परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर हत्या की सजा बरकरार — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

पटना उच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 के तहत हत्या के लिए दी गई आजीवन कारावास की सजा के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई की। दोषसिद्ध व्यक्ति ने तर्क दिया कि कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था और यह कि मुकदमा निष्पक्ष नहीं था। न्यायालय ने माता‑पिता की गवाही और परिस्थितियों की श्रृंखला को विश्वसनीय माना। वैशाली सत्र न्यायालय द्वारा दी गई दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा गया और अपील खारिज कर दी गई।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वैशाली थाना कांड संख्या 111/2015 से उत्पन्न हुआ। सूचक गजेन्द्र ठाकुर (PW-8) ने बताया कि 19.04.2015 की रात वह और उनकी पत्नी सुशीला देवी (PW-7) अपने घर के बरामदे में सोए थे, जबकि उनका पुत्र सुबोध कुमार घर के एक कमरे (जिसे ‘कोठरी’ कहा गया है) में अकेले सोया हुआ था।

20.04.2015 की रात लगभग 01:45 बजे उन्हें उस कमरे से छटपटाहट की आवाज सुनाई दी जिसमें सुबोध सो रहा था। जब वे भागकर वहाँ पहुँचे तो उन्होंने दो युवकों को देखा, जिनमें वर्तमान अपीलकर्ता Md. Alauddin भी शामिल था, जो अपने हाथों में “चपर” (तेज धार वाला काटने का औज़ार) लिए कमरे से भाग रहे थे। कमरे के अंदर उन्होंने सुबोध को बिस्तर पर पड़ा पाया, खून से लथपथ, उसकी गर्दन के दाहिनी ओर गहरा घाव था। उसकी मौत बिस्तर पर ही हो चुकी थी।

लिखित रिपोर्ट के अनुसार, कथित कारण यह था कि अपीलकर्ता की बहन, सोनी खातून, फोन पर सुबोध से बात किया करती थी। सूचक और उसकी पत्नी ने इस पर आपत्ति की थी और वे सोनी के माता‑पिता और भाई से भी बात करने गए थे, लेकिन संपर्क जारी रहा। सूचक ने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने Md. Yunus और सोनी खातून के साथ मिलकर साजिश रची और सुबोध की गर्दन चपर से काटकर उसकी हत्या कर दी।

इस लिखित रिपोर्ट के आधार पर 20.04.2015 को वैशाली थाना कांड संख्या 111/2015 दर्ज किया गया, जिसमें तीन नामजद अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302/34/120B के तहत मामला पंजीकृत हुआ। अनुसंधान के बाद 16.07.2015 को इन्हीं धाराओं के तहत आरोपपत्र दाखिल किया गया।

26.10.2015 को संज्ञान के चरण पर मजिस्ट्रेट ने उल्लेख किया कि सह-अभियुक्त सोनी खातून और Md. Yunus के अभिलेख पहले के आदेश दिनांक 21.04.2015 और 06.05.2015 के द्वारा किशोर न्याय बोर्ड को भेजे जा चुके हैं। वयस्क अभियुक्त Md. Alauddin का मामला 30.11.2015 को सत्र न्यायालय को समर्पित किया गया। सत्र वाद संख्या 446/2015 दर्ज हुआ।

05.01.2016 को अपीलकर्ता के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302/34 और 120B के तहत आरोप तय किए गए और उसे समझाए गए। अभियोजन ने 12 गवाहों का परीक्षण करवाया, जिनमें परिवारजन, पड़ोसी, चिकित्सक और अन्वेषण अधिकारी शामिल थे, तथा पोस्ट‑मार्टम रिपोर्ट और पंचनामा जैसे दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए। बचाव पक्ष ने दो गवाहों का परीक्षण करवाया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश‑I, वैशाली, हाजीपुर ने 10.05.2018 के निर्णय द्वारा अपीलकर्ता को धारा 302/34 IPC के तहत दोषी ठहराया और 17.05.2018 को उसे आजीवन कारावास तथा 50,000/- रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इससे आहत होकर अपीलकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में Criminal Appeal (DB) No. 788 of 2018 दायर की, जिस पर 23.09.2024 को निर्णय हुआ।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद (पीठ में माननीय श्री न्यायमूर्ति शैलेन्द्र सिंह भी शामिल) के माध्यम से बोलते हुए, समूचे विचारण अभिलेख, सभी गवाहों के साक्ष्य और अपील के आधारों की बारीकी से समीक्षा की।

सबसे पहले न्यायालय ने नोट किया कि यह परिस्थितिजन्य साक्ष्य का मामला है। किसी ने भी यह दावा नहीं किया कि उसने सुबोध की गर्दन काटने की वास्तविक क्रिया को अपनी आँखों से देखा। हालांकि, माता‑पिता PW‑7 सुशीला देवी और PW‑8 गजेन्द्र ठाकुर ने कहा कि उन्होंने कराहने की आवाज के तुरंत बाद अपीलकर्ता और Md. Yunus को खून से सने चपर लिए कमरे से भागते हुए देखा।

विचारण न्यायालय ने पहले पाया था कि लगभग सभी प्रमुख गवाह इस बात पर एक‑सुर में थे कि कराहने की आवाज सुनकर जब वे जागे और कमरे की ओर भागे, तो उन्होंने अपीलकर्ता और यूनुस को चपर लेकर भागते हुए देखा। उच्च न्यायालय ने इस पहलू का पुनर्मूल्यांकन किया।

अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि PW‑7 और PW‑8 को छोड़कर पड़ोसी (PW‑1 योगेन्द्र, PW‑2 राजेन्द्र, PW‑3 कृष्णनंदन, PW‑5 सुरेश, PW‑9 अशोक) केवल सूचक के चिल्लाने की आवाज पर घटनास्थल पर पहुँचे और वे अभियुक्तों को भागते हुए नहीं देख सकते थे। न्यायालय ने माना कि सावधानीपूर्वक पढ़ने पर यह पूर्णतः सिद्ध नहीं होता कि इन पड़ोसियों ने सचमुच अपीलकर्ता को भागते देखा हो। लेकिन न्यायालय ने इंगित किया कि यदि इस सीमित बिंदु पर उनकी बात को एक तरफ रख भी दिया जाए, तब भी माता‑पिता PW‑7 और PW‑8 की गवाही मज़बूती से खड़ी रहती है।

न्यायालय ने ज़ोर देकर कहा कि PW‑7 और PW‑8 बरामदे में सो रहे थे और सुबोध का कमरा उत्तर दिशा में स्थित था। उन्होंने अपने पुत्र की कराहने की आवाज सुनी, तुरंत कमरे में गए और अपीलकर्ता को खून से सना चपर लिए कमरे से निकलते देखा। उनकी उपस्थिति स्वाभाविक थी क्योंकि घटना रात में उनके ही घर के भीतर घटी।

बचाव पक्ष ने पंचनामा (इनक्वेस्ट रिपोर्ट) में “मृतक के दरवाजे” पर पंचनामा तैयार होने का हवाला देते हुए और अन्वेषण अधिकारी के इस कथन को रेखांकित करते हुए कि उसे घटनास्थल पर खून नहीं मिला, घटना‑स्थल पर ही प्रश्न खड़ा करने की कोशिश की। उच्च न्यायालय ने दो कारणों से इस चुनौती को अस्वीकार कर दिया।

पहला, साक्ष्य अधिनियम की धारा 138 और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Gian Chand v. State of Haryana पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि यदि बचाव पक्ष किसी गवाह के कथन की किसी विशेष बिंदु, जैसे घटना‑स्थल, पर शुद्धता को चुनौती देना चाहता है, तो उसे उस बिंदु पर गवाह से जिरह करनी होती है। यहाँ बचाव पक्ष ने PW‑7 और PW‑8 से इस बारे में कोई प्रश्न नहीं किया कि घटना कहाँ हुई या वे कहाँ सो रहे थे। अतः इन बिंदुओं पर उनकी गवाही बिना चुनौती के रह गई और उसे स्वीकार करना पड़ा।

दूसरा, घटनास्थल पर खून न मिलने के संबंध में न्यायालय ने अन्वेषण अधिकारी (PW‑12) के बयान को ध्यान से पढ़ा। अनुच्छेद 9 में उसने कहा कि मृत शरीर खाट पर पड़ा था और उसे याद नहीं कि बिस्तर पर चादर थी या खून नीचे गिरा था या नहीं। अनुच्छेद 10 में उसने कहा कि उसे घटनास्थल पर खून नहीं मिला और उसने खून लगे कपड़े ज़ब्त नहीं किए। न्यायालय ने इन बयानों को परस्पर असंगत पाया और यह भी नोट किया कि अधिकारी घटना के लगभग दो वर्ष चार माह बाद बयान दे रहा था और उसने स्वीकार किया कि उसे कुछ विवरण याद नहीं हैं। इस पृष्ठभूमि में फर्श पर खून न होने वाला उसका बाद का कथन अधिक महत्व का नहीं माना गया और इसे घटना‑स्थल पर संदेह करने के लिए पर्याप्त नहीं समझा गया।

मकसद (motive) के संबंध में न्यायालय ने नोट किया कि सभी अभियोजन गवाह इस बात पर एक‑मत थे कि सुबोध और अपीलकर्ता की बहन सोनी खातून आपस में मोबाइल फोन से बात कर रहे थे। PW‑7 ने कहा कि दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे और एक ही ट्यूशन जाते थे। उसने यह भी कहा कि सुबोध सोनी से कह रहा था कि वह उससे बात न करे। PW‑8 ने कहा कि घटना से लगभग छह माह पहले से सुबोध सोनी से बात कर रहा था और घटना से लगभग 7–8 दिन पहले उसकी पत्नी अपीलकर्ता के घर उन्हें फटकार लगाने गई थी। जिरह में बचाव पक्ष ने इन बयानों को गंभीरता से चुनौती नहीं दी।

अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि इस संबंध को लेकर अभियुक्त को कोई झुंझलाहट नहीं थी बल्कि वास्तव में मृतक का परिवार ही परेशान था। तथापि न्यायालय ने माना कि मौखिक साक्ष्य के सुसंगत स्वरूप से सुबोध और सोनी खातून के बीच का संबंध स्पष्ट रूप से घटना का कारण और हत्या का मकसद बनकर उभरता है। न्यायालय ने पाया कि अभियोजन ने मकसद को संदेह से परे सिद्ध कर दिया है।

चिकित्सकीय साक्ष्य के रूप में PW‑10 चिकित्सक ने पोस्ट‑मार्टम किया और मृतक की गर्दन के ऊपरी दाहिने हिस्से पर गहरा चीरा हुआ घाव दर्ज किया। उसने राय दी कि मृत्यु अत्यधिक रक्तस्राव और इस चोट से लगे शॉक के कारण हुई और प्रयुक्त हथियार कड़ा तथा तेज‑धार वाला था। यह अभियोजन के उस कथन से मेल खाता है कि गर्दन पर चोट चपर से दी गई।

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि क्योंकि केवल एक बाहरी चोट थी, इसलिए यह कहानी कि दो अभियुक्तों ने चपर से सुबोध पर हमला किया, संदिग्ध है। न्यायालय ने इसे परिस्थितियों की श्रृंखला तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं माना। शरीर के महत्वपूर्ण अंग पर एक ही घातक चोट की उपस्थिति, इस संस्करण के पूरी तरह अनुरूप थी कि चपर जैसे तेज धारदार हथियार का उपयोग किया गया।

अपीलकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत उसका बयान ठीक प्रकार से दर्ज नहीं किया गया और सभी आपत्तिजनक परिस्थितियों से उसे अवगत नहीं कराया गया, तथा उसने Raj Kumar @ Suman, Naresh Kumar और Sujit Biswas जैसे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा किया। उच्च न्यायालय ने धारा 313 के बयान की जाँच की और पाया कि अपीलकर्ता को यह बताया गया था कि गवाहों ने यह गवाही दी है कि उसने रात में कमरे में सो रहे सूचक के पुत्र की गर्दन तेज धारदार हथियार से काट दी। इस प्रकार, घटना‑स्थल और कथित कृत्य दोनों स्पष्ट रूप से उसके समक्ष रखे गए थे। अपीलकर्ता ने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया और केवल “नहीं” में उत्तर दिया।

चूँकि यह नहीं दिखाया गया कि कोई विशिष्ट आपत्तिजनक तथ्य अपीलकर्ता के विरुद्ध इस तरह प्रयुक्त किया गया जिसे उससे धारा 313 में पूछे बिना माना गया हो, न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई पूर्वाग्रह नहीं हुआ और Raj Kumar @ Suman में प्रतिपादित विधि उससे कोई सहायता नहीं देती।

एफआईआर दर्ज करने में देरी के मुद्दे पर बचाव पक्ष ने कहा कि PW‑7 ने यह कहा कि उसने रात में ही पुलिस को सूचना दी थी, लेकिन PW‑8 द्वारा लिखित रिपोर्ट सुबह ही दी गई, जिसका अर्थ है कि 4–5 घंटे की देरी हुई और प्रथम संस्करण दबा दिया गया। न्यायालय ने नोट किया कि घटना लगभग 01:45 बजे हुई, थाना 12 किलोमीटर दूर था और लिखित रिपोर्ट सुबह तब दी गई जब पुलिस वहाँ पहुँची। इसके बाद एफआईआर दर्ज हुई और पंचनामा व पोस्ट‑मार्टम की औपचारिकताएँ की गईं; मृत शरीर 20.04.2015 को 4:15 बजे अपराह्न अस्पताल पहुँचा। Tara Singh और Hariprasad @ Kishan Sahu सहित सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि ग्रामीण परिस्थिति में, जब परिवार ने अभी‑अभी अपने घर में मौत झेली हो, ऐसी थोड़ी सी देरी अपने‑आप में अभियोजन के मामले पर संदेह डालने के लिए पर्याप्त नहीं है, खासकर जब न तो PW‑7 और न ही PW‑12 से इस बिंदु पर जिरह की गई।

बचाव पक्ष ने दो गवाह भी प्रस्तुत किए। DW‑1 वसीरन खातून ने जिरह में स्वीकार किया कि वह अपीलकर्ता के पिता (DW‑2 Md. Jabbar) से सुनी बातों के आधार पर गवाही दे रही है। DW‑2 अपीलकर्ता के पिता के रूप में गवाह‑पेटी में आया। उच्च न्यायालय ने पाया कि दोनों बचाव गवाह न तो विश्वसनीय हैं और न ही स्वतंत्र, और उनकी गवाही से अभियोजन का मामला तनिक भी कमजोर नहीं होता।

समस्त साक्ष्य और परिस्थितिजन्य साक्ष्य से संबंधित विधि, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Sharad Birdhichand Sarda और Rukia Begum भी शामिल हैं, की समीक्षा के बाद न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि परिस्थितियों की श्रृंखला पूर्ण है। मकसद सिद्ध हुआ; अपीलकर्ता को घटना के तुरंत बाद खून से सने चपर के साथ कमरे से भागते देखा गया; मृतक को बिस्तर पर गर्दन की उसी प्रकृति की चोट के साथ मृत पाया गया; और “अज्ञात अपराधी” वाली बचाव की कहानी के समर्थन में कोई सामग्री नहीं थी।

न्यायालय ने ठहराया कि किसी अन्य तर्कसंगत निष्कर्ष पर पहुँचना संभव नहीं है, सिवाय इसके कि अपीलकर्ता ने अपने साथी के साथ मिलकर हत्या की। उसने साक्ष्य के विचार में विचारण न्यायालय द्वारा की गई किसी भी भूल को न पाते हुए, धारा 302/34 IPC के तहत दोषसिद्धि और आजीवन कारावास व जुर्माने, दोनों को बरकरार रखा।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय पीड़ित परिवारों, जाँच एजेंसियों और उन बचाव वकीलों के लिए महत्वपूर्ण है जो ऐसे मामलों से निपटते हैं जहाँ घरों के भीतर रात के समय हत्या होती है और हत्या की क्रिया का कोई प्रत्यक्षदर्शी न हो।

न्यायालय ने दिखाया कि ऐसे मामलों में यदि निकट परिजनों की गवाही जिरह में नहीं हिलती और वे केवल अपराध के तुरंत बाद अभियुक्त को भागते हुए ही देख पाते हैं, तो भी उनकी सुसंगत गवाही को विश्वसनीय माना जा सकता है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में, खासकर असामान्य समय पर, एफआईआर दर्ज करने में थोड़ी बहुत देरी किसी सच्चे मामले को अपने‑आप कमजोर नहीं कर देती, यदि आधारभूत कहानी चिकित्सकीय और अन्य साक्ष्यों द्वारा समर्थित हो।

निर्णय यह रेखांकित करता है कि यदि बचाव पक्ष घटना‑स्थल या अभियुक्त की पहचान जैसे बुनियादी तथ्यों को विवादित करना चाहता है, तो उसे स्पष्ट रूप से अभियोजन गवाहों का जिरह के दौरान सामना कराना होगा। बाद में, जब गवाह गवाह‑पेटी से उतर चुके हों, ऐसे संदेह उठाना, जो जिरह के समय उनके सामने नहीं रखे गए, सफल नहीं होगा।

साधारण पाठकों के लिए यह निर्णय यह दिखाता है कि जब शोकाकुल माता‑पिता की प्रत्यक्ष कथा सुसंगत हो और उसका खंडन न हुआ हो, तो न्यायालय उसे गंभीर महत्व देता है, और बिना किसी आधार के “अज्ञात अपराधी” पर दोष मढ़ने के प्रयास अपील में सफल होने की संभावना कम होती है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या तब भी अपीलकर्ता की धारा 302/34 IPC के तहत हत्या की दोषसिद्धि कायम रह सकती थी जब मामला मुख्यतः परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था और माता‑पिता ने केवल उसे हथियार के साथ भागते हुए ही देखा था?
    उत्तर: हाँ। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि माता‑पिता स्वाभाविक और पूरी तरह विश्वसनीय गवाह हैं, मकसद सिद्ध हुआ है, चिकित्सकीय साक्ष्य अभियोजन के मामले से मेल खाता है और परिस्थितियों की श्रृंखला अपीलकर्ता के दोष पर कोई तर्कसंगत संदेह नहीं छोड़ती।
  • प्रश्न: क्या एफआईआर में देरी, घटना‑स्थल को लेकर संदेह और धारा 313 CrPC के अधूरे प्रश्नों जैसी कथित कमियाँ मुकदमे को अवैध बनाती हैं?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने कहा कि परिस्थितियों को देखते हुए एफआईआर उचित समय पर दर्ज हुई, घटना‑स्थल जिरह में बिना चुनौती के रहा और इसलिए स्वीकार किया गया, तथा अपीलकर्ता का धारा 313 CrPC के तहत पर्याप्त रूप से आपत्तिजनक परिस्थितियों से सामना कराया गया, और किसी प्रकार के पूर्वाग्रह को प्रदर्शित नहीं किया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय

  • Hariprasad @ Kishan Sahu v. State of Chhattisgarh, (2024) 2 SCC 557
  • Tara Singh v. State of Punjab, 1991 Supp (1) SCC 536
  • Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra, (1984) 4 SCC 116
  • Rukia Begum and Others v. State of Karnataka, (2011) 4 SCC 779
  • Gian Chand v. State of Haryana, (2013) 14 SCC 420
  • Laxmibai (Dead) through LRs. and Another v. Bhagwantbuva (Dead) through LRs. and Others, (2013) 4 SCC 97
  • Raj Kumar @ Suman v. State (NCT of Delhi), AIR 2023 SC 3113
  • Naresh Kumar v. State of Delhi, AIR 2024 SC 3233
  • Sujit Biswas v. State of Assam, (2013) 12 SCC 406
  • Asraf Ali v. State of Assam, (2008) 16 SCC 328
  • S. Harnam Singh v. State (Delhi Administration), (1976) 2 SCC 819

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Appeal (DB) No. 788 of 2018; arising out of Vaishali P.S. Case No. 111 of 2015; Sessions Trial No. 446 of 2015

मामला शीर्षक: Md. Alauddin v. State of Bihar

उद्धरण: 2024(4) PLJR 343

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Rajeev Ranjan Prasad; Hon’ble Mr. Justice Shailendra Singh

निर्णय की तिथि: 23.09.2024

अधिवक्ता:

  • अपीलकर्ता की ओर से: Mr. Ajay Kumar Thakur, Advocate; Mr. Arvind Kumar Sinha, Advocate
  • राज्य की ओर से: Mr. Ajay Mishra, Additional Public Prosecutor
  • सूचक की ओर से: Mr. Raja Ram Rai, Advocate

आरोपित अपराध: Sections 302/34/120B IPC (विचारण न्यायालय ने अंततः Section 302/34 IPC के तहत दोषसिद्ध किया)

विचारण न्यायालय का परिणाम: Section 302/34 IPC के तहत दोषसिद्धि; 50,000/- रुपये जुर्माने सहित आजीवन कारावास

मामले की प्रकृति: हत्या के संबंध में सत्र न्यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि और सजा के विरुद्ध आपराधिक अपील (विभागीय पीठ)

अंतिम उच्च न्यायालय परिणाम: अपील खारिज; दोषसिद्धि एवं सजा की पुष्टि

निर्णय का लिंक: Patna High Court Judgment

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