेख: 2024 (4) PLJR 303
अधिवक्ता:
- पुनरीक्षण में याचिकाकर्ता / वाद में प्रतिवादी सं. 4: Captain Rajesh Kumar (स्वयं उपस्थित)।
- विपक्षी पक्ष: श्री धनश्वर प्रसाद गुप्ता, अधिवक्ता।
मामले का स्वरूप: दीवानी प्रक्रिया संहिता की धारा 115 के अंतर्गत (रूप-शैली से निहित) सिविल पुनरीक्षण, जिसमें उप न्यायाधीश-1, पटना द्वारा शीर्षक वाद सं. 463/2015 में आदेश VII नियम 11 CPC के अंतर्गत वादपत्र अस्वीकृति से इंकार करने वाले आदेश को चुनौती दी गई (शीर्षक की घोषणा, कब्जा, D.C.L.R. आदेश के विरुद्ध घोषणा और भूमि व संरचनाओं के संबंध में निषेधाज्ञा का वाद)।
विवादित आदेश: दिनांक 08.06.2016, उप न्यायाधीश-1, पटना द्वारा शीर्षक वाद सं. 463/2015 में पारित आदेश, जिसके द्वारा याचिकाकर्ता का आदेश VII नियम 11 CPC के अंतर्गत वादपत्र अस्वीकृति का आवेदन खारिज किया गया।
उच्च न्यायालय का परिणाम: सिविल पुनरीक्षण स्वीकृत; 08.06.2016 का निचली अदालत का आदेश निरस्त; मामले को कानून के अनुसार, आवश्यकतानुसार आदेश X और आदेश XIV CPC के उपयोग सहित, पुनर्निर्णय हेतु वापस भेजा गया।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का आधिकारिक निर्णय
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