घरेलू हिंसा पुनरीक्षण में परिसीमा की दलील खारिज — पटना उच्च न्यायालय, 2024

Shubham Shivansh

Reviewed by: Shubham Shivansh

License Number: D/7102/2022

Shubham Shivansh is a lawyer at Samvida Law Associates practicing in civil disputes, service law, and GST matters. He represents clients in property disputes, contractual disagreements, service-related grievances, and tax compliance matters before the Patna High Court and other jurisdictions. His practice handles civil litigation, employment-related disputes, and regulatory matters for individuals and businesses across Bihar.

पत्नी ने अपीलीय न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी जिसमें उसके वैवाहिक घर में रहने के अंतरिम अधिकार को रद्द कर दिया गया था। पटना उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट के संरक्षण आदेश को बहाल कर दिया। न्यायालय ने माना कि उसकी घरेलू हिंसा शिकायत परिसीमा से बाधित नहीं है और लंबी पृथक-निवास के बावजूद घरेलू संबंध जारी रहा। अब ट्रायल मजिस्ट्रेट को साक्ष्य लेकर अंतिम आदेश पारित करना होगा।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला Domestic Violence Case No. 21 of 2018 से उत्पन्न हुआ, जो Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 के तहत पत्नी द्वारा अपने पति के विरुद्ध दायर किया गया था।

पक्षकारों का विवाह 30.01.2013 को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार नूरानी बाग, आलमगंज, पटना में हुआ था। पत्नी का आरोप था कि उसके माता-पिता ने उसके नाम से चेक द्वारा 5 लाख रुपये दिए, विवाह में 6 लाख रुपये खर्च किए और सोना, बर्तन तथा अन्य घरेलू सामान उपलब्ध कराया।

उसकी शिकायत के अनुसार, ससुराल जाने के बाद उसकी सास ने उसके सभी सोने के आभूषण अपने पास रख लिए। सास के उकसावे पर पति ने कथित रूप से उसके माता-पिता से Scorpio वाहन की मांग शुरू कर दी। उसने कहा कि उसे गाली-गलौज और अत्याचार सहने पड़े, लेकिन उसने यह सोचकर बर्दाश्त किया कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।

उसका आगे आरोप था कि मायके छोड़ने के बहाने पति उसे मोटरसाइकिल पर लेकर निकला, बीच रास्ते में उसे छोड़कर स्वयं वापस चला गया। जब उसके पिता और भाई ने पति के परिवार से यह अनुरोध किया कि उसे इज्जत के साथ रखा जाए, तो कथित रूप से उन्हें गाली देकर भगा दिया गया और वाहन की मांग दोहराई गई।

इसके बाद पत्नी ने Complaint Case No. 1670(C)/2013 पति, उसकी मां और अन्य रिश्तेदारों के विरुद्ध मानसिक और शारीरिक क्रूरता के लिए दायर किया। Learned S.D.J.M., Patna द्वारा संज्ञान लिया गया। उस मामले में उच्च न्यायालय में जमानत पर विचार के दौरान, पति को प्रति माह 2,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में देने का आदेश दिया गया। उसका कहना था कि यह राशि अपर्याप्त थी।

इसी बीच, पति ने Chief Judicial Magistrate, Patna के समक्ष Complaint Case No. 1334(C)/2013 उसके पिता और भाई के खिलाफ दायर किया, जिसे उसने झूठे आरोपों पर आधारित बताया। उसने Hindu Marriage Act की Section 9 के तहत वैवाहिक सह-जीवन की पुनर्स्थापना के लिए Matrimonial Case No. 355 of 2013 भी दायर किया, परंतु उसे अनुपस्थिति के कारण खारिज होने दिया।

बाद में पति ने Principal Judge, Family Court, Patna के समक्ष Matrimonial Case No. 1271 of 2016 दायर कर तलाक की मांग की। वह मामला अभी लंबित है। उस कार्यवाही में 30.11.2017 को Family Court ने उसे प्रति माह अतिरिक्त 2,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण के रूप में तथा वाद व्यय देने का निर्देश दिया। पत्नी का आरोप था कि उसने इस आदेश का पालन नहीं किया।

उसने कहा कि पति Hazaribagh में प्रैक्टिस करने वाला वकील है और उसके पास कृषि भूमि तथा अन्य संपत्तियां हैं। उसने यह भी दावा किया कि मोहल्ला-शेखपुरा, शास्त्री नगर, पटना में लगभग डेढ़ कट्ठा जमीन पर चार मंजिला मकान है, जिसमें विवाह के बाद वह और उसका पति एक फ्लैट में रहते थे। उसके अनुसार वह फ्लैट अब बंद है और बाकी फ्लैट किराए पर दिए गए हैं, जिससे लगभग 50,000 रुपये प्रतिमाह आय होती है। उसने दावा किया कि उसकी कोई स्वतंत्र आय नहीं है।

इन तथ्यों के आधार पर उसने Domestic Violence Act की Section 17 के तहत संरक्षण आदेश मांगा, यह कहते हुए कि शास्त्री नगर, पटना स्थित उस shared household में रहने का उसे अधिकार है।

न्यायालय ने क्या जांचा और क्या निर्णय दिया

पत्नी के अंतरिम निवास संबंधी राहत के आवेदन पर 15.03.2018 को Additional Chief Judicial Magistrate-IV, Patna द्वारा विचार किया गया। मजिस्ट्रेट ने पक्षकारों की दलीलों सहित 08.10.2018 को पति द्वारा दायर आपत्ति पर विचार किया।

पति की पहली प्रमुख आपत्ति परिसीमा की थी। उसका कहना था कि पत्नी 13.04.2013 से अपने मायके में रह रही है और कथित घटना तथा अलगाव के लगभग चार वर्ष ग्यारह माह बाद घरेलू हिंसा मामला दायर किया गया। Code of Criminal Procedure, 1973 की Section 468, जो कुछ अपराधों के लिए एक वर्ष की परिसीमा निर्धारित करती है, और Supreme Court के निर्णय Inderjit Singh Grewal v. State of Punjab पर भरोसा करते हुए उसने दलील दी कि शिकायत समय-सीमा से बाधित है।

दूसरे, उसने दलील दी कि 15.04.2013 के बाद, जब कथित रूप से वे अलग हो गए, उनके बीच कोई विद्यमान “domestic relationship” नहीं रही। इसलिए, उसका कहना था कि Domestic Violence Act लागू ही नहीं हो सकता।

तीसरे, Supreme Court के निर्णय S.R. Batra v. Taruna Batra का हवाला देते हुए उसने यह तर्क दिया कि शास्त्री नगर का मकान पूरी तरह उसकी मां के स्वामित्व में है। अतः वह “shared household” नहीं है और पत्नी वहां निवास का दावा नहीं कर सकती।

इन आपत्तियों पर विचार करने के बाद, मजिस्ट्रेट ने 08.01.2019 को अंतरिम आदेश पारित कर पति को निर्देश दिया कि वह कार्यवाही में सहयोग करे और शास्त्री नगर थाना क्षेत्र में स्थित वैवाहिक घर में संलग्न शौचालय सहित एक कमरा पत्नी के लिए उपलब्ध कराए। यह निर्देश मामले के अंतिम परिणाम के अधीन रखा गया।

पति ने इस अंतरिम आदेश को Criminal Appeal No. 37 of 2019 में Additional Sessions Judge XIV, Patna के समक्ष चुनौती दी। 21.10.2019 को अपीलीय न्यायालय ने उसकी अपील स्वीकार कर ली, मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया और व्यावहारिक रूप से पत्नी को अंतरिम निवास राहत से वंचित कर दिया।

अपीलीय न्यायालय ने यह माना कि:

  • शिकायत Section 468 Cr.P.C. से बाधित थी क्योंकि कथित घटना के लगभग चार वर्ष बाद दायर की गई थी, और इस निष्कर्ष के लिए Inderjit Singh Grewal के तर्क का अनुसरण किया गया।
  • चूंकि पत्नी स्वयं कहती है कि वह 13.04.2013 से मायके में रह रही है, इसलिए Domestic Violence Act की Section 2(f) में परिभाषित किसी निरंतर domestic relationship का अस्तित्व नहीं था।
  • शास्त्री नगर की संपत्ति केवल पति की मां की थी, अतः उसे निवास-अधिकार के लिए “shared household” नहीं माना जा सकता।

इससे आहत होकर पत्नी ने Patna High Court में Criminal Revision No. 1544 of 2019 दायर कर अपीलीय आदेश को रद्द करने और मजिस्ट्रेट के अंतरिम संरक्षण आदेश को बहाल करने की मांग की।

उच्च न्यायालय के समक्ष उसके वकील ने तर्क दिया कि अपीलीय न्यायालय ने Domestic Violence Act की Section 2(f) में “domestic relationship”, Section 3 में “domestic violence” और Section 2(s) में “shared household” की परिभाषाओं को गलत पढ़ा। उन्होंने कहा कि एक बार पति-पत्नी किसी भी समय वैवाहिक संबंध में shared household में साथ रह चुके हों तो Act के उद्देश्य से वह बंधन domestic relationship बना रहता है, भले ही वे बाद में अलग रह रहे हों।

उन्होंने यह भी दलील दी कि अपीलीय न्यायालय ने Section 468 Cr.P.C. का गलत आवेदन किया और Supreme Court के निर्णय Inderjit Singh Grewal को गलत समझा। उनके अनुसार Section 468 Cr.P.C. की परिसीमा केवल उस समय लागू होती है जब किसी आपराधिक अपराध का संज्ञान लिया जा रहा हो, न कि तब जब कोई महिला Domestic Violence Act के तहत संरक्षण और निवास जैसी दीवानी प्रकृति की राहतें मांग रही हो।

“shared household” और S.R. Batra के मुद्दे पर उन्होंने तर्क दिया कि केवल साक्ष्य लेने के बाद ही न्यायालय यह तय कर सकता है कि शास्त्री नगर की संपत्ति संयुक्त पारिवारिक संपत्ति है या नहीं और क्या पत्नी वास्तव में विवाह के बाद वहां रही थी। अंतरिम चरण में यह कहना गलत था कि उसे निवास का कोई अधिकार नहीं है।

पति की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि Domestic Violence Act की Section 28 विशेष रूप से Sections 12, 18 से 23 और 31 के तहत की जाने वाली कार्यवाहियों पर Cr.P.C. की प्रक्रिया लागू करती है। Santosh Kumar v. State of Bihar (Cr. Misc. No. 41318 of 2016) में समन्वय पीठ के निर्णय तथा Karnataka High Court के निर्णयों पर भरोसा करते हुए उसने यह कायम रखा कि Section 468 Cr.P.C. से मूल शिकायत ही बाधित है।

Justice Rajeev Ranjan Prasad ने पहले Domestic Violence Act की रूपरेखा का विस्तार से विश्लेषण किया। उन्होंने Sections 2(f), 3 और 2(s) के तहत “domestic relationship”, “domestic violence” और “shared household” की वैधानिक परिभाषाओं को उद्धृत कर उनका परीक्षण किया। उन्होंने रेखांकित किया कि Section 2(f) उन दो व्यक्तियों के संबंध को कवर करता है जो विवाह या अन्य किसी संबंध से जुड़े हों और “live or have, at any point of time, lived together in a shared household” हों।

सरल पाठ के आधार पर न्यायालय ने माना कि इस परिभाषा में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है कि शिकायत दायर करते समय भी पक्षकारों का साथ रहना आवश्यक है। पर्याप्त है कि वे किसी भी समय अतीत में shared household में पति-पत्नी के रूप में साथ रहे हों। इस मामले में, दंपती का विवाह 2013 में हुआ और वे साथ रहे, अतः domestic relationship स्पष्ट रूप से विद्यमान थी।

न्यायालय ने इसके बाद Scorpio वाहन की मांग तथा दहेज के लिए शारीरिक और मानसिक क्रूरता के आरोपों की जांच की। Section 3 और उसकी व्याख्याओं को पढ़ते हुए न्यायालय ने माना कि शिकायत में कथित कृत्य “domestic violence” के अंतर्गत स्पष्ट रूप से आते हैं, विशेषकर दहेज-जनित शारीरिक, मौखिक/भावनात्मक और आर्थिक शोषण के रूप में।

इसके बाद न्यायालय ने Act के तहत मिलने वाली राहतों की संरचना समझाई—protection orders (Section 18), residence orders (Section 19), monetary relief (Section 20), custody (Section 21) और compensation (Section 22)—जो सभी Section 12 के तहत आवेदन पर दी जाती हैं। ये मुख्यतः संरक्षणात्मक और निवारक हैं, दंडात्मक नहीं।

परिसीमा के प्रश्न पर, न्यायालय ने Domestic Violence Act की Sections 31 और 32 को Section 468 Cr.P.C. के साथ मिलाकर बारीकी से पढ़ा। Section 31 के अनुसार protection order या interim protection order का उल्लंघन करना प्रतिवादी के लिए एक “offence” है। ऐसे उल्लंघन पर अधिकतम एक वर्ष का कारावास या अधिकतम 20,000 रुपये जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है। Section 32 इस अपराध को संज्ञेय और गैर-जमानती घोषित करता है तथा इसे उस मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय बताता है जिसने protection order पारित किया है।

न्यायालय ने माना कि Section 468 Cr.P.C. उस अवस्था से संबंधित है जब किसी “offence” का संज्ञान लिया जा रहा हो और इसलिए यह केवल Section 31 के तहत protection order के उल्लंघन के अभियोजन पर लागू हो सकता है। यह उस अवस्था पर लागू नहीं हो सकता जब कोई महिला मूल रूप से मजिस्ट्रेट के समक्ष protection या residence orders के लिए आवेदन दायर करती है, क्योंकि उस समय कोई अपराध का संज्ञान लिया ही नहीं जा रहा होता।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि Domestic Violence Act “पीड़िता को राहत प्रदान करने पर अधिक केंद्रित” है और पूरी तरह आपराधिक प्रकृति का अधिनियम नहीं है। इस Act में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो protection या residence orders के लिए शिकायत दायर करने की कोई समय-सीमा निर्धारित करे।

इस तर्क के आधार पर उच्च न्यायालय ने पति की दलील तथा अपीलीय न्यायालय के इस मत से असहमति जताई कि Section 468 Cr.P.C. से शिकायत बाधित थी। उसने Inderjit Singh Grewal और Santosh Kumar दोनों मामलों को तथ्यों के आधार पर अलग बताया।

उक्त पूर्व मामलों में पक्षकारों के बीच पहले से तलाक के डिक्री मौजूद थे, और प्रश्न यह था कि क्या पूर्व पत्नी शिकायत दायर कर सकती है या जब उच्च न्यायालय Section 482 Cr.P.C. के तहत अधिकार का प्रयोग कर रहा हो तब परिसीमा लागू होगी या नहीं। यहां, कोई तलाक डिक्री नहीं थी और विवाद केवल इस बात से संबंधित था कि पत्नी Domestic Violence Act के तहत संरक्षण प्राप्त करने के अपने अधिकार का उपयोग कर सकती है या नहीं।

“shared household” और शास्त्री नगर संपत्ति के संबंध में, न्यायालय ने नोट किया कि यद्यपि पति ने कहा कि संपत्ति उसकी मां के नाम पर है, फिर भी मां ने स्वयं मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती नहीं दी थी। पत्नी का विशिष्ट मामला था कि विवाह के बाद वह अपने पति के साथ उस इमारत के एक फ्लैट में रही और अन्य फ्लैट किराए पर दिए गए थे।

अपीलीय न्यायालय ने बिना साक्ष्य के यह मान लिया था कि संपत्ति न तो पति की है और न ही संयुक्त परिवार की। उच्च न्यायालय को अंतरिम चरण में रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सामग्री नहीं मिला जो इस निष्कर्ष को उचित ठहरा सके। संपत्ति संयुक्त है, स्वअर्जित है या अन्य प्रकार की, तथा क्या वह “shared household” के रूप में योग्य है या नहीं—ये सभी प्रश्न मजिस्ट्रेट के समक्ष दोनों पक्षों द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत करने के बाद ही तय किए जाने हैं।

न्यायालय ने Supreme Court के निर्णय S.R. Batra को भी अलग बताया, यह इंगित करते हुए कि उस मामले में यह स्पष्ट निष्कर्ष था कि पत्नी उस परिसर के कब्जे में नहीं थी और संपत्ति निर्विवाद रूप से सास की थी। इसके विपरीत, वर्तमान मामले में स्वामित्व और निवास-स्वरूप के तथ्यों पर विवाद है और अभी तक उन्हें सिद्ध किया जाना शेष है।

अंततः उच्च न्यायालय ने तीन विशिष्ट प्रश्नों के उत्तर दिए:

  • सिर्फ इस आधार पर कि पत्नी 13.04.2013 से अलग रह रही है, पति यह नहीं कह सकता कि कोई domestic relationship विद्यमान नहीं है।
  • शास्त्री नगर का मकान “shared household” है या नहीं, यह मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।
  • पत्नी की घरेलू हिंसा शिकायत और उसके protection order के लिए प्रार्थना Section 468 Cr.P.C. से बाधित नहीं है।

इन्हीं आधारों पर पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अपीलीय न्यायालय ने कानून की दृष्टि से त्रुटि की है। उसने 21.10.2019 की अपीलीय निर्णय को रद्द कर दिया, मजिस्ट्रेट के अंतरिम निवास राहत संबंधी आदेश को बहाल किया और A.C.J.M.-IV, Patna को निर्देश दिया कि घरेलू हिंसा मामले में कार्यवाही आगे बढ़ाकर विधि के अनुसार उपयुक्त अंतिम आदेश पारित करे।

इस निर्णय का महत्व

यह निर्णय उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है जो अत्याचार या दहेज-उत्पीड़न के कारण अपने पतियों से लंबे समय से अलग रह रही हैं। यह स्पष्ट करता है कि केवल समय बीत जाने या मायके में रहने की वजह से वे Domestic Violence Act के तहत न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के अधिकार से वंचित नहीं होतीं।

पटना उच्च न्यायालय ने साफ किया है कि Cr.P.C. की परिसीमा संबंधी प्रावधान Domestic Violence Act के तहत निवास और संरक्षण आदेश प्राप्त करने के अधिकार पर अंकुश नहीं लगाते। परिसीमा तो केवल बाद के उस आपराधिक मामले में महत्व रखती है जब किसी protection order की अवज्ञा के लिए अभियोग चलता है, न कि मूल शिकायत दायर करने के चरण पर।

न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया है कि किसी संपत्ति को “shared household” है या नहीं, यह केवल दलीलों के आधार पर, और वह भी तब जबकि तथ्य विवादित हों, साधारण ढंग से तय नहीं किया जा सकता। जिस घर में महिला के विवाह के बाद रहने का दावा है, वहां रहने के उसके अधिकार से वंचित करने से पहले साक्ष्य दर्ज किया जाना आवश्यक है।

घरेलू हिंसा के पीड़ितों के लिए यह निर्णय संकेत देता है कि भले ही वे वर्षों तक चुपचाप उत्पीड़न सहती रही हों या वैवाहिक घर छोड़ चुकी हों, कानून उनके लिए अब भी खुला है। बिहार के वकीलों और ट्रायल न्यायालयों के लिए यह Domestic Violence Act के तहत “domestic relationship”, “shared household” और परिसीमा की भूमिका को समझने के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शक प्रदान करता है।

कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या Domestic Violence Act के तहत domestic relationship केवल इसलिए समाप्त हो जाती है कि पत्नी कई वर्षों से अलग रह रही है?
    उत्तर: नहीं। यदि पक्षकारों का विवाह हुआ था और वे किसी समय shared household में साथ रहे हैं, तो Act के उद्देश्य से domestic relationship बनी रहती है, बाद की पृथक-निवास की परवाह किए बिना।
  • प्रश्न: क्या अलगाव के एक वर्ष से अधिक समय बाद दायर Domestic Violence Act के तहत protection और residence orders के लिए महिला का आवेदन Section 468 Cr.P.C. से बाधित है?
    उत्तर: नहीं। Section 468 केवल उन मामलों में लागू होती है जहां किसी offence का संज्ञान लिया जा रहा हो, जैसे कि Act की Section 31 के तहत protection order के उल्लंघन का मामला। यह Section 12 के तहत protection या residence orders के लिए आवेदन दायर करने को सीमित नहीं करती।
  • प्रश्न: क्या मां-के-नाम पंजीकृत शास्त्री नगर मकान को अंतरिम चरण में ही shared household की परिधि से बाहर कर दिया जा सकता है?
    उत्तर: इस चरण पर नहीं। यह shared household है या नहीं, इसका निर्धारण स्वामित्व, संयुक्त पारिवारिक स्थिति और वहां पत्नी के निवास से संबंधित साक्ष्य पर निर्भर करता है, जो ट्रायल के बाद ही तय किया जा सकता है।

न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले

  • Inderjit Singh Grewal v. State of Punjab & Ors., (2011) 12 SCC 588
  • S.R. Batra & Anr. v. Smt. Taruna Batra, AIR 2007 SC 1118
  • Bharat Petroleum Corporation v. N.R. Vairamani & Anr., (2004) 8 SCC 579
  • Santosh Kumar v. The State of Bihar & Anr., Cr. Misc. No. 41318 of 2016 (Patna High Court)
  • Japani Sahoo v. Chandra Sekhar Mohanty, AIR 2007 SC 2762 (referred in Santosh Kumar)
  • Noida Entrepreneurs Association v. Noida & Ors., (2011) 6 SCC 508 (referred in Santosh Kumar)
  • Smt. Sureshta Devi, AIR 1992 SC 1304 (referred in Inderjit Singh Grewal)
  • Amit Agarwal & Ors. v. Sanjay Aggarwal, III (2016) DMC 97 (P&H) (referred in Santosh Kumar)

मामले का विवरण

मामला संख्या: Criminal Revision No. 1544 of 2019 (arising out of Domestic Violence Case No. 21 of 2018)

वाद का शीर्षक: Madhuri Kumari v. The State of Bihar & Anr.

उद्धरण: 2024(2) PLJR 783

न्यायालय: High Court of Judicature at Patna

पीठ: Hon’ble Mr. Justice Rajeev Ranjan Prasad

निर्णय की तिथि: 30.01.2024

पक्षकारों के अधिवक्ता:

  • याचिकाकर्ता (पत्नी) की ओर से: Mr. Dhanendra Chaubey, Advocate
  • राज्य की ओर से: Mr. Md. Fahimuddin, APP
  • प्रतिवादी संख्या 2 (पति) की ओर से: Mr. Vijay Kumar Sinha, Advocate

मामले की प्रकृति: Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 के तहत कार्यवाही में अपीलीय आदेश के विरुद्ध दायर आपराधिक पुनरीक्षण, जिसमें अंतरिम निवास/संरक्षण आदेश को रद्द करने को चुनौती दी गई।

निर्णय की प्रति का लिंक: पूरे पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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