मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता का चयन सिविल सेवा परीक्षा, 2015 के माध्यम से हुआ और उसे 08.12.2016 की तिथि वाले पत्र द्वारा भारतीय राजस्व सेवा (कस्टम्स एवं सेंट्रल एक्साइज) समूह “A” में नियुक्ति की पेशकश की गई।
उसने 22.12.2016 को राष्ट्रीय कस्टम्स, एक्साइज एवं नशीले पदार्थ अकादमी (NACEN), फरीदाबाद में प्रशिक्षण जॉइन किया। जुलाई 2017 में वहां प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उसे क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र, भांडुप, मुंबई भेजा गया, जहां उसने 14.07.2017 को रिपोर्ट की और अपना प्रशिक्षण पूरा किया।
विभिन्न स्थानों पर क्षेत्रीय प्रशिक्षण के उपरांत, उसने 12.12.2017 को पटना में कार्यभार ग्रहण किया। मई 2018 में उसे सहायक आयुक्त, एंटी-इवेशन (मुख्यालय), पटना के रूप में स्वतंत्र प्रभार दिया गया।
नियुक्ति की शर्तों के अनुसार, उसे दो वर्ष की परिवीक्षा अवधि के भीतर कस्टम्स और सेंट्रल एक्साइज कानूनों की विभागीय परीक्षाओं के भाग-I और भाग-II उत्तीर्ण करने थे। उसने 03.07.2018 से 09.07.2018 के बीच इन परीक्षाओं में भाग लिया, सभी पेपर उत्तीर्ण कर लिए, सिवाय पेपर X के, और बाद में 30.11.2018 को पेपर X भी पास कर लिया। इस प्रकार उसने ज्वाइनिंग के दो वर्ष के भीतर अनिवार्य परीक्षाएँ पूरी कर लीं।
27.06.2019 को उसके विरुद्ध और एक अधीक्षक के विरुद्ध सीबीआई मामला (RC No. 023 2019 A 0007) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120B के अंतर्गत दर्ज किया गया। याचिकाकर्ता को 27.06.2019 को गिरफ्तार किया गया और 28.06.2019 को न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया।
क्योंकि वह 48 घंटे से अधिक समय तक निरुद्ध रहा, इसलिए आदेश दिनांक 01.08.2019 के माध्यम से 27.06.2019 से प्रभावी मानी गई निलंबन की स्थिति में रखा गया। उसके निलंबन को 19.09.2019, 18.03.2020 और 14.09.2020 के आदेशों द्वारा समय-समय पर बढ़ाया गया। सह-अभियुक्त अधीक्षक का निलंबन, हालांकि, 14.09.2020 को समाप्त कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने अपने निलंबन और उसके विस्तारों को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT), पटना पीठ, के समक्ष O.A. No. 050/00362/2020 में चुनौती दी। जब वह मामला लंबित था, तो राजस्व विभाग के अवर सचिव ने 05.02.2021 की तिथि का आदेश जारी कर, केन्द्रीय सिविल सेवाएँ (अस्थायी सेवा) नियम, 1965 (CCS Temporary Service Rules, 1965) के नियम 5(1) के तहत उसकी सेवाएँ समाप्त कर दीं।
तत्पश्चात याचिकाकर्ता ने उक्त सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती देते हुए CAT के समक्ष O.A. No. 050/00105/2021 दायर किया। 08.04.2024 की सामान्य आदेश द्वारा CAT ने दोनों मूल आवेदनों को खारिज कर दिया। वर्तमान रिट याचिकाएँ (CWJC No. 11330 of 2024 और CWJC No. 12052 of 2024) पटना उच्च न्यायालय के समक्ष उसी CAT आदेश से उत्पन्न हुईं।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह और माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडेय की द्वैधपीठ ने दोनों रिट याचिकाओं की एक साथ सुनवाई कर 03.04.2026 को सामान्य फैसला सुनाया।
पहली रिट (CWJC No. 11330 of 2024) में याचिकाकर्ता ने 05.02.2021 के सेवा समाप्ति आदेश को चुनौती दी। उसकी मुख्य दलीलें इस प्रकार थीं:
पहला, उसने तर्क दिया कि उसने परिवीक्षा के सभी आवश्यकताओं को पूरा कर लिया था। 08.12.2016 की नियुक्ति पत्र के अनुसार परिवीक्षा अवधि दो वर्ष थी। इस अवधि के दौरान उसे NACEN फरीदाबाद और RTC भांडुप में प्रशिक्षण से गुजरना था और भाग-I तथा भाग-II विभागीय परीक्षाएं पास करनी थीं। उसका कहना था कि उसने प्रशिक्षण और परीक्षाएं इसी अवधि के भीतर पूरी कर लीं, अतः सरकार उसे परिवीक्षाधीन नहीं मान सकती थी, जब तक कि परिवीक्षा और पुष्टि से संबंधित मास्टर सर्कुलर में निर्धारित प्रक्रिया का पालन न किया जाए।
दूसरा, उसने 11.03.2019 और 02.07.2018 की दिनांक वाले कार्यालय ज्ञापनों (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के परिवीक्षा और पुष्टि संबंधी मास्टर सर्कुलर) पर भरोसा किया। इन परिपत्रों में कहा गया है कि सामान्यतः परिवीक्षा एक वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाई जानी चाहिए (और किसी भी स्थिति में सामान्य अवधि के दोगुने से अधिक कभी नहीं), कि वरिष्ठ अधिकारियों का एक बोर्ड परिवीक्षाधीन के प्रतिवेदनों का आकलन करेगा, और यदि सामान्य परिवीक्षा अवधि के दोगुने समय की समाप्ति के आठ सप्ताह के भीतर पुष्टि, सेवा समाप्ति या पूर्व पद पर पुनर्व्यवस्था का कोई आदेश जारी नहीं होता, तो परिवीक्षाधीन को परिवीक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण करने वाला माना जाएगा।
उसका तर्क था कि इन सुरक्षा उपायों, जिसमें सुनवाई का अवसर भी शामिल है, का पालन सेवा समाप्ति से पहले नहीं किया गया, अतः आदेश दंडात्मक और अवैध है।
तीसरा, उसने उन कारणों पर प्रहार किया जो बाद में CAT के समक्ष प्रतिवादियों के लिखित बयान में उजागर किए गए। वहां अधिकारियों ने कहा कि उसकी सेवाएँ इसलिए समाप्त की गईं क्योंकि उसने अपना प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा नहीं किया था और फर्बिशर कोर्स के दौरान वह “अनधिकृत अनुपस्थित” रहा, तथा उसे कथित रूप से रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया, जिससे उसकी नैतिक जिम्मेदारी की कमी प्रकट होती है।
याचिकाकर्ता का कहना था कि “अनधिकृत अनुपस्थिति” शब्दावली कलंकयुक्त (stigmatic) है। उसने इंगित किया कि फर्बिशर कोर्स चार Spell में निर्धारित थे, और उसने अतिरिक्त महानिदेशक, NACEN द्वारा प्रमुख मुख्य आयुक्त को भेजे गए वे पत्र प्रस्तुत किए जिनमें याचिकाकर्ता को ऐसे कोर्सों के लिए relieving करने का अनुरोध किया गया था। उसका तर्क था कि उसे कभी relieving नहीं किया गया, इसीलिए उसकी अनुपस्थिति के लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
उसने यह तर्क भी दिया कि उसे रिश्वत लेते हुए पकड़ा गया बताना भी कलंकयुक्त है क्योंकि आपराधिक मामला अब तक लंबित है और उसे दोषसिद्ध नहीं किया गया है।
चौथा, उसने रेखांकित किया कि अवर सचिव का 18.03.2020 का आदेश यह उल्लेख करता है कि CCS (CCA) Rules, 1965 के नियम 14 के अंतर्गत मसौदा आरोप-पत्र विचाराधीन है। उसका तर्क था कि एक बार जब अनुशासनात्मक कार्यवाही पर विचार शुरू हो चुका था, तो CCS Temporary Service Rules, 1965 के नियम 5(1) के तहत पूर्ण विभागीय जांच किए बिना उसकी सेवाएँ समाप्त नहीं की जा सकती थीं।
उसने यह भी तर्क दिया कि CCS Temporary Service Rules, 1965 उसके ऊपर लागू नहीं होते क्योंकि नियम 2(g) के आलोक में 22.04.2016 को अधिसूचित भारतीय राजस्व सेवा (कस्टम्स एवं सेंट्रल एक्साइज) समूह ‘A’ नियम, 2016 (IRS Rules, 2016) प्रभावी हैं।
उसका यह भी कहना था कि CAT का निर्णय आत्मविरोधाभासी है: एक ओर उसने कहा कि वह अब परिवीक्षाधीन नहीं था, और दूसरी ओर यह माना कि कोई पुष्टि आदेश नहीं था, फिर भी उसे CCS Temporary Service Rules, 1965 के अंतर्गत आने वाला अस्थायी कर्मचारी माना।
उसने सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों, जैसे Karnataka State Road Transport Corporation v. S. Manjunath, Ratnesh Kumar Choudhary v. IGIMS, तथा V.P. Ahuja v. State of Punjab पर भरोसा किया और तर्क दिया कि जहाँ सेवा समाप्ति कदाचार पर आधारित हो या कलंकयुक्त हो, वहाँ प्राकृतिक न्याय के अनुरूप नियमित जांच आवश्यक है।
दूसरी ओर, भारत संघ और विभागीय अधिकारियों, की ओर से माननीय अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया डॉ. के.एन. सिंह ने प्रशिक्षण की स्थिति और सीबीआई मामले का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत किया।
उन्होंने बताया कि 68वाँ बैच के अधिकारी प्रशिक्षुओं, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल थे, ने 19.12.2016 को NACEN में प्रशिक्षण शुरू किया। इस बैच के लिए फर्बिशर कोर्स 13.08.2018 से 07.09.2018 तक चला। इस कोर्स के दौरान उपस्थिति अभिलेखों से पता चला कि आठ अधिकारियों, जिनमें याचिकाकर्ता भी शामिल था, की उपस्थिति 75% से कम थी और उन्हें अनधिकृत अनुपस्थित माना गया, जो अनुशासनहीनता के समान है। परिणामस्वरूप, उन्हें फर्बिशर कोर्स पूर्णता प्रमाण-पत्र से वंचित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता और उसके नियंत्रक प्राधिकारी को सूचित किया गया कि उसका फर्बिशर कोर्स अगले बैच (69वाँ बैच) के साथ दोहराया जाएगा। किंतु, इससे पहले ही, 27.06.2019 को उसे सीबीआई द्वारा कथित रूप से 2.5 लाख रुपये की रिश्वत स्वीकार करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया, गिरफ्तार किया गया और निलंबित कर दिया गया।
प्रतिवादियों का तर्क था कि उसके मामले की समीक्षा के बाद यह पाया गया कि उसने प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा नहीं किया, फर्बिशर कोर्स के दौरान अनधिकृत अनुपस्थित रहा और भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार हुआ। नियुक्ति प्राधिकारी ने उसे सेवा में बने रहने के लिए अनुपयुक्त माना। क्योंकि 05.02.2021 तक उसकी पुष्टि नहीं हुई थी, वह अस्थायी कर्मचारी ही था। CCS Temporary Service Rules, 1965 के नियम 5(1), नियुक्ति पत्र के खंड (vi) और IRS Rules, 2016 के नियम 6(3) के साथ पढ़ते हुए, उसके सेवाओं को termination simpliciter के आदेश द्वारा समाप्त किया गया।
उन्होंने जोर देकर कहा कि अस्थायी कर्मचारी या परिवीक्षाधीन अधिकारी को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होता और ऐसा व्यक्ति, जब तक आदेश दंडात्मक या कलंकयुक्त न हो, बिना कारण बताओ नोटिस के सेवा से मुक्त किया जा सकता है। उन्होंने High Court of Judicature at Patna v. Pandey Madan Mohan Prasad Sinha तथा Rajasthan High Court v. Ved Priya सहित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर भरोसा किया।
पटना उच्च न्यायालय ने पहले लागू नियमों का विश्लेषण किया। नियुक्ति पत्र के खंड (iv)–(vi) और (xiv) ने दो वर्ष की परिवीक्षा निर्धारित की, परीक्षाओं में असफलता या किसी अन्य कारण से उसके विस्तार की अनुमति दी, कार्य या आचरण असंतोषजनक होने या परिवीक्षाधीन के कुशल होने की संभावना न होने पर सेवा समाप्त करने का अधिकार प्रदान किया और IRS Rules, 2016 को लागू घोषित किया।
IRS Rules, 2016 के नियम 6 में दो वर्ष की परिवीक्षा (विस्तार योग्य), सफल समापन पर पुष्टि, तथा यह प्रावधान है कि यदि नियंत्रक प्राधिकारी को परिवीक्षा या उसके विस्तार के दौरान अधिकारी स्थायी नियुक्ति के लिए उपयुक्त न लगे, तो उसे सेवा से मुक्त किया जा सकता है। नियम 6(5) के अनुसार सरकार की परिवीक्षा और पुष्टि संबंधी निर्देश लागू होंगे, जिनके तहत DOPT का 11.03.2019 का कार्यालय ज्ञापन (मास्टर सर्कुलर) जारी हुआ।
उस मास्टर सर्कुलर के खंड 27 में कहा गया है कि यदि सामान्य परिवीक्षा अवधि के दोगुने समय के समाप्त होने के आठ सप्ताह के भीतर अधिकारी के संबंध में पुष्टि, सेवा समाप्ति या पूर्व पद पर पुनर्व्यवस्था का कोई आदेश जारी नहीं होता, तभी उसे परिवीक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण करने वाला माना जाएगा।
न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 19.12.2016 को ज्वाइन किया। सामान्य दो वर्ष की परिवीक्षा का दोगुना चार वर्ष हुआ, और उसमें आठ सप्ताह जोड़ने पर अंतिम तिथि 12.02.2021 बनती है। किंतु 05.02.2021 को उसकी सेवा समाप्त कर दी गई, जो उस तिथि से पूर्व थी। अतः परिवीक्षा की अनुमानित (deemed) पूर्णता नहीं हुई और सेवा समाप्ति की तिथि को वह अभी भी परिवीक्षाधीन/अस्थायी सरकारी सेवक था।
पीठ ने आगे माना कि CCS Temporary Service Rules, 1965 लागू थे। ऐसा कोई अधिसूचना नहीं थी जो याचिकाकर्ता जैसे अधिकारियों को इन नियमों से मुक्त करती हो, और इन नियमों ने परिवीक्षाधीन अधिकारियों को स्पष्ट रूप से अपवर्जित भी नहीं किया है। अतः उसकी स्थिति IRS Rules, 2016 और CCS Temporary Service Rules, 1965 दोनों के दायरे में थी।
CCS Temporary Service Rules, 1965 के नियम 5(1) के अंतर्गत अस्थायी सरकारी सेवक की सेवाएँ किसी भी समय लिखित नोटिस देकर, या नोटिस अवधि के बदले एक माह के वेतन एवं भत्तों का भुगतान कर तत्काल समाप्त की जा सकती हैं। न्यायालय ने 05.02.2021 का सेवा समाप्ति आदेश उद्धृत किया, जिसने मात्र नियम 5(1) की प्रोवाइज़ो का हवाला देकर उसकी सेवाएँ तत्काल समाप्त कीं और नोटिस के बदले एक माह का वेतन देने का निर्देश दिया। आदेश में न कोई कारण दर्ज था, न किसी कदाचार का उल्लेख, न ही कोई कलंक।
IRS Rules, 2016 के नियम 6(3) को CCS Temporary Service Rules, 1965 के नियम 5(1) के साथ पढ़ते हुए न्यायालय ने माना कि किसी भी नियम में परिवीक्षाधीन/अस्थायी कर्मचारी को अनुपयुक्त पाए जाने पर सेवा से मुक्त करने से पूर्व कारण बताओ नोटिस, विभागीय जांच या कारणों के उल्लेख की अनिवार्यता नहीं है। ये नियम नियंत्रक प्राधिकारी को परिवीक्षा के दौरान समग्र आचरण के आधार पर राय बनाने की अनुमति देते हैं।
पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के Pandey Madan Mohan Prasad Sinha वाले निर्णय पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया कि परिवीक्षाधीन अधिकारी को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं होता, और परिवीक्षाधीन की सेवा समाप्ति के मामले में पूर्व-सुनवाई (pre-decisional hearing) जैसी प्राकृतिक न्याय की आवश्यकताएँ लागू नहीं होतीं, तथा जब तक आदेश स्वयं दंडात्मक न हो, प्राधिकारी प्रतिकूल सामग्री के आधार पर उसे पुष्टि के लिए अनुपयुक्त मान सकता है।
न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता की रिश्वतखोरी मामले में गिरफ्तारी और फर्बिशर कोर्स की अपूर्णता पर अधिकारियों की निर्भरता, उसकी उपयुक्तता का आकलन करने के वैध क्षेत्र के भीतर आती है। न्यायालय ने अवलोकन किया कि ऐसे घटनाक्रम किसी परिवीक्षाधीन के स्थायी नियुक्ति के लिए अनुपयुक्त माने जाने का आधार विधिसम्मत रूप से बन सकते हैं।
न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों (S. Manjunath, Ratnesh Kumar Choudhary, V.P. Ahuja) को इस आधार पर अलग (distinguish) किया कि वे ऐसे मामलों से संबंधित थे, जहाँ सेवा समाप्ति के आदेश वस्तुतः कदाचार पर आधारित और दंडात्मक प्रकृति के थे। यहाँ न तो कोई विभागीय जांच आरंभ की गई और न ही उसे छोड़ा गया, और 05.02.2021 का आदेश discharge simpliciter के रूप में ही रहा, दंड के रूप में नहीं।
तदनुसार, न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि सेवा समाप्ति आदेश किसी अवैधता या दोष से ग्रस्त नहीं है और CAT ने सही ही इसके विरुद्ध चुनौती को अस्वीकार किया।
दूसरी रिट (CWJC No. 12052 of 2024) में याचिकाकर्ता ने 01.08.2019 का मूल मानी गई निलंबन (deemed suspension) आदेश तथा बाद के विस्तार आदेश दिनांक 19.09.2019, 18.03.2020 और 14.09.2020 को चुनौती दी।
उसने Ajay Kumar Choudhary v. Union of India पर भरोसा किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सामान्यतः निलंबन तीन माह से अधिक बिना आरोप-पत्र दिए जारी नहीं रहना चाहिए और आगे का विस्तार कारणयुक्त आदेश पर आधारित होना चाहिए।
किन्तु प्रतिवादियों ने इंगित किया कि याचिकाकर्ता को सीबीआई मामले में गिरफ्तार किया गया और वह 48 घंटे से अधिक समय तक अभिरक्षा में रहा। CCS (Classification, Control & Appeal) Rules, 1965 के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति निरुद्धि की तिथि से ही मानी गई निलंबन की स्थिति में माना जाता है। उन्होंने बताया कि अभियोजन की स्वीकृति 14.01.2020 को दी गई और सीबीआई ने प्रमुख दंड (major penalty) की कार्यवाही शुरू करने की सलाह दी थी, किंतु उसके पहले ही 05.02.2021 को उसकी सेवाएँ समाप्त कर दी गईं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक निलंबन विस्तार CCS (CCA) Rules, 1965 के नियम 10(6) के अनुसार, निलंबन समीक्षा समिति की अनुशंसा तथा सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति पर, लंबित सीबीआई मामले को ध्यान में रखते हुए किया गया।
न्यायालय ने नियम 10(6) को उद्धृत किया, जो 90 दिनों से पहले निलंबन की समीक्षा अनिवार्य बनाता है और समीक्षा समिति की अनुशंसा पर अधिकतम 180 दिनों के ब्लॉक में विस्तार की अनुमति देता है।
इन प्रावधानों की जांच पर न्यायालय ने निलंबन या उसके विस्तारों में कोई अवैधता नहीं पाई। उसने आगे माना कि Ajay Kumar Choudhary के दिशानिर्देश यहाँ लागू नहीं होते क्योंकि वह निर्णय एक नियमित सरकारी सेवक से संबंधित था, न कि याचिकाकर्ता जैसे परिवीक्षाधीन/अस्थायी कर्मचारी से। इसके अतिरिक्त, वर्तमान मामले में परिवीक्षा अवधि के दौरान सेवा समाप्ति से पूर्व पूर्ण विभागीय जांच करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
अतः न्यायालय ने CAT के इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि निलंबन और उसके विस्तार वैध थे।
अंततः, पीठ ने माना कि 08.04.2024 के CAT के सामान्य आदेश में न तो कोई विकृति (perversity), न ही कोई अतार्किकता या अनुचितता है, और दोनों रिट याचिकाओं को निराधार पाते हुए खारिज कर दिया।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय परिवीक्षाधीन और अस्थायी सरकारी सेवकों, विशेष रूप से नव नियुक्त समूह “A” अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण है।
यह स्पष्ट करता है कि विभागीय परीक्षाएँ सफलतापूर्वक पास कर लेने के बाद भी, परिवीक्षाधीन अधिकारी को पुष्टि से पहले पद पर अधिकार नहीं मिलता। यदि परिवीक्षा के दौरान गंभीर मसले—जैसे आपराधिक जांच, गिरफ्तारी, या अनिवार्य प्रशिक्षण की अपूर्णता—उठ खड़े हों, तो सरकार लागू सेवा नियमों के तहत साधारण सेवा समाप्ति आदेश द्वारा परिवीक्षाधीन को सेवा से मुक्त कर सकती है।
निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि परिवीक्षा और पुष्टि पर मास्टर सर्कुलर, जिसमें सामान्य अवधि के दोगुने समय के बाद आठ सप्ताह के भीतर परिवीक्षा की अनुमानित पूर्णता की अवधारणा भी शामिल है, परिवीक्षाधीन की सहायता में तब नहीं आएंगे जब नियोक्ता उस अधिकतम समयसीमा से पहले ही उसे सेवा से मुक्त कर दे।
वे सरकारी सेवक जो आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं, उनके लिए यह फैसला दर्शाता है कि 48 घंटे से अधिक की गिरफ्तारी पर मानी गई निलंबन और CCS (CCA) Rules के नियम 10(6) के तहत निलंबन के आवधिक विस्तार, यदि विधिवत समीक्षा के साथ किए गए हों, तो कानूनी रूप से टिकाऊ हैं, भले ही अंततः विभागीय आरोप-पत्र न दिया जाए क्योंकि व्यक्ति को परिवीक्षाधीन के रूप में ही हटा दिया गया हो।
साधारण पाठकों और सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए संदेश यह है कि परिवीक्षा एक परीक्षणकाल है। केवल अच्छे परीक्षा परिणाम पर्याप्त नहीं हैं; संपूर्ण आचरण, जिसमें ईमानदारी और अनुशासन शामिल है, लगातार जांच के दायरे में रहता है। इस अवधि के दौरान गिरफ्तारी या गंभीर आरोप सेवा से निष्कासन का कारण बन सकते हैं, बिना उन सुरक्षा उपायों के जो पुष्टि प्राप्त कर्मचारियों पर लागू होते हैं।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या परिवीक्षाधीन IRS अधिकारी की सेवाएँ CCS Temporary Service Rules, 1965 के नियम 5(1) के तहत, विभागीय जांच किए बिना, परीक्षाएँ पूरी होने और लंबित सीबीआई कार्यवाही के बावजूद समाप्त की जा सकती थीं?
उत्तर: हाँ। न्यायालय ने माना कि 05.02.2021 को वह अब भी परिवीक्षाधीन/अस्थायी सरकारी सेवक था; IRS Rules, 2016 के नियम 6(3) तथा CCS Temporary Service Rules, 1965 के नियम 5(1) के संयुक्त पठन से उसकी सेवाएँ बिना जांच या पूर्व नोटिस के discharge simpliciter आदेश द्वारा समाप्त की जा सकती थीं। - प्रश्न: क्या फर्बिशर कोर्स की अपूर्णता और भ्रष्टाचार मामले ने सेवा समाप्ति आदेश को इतना दंडात्मक या कलंकयुक्त बना दिया था कि उस पर अनुच्छेद 311 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत लागू होते?
उत्तर: नहीं। 05.02.2021 का आदेश केवल नियम 5(1) को लागू करते हुए साधारण सेवा समाप्ति का था, जिसमें किसी कदाचार या कलंक का उल्लेख नहीं था। प्राधिकारी इन तथ्यों पर परिवीक्षा के दौरान उपयुक्तता का आकलन करने के लिए भरोसा कर सकता था, बिना आदेश को दंड में परिवर्तित किए। - प्रश्न: क्या 01.08.2019 का मानी गई निलंबन आदेश और उसके विस्तार, बिना आरोप-पत्र के तीन माह से अधिक समय तक चलते रहने के कारण, Ajay Kumar Choudhary के आलोक में अवैध थे?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि CCS (CCA) Rules, 1965 के नियम 10(6) के तहत समीक्षा तथा अधिकतम 180 दिन तक के ब्लॉक में निलंबन विस्तार की अनुमति थी, जिसका विधिवत पालन किया गया। Ajay Kumar Choudhary के दिशानिर्देश इस परिवीक्षाधीन के मामले में अनुप्रयुक्त (inapplicable) पाए गए।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- High Court of Judicature at Patna v. Pandey Madan Mohan Prasad Sinha, (1997) 10 SCC 409.
- Rajasthan High Court v. Ved Priya and another, 2020 SCC OnLine SC 337.
- State of Punjab and Others v. Sukhwinder Singh, (2005) 5 SCC 569.
- Karnataka State Road Transport Corporation and Another v. S. Manjunath, (2000) 5 SCC 250 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत, अलग किया गया)।
- Ratnesh Kumar Choudhary v. Indira Gandhi Institute of Medical Sciences, Patna, Bihar & Ors., (2015) 15 SCC 151 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत, अलग किया गया)।
- V.P. Ahuja v. State of Punjab and Others, (2000) 3 SCC 239 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत, अलग किया गया)।
- Ajay Kumar Choudhary v. Union of India and Another, (2015) 7 SCC 291 (याचिकाकर्ता द्वारा उद्धृत, अनुप्रयुक्त पाया गया)।
मामले का विवरण
मामला संख्या: सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 12052 वर्ष 2024; सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 11330 वर्ष 2024।
वाद शीर्षक: Chandan Prakash Pandey बनाम The Union of India & Ors. (दोनों CWJC No. 12052 of 2024 और CWJC No. 11330 of 2024 में)।
उद्धरण: 2026 (3) PLJR 176.
पीठ (Coram): माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह; माननीय श्री न्यायमूर्ति आलोक कुमार पांडेय।
निर्णय की तिथि: 03.04.2026।
चुनौती दिए गए प्रारंभिक आदेश: केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, पटना पीठ, पटना द्वारा O.A. No. 050/00105/2021 तथा O.A. No. 050/00362/2020 में पारित सामान्य आदेश दिनांक 08.04.2024; सेवा समाप्ति आदेश दिनांक 05.02.2021; निलंबन तथा निलंबन-विस्तार आदेश दिनांक 01.08.2019, 19.09.2019, 18.03.2020 और 14.09.2020।
वकील:
दोनों रिट याचिकाओं में याचिकाकर्ता की ओर से: श्री मुन्ना पीडी दीक्षित, अधिवक्ता।
दोनों रिट याचिकाओं में प्रतिवादियों की ओर से: डॉ. के.एन. सिंह, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया; श्री अंशुमन, वरिष्ठ स्थायी अधिवक्ता, CGST & CX; श्री शिवादित्य धारी सिन्हा, अधिवक्ता।
मामले का स्वरूप: संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत सेवा संबंधी मुद्दों (परिवीक्षाधीन नियुक्ति की सेवा समाप्ति और मानी गई निलंबन तथा उसके विस्तारों की वैधता) पर CAT के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिकाएँ।
पूर्ण निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का निर्णय दिनांक 03.04.2026, CWJC No. 12052 of 2024 तथा CWJC No. 11330 of 2024 में
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