गैर-विस्तृत (नॉन-स्पीकिंग) आदेश के कारण अनुशासनात्मक दंड निरस्त — पटना उच्च न्यायालय, 2026

Abhishek Kumar

Reviewed by: Abhishek Kumar

License Number: BR/1810/2019

अभिषेक कुमार समविदा लॉ एसोसिएट्स में एक वकील हैं जो जीएसटी और आयकर मामलों में प्रथा करते हैं। वह पटना उच्च न्यायालय और अन्य अधिकार क्षेत्रों में कर विवाद और नियामक अनुपालन के मामलों में क्लाइंट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी प्रैक्टिस बिहार और आसपास के क्षेत्रों में व्यवसायों और व्यक्तियों के लिए कर मूल्यांकन कार्यवाही, जीएसटी संबंधित मामलों और व्यावसायिक विवादों को संभालती है।

पटना उच्च न्यायालय ने एक सरकारी अधिकारी के विरुद्ध किया गया विभागीय दंड जांचा। न्यायालय ने पाया कि अनुशासनात्मक और अपीलीय दोनों आदेशों में दूसरी कारण बताओ सूचना के प्रति उसकी प्रत्युत्तर को ठीक से नहीं माना गया। दोनों आदेशों को निरस्त कर मामला वापस भेज दिया गया। अब प्राधिकार को 90 दिनों के भीतर नया, कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में कार्यरत एक सरकारी सेवक के विरुद्ध चलाए गए विभागीय कार्यवाही से उत्पन्न हुआ।

याचिकाकर्ता को प्रारंभ में मुंगेर जिले के संग्रामपुर अंचल में सर्किल निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्होंने 21.09.1990 को सेवा जॉइन की। बाद में उन्होंने कटिहार जिले के आजमनगर में सर्किल अधिकारी (अंचल अधिकारी) के रूप में कार्य किया।

जब वे आजमनगर में पदस्थापित थे, तब जिला पदाधिकारी, कटिहार ने तीन आरोपों वाला प्रपत्र-क जारी किया। इससे उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही प्रारंभ हुई।

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के उप सचिव ने आरोपपत्र याचिकाकर्ता को प्रेषित किया और 15 दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा। याचिकाकर्ता ने 17.07.2014 को विस्तृत प्रत्युत्तर दायर कर आरोपों से इनकार किया और दोषमुक्ति की मांग की।

इस प्रत्युत्तर के बावजूद, विभाग के विशेष सचिव ने बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005, जिसे सामान्यतः CCA नियमावली, 2005 कहा जाता है, के नियम 17(2) के अंतर्गत औपचारिक विभागीय कार्यवाही शुरू करने का निर्णय लिया।

इस कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान, याचिकाकर्ता को आजमनगर से रोहतास जिले के दिनारा स्थित समाहरण (Consolidation) कार्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ उन्होंने प्रभारी समाहरण पदाधिकारी के रूप में जॉइन किया।

18.08.2018 को दोपहर 1:00 बजे, उन्हें अतिरिक्त Collector, कटिहार द्वारा विभागीय कार्यवाही के सिलसिले में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया। वे उपस्थित हुए और दस्तावेजों से समर्थित लिखित बयान प्रस्तुत किया।

अतिरिक्त Collector ने जांच/आचरण पदाधिकारी के रूप में कार्य करते हुए जांच पूरी की और 27.09.2018 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें याचिकाकर्ता के विरुद्ध आरोपों को सिद्ध माना गया।

इस रिपोर्ट के आधार पर विभाग द्वारा 21.01.2019 को दूसरी कारण बताओ सूचना जारी की गई। याचिकाकर्ता ने 16.01.2019 को अपना प्रत्युत्तर दाखिल किया, अपने बचाव को दोहराया और दोषमुक्ति का अनुरोध किया।

इसके पश्चात, 31.10.2019 को राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अतिरिक्त सचिव ने Memo No. 728 (NiO ko) के रूप में आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ता पर वेतन की तीन वार्षिक वृद्धियों को संचयी प्रभाव सहित रोकने का दंड आरोपित किया। इसे एक मुख्य (मेजर) दंड माना जाता है।

कष्टसाध्य होकर, याचिकाकर्ता ने अपीलीय/पुनरीक्षण अधिकरण-सह माननीय मंत्री, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग, बिहार सरकार, पटना के समक्ष सेवा अपील प्रकरण संख्या 33/2019-20 (कटिहार) दायर किया। 17.05.2022 के आदेश द्वारा अपील खारिज कर दी गई।

इसके बाद याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय की सिविल रिट क्षेत्राधिकार में C.W.J.C. No. 9740 of 2022 दाखिल कर 31.10.2019 की अनुशासनात्मक तथा 17.05.2022 की अपीलीय दोनों ही आदेशों को चुनौती दी।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति डॉ. अंशुमान की पीठ के माध्यम से याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्य के अधिवक्ता को सुना।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि उनकी लंबी और ईमानदार सेवा रही है, जिसमें वार्षिक गोपनीय रिपोर्टें उनके दक्ष और उत्कृष्ट कार्यनिष्पादन को दर्शाती हैं। इसके बावजूद, उन्हें अक्षमता और कदाचार के आरोपों पर दंडित किया गया। उनके अनुसार यह विरोधाभास विभाग द्वारा मस्तिष्क का समुचित उपयोग न होने (non-application of mind) को दर्शाता है।

उन्होंने आगे तर्क दिया कि दूसरी कारण बताओ सूचना के प्रति उनकी प्रत्युत्तर को अनुशासनिक प्राधिकार ने बिल्कुल भी नहीं माना। इसलिए दंडादेश मनमाना, अन्यायपूर्ण और विधि-विरुद्ध था। उनका यह भी कहना था कि अपीलीय प्राधिकार ने तथ्यों और विधि की उचित सराहना किए बिना यंत्रवत ढंग से उनकी अपील खारिज कर दी।

दूसरी ओर, राज्य ने विभागीय कार्यवाही का बचाव किया। कहा गया कि याचिकाकर्ता ने 2013 में आजमनगर में सर्किल अधिकारी के रूप में जॉइन किया और उनके कार्यकाल के दौरान गंभीर कमियां पाई गईं, जैसे अनधिकृत अनुपस्थिति, वैध आदेशों की अवहेलना और सरकारी कार्यों से बचना। इनसे कार्यालय के सुचारू संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

राज्य के अनुसार, याचिकाकर्ता से इन आरोपों के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया, परंतु उनका स्पष्टीकरण असंतोषजनक पाया गया। इसलिए CCA नियमावली, 2005 के नियम 17(2) के अंतर्गत औपचारिक कार्यवाही प्रारंभ की गई और अतिरिक्त Collector, कटिहार को जांच पदाधिकारी नियुक्त किया गया।

राज्य ने प्रस्तुत किया कि जांच पूरी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पूर्ण अनुपालन के साथ की गई। याचिकाकर्ता को भाग लेने के लिए पर्याप्त अवसर दिया गया। साक्ष्यों पर विचार के पश्चात, जांच पदाधिकारी ने 27.09.2018 की Letter No. 790 द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें आरोपों को सिद्ध माना गया।

इसके पश्चात 21.01.2019 की दिनांकित दूसरी कारण बताओ सूचना जारी की गई। याचिकाकर्ता ने अपना प्रतिवेदन दिया। अनुशासनिक प्राधिकार ने आरोपों, याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण तथा जांच रिपोर्ट पर विचार करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि आरोप सिद्ध हैं। तब तीन वार्षिक वृद्धियों को संचयी प्रभाव सहित रोकने का दंड दिया गया। राज्य ने कहा कि यह दंड कदाचार के अनुपात में उचित है।

राज्य ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता की विभागीय अपील, जो मंत्री-सह-अपीलीय प्राधिकार के समक्ष दायर की गई थी, पर विचार कर 17.05.2022 के आदेश से उसे खारिज कर दिया गया। उनका तर्क था कि कोई अवैधता या अनियमितता नहीं हुई और रिट याचिका निरस्त की जानी चाहिए।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, पटना उच्च न्यायालय ने CCA नियमावली, 2005 के नियम 18 के अंतर्गत कानूनी आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित किया। नियम 18 यह नियंत्रित करता है कि जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद अनुशासनिक प्राधिकार को क्या कार्रवाई करनी है।

न्यायालय ने नियम 18 को विस्तार से उद्धृत किया। नियम 18(2) के तहत, यदि अनुशासनिक प्राधिकार जांच पदाधिकारी के निष्कर्षों से असहमत होता है, तो उसे कारण दर्ज करने और अपने निष्कर्ष रिकॉर्ड करने होते हैं। नियम 18(3) के तहत, जांच रिपोर्ट की प्रति तथा अनुशासनिक प्राधिकार के निष्कर्ष (यदि कोई हों) सरकारी सेवक को दी जानी चाहिए ताकि वह प्रतिवेदन दे सके।

सबसे महत्वपूर्ण रूप से, नियम 18(4) यह प्रावधान करता है कि अनुशासनिक प्राधिकार किसी भी दंड को उप-नियम (5) और (6) के अंतर्गत लगाने से पूर्व, सरकारी सेवक द्वारा किया गया प्रतिवेदन अथवा प्रस्तुतीकरण, यदि कोई हो, पर विचार करेगा।

न्यायालय ने ध्यान दिया कि इस मामले में वास्तव में दूसरी कारण बताओ सूचना जारी की गई थी और याचिकाकर्ता ने अपना प्रत्युत्तर भी दिया था। अतः नियम 18(3) का अनुपालन विवाद का विषय नहीं था।

मुख्य प्रश्न यह था कि क्या अनुशासनिक प्राधिकार ने नियम 18(4) का अनुपालन करते हुए याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर ठीक से विचार किया और उसे स्वीकार या अस्वीकार करने के कारण दर्ज किए।

उच्च न्यायालय ने 31.10.2019 की दिनांकित Memo No. 728 में निहित अनुशासनात्मक आदेश का परीक्षण किया। पाया गया कि याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन को मात्र बहुत संक्षिप्त रूप से निपटाया गया है। प्रासंगिक भाग में सार रूप में यह कहा गया था कि आरोप, उनका स्पष्टीकरण, जांच रिपोर्ट और दूसरी कारण बताओ सूचना के प्रत्युत्तर पर विचार करने के बाद पाया गया कि उनका स्पष्टीकरण स्वीकार्य या संतोषजनक नहीं है।

न्यायालय ने माना कि इस प्रकार की नंगे (बेरुखे) अवलोकन पर्याप्त नहीं हैं। अनुशासनिक कार्यवाहियां अर्ध-न्यायिक (quasi-judicial) प्रकृति की होती हैं। इसका अर्थ यह है कि उन्हें न्यायालयों के समान मानकों का पालन करना होता है, जिसमें कारण दर्ज करना और यह दिखाना शामिल है कि प्राधिकार ने किस प्रकार मस्तिष्क का उपयोग किया।

उच्च न्यायालय ने जोर देकर कहा कि केवल यह कह देना कि दोषारोपित कर्मचारी का स्पष्टीकरण “संतोषजनक नहीं” है, विधि की अपेक्षा को पूरा नहीं करता। अनुशासनिक प्राधिकार नियम 18(4) के अनुरूप अंतिम आदेश पारित करते समय प्रतिवेदन की जांच कर कारणों को अभिलिखित करने के लिए बाध्य है।

इस मामले में अनुशासनिक आदेश यह नहीं दर्शाता कि याचिकाकर्ता के बचाव को अस्वीकार करने का कोई विशिष्ट कारण क्या था अथवा प्रत्येक आरोप का उनकी प्रत्युत्तर के आलोक में कैसे मूल्यांकन किया गया। दूसरी कारण बताओ सूचना के जवाब में उन्होंने जो बिंदु उठाए, उनका कोई विचार-विमर्श आदेश में नहीं है।

इसी प्रकार, 17.05.2022 की दिनांकित अपीलीय/पुनरीक्षण अधिकरण-सह-माननीय मंत्री द्वारा पारित अपीलीय आदेश को भी न्यायालय ने समान त्रुटि से ग्रस्त पाया। अपीलीय प्राधिकार ने केवल यह दर्ज किया कि दूसरी कारण बताओ सूचना के जवाब में दिया गया स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है, परंतु कोई विस्तृत तर्क नहीं दिया।

इन कारणों से न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अनुशासनिक प्राधिकार और अपीलीय प्राधिकार दोनों ही CCA नियमावली, 2005 के नियम 18(4) के अंतर्गत अपेक्षित न्यायिक मस्तिष्क का उपयोग करने में विफल रहे।

इसी आधार पर उच्च न्यायालय ने माना कि तीन वार्षिक वृद्धियों को संचयी प्रभाव सहित रोकने का दंड लगाने वाला 31.10.2019 (Memo No. 728) का अनुशासनिक आदेश टिकाऊ नहीं है। सेवा अपील प्रकरण संख्या 33/2019-20 में 17.05.2022 का अपीलीय आदेश भी स्थिर नहीं रह सकता।

अतः न्यायालय ने दोनों आदेशों को निरस्त कर दिया।

हालाँकि न्यायालय ने याचिकाकर्ता को दोषमुक्त (exonerate) नहीं किया और न ही मामला समाप्त किया। इसके बजाय, उसने मामला पुनः अनुशासनिक प्राधिकार को भेज दिया। प्राधिकार को निर्देश दिया गया है कि वह याचिकाकर्ता की दूसरी कारण बताओ सूचना के प्रत्युत्तर पर विधिवत विचार करने के बाद नया आदेश पारित करे।

उच्च न्यायालय ने समय सीमा तय करते हुए निर्देश दिया कि नया आदेश निर्णय की तिथि से 90 दिनों के भीतर पारित किया जाए।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय विभागीय कार्यवाहियों का सामना कर रहे सरकारी कर्मचारियों और ऐसी जांच संचालित करने वाले प्राधिकारों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।

कर्मचारियों के लिए यह दर्शाता है कि यदि जांच में आरोप सिद्ध भी माने जाएं, तब भी अनुशासनिक और अपीलीय प्राधिकारों को दूसरी कारण बताओ सूचना के प्रति उनके जवाब को ध्यान से पढ़कर उस पर विचार करना और उसका निपटारा करना अनिवार्य है। केवल “स्पष्टीकरण असंतोषजनक” कहकर, बिना कारण बताए, दिया गया दंडादेश चुनौती योग्य है।

विभागों के लिए, पटना उच्च न्यायालय का यह निर्णय स्मरण कराता है कि अनुशासनिक आदेश अर्ध-न्यायिक होते हैं। इनमें विशेष रूप से CCA नियमावली, 2005 के नियम 18(4) के लागू होने पर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी व्यक्ति के बचाव को अस्वीकार क्यों किया गया।

निर्णय यह नहीं कहता कि याचिकाकर्ता निर्दोष है। इसके बजाय, यह सही प्रक्रिया और कारणयुक्त आदेशों पर जोर देता है। इससे दोनों पक्षों को लाभ है: कर्मचारियों को यह भरोसा मिलता है कि उनके बचाव पर वास्तव में विचार किया गया, और विभाग ऐसे दंडादेश पारित करते हैं जो न्यायालय में टिक सकें।

कानूनी मुद्दे और उनके उत्तर

  • मुद्दा: क्या अनुशासनिक प्राधिकार ने संचयी प्रभाव सहित तीन वार्षिक वृद्धियों को रोकने का दंड लगाते समय बिहार सरकारी सेवक (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियमावली, 2005 के नियम 18(4) का अनुपालन किया था?
    उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अनुशासनिक प्राधिकार ने याचिकाकर्ता की दूसरी कारण बताओ सूचना के प्रत्युत्तर पर विधिवत विचार नहीं किया और केवल यह कहने से आगे कोई कारण नहीं दिया कि उनका स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है।
  • मुद्दा: क्या दंड को बरकरार रखने वाला अपीलीय प्राधिकार का आदेश विधि की दृष्टि से टिकाऊ था?
    उत्तर: नहीं। न्यायालय ने पाया कि अपीलीय प्राधिकार ने भी न्यायिक मस्तिष्क का उपयोग नहीं किया और केवल यह दर्ज किया कि स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं है, इसलिए उसका आदेश भी निरस्त कर दिया गया।
  • मुद्दा: नियम 18(4) के उल्लंघन का निष्कर्ष आने के बाद आगे क्या कार्यवाही होनी चाहिए थी?
    उत्तर: न्यायालय ने प्रकरण को पुनः अनुशासनिक प्राधिकार के पास यह निर्देश देते हुए भेजा कि वह याचिकाकर्ता की दूसरी कारण बताओ सूचना के प्रत्युत्तर पर विधिवत विचार कर 90 दिनों के भीतर नया, कारणयुक्त आदेश पारित करे।

न्यायालय द्वारा उद्धृत प्रकरण

  • निर्णय के पाठ में किसी पूर्व न्यायिक निर्णय या प्रकरण विधि का उल्लेख या उस पर भरोसा नहीं किया गया है।

मामले का विवरण

मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 9740 of 2022

मामला शीर्षक: Sunil Kumar Bhandari v. The Principal Secretary, Revenue and Land Reforms Department, Government of Bihar & Ors.

Citation: 2026 (2) PLJR 662

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Dr. Anshuman

अधिवक्ता: याचिकाकर्ता की ओर से – Mr. Bindhyachal Singh, Senior Advocate; Mr. Parmeshwar Vishwakarma, Advocate. प्रतिवादियों की ओर से – Mr. Md. Khurshid Alam, AAG-12.

मामले का स्वभाव: सेवा संबंधी मामले में विभागीय दंड और अपीलीय आदेश को चुनौती देते हुए सिविल रिट क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दायर रिट याचिका।

प्रमुख तिथियां: प्रथम कारण बताओ सूचना का प्रत्युत्तर – 17.07.2014; जांच रिपोर्ट Letter No. 790 दिनांक 27.09.2018; दूसरी कारण बताओ सूचना Letter No. 4 दिनांक 21.01.2019; दंडादेश Memo No. 728 दिनांक 31.10.2019; अपीलीय आदेश दिनांक 17.05.2022; उच्च न्यायालय का निर्णय दिनांक 13.03.2026; CAV तिथि 31.01.2026; अपलोडिंग तिथि 16.03.2026।

निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय का पूर्ण निर्णय पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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