प्रकरण की पृष्ठभूमि
यह मामला 03.01.2020 को जिला जेल, हाजीपुर में घटित एक गंभीर घटना से उत्पन्न हुआ है। उस समय याचिकाकर्ता जेल अधीक्षक के पद पर पदस्थापित थे।
उस दोपहर एक बंदी मनीष कुमार @ नेताजी @ टेलिया की जेल परिसर के अंदर ही एक अन्य बंदी राजा बाबू द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई। जांच में यह बात सामने आई कि एक वार्डर राज कुमार ने कथित तौर पर बंदी राजा बाबू के साथ मिलकर साजिश रची और गोलीबारी में प्रयुक्त आग्नेयास्त्र उपलब्ध कराया।
घटना के तुरंत बाद जिलाधिकारी, वैशाली तथा पुलिस अधीक्षक, वैशाली ने जेल के अंदर तलाशी अभियान चलाया। तलाशी में एक पिस्तौल, दो जीवित कारतूस, चार खाली कारतूस, छह मोबाइल फोन, दो चार्जर, दो छोटी स्टील की कैंचियां, एक चिकनी मिट्टी की चिलम, दो लोहे की छैनी तथा अन्य निषिद्ध वस्तुएं बरामद हुईं।
जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक ने 04.01.2020 दिनांकित संयुक्त प्रतिवेदन तैयार किया और इसे 05.01.2020 को गृह विभाग, बिहार के अपर मुख्य सचिव को भेजा। इसकी एक प्रति कारा महानिरीक्षक, बिहार को भी प्रेषित की गई।
05.01.2020 को ही अपर मुख्य सचिव के निर्देश पर जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में हाजीपुर जेल का औचक निरीक्षण कराया गया। इस निरीक्षण के दौरान तीन मोबाइल फोन, एक ईयरफोन, एक यूएसबी डिवाइस तथा अन्य निषिद्ध सामग्री बरामद हुई। निरीक्षण दल ने याचिकाकर्ता को निषिद्ध वस्तुओं की बरामदगी के लिए दोषी माना और जेल की संरचना तथा सुरक्षा व्यवस्थाओं में कई खामियों का उल्लेख किया।
इसी निरीक्षण प्रतिवेदन के आधार पर 14.01.2020 के आदेश द्वारा विभागीय कार्यवाही की संभावना में याचिकाकर्ता को निलंबित कर दिया गया। 18.04.2020 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसका उत्तर याचिकाकर्ता ने 22.06.2020 को दिया।
उनका उत्तर असंतोषजनक पाकर, प्राधिकारियों ने 11.09.2020 के संकल्प द्वारा बिहार सी.सी.ए. नियमावली, 2005 के तहत विभागीय कार्यवाही आरंभ की और आरोप-पत्र (मेमो ऑफ चार्ज) जारी किया। कुल पाँच आरोप बनाए गए, जिनमें समग्र रूप से सुरक्षा बनाए रखने में विफलता, तलाशी की निगरानी न करना, अधीनस्थ कर्मचारियों पर नियंत्रण का अभाव तथा बिहार कारा नियमावली, 2012 और बिहार सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1976 के तहत कर्तव्य की उपेक्षा जैसे आरोप शामिल थे।
जांच उपरांत, जांच अधिकारी ने 22.11.2021 को अपनी प्रतिवेदन (रिपोर्ट) प्रस्तुत की। उन्होंने आरोप संख्या 1 को सिद्ध तथा शेष चार आरोपों को आंशिक रूप से सिद्ध माना। जांच प्रतिवेदन संलग्न करते हुए दूसरा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ता ने अपना उत्तर दायर किया, परंतु अनुशासनिक प्राधिकारी उससे संतुष्ट नहीं हुआ।
25.05.2022 को संयुक्त सचिव सह निदेशक (प्रशासन) ने याचिकाकर्ता पर पाँच वार्षिक वेतनवृद्धि को समेकित प्रभाव (क्यूम्यूलेटिव इफेक्ट) सहित रोके जाने का दंड लगाया। याचिकाकर्ता की पुनरीक्षण याचिका 01.09.2022 के आदेश द्वारा खारिज कर दी गई।
इसके बाद 13.09.2022 दिनांकित एक नया कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें पूछा गया कि निलंबन अवधि के लिए उन्हें केवल निर्वाह भत्ता ही क्यों न दिया जाए। उनके उत्तर पर विचार कर 20.12.2022 का आदेश पारित किया गया, जिसके तहत निर्देश दिया गया कि निलंबन अवधि के लिए उन्हें निर्वाह भत्ते के अलावा कोई अन्य भुगतान नहीं मिलेगा।
इन आदेशों से आहत होकर, याचिकाकर्ता ने पटना उच्च न्यायालय में सिविल रिट जूरिस्डिक्शन केस संख्या 8620/2024 दायर की, जिसमें 25.05.2022 के दंड आदेश, 01.09.2022 के पुनरीक्षण आदेश, 13.09.2022 के कारण बताओ नोटिस, 20.12.2022 के आदेश तथा मेमो संख्या 6159 दिनांक 11.09.2020 के माध्यम से आरंभ की गई विभागीय कार्यवाही को चुनौती देते हुए उनके सभी परिनामी लाभों के साथ निरस्तीकरण (क्वैशिंग) की प्रार्थना की गई।
न्यायालय ने क्या परखा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने माननीय श्री न्यायमूर्ति संदीप कुमार की पीठ के माध्यम से मामले के तथ्यों और विभागीय जांच की कार्यवाही – दोनों की गहन समीक्षा की।
याचिकाकर्ता का मुख्य बचाव यह था कि आरोप केवल पर्यवेक्षण (सुपरविजन) की कमी से संबंधित थे, न कि किसी प्रत्यक्ष कदाचार से। उनका कहना था कि वे एक परिश्रमी अधिकारी हैं, राष्ट्रपति सुधार सेवा पदक से सम्मानित हैं, और उन्होंने जेल की सुरक्षा सुधारने के लिए कई कदम उठाए थे।
याचिकाकर्ता ने उच्च प्राधिकारियों को लिखे गए अनेक पत्रों का हवाला दिया, जिनमें जेल की संरचना सुधारने, परकोटा (बाउंड्री वॉल) ऊँचा करने, जैमर और सीसीटीवी कैमरे लगाने आदि की मांग की गई थी। उन्होंने 19.06.2019 दिनांकित एक पत्र पर भी भरोसा किया, जिसमें उन्होंने एक ऐसे जेलकर्मी के प्रतिस्थापन (रिप्लेसमेंट) का अनुरोध किया था जो संतोषजनक रूप से कार्य नहीं कर रहा था।
03.01.2020 की विशेष घटना के संदर्भ में, याचिकाकर्ता का तर्क था कि गोलीबारी, वार्डर राज कुमार और बंदी राजा बाबू के बीच आपराधिक साजिश का परिणाम थी। उनका कहना था कि वे इस कृत्य के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी नहीं ठहराए जा सकते, विशेषकर जब वे तीन माह की लंबी अवकाश के बाद 02.01.2020 को ही ड्यूटी पर लौटे थे।
उन्होंने आगे कहा कि 2018 में तत्कालीन जिलाधिकारी, वैशाली द्वारा किए गए निरीक्षण में ही जेल में गंभीर कमियां दर्ज की जा चुकी थीं, जिनमें कम ऊँचाई की परकोटा भी शामिल थी। उस निरीक्षण के बाद याचिकाकर्ता ने कार्यपालक अभियंता, भवन निर्माण विभाग तथा कारा महानिरीक्षक को लगातार पत्र लिखकर सुधार एवं बेहतर सुरक्षा उपायों, जैसे अधिक सीसीटीवी कवरेज और जैमर लगाए जाने, की मांग की। उनके अनुसार ये पत्र उनके सक्रिय प्रयासों के प्रमाण हैं, लापरवाही के नहीं।
याचिकाकर्ता ने यह भी रेखांकित किया कि वे नियमित रूप से अपने अधीनस्थों, जिनमें सहायक अधीक्षक और बीएमपी इंचार्ज शामिल हैं, को जेल में प्रवेश करने वाले सभी व्यक्तियों की कड़ी तलाशी (फ्रिस्किंग) कराने तथा आपत्तिजनक वस्तुएं मिलने पर उचित कार्रवाई करने के निर्देश देते थे। इसके बावजूद, वार्डर राज कुमार ने कथित रूप से अवैध आग्नेयास्त्र भीतर पहुंचाया।
याचिकाकर्ता की चुनौती का एक महत्वपूर्ण हिस्सा विभागीय जांच की प्रक्रिया से संबंधित था। आरोप-पत्र से यह स्पष्ट था कि आरोपों को सिद्ध करने के लिए दो मौखिक साक्षियों को प्रस्तुत किया जाना था। जांच अधिकारी ने प्रश्नावली के आधार पर इन दोनों साक्षियों के बयान संयुक्त रूप से दर्ज किए।
याचिकाकर्ता का कहना था कि दोनों साक्षियों ने उनके विरुद्ध कुछ भी नहीं कहा। उन्होंने आगे यह इंगित किया कि जांच अधिकारी ने आरोप संख्या 1 को सिद्ध तथा शेष आरोपों को आंशिक रूप से सिद्ध केवल संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन और वार्डर राज कुमार के बयान के आधार पर माना।
हालाँकि, संयुक्त प्रतिवेदन के लेखक – तत्कालीन जिलाधिकारी, वैशाली और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक, वैशाली – को विभागीय जांच में कभी गवाह के रूप में प्रस्तुत ही नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि बिना उन्हें साक्षी के रूप में परीक्षित किए, संयुक्त प्रतिवेदन के कथ्यों को साक्ष्य नहीं माना जा सकता था।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि जांच अधिकारी ने वार्डर राज कुमार के कथित बयान पर भारी निर्भरता की, जोकि कथित रूप से आग्नेयास्त्र उपलब्ध कराने वाला व्यक्ति था। राज कुमार को विभागीय जांच में गवाह के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया और याचिकाकर्ता को कभी भी उसका प्रतिपरीक्षण (क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन) करने का अवसर नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता ने इसे प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन बताया।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, विशेष रूप से Roop Singh Negi v. Punjab National Bank, State of U.P. v. Saroj Kumar Sinha, SBI v. S.N. Goyal और अन्य नज़ीरों पर भरोसा किया, जिनमें स्पष्ट किया गया है कि जब प्रमुख दंड (मेजर पेनाल्टी) का प्रस्ताव हो, तो विभागीय कार्यवाही में मौखिक साक्ष्य दर्ज करना अनिवार्य है, दस्तावेजों को उनके लेखक के माध्यम से सिद्ध करना आवश्यक है और अभियुक्त कर्मचारी को गवाहों का प्रतिपरीक्षण करने का अवसर मिलना चाहिए।
राज्य ने अपने प्रतिवाद हलफनामों में जांच का बचाव किया। उसने जोर दिया कि जेल में दो अलग-अलग तलाशी अभियानों में आग्नेयास्त्र और नकदी सहित अवैध वस्तुएं बरामद हुईं, जो स्वयं ही याचिकाकर्ता की घोर लापरवाही और जेलकर्मियों पर नियंत्रण के अभाव को दर्शाती हैं।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायालय ने जांच अभिलेख का परीक्षण किया। न्यायालय ने नोट किया कि 03.01.2020 को गोलीबारी के तुरंत बाद किए गए प्रारंभिक (प्रिलिमिनरी) जांच में पाँच कार्मिकों को सुरक्षा चूक के लिए प्रथम दृष्टया जिम्मेदार पाया गया था, परंतु उस स्तर पर न तो याचिकाकर्ता का नाम लिया गया और न ही उनके विरुद्ध कोई प्रतिकूल टिप्पणी की गई।
बाद में दो सदस्यीय समिति ने जेल का निरीक्षण किया और निषिद्ध वस्तुओं की बरामदगी के लिए याचिकाकर्ता को जिम्मेदार माना। इसी निरीक्षण प्रतिवेदन के आधार पर विभागीय कार्यवाही शुरू की गई।
न्यायालय ने यह परखा कि जांच अधिकारी किस प्रकार निष्कर्ष पर पहुँचे। उसने पाया कि जांच अधिकारी याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत बचाव साक्ष्य (डिफेन्स एविडेंस) पर समुचित विचार करने में विफल रहे। संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन को उसके लेखकों की गवाही के बिना सिद्ध नहीं किया गया, फिर भी जांच अधिकारी ने उस पर “भारी भरोसा” किया।
न्यायालय ने यह भी पाया कि जांच अधिकारी ने वार्डर राज कुमार के कथित बयान पर काफी हद तक निर्भर किया, जबकि राज कुमार को जांच में गवाह के रूप में प्रस्तुत ही नहीं किया गया। परिणामस्वरूप, याचिकाकर्ता को उसके बयान की विश्वसनीयता परखने के लिए प्रतिपरीक्षण का अवसर नहीं मिला।
यह तय करने के लिए कि ऐसी जांच बरकरार रखी जा सकती है या नहीं, न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के नवीनतम निर्णयों का सहारा लिया। उसने विस्तार से Satyendra Singh v. State of U.P., 2024 SCC OnLine SC 3325 के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें Roop Singh Negi और Nirmala J. Jhala पर भरोसा किया गया था।
इन नज़ीरों से न्यायालय ने तीन मुख्य सिद्धांतों को उजागर किया:
पहला, जब विभागीय कार्यवाही में प्रमुख दंड प्रस्तावित हो, तो साक्ष्य का रिकॉर्ड किया जाना अनिवार्य है। केवल दस्तावेज प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं है; उनके कथ्यों को मौखिक साक्ष्य द्वारा सिद्ध करना होता है।
दूसरा, यहाँ तक कि एकतरफा (एक्स-पार्टी) जांच में भी, जांच अधिकारी को यह देखना होता है कि बिना चुनौती दिए गए (अनरिबटेड) साक्ष्य पर्याप्त हैं या नहीं, और उसे गवाहों के बयान दर्ज करने होते हैं। जिन दस्तावेजों के कथ्य सिद्ध नहीं किए गए हैं, उन्हें आरोप सिद्ध करने के लिए आधार नहीं बनाया जा सकता।
तीसरा, प्रारंभिक जांच (प्रिलिमिनरी इन्क्वायरी) में दर्ज साक्ष्य, जहाँ अभियुक्त अधिकारी उपस्थित नहीं था और प्रतिपरीक्षण का अवसर नहीं मिला, को नियमित विभागीय जांच में तब तक उपयोग नहीं किया जा सकता जब तक उन गवाहों और दस्तावेजों को विधिवत् रूप से जांच अधिकारी के सामने प्रस्तुत और परखा न जाए।
न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के नवीन निर्णय K. Prabhakar Hegde v. Bank of Baroda, Neutral Citation 2025 INSC 997 का भी संदर्भ दिया, जिसमें प्रारंभिक जांच प्रतिवेदनों के सीमित उपयोग से संबंधित विधि का सार प्रस्तुत किया गया है। न्यायालय ने दोहराया कि ऐसी रिपोर्टें आंतरिक (इंटर्नल) प्रकृति की होती हैं, केवल उनके आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती, और उनमें प्रयुक्त मौखिक या दस्तावेजी सामग्री को नियमित जांच में स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत और सिद्ध करना आवश्यक है।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पटना उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध की गई विभागीय जांच विधिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण (लीगली फ्लॉड) थी। प्रमुख गवाह, वार्डर राज कुमार, की गवाही दर्ज ही नहीं की गई। संयुक्त निरीक्षण प्रतिवेदन पर निर्भरता उसके लेखकों की गवाही के बिना की गई। याचिकाकर्ता को प्रतिपरीक्षण के अधिकार से वंचित किया गया और जांच, विभागीय कार्यवाहियों में लागू अपेक्षाकृत कम मानक – “संभावनाओं के तुलनात्मक भार” (प्रेपॉन्डरेंस ऑफ प्रॉबेबिलिटीज) – को भी पूरा नहीं कर सकी।
न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक पहलू पर भी ध्यान दिया: याचिकाकर्ता तीन माह के अवकाश के बाद 02.01.2020 को ही ड्यूटी पर लौटे थे और गोलीबारी की घटना 03.01.2020 को हुई। इस पृष्ठभूमि में तथा किसी प्रत्यक्ष कदाचार या अक्षमता का विशिष्ट आरोप न होने की स्थिति में न्यायालय ने माना कि जेल की समग्र प्रणालीगत कमियों की पूरी जिम्मेदारी उन पर कठोर रूप से नहीं डाली जा सकती।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि बिहार कारा नियमावली, 2012 के नियम 800 के तहत मुख्य द्वार पर तलाशी और निषिद्ध वस्तुओं के प्रवेश को रोकने की प्राथमिक जिम्मेदारी उपाधीक्षक (प्रशासन एवं सुरक्षा) की है। अधीक्षक के रूप में याचिकाकर्ता की समग्र जिम्मेदारी तो थी, परंतु मुख्य द्वार की सुरक्षा के लिए वे इसी अधिकारी पर निर्भर थे। न्यायालय ने रेखांकित किया कि इस दलील पर जांच प्रतिवेदन में विचार नहीं किया गया और संबंधित उपाधीक्षक को गवाह के रूप में भी पेश नहीं किया गया।
इन सभी तथ्यों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से प्राप्त मार्गदर्शन के आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि जांच प्रतिवेदन तथा उसके पश्चात पारित दंड एवं निलंबन से संबंधित आदेश विधिविरुद्ध (विटिएटेड) हैं।
अतः न्यायालय ने 25.05.2022 के दंड आदेश, 01.09.2022 के पुनरीक्षण (रीव्यू) अस्वीकृति आदेश तथा 20.12.2022 के उस आदेश को, जिसके द्वारा निलंबन अवधि के दौरान पूर्ण वेतन से वंचित किया गया था, निरस्त कर दिया। न्यायालय ने घोषित किया कि याचिकाकर्ता सभी परिनामी लाभों के लिए विधि के अनुसार हकदार होंगे। रिट याचिका स्वीकृत (अलाउ) की गई।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय सरकारी सेवकों, विशेषकर बिहार में जेल प्रशासन और अन्य संवेदनशील पदों पर कार्यरत अधिकारियों के लिए विशेष महत्व रखता है।
पहला, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि विभागीय कार्यवाहियों में भी न्यूनतम न्यायसंगत प्रक्रिया (फेयरनेस) अपनाना अनिवार्य है। प्राधिकारी केवल परोक्ष रिपोर्टों या अभियुक्त की अनुपस्थिति में जुटाई गई अप्रमाणित कथित बयानों के आधार पर किसी कर्मचारी को दंडित नहीं कर सकते।
दूसरा, जब समेकित प्रभाव सहित वेतनवृद्धि रोकने जैसे गंभीर दंड का प्रस्ताव हो, तो विभाग को अपने गवाह प्रस्तुत करने, दस्तावेज सिद्ध करने और प्रतिपरीक्षण की अनुमति देने का दायित्व निभाना होगा। जांच में अपनाए गए संक्षिप्त मार्ग (शॉर्टकट) न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं पाएंगे।
तीसरा, न्यायालय ने यह मान्यता दी कि संरचनात्मक कमियाँ और लम्बे समय से चली आ रही सुरक्षा संबंधी खामियाँ स्वतः किसी नवप्रत्यावर्तित अधिकारी पर, स्पष्ट लापरवाही के प्रमाण के बिना, नहीं थोपी जा सकतीं। यह उन अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करता है जो कठिन प्रणालियों को सुधारने का प्रयास कर रहे हों, लेकिन बाद में किसी घटना के घटित होने पर दोषी ठहरा दिए जाते हैं।
अंततः, निलंबन के संदर्भ में यह निर्णय दिखाता है कि एक बार जांच पूरी हो जाने और दंड लगाए जाने के बाद, निलंबन अवधि के वेतन से संबंधित आगे के आदेश भी विधिक मानकों पर खरे उतरने चाहिए। निलंबन अवधि के दौरान वेतन को केवल निर्वाह भत्ते तक सीमित करने वाला अनुचित आदेश भी न्यायालय द्वारा रद्द किया जा सकता है।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या हाजीपुर के जेल अधीक्षक के विरुद्ध की गई विभागीय जांच विधि के अनुरूप संचालित हुई थी और क्या वह प्रमुख दंड का वैध आधार बन सकती थी?
उत्तर: नहीं। न्यायालय ने माना कि जांच दोषपूर्ण थी, क्योंकि महत्त्वपूर्ण गवाहों की गवाही नहीं हुई, दस्तावेजों को बिना उनके लेखक के माध्यम से सिद्ध किए स्वीकार कर लिया गया और प्रारंभिक जांच के साक्ष्य का उपयोग याचिकाकर्ता को प्रतिपरीक्षण का अवसर दिए बिना कर लिया गया। - प्रश्न: क्या पाँच वेतनवृद्धियों को समेकित प्रभाव सहित रोकने का दंड तथा निलंबन अवधि के दौरान पूर्ण वेतन से वंचित रखने का आदेश टिकाऊ था?
उत्तर: नहीं। चूँकि आधारभूत विभागीय जांच ही अवैध पाई गई, इसलिए 25.05.2022 का दंड आदेश, 01.09.2022 का पुनरीक्षण आदेश तथा 20.12.2022 का निलंबन वेतन संबंधी आदेश रद्द कर दिए गए। याचिकाकर्ता को सभी परिनामी लाभों का अधिकारी माना गया। - प्रश्न: क्या हाजीपुर जेल में सामान्य सुरक्षा चूक तथा निषिद्ध वस्तुओं की बरामदगी की जिम्मेदारी, मामले के तथ्यों की पृष्ठभूमि में, कड़ाई से याचिकाकर्ता पर डाली जा सकती थी?
उत्तर: मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए न्यायालय ने माना कि प्रणालीगत कमियों की पूर्ण जिम्मेदारी याचिकाकर्ता पर नहीं डाली जा सकती, विशेषकर जब वे अभी-अभी लम्बी छुट्टी के बाद ड्यूटी पर लौटे थे, उनके विरुद्ध किसी विशिष्ट कदाचार का आरोप नहीं था और नियमों के तहत मुख्य द्वार की तलाशी की प्राथमिक जिम्मेदारी उपाधीक्षक (प्रशासन एवं सुरक्षा) पर थी।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Satyendra Singh v. State of U.P., 2024 SCC OnLine SC 3325
- Roop Singh Negi v. Punjab National Bank, (2009) 2 SCC 570
- State of U.P. v. Saroj Kumar Sinha, (2010) 2 SCC 772
- Nirmala J. Jhala v. State of Gujarat & Anr., (2013) 4 SCC 301
- Amalendu Ghosh v. North Eastern Railway, AIR 1960 SC 992
- Champaklal Chimanlal Shah v. Union of India, AIR 1964 SC 1854
- Narayan Dattatraya Ramteerthakhar v. State of Maharashtra, (1997) 1 SCC 299
- SBI v. S.N. Goyal, (2008) 8 SCC 92 (याचिकाकर्ता के अधिवक्ता द्वारा उद्धृत)
- K. Prabhakar Hegde v. Bank of Baroda, Neutral Citation 2025 INSC 997
प्रकरण-विवरण
मामला संख्या: Civil Writ Jurisdiction Case No. 8620 of 2024
मामले का शीर्षक: Ramesh Prasad v. The State of Bihar & Ors.
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ (कोरम): Hon’ble Mr. Justice Sandeep Kumar
निर्णय दिनांक: 13.01.2026
उद्धरण: 2024(2) PLJR 519
पेशी (उपस्थिति):
याचिकाकर्ता की ओर से: Mr. Siddhartha Prasad, Advocate
प्रतिवादियों की ओर से: Mr. Amish Kumar, A.C. to A.G.
प्रकरण की प्रकृति: विभागीय दंड, पुनरीक्षण आदेश, निलंबन वेतन आदेश तथा आधारभूत अनुशासनिक कार्यवाहियों को चुनौती देने वाली सिविल रिट याचिका।
चुनौतीग्रस्त (इम्प्यून्ड) आदेश:
25.05.2022 दिनांकित दंड आदेश (पाँच वेतनवृद्धियों को समेकित प्रभाव सहित रोकना); 01.09.2022 का पुनरीक्षण अस्वीकृति आदेश; 13.09.2022 का कारण बताओ नोटिस; 20.12.2022 का निलंबन अवधि में वेतन को केवल निर्वाह भत्ते तक सीमित करने वाला आदेश; मेमो संख्या 6159 दिनांक 11.09.2020 के माध्यम से आरंभ की गई विभागीय कार्यवाही।
निर्णय का लिंक: पटना उच्च न्यायालय के पूर्ण निर्णय तक पहुँचने के लिए यहाँ क्लिक करें
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