गिरफ्तारी वारंट और संपत्ति कुर्की के विरुद्ध रिट याचिका अस्वीकृत — पटना उच्च न्यायालय, 2026

Sakshi Bhatnagar

Reviewed by: Sakshi Bhatnagar

License Number: BR/2891A/2019

Sakshi Bhatanagar is a lawyer at Samvida Law Associates practicing criminal law. She represents clients in criminal proceedings before the Patna High Court and subordinate courts, handling bail applications, criminal appeals, NDPS matters, and customs-related cases. Her practice focuses on criminal defense and litigation across multiple forums in Bihar.

बहु-हत्या कांड के दो आरोपियों ने मजिस्ट्रेट द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट, उद्घोषणा तथा उनके मकानों की कुर्की के आदेशों को चुनौती दी। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि ऐसे न्यायिक आदेशों को रिट याचिका में निरस्त नहीं किया जा सकता और वैसे भी आरोपियों की गिरफ्तारी तथा जमानत के बाद ये आदेश निष्प्रभावी हो चुके थे। अतः न्यायालय ने न तो आदेशों को रद्द किया और न ही मुआवज़ा देने से सहमति जताई। फिर भी न्यायालय ने मजिस्ट्रेट की कार्यपद्धति को अवैध बताते हुए आलोचना की और चेतावनी दी कि ऐसे दबावपूर्ण कदम दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार ही उठाए जाने चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

फौजदारी मामला बेनीपट्टी थाना कांड संख्या 67/2021 से शुरू हुआ, जो सूचक राम नारायण सिंह के फर्दबeyan पर आधारित था। उन्होंने बताया कि 29.03.2021 को लगभग दोपहर 1:00 बजे, उनके घर के पास, कथित रूप से आग्नेयास्त्र तथा अन्य हथियारों से लैस व्यक्तियों के बड़े समूह ने उनके परिजनों पर हमला कर दिया।

फर्दब्यान के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर सूचक के पुत्र एवं भतीजों पर हमला किया, जिससे वे घटनास्थल पर ही मारे गए और अन्य तीन परिजन गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में उपचार के दौरान दो और घायलों की मृत्यु हो गई। कुल मिलाकर, एफआईआर में 35 नामित और 10–12 अज्ञात व्यक्तियों का उल्लेख किया गया।

मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149, 341, 323, 324, 325, 326, 307, 302 और 120B तथा शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दर्ज किया गया। जांच बेनीपट्टी पुलिस द्वारा की गई।

घटना के तुरंत बाद, 31.03.2021 और 06.04.2021 को, अन्वेषण अधिकारी ने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी-प्रथम (ACJM-I), बेनीपट्टी की अदालत में लिखित प्रार्थनापत्र दायर किए। इन प्रार्थनापत्रों में पुलिस ने याचिकाकर्ताओं एवं अन्य के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 82 के तहत उद्घोषणा और धारा 83 के तहत संपत्ति कुर्क करने के आदेश जारी करने का अनुरोध किया।

ACJM-I, बेनीपट्टी ने इन प्रार्थनापत्रों को स्वीकार कर लिया। 01.04.2021 और 06.04.2021 को मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ताओं के संबंध में एक साथ गिरफ्तारी वारंट, उद्घोषणा और कुर्की वारंट जारी करने वाले आदेश पारित किए। कुर्की की कार्रवाई 11.04.2021 और 25.04.2021 को की गई।

दोनों याचिकाकर्ता, कौशिक सिंह @ संतोष सिंह और मुसाफिर सिंह ने बाद में क्रमशः पटना उच्च न्यायालय में फौजदारी रिट अधिकारिता वाद संख्या 374/2022 और फौजदारी रिट अधिकारिता वाद संख्या 343/2022 दायर किए। दोनों रिट याचिकाएँ G.R. संख्या 200/2021, जो बेनीपट्टी थाना कांड संख्या 67/2021 से संबंधित है, से उत्पन्न हुईं और इन्हें एक साथ सुना गया।

न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया

पहले याचिकाकर्ता, मुसाफिर सिंह, लगभग 82 वर्ष के वृद्ध व्यक्ति हैं। उच्च न्यायालय के समक्ष उनका मामला यह था कि घटना के कथित समय पर वे अपने घर में सो रहे थे। दूसरे याचिकाकर्ता, कौशिक सिंह @ संतोष सिंह, उनके पुत्र हैं। उनका कहना था कि उनका इस घटना से कोई संबंध नहीं है और राजनीतिक दुश्मनी के कारण उन्हें झूठा फँसाया गया है।

याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि होली के त्योहार, शरीर पर लगे रंग और कीचड़ के कारण 100–500 मीटर की दूरी से इतनी बड़ी संख्या में लोगों की सही पहचान करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था। फिर भी सूचक ने विस्तार से याचिकाकर्ताओं सहित अनेक व्यक्तियों के नाम लिखवाए। अधिवक्ता ने यह भी इंगित किया कि थाना मात्र 3–4 किलोमीटर दूर होने और तीन व्यक्तियों की मृत्यु तथा तीन के गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद एफआईआर दर्ज करने में लगभग 10 घंटे की देरी हुई।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, जांच के दौरान पुलिस ने पहले पाया कि वास्तव में केवल 5–6 व्यक्ति ही संलिप्त हो सकते हैं। एक मुख्य आरोपी, प्रवीण झा, की गिरफ्तारी हुई और उसके कथित स्वीकारोक्ति बयान में याचिकाकर्ताओं के नाम नहीं आए। इसी तरह, एक घायल पीड़ित ने, अपने कथित कैमरा बयान में, याचिकाकर्ताओं को हमलावर के रूप में नहीं बताया। सूचक ने स्वयं को प्रत्यक्षदर्शी बताया, जबकि कथित रूप से लगभग 50 व्यक्ति घटना में शामिल थे और 25 व्यक्ति समूहों में फायरिंग कर रहे थे, फिर भी सूचक को कोई चोट नहीं आई। इस पृष्ठभूमि में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उनके विरुद्ध मामला संदिग्ध है।

हालाँकि रिट याचिकाओं का मुख्य जोर निर्दोषता पर न होकर मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट, उद्घोषणा और कुर्की के आदेशों की वैधता पर था। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अन्वेषण अधिकारी ने मात्र दो दिन के भीतर (एक मामले में एफआईआर के दो दिन बाद और दूसरे में कुछ दिन बाद) बिना किसी हलफनामे, विशिष्ट कारणों या साक्ष्य के, तीनों प्रकार के दबावपूर्ण उपायों के लिए समग्र (composite) प्रार्थनापत्र दाखिल कर दिए।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 73, 82 और 83 अलग-अलग चरणों में लागू होती हैं और केवल पुलिस की गिरफ्तारी में मदद के लिए इन्हें एक साथ लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने इंगित किया कि मजिस्ट्रेट ने महज औपचारिक ढंग से आदेश पारित किए, बिना यह संतोष दर्ज किए कि आरोपी फ़रार हैं या अपने को छिपा रहे हैं, और बिना इस सामग्री के कि उन्हें गिरफ्तार करने के प्रयास विफल रहे हों।

याचिकाकर्ताओं ने कई पूर्ववर्ती निर्णयों पर भरोसा किया। Dawood Ibrahim Kaskar बनाम State of Maharashtra, (2010) 10 SCC 438 में, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 73 दंप्रसं के तहत वारंट केवल आरोपी को न्यायालय के समक्ष पेश कराने के लिए जारी किया जा सकता है, न कि मात्र पुलिस जांच या गिरफ्तारी में मदद हेतु। न्यायालय को अपना स्वतंत्र न्यायिक मस्तिष्क लगाना होगा।

उन्होंने Nalini Kant Agrawal बनाम State of Bihar, 2003(1) PLJR 350 का भी हवाला दिया, जिसमें इस न्यायालय ने कहा कि धारा 73 दंप्रसं के तहत वारंट का उद्देश्य आरोपी की उपस्थिती न्यायालय के समक्ष सुनिश्चित करना है, पुलिस के समक्ष नहीं, तथा मजिस्ट्रेट को यह निष्कर्ष दर्ज करना होगा कि आरोपी गिरफ्तारी से बच रहा है। याचिकाकर्ताओं ने सह-पीठ के निर्णय Pinki Kumari & Anr. बनाम The State of Bihar and Others (Criminal Writ Jurisdiction Case No. 712 of 2022, आदेश दिनांक 26.08.2022) का भी हवाला दिया, जिसमें हलफनामे के बिना तथा पूर्व में जारी वारंटों के निष्पादन के प्रयासों के प्रमाण बिना, जल्दबाज़ी में पारित इसी प्रकार के आदेशों को रद्द कर दिया गया था।

धारा 82 और 83 दंप्रसं के संदर्भ में, याचिकाकर्ताओं ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं किया। धारा 82 के तहत उद्घोषणा तभी जारी की जा सकती है जब न्यायालय के पास यह मानने का कारण हो कि आरोपी फ़रार हो गया है या अपने को छिपा रहा है, और सामान्यतः यह तब होता है जब वारंट प्रयासों के बावजूद निष्पादित न हो सके। धारा 83 के प्रावधान के अनुसार, उद्घोषणा के साथ ही कुर्की तभी आदेशित की जा सकती है जब हलफनामे या अन्यथा, इस बात का पर्याप्त आधार हो कि व्यक्ति अपनी संपत्ति को नष्ट करने या न्यायालय की स्थानीय सीमा से बाहर ले जाने वाला है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इन सुरक्षा उपायों का कोई पालन नहीं हुआ। फिर भी मजिस्ट्रेट ने पुलिस के प्रार्थनापत्र के उसी दिन या अगले दिन ही एक साथ वारंट, उद्घोषणा और कुर्की के आदेश पारित कर दिए, जो पूर्णतः मस्तिष्क के गैर-प्रयोग को दर्शाता है।

उन्होंने आगे यह भी दलील दी कि चूँकि मूल पुलिस प्रार्थनापत्र ही अवैध थे, इसलिए बाद की सभी कार्रवाइयाँ, जिनमें न्यायालय के आदेश भी शामिल हैं, शून्य हैं। इस संदर्भ में उन्होंने “sublato fundamento cadit opus” सूक्ति तथा State of Punjab बनाम Davinder Pal Singh Bhullar, (2011) 14 SCC 770 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला दिया।

इसी आधार पर, उन्होंने न केवल आदेशों को रद्द कराने की मांग की, बल्कि उनके आवासीय मकान की कथित अवैध कुर्की तथा संपत्ति और प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए मुआवज़े की भी मांग की। इसके लिए उन्होंने Rudul Sah बनाम State of Bihar, (1983) 4 SCC 141 और Nilabati Behera बनाम State of Odisha, (1993) 2 SCC 746 का हवाला दिया, जिनमें सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के लिए मौद्रिक मुआवज़े को सार्वजनिक कानून के उपाय के रूप में मान्यता दी।

राज्य के अधिवक्ता ने सबसे पहले यह तर्क दिया कि रिट याचिकाएँ व्यावहारिक नहीं हैं, क्योंकि वे सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायिक आदेशों को चुनौती देती हैं। Neeta Singh & Ors. बनाम State of Uttar Pradesh & Ors., 2024 SCC OnLine SC 5761 और Pradnya Pranjal Kulkarni बनाम State of Maharashtra & Anr., 2025 SCC OnLine SC 1948 में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णयों के अनुसार, अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक आदेश के खिलाफ रिट याचिका ग्राह्य नहीं है।

राज्य की ओर से आगे यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी और बाद में जमानत मिलने के बाद impugned आदेश निष्प्रभावी (infructuous) हो गए हैं। जांच पूरी हो चुकी है तथा आरोपपत्र और पूरक आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं, जिनमें याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध मामला सही पाया गया है।

महत्वपूर्ण रूप से, राज्य के अधिवक्ता ने यह स्वीकार किया कि पुलिस प्रार्थनापत्र किसी हलफनामे, कारणों या साक्ष्य से समर्थित नहीं थे, और यह भी माना कि मजिस्ट्रेट के आदेश विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थे। तथापि, उन्होंने यह तर्क दिया कि मामला पाँच ग्रामीणों की हत्या से जुड़ा है, स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण थी और परिस्थितियों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से impugned आदेश पारित किए गए।

बहस के दौरान, याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता ने बाद की घटनाओं (गिरफ्तारी और जमानत) को देखते हुए मजिस्ट्रेट के आदेशों को रद्द करने की प्रार्थना पर ज़ोर नहीं दिया। उन्होंने अपनी मांग केवल मुआवज़ा देने तथा न्यायिक अधिकारियों के लिए संवेदनशीलता और प्रशिक्षण के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने तक सीमित रखी।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा ने दोनों पक्षों की दलीलों का परीक्षण किया। न्यायालय ने राज्य की इस दलील से सहमति जताई कि मजिस्ट्रेट के न्यायिक आदेशों को सीधे चुनौती देने के लिए रिट याचिका का उपयोग नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि न्यायिक आदेश के विरुद्ध अनुच्छेद 226 के तहत कोई रिट याचिका विधिसंगत नहीं है।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि चूँकि याचिकाकर्ताओं को पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी, इसलिए गिरफ्तारी वारंट, उद्घोषणा और कुर्की से संबंधित विशिष्ट आदेश व्यावहारिक प्रभाव खो चुके थे। इस प्रकार, इन आदेशों को चुनौती देना निष्प्रभावी हो गया था। क्योंकि याचिकाकर्ता स्वयं इस राहत पर अब ज़ोर नहीं दे रहे थे, इन आदेशों की वैधता पर अधिक चर्चा करना केवल शैक्षणिक (academic) होता।

मुआवज़े की मांग पर न्यायालय ने कहा कि ऐसा राहत केवल सहायक (ancillary) हो सकती है। जब मुख्य राहत (आदेशों को निरस्त करना) न तो ग्राह्य हो और न ही उस पर ज़ोर दिया जा रहा हो तथा वह निष्प्रभावी हो चुकी हो, तो फौजदारी रिट अधिकारिता के अंतर्गत मुआवज़ा देने पर विचार करने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता अपने अधिकारों के कथित उल्लंघन के लिए मुआवज़ा मांगना चाहें, तो वे अन्य उपयुक्त विधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र हैं।

साथ ही, न्यायालय ने गंभीर प्रक्रिया संबंधी अनियमितताओं की अनदेखी नहीं की। न्यायमूर्ति झा ने विचाराधीन न्यायालय के कार्य-निर्वहन पर अपनी “व्यथा और निराशा” स्पष्ट रूप से दर्ज की। उन्होंने पाया कि मजिस्ट्रेट ने धारा 73 के तहत वारंट, धारा 82 के तहत उद्घोषणा और धारा 83 दंप्रसं के तहत कुर्की के समग्र आदेश बिना आवश्यक शर्तों को पूरा किए पारित किए।

न्यायालय ने Dawood Ibrahim Kaskar और Nalini Kant Agrawal में स्थापित विधि की पुनः स्मृति दिलाई कि गिरफ्तारी वारंट केवल पुलिस के कहने भर से जारी नहीं किए जा सकते और इनका उद्देश्य आरोपी की उपस्थिति न्यायालय के समक्ष सुनिश्चित करना है, न कि जांच में सहूलियत देना। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि जब तक न्यायालय किसी सामग्री के आधार पर यह कारण दर्ज न करे कि आरोपी गिरफ्तारी से बच रहा है, तब तक धारा 82 और 83 को लागू नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने आगे इंगित किया कि उद्घोषणा में आरोपी को उपस्थित होने के लिए कम से कम 30 दिन का समय देना अनिवार्य है और संपत्ति की समवर्ती कुर्की तभी संभव है जब संपत्ति के निस्तारण या हटाए जाने की संभावना के साक्ष्य हों।

न्यायमूर्ति झा ने Davinder Pal Singh Bhullar के सिद्धांत को दोहराया कि यदि प्रारंभिक कार्रवाई विधि के अनुरूप नहीं है, तो बाद की सभी कार्यवाहियां स्वतः गिर जाती हैं। उन्होंने माना कि ACJM-I, बेनीपट्टी द्वारा जिस प्रकार एक साथ ये आदेश पारित किए गए, वे “कानून की नज़र में गलत” हैं।

फिर भी, यह देखते हुए कि पाँच हत्याएँ हुई थीं और संभवतः इसने मजिस्ट्रेट के निर्णय को प्रभावित किया होगा, न्यायालय ने मामले को “quietus” देने का निर्णय लिया और आगे किसी भी कार्रवाई का निर्देश देने से परहेज़ किया। अंततः, दोनों रिट याचिकाएँ तथा लंबित अंतरिम प्रार्थना-पत्र बिना किसी वास्तविक राहत दिए निस्तारित कर दी गईं।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो फौजदारी मामलों में इस स्थिति का सामना करते हैं कि अचानक उनकी संपत्ति कुर्क कर दी जाए या उन्हें फ़रार घोषित कर दिया जाए। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से मजिस्ट्रेटों और पुलिस को याद दिलाया है कि गिरफ्तारी वारंट, उद्घोषणा और कुर्की अत्यंत कठोर उपाय हैं और इन्हें केवल अभियुक्त पर दबाव बनाने के लिए, वह भी एक साथ और अनायास, जारी नहीं किया जा सकता।

साथ ही, न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति मजिस्ट्रेट के न्यायिक आदेश को चुनौती देना चाहता है, तो अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका उचित मार्ग नहीं है। उसे फौजदारी प्रक्रिया कानून द्वारा प्रदत्त उपायों का ही उपयोग करना होगा।

बिहार के आम नागरिकों के लिए यह निर्णय दो बातें दिखाता है। पहली, न्यायालय यह देख रहा है कि पुलिस और मजिस्ट्रेट धारा 73, 82 और 83 दंप्रसं की शक्तियों का कैसे प्रयोग करते हैं, और दुरुपयोग होने पर उसकी आलोचना करेगा। दूसरी, ऐसे दुरुपयोग के लिए मुआवज़े की मांग, संभवतः, अलग और उपयुक्त विधिक कार्यवाही के माध्यम से करनी होगी, न कि केवल इस आधार पर कि फौजदारी रिट में मुख्य राहत निष्प्रभावी हो जाने के बाद उसके साथ-साथ मुआवज़ा भी दे दिया जाए।

कानूनी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: क्या मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 73, 82 और 83 दंप्रसं के अंतर्गत गिरफ्तारी वारंट, उद्घोषणा और कुर्की के समवर्ती आदेशों को अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका में रद्द किया जा सकता है?
    उत्तर: नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अनुसरण करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि न्यायिक आदेशों के विरुद्ध रिट याचिकाएँ ग्राह्य नहीं हैं। किसी भी स्थिति में, याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी और जमानत के बाद चुनौती निष्प्रभावी हो चुकी थी।
  • प्रश्न: क्या कथित अवैध कुर्की और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए फौजदारी रिट अधिकारिता में याचिकाकर्ताओं को मुआवज़ा दिया जा सकता था?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि मुआवज़ा केवल सहायक राहत होता। जब आदेशों को रद्द करने की मुख्य राहत न तो ग्राह्य थी और न ही उस पर ज़ोर दिया जा रहा था, तो इन रिट याचिकाओं में मुआवज़ा देने की कोई गुंजाइश नहीं थी। याचिकाकर्ताओं को उपयुक्त विधिक उपचार अलग से अपनाने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया गया।
  • प्रश्न: क्या मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी वारंट, उद्घोषणा और कुर्की जारी करने में प्रक्रिया संबंधी अनियमितताएँ थीं?
    उत्तर: हाँ। न्यायालय ने पाया कि गिरफ्तारी के प्रयासों के प्रमाण, फ़रारी के संबंध में संतोष की रिकॉर्डिंग, उद्घोषणा में 30 दिन के समय का पालन तथा समवर्ती कुर्की के आधारों के बिना मजिस्ट्रेट द्वारा पारित समग्र आदेश दंप्रसं के विपरीत तथा “कानून की नज़र में गलत” थे, यद्यपि मामले की प्रकृति और रिट अधिकारिता की सीमाओं के कारण कोई सुधारात्मक आदेश पारित नहीं किया गया।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Dawood Ibrahim Kaskar v. State of Maharashtra, (2010) 10 SCC 438
  • Nalini Kant Agrawal v. State of Bihar, 2003(1) PLJR 350
  • Pinki Kumari & Anr. v. The State of Bihar and Others, Criminal Writ Jurisdiction Case No. 712 of 2022, order dated 26.08.2022
  • Usha Mishra v. State of Bihar, 2007(3) PLJR 748
  • State of Punjab v. Davinder Pal Singh Bhullar, (2011) 14 SCC 770
  • Rudul Sah v. State of Bihar, (1983) 4 SCC 141
  • Nilabati Behera v. State of Odisha, (1993) 2 SCC 746
  • Neeta Singh & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Ors., 2024 SCC OnLine SC 5761
  • Pradnya Pranjal Kulkarni v. State of Maharashtra & Anr., 2025 SCC OnLine SC 1948

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Writ Jurisdiction Case No. 374 of 2022 with Criminal Writ Jurisdiction Case No. 343 of 2022

मामले का शीर्षक: Kaushik Singh @ Santosh Singh v. The State of Bihar & Ors.; Musafir Singh v. The State of Bihar & Ors.

पीठ: माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा

निर्णय की तिथि: 30.03.2026

उल्लेख: 2026(3) PLJR 215

अधिवक्ता:

याचिकाकर्ताओं की ओर से (दोनों रिट याचिकाओं में): श्री आनंद कुमार ओझा, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री रवीन्द्र कुमार सिंह, अधिवक्ता

प्रतिवादियों की ओर से (Cr. WJC No. 374 of 2022): श्री सुमन कुमार झा, AC to AAG-3

प्रतिवादियों की ओर से (Cr. WJC No. 343 of 2022): श्री मो. नदीम सेराज, GP-5

मामले का स्वरूप: फौजदारी रिट याचिकाएँ, जिनमें हत्या के मामले (G.R. संख्या 200/2021, बेनीपट्टी थाना कांड संख्या 67/2021) में मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी वारंट, धारा 82 दंप्रसं के तहत उद्घोषणा तथा धारा 83 दंप्रसं के तहत संपत्ति कुर्की के आदेशों को चुनौती दी गई

निर्णय की लिंक: Patna High Court Judgment

यदि आपको यह व्याख्या उपयोगी लगी हो और आप यह जानने के लिए अद्यतन रहना चाहते हों
कि बिहार में विधिक विकास आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं,
तो आप Samvida Law Associates को आगे की जानकारी के लिए फ़ॉलो करने पर विचार कर सकते हैं।

Facing a similar matter before the Patna High Court? Contact Samvida Law Associates.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News