पत्नी ने अपनी लिखित बयान की एक पंक्ति को विवाह के समय दिए गए उपहारों की वापसी के लिए प्रतिदावा के रूप में मानने की कोशिश की थी।
न्यायालय ने माना कि यह कानून के तहत वैध प्रतिदावा नहीं है और उसके विविध वाद (मिसिलेनियस केस) की खारिजी को बरकरार रखा।
पत्नी को अभी भी सक्षम न्यायालय के समक्ष विधि के अनुसार उचित वाद दायर करने की स्वतंत्रता है।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद तब शुरू हुआ जब पति ने अपनी पत्नी के विरुद्ध वैवाहिक संबंध विच्छेद (विवाह-विधि भंग) के लिए एक वैवाहिक वाद दायर किया। यह वाद माननीय जिला न्यायाधीश, मुंगेर/लखीसराय की अदालत में वैवाहिक वाद संख्या 18 of 2011/11 of 2015 के रूप में दर्ज हुआ और बाद में इसे बेगूसराय स्थित परिवार न्यायालय में हस्तांतरित कर दिया गया।
पत्नी उस वाद में हाजिर हुई और अपनी लिखित बयान दाखिल की। उसमें उसने आरोप लगाया कि पति ने उसका स्त्रीधन और अन्य सामान ग़लत तरीके से अपने पास रख लिया है। उसने यह भी उल्लेख किया कि विवाह के समय पति को रु. 8,35,000/- मूल्य के उपहार दिए गए थे और उसने प्रार्थना की कि ये उपहार उसे वापस किए जाएँ।
उसके अनुसार, लिखित बयान में की गई यह प्रार्थना पति के विरुद्ध “प्रतिदावा” मानी जानी चाहिए। प्रतिदावा, उसी वाद के भीतर प्रतिवादी द्वारा वादी के विरुद्ध अपने लिए अलग राहतें माँगने के लिए दायर किया जाने वाला एक स्वतंत्र वाद जैसा होता है।
दिनांक 16.04.2018 को माननीय प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, बेगूसराय ने पति के वैवाहिक वाद को खारिज कर दिया। किंतु, उस वाद को खारिज करते समय परिवार न्यायालय ने पत्नी द्वारा उपहारों और स्त्रीधन की वापसी के संबंध में किए गए तथाकथित प्रतिदावा पर पृथक रूप से विचार नहीं किया।
यह महसूस करते हुए कि उसका दावा अनिर्णीत रह गया है, पत्नी ने फिर उसी परिवार न्यायालय के समक्ष विविध वाद संख्या 12 of 2018 दायर किया। इस विविध वाद में उसने न्यायालय से अनुरोध किया कि उसके कथित प्रतिदावा पर गुण-दोष के आधार पर विचार कर निर्णय दिया जाए।
दिनांक 29.06.2019 को, प्रवेश (एडमिशन) स्तर पर ही माननीय प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, बेगूसराय ने विविध वाद संख्या 12 of 2018 को खारिज कर दिया। परिवार न्यायालय ने माना कि उसके समक्ष वास्तव में कोई प्रतिदावा था ही नहीं और यह विविध वाद विचारणीय (मेनटेन करने योग्य) नहीं है।
इससे आहत होकर पत्नी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन सिविल विविध (सिविल मिसिलेनियस) संख्या 1131 of 2019 दायर कर पटना उच्च न्यायालय की शरण ली। उसने उच्च न्यायालय से 29.06.2019 के परिवार न्यायालय के आदेश को निरस्त करने तथा उसके कथित प्रतिदावा पर विचार करने हेतु निर्देश देने की प्रार्थना की।
न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया
पटना उच्च न्यायालय ने, माननीय श्री न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा के माध्यम से, एक सीमित किंतु महत्त्वपूर्ण प्रश्न की जाँच की: क्या पत्नी की लिखित बयान में उपहारों और स्त्रीधन की वापसी के लिए की गई प्रार्थना को विधि की नज़र में वैध प्रतिदावा माना जा सकता है?
पत्नी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि परिवार न्यायालय ने दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 (संहिता) के आदेश VIII नियम 6A से 6D के तहत प्रतिदावा के कानून को पूरी तरह ग़लत समझा है। उनका कहना था कि पत्नी ने अपनी लिखित बयान में स्पष्ट रूप से प्रतिदावा किया था और अधीनस्थ न्यायालय का यह कहना कि कोई प्रतिदावा था ही नहीं, क़ानूनन गलत है।
उन्होंने आगे यह प्रस्तुत किया कि एक बार आदेश VIII नियम 6A के तहत प्रतिदावा कर दिया जाए, तो उसे वादपत्र (प्लेन्ट) माना जाना चाहिए और एक पृथक वाद की तरह निपटाया जाना चाहिए। उनके अनुसार, पति के वैवाहिक वाद की खारिजी से पत्नी के प्रतिदावा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता; उसे अपने ही गुण-दोष पर निर्णयित किया जाना चाहिए था।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि प्रतिदावा करने के विभिन्न तरीके हो सकते हैं और केवल इस कारण से प्रतिदावा को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह किसी विशेष प्रारूप में नहीं किया गया या पृथक अर्ज़ी के रूप में दाखिल नहीं हुआ। उन्होंने न्यायालय का ध्यान लिखित बयान के पैरा 16 और राहत भाग के अंतिम पैरा की ओर दिलाया, जहाँ पत्नी ने प्रार्थना की थी कि पति को उसके माता-पिता द्वारा दिए गए सभी उपहार लौटाने का निर्देश दिया जाए।
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 23A पर भरोसा करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि तलाक, वैध अलगाव या सहवास पुनर्स्थापन की कार्यवाही में, प्रतिवादी अधिनियम के अंतर्गत किसी भी राहत के लिए प्रतिदावा कर सकता है। उन्होंने केरल उच्च न्यायालय के निर्णय Anil Kumar v. Sunil Kumar and Anr., 2023 SCC OnLine Ker 8218 पर यह कहने के लिए भरोसा किया कि प्रतिदावा के रूप और सामग्री में हुई किसी भी कमी को दूर किया जा सकता है (क्युरेबल डिफेक्ट)। उन्होंने परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984 (FC Act) की धारा 20 का भी हवाला दिया, यह प्रस्तुत करने के लिए कि FC Act के प्रावधान अन्य कानूनों पर प्रधानता रखते हैं और इसीलिए पत्नी द्वारा किया गया प्रतिदावा विचारित किया जाना चाहिए था।
दूसरी ओर, पति के पक्ष के अधिवक्ता ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि परिवार न्यायालय का आदेश विधि-सम्मत है और उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार, प्रतिदावा को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया जाना आवश्यक है, ताकि न्यायालय और विपक्षी पक्ष दोनों को यह स्पष्ट हो कि एक स्वतंत्र दावा किया जा रहा है।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Nitaben Dinesh Patel v. Dinesh Dahyabhai Patel, (2021) 20 SCC 210 पर भरोसा किया। उन्होंने आगे तर्क दिया कि संहिता के आदेश VIII नियम 6B के तहत प्रतिदावा को आदेश VII के अनुरूप वादपत्र के समान स्वरूप में होना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि उसमें वादपत्र में अपेक्षित सभी विवरण होने चाहिए, जैसे कारण-ए-दावा (कॉज़ ऑफ़ एक्शन) का विवरण, उत्पन्न होने की तिथि, अधिकार क्षेत्र (जुरिस्डिक्शन) के तथ्य, मूल्यांकन और माँगी गई राहतें इत्यादि।
उन्होंने केरल उच्च न्यायालय के ही निर्णय Anil Kumar v. Sunil Kumar and Anr. पर पुनः भरोसा किया, प्रतिदावा में उचित विवरणों की आवश्यकता पर बल देने के लिए। चूँकि पत्नी ने इस प्रकार का कोई विधिवत विस्तृत प्रतिदावा दाखिल नहीं किया था, इसलिए परिवार न्यायालय द्वारा विविध वाद को अविचारणीय मानना बिल्कुल सही था।
पति के वकील ने मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय Ramani Ammal v. Susilammal, AIR 1991 Madras 163 पर भी भरोसा किया। उस निर्णय में यह रेखांकित किया गया था कि परीक्षण न्यायालय को प्रतिवादी के प्रतिदावा को विशेष रूप से प्रतिदावा के रूप में दर्ज और ग्रहण करना चाहिए। केवल उसे साधारण दलील मान लेना और उसके आधार पर मुद्दे तय कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि परीक्षण न्यायालय किसी दलील को प्रतिदावा के रूप में ग्रहण ही नहीं करता, तो वहीं पर मामला समाप्त माना जाएगा।
इसके बाद पटना उच्च न्यायालय ने विधिक प्रावधानों की ओर रुख किया।
सबसे पहले, न्यायालय ने संहिता के आदेश VIII नियम 6A को उद्धृत किया, जो यह अनुमति देता है कि प्रतिवादी, अपने बचाव-पत्र दाखिल करने से पहले उत्पन्न किसी कारण-ए-दावा के संबंध में, वादी के विरुद्ध प्रतिदावा स्थापित कर सकता है। यह नियम यह भी कहता है कि ऐसा प्रतिदावा क्रॉस-सूट के समान प्रभाव रखता है और उसे वादपत्र माना जाएगा तथा वादपत्रों पर लागू नियमों से शासित होगा।
इसके बाद न्यायालय ने संहिता के आदेश VII नियम 1 को उद्धृत किया, जिसमें यह सूचीबद्ध है कि वादपत्र में कौन-कौन से विवरण होने चाहिए: न्यायालय का नाम, पक्षकारों के नाम और पते, कारण-ए-दावा उत्पन्न करने वाले तथ्य और उसके उत्पन्न होने की तिथि, अधिकार क्षेत्र दर्शाने वाले तथ्य, माँगी गई राहत, कोर्ट-फीस और अधिकार क्षेत्र हेतु मूल्यांकन आदि।
इन दोनों प्रावधानों को सम्मिलित रूप से पढ़ने पर न्यायालय ने माना कि प्रतिदावा में आदेश VII नियम 1 के तहत निर्धारित सभी विवरण होने चाहिए। दूसरे शब्दों में, वह एक पूर्णत: स्वायत्त दलील होनी चाहिए, जो स्वयं एक अलग वाद के रूप में टिक सके।
इसके बाद न्यायालय ने FC Act की जाँच की। धारा 7 परिवार न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र का वर्णन करती है, जिसमें पति-पत्नी के बीच, या उनमें से किसी के संबंध में संपत्ति से संबंधित वाद और कार्यवाहियाँ शामिल हैं। धारा 7 की व्याख्या (c) को प्रासंगिक माना गया, क्योंकि पत्नी ने विवाह के समय दिए गए उपहारों की वापसी की प्रार्थना की थी।
FC Act की धारा 20 इस अधिनियम को, जहाँ यह किसी अन्य क़ानून से असंगत हो, प्रधानता प्रदान करती है। धारा 10 यह उपबंधित करती है कि, इस अधिनियम और नियमों के अधीन रहकर, परिवार न्यायालयों के समक्ष वादों और कार्यवाहियों में दीवानी प्रक्रिया संहिता के प्रावधान लागू होंगे, सिवाय दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय IX के अंतर्गत कार्यवाहियों के। यह परिवार न्यायालयों को सुलह कराने या तथ्यों की सच्चाई खोजने के लिए अपनी स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित करने की अनुमति भी देती है।
इसके बाद न्यायालय ने HMA की धारा 23A पर विचार किया, जो यह प्रावधान करती है कि तलाक, वैध अलगाव या सहवास की पुनर्स्थापना की कार्यवाही में, प्रतिवादी न केवल याचिकाकर्ता के दावे का प्रतिरोध कर सकता है, बल्कि व्यभिचार, क्रूरता या परित्याग के आधार पर अधिनियम के अंतर्गत किसी भी राहत के लिए प्रतिदावा भी कर सकता है। यदि ऐसे आधार सिद्ध हो जाएँ, तो न्यायालय प्रतिवादी को ऐसा कोई भी राहत दे सकता है जैसे कि उसने अलग से स्वतंत्र याचिका दायर की हो।
स्वीकृत तथ्यों की जाँच के बाद न्यायालय ने दो मुख्य बिंदु नोट किए:
(i) पति ने विवाह-विच्छेद के लिए याचिका दायर की थी। पत्नी ने उसकी आरोपों का खंडन करते हुए लिखित बयान दाखिल किया।
(ii) पत्नी ने दावा किया कि रु. 8,35,000/- मूल्य के उपहार पति को दिए गए थे और लिखित बयान के राहत भाग में उसने उनकी वापसी की प्रार्थना की।
न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि FC Act स्वयं प्रतिदावा दाखिल करने का कोई प्रावधान नहीं करता। HMA की धारा 23A प्रतिदावा के लिए अवश्य प्रावधान करती है, किंतु HMA प्रतिदावा के स्वरूप (फॉर्म) और उसमें समाहित किए जाने वाले विवरणों के संबंध में मौन है। चूँकि HMA और FC Act दोनों प्रतिदावा के प्रारूप के बारे में मौन हैं, इसलिए FC Act की धारा 10 की शरण लेनी पड़ती है, जो यह अनिवार्य करती है कि प्रक्रिया संहिता द्वारा संचालित होगी। अतः परिवार न्यायालय के समक्ष किसी भी प्रतिदावा को फिर भी आदेश VIII नियम 6A तथा आदेश VII नियम 1 की आवश्यकताओं को संतुष्ट करना होगा।
इसे पत्नी की दलीलों पर लागू करते हुए, न्यायालय ने माना कि उपहारों की वापसी के लिए उसका दावा निर्धारित प्रारूप में नहीं था। वह केवल लिखित बयान में की गई एक प्रार्थना-पंक्ति थी, कोई ऐसा संरचित प्रतिदावा नहीं था जिसमें सभी आवश्यक विवरण समाहित हों।
न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि प्रक्रियात्मक क़ानून को प्राय: न्याय की दासी (हैंडमेडन ऑफ जस्टिस) कहा जाता है और उसे न्याय के उद्देश्य को आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि केवल एक पक्ष को किसी भी क़ीमत पर न्याय दिलाने की धारणा के नाम पर प्रक्रिया की बलि नहीं दी जा सकती, विशेषकर तब जब इससे दूसरे पक्ष के साथ अन्याय हो सकता हो।
प्रतिदावा के लिए एक निश्चित प्रारूप पर ज़ोर देने से यह सुनिश्चित होता है कि वादी को उसके विरुद्ध किए गए दावे के बारे में स्पष्ट रूप से सूचित किया जाए और उसे उस प्रतिदावा के उत्तर में लिखित बयान दाखिल करने का अवसर दिया जाए। यदि लिखित बयान में की गई एक साधारण अभिव्यक्ति को ही प्रतिदावा मान लिया जाए, तो वादी को यह वैधानिक अधिकार नहीं मिल पाएगा, जो विधायिका की मंशा नहीं हो सकती थी।
इसके बाद न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण, किंतु अब तक अप्रसिद्ध, मुद्दे पर विचार किया: क्या उपहार-सामग्री की वापसी का दावा HMA या FC Act के तहत प्रतिदावा के रूप में किया जा सकता है?
न्यायालय ने नोट किया कि पति-पत्नी के बीच संपत्ति संबंधी विवादों का निपटारा FC Act के तहत किया जा सकता है, पर FC Act प्रतिदावा का प्रावधान नहीं करता। HMA के तहत धारा 23A प्रतिदावा का प्रावधान अवश्य करती है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने Nitaben Dinesh Patel (उपर्युक्त) में ऐसे प्रतिदावों के दायरे को सीमित कर दिया है।
Nitaben Dinesh Patel के पैरा 43 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 23A के अंतर्गत प्रतिदावा द्वारा केवल HMA के कुछ निश्चित उपबंधों के अंतर्गत ही राहतें माँगी या दी जा सकती हैं: धारा 9 (सहवास की पुनर्स्थापना), धारा 10 (वैध अलगाव), धाराएँ 11 और 12 (विवाह शून्यता एवं निरस्तीकरण), और धारा 13 (तलाक)। प्रतिवादी केवल इन्हीं धाराओं के अंतर्गत दी जाने वाली राहतों को ऐसे कार्यवाहियों में प्रतिदावा के माध्यम से माँग सकते हैं।
पटना उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि यह प्रामाणिकता स्पष्ट करती है कि HMA की धारा 23A के अंतर्गत प्रतिदावा का प्रयोग उपहार-सामग्री की वापसी के लिए नहीं किया जा सकता। जहाँ FC Act परिवार न्यायालयों को पति-पत्नी के बीच संपत्ति विवादों पर अधिकार-क्षेत्र देता है, वहीं यह प्रतिदावा के संबंध में मौन है। FC Act और HMA को साथ पढ़ते हुए, न्यायालय ने माना कि HMA के तहत प्रतिदावा केवल धाराएँ 9 से 13 के अंतर्गत दी जाने वाली राहतों तक ही सीमित है, न कि उपहारों की वापसी जैसे संपत्ति-संबंधी दावों तक।
अंततः, न्यायालय ने अपने निष्कर्षों को समेटा। HMA की धारा 23A द्वारा विशेष रूप से अनुमत (धाराओं 9–13 से संबंधित) प्रतिदावों को छोड़कर, HMA की कार्यवाही में कोई अन्य प्रतिदावा दायर नहीं किया जा सकता। और जब प्रतिदावा विधिसम्मत रूप से अनुमत भी हो, तब भी उसे आदेश VIII नियम 6A तथा आदेश VII नियम 1 संहिता का अनुपालन करते हुए दाखिल किया जाना आवश्यक है। केवल लिखित बयान में किया गया कोई साधारण कथन या प्रार्थना पर्याप्त नहीं है। दलील में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख होना चाहिए कि यह प्रतिदावा है और उसमें सभी आवश्यक विवरण निहित होने चाहिए।
इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि परिवार न्यायालय, बेगूसराय ने विविध वाद संख्या 12 of 2018 को खारिज करते हुए कोई त्रुटि या अधिकार-क्षेत्र का उल्लंघन नहीं किया। अतः उसने 29.06.2019 के आदेश की पुष्टि की और सिविल विविध संख्या 1131 of 2019 को निराधार पाते हुए खारिज कर दिया।
साथ ही, न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण द्वार खुला छोड़ दिया। उसने स्पष्ट किया कि पत्नी को विधि के अनुसार उपाय तलाशने और यदि वह चाहें तो सक्षम न्यायालय के समक्ष अपने अधिकारों का दावा करने की स्वतंत्रता है। सरल शब्दों में, वह अपने उपहारों और स्त्रीधन के दावे के लिए उपयुक्त मंच के समक्ष एक विधिवत, स्वतंत्र वाद दायर कर सकती है।
यह निर्णय क्यों महत्त्वपूर्ण है
यह निर्णय उन पति-पत्नी, विशेष रूप से महिलाओं, के लिए महत्वपूर्ण है जो परिवार न्यायालयों में वैवाहिक मुक़दमों के दौरान अपना स्त्रीधन या उपहारों का दावा करना चाहती हैं।
पहला, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि मात्र लिखित बयान के अंत में एक प्रार्थना जोड़ देने से कोई वैधानिक प्रतिदावा नहीं बन जाता। यदि कोई व्यक्ति अलग राहत चाहता है, विशेष रूप से संपत्ति या उपहारों के बारे में, तो उसे आवश्यक प्रारूप में विधिवत प्रतिदावा दाखिल करना होगा या सक्षम न्यायालय में स्वतंत्र वाद/कार्यवाही प्रारंभ करनी होगी।
दूसरा, निर्णय यह स्पष्ट करता है कि हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत प्रतिदावों का प्रयोग केवल कुछ वैवाहिक राहतों के लिए ही हो सकता है: सहवास की पुनर्स्थापना, वैध अलगाव, विवाह की शून्यता या निरस्तीकरण, और तलाक। स्त्रीधन या उपहारों की वापसी के दावे इस सूची में नहीं आते। इन दावों को अन्य प्रावधानों के तहत और उचित कार्यवाहियों में उठाया जाना होगा।
तीसरा, यह निर्णय रेखांकित करता है कि प्रक्रिया मात्र तकनीकी औपचारिकता नहीं है। प्रतिदावा का उचित प्रारूप दोनों पक्षों की रक्षा करता है: यह विपक्षी पक्ष को स्पष्ट सूचना देता है और उसे जवाब देने का अवसर प्रदान करता है। यह निष्पक्षता के लिए महत्वपूर्ण है।
बिहार तथा अन्य स्थानों के पक्षकारों के लिए यह निर्णय एक संकेत है कि यदि विवाह संबंधी वाद में संपत्ति या उपहारों से जुड़ा विवाद है, तो उन्हें यह मान लेने के बजाय कि लिखित बयान की एक साधारण पंक्ति को प्रतिदावा माना जाएगा, यह जानने के लिए विधिक सलाह लेनी चाहिए कि किस प्रकार का उचित वाद या कार्यवाही दायर की जाए।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या विवाह अधिनियम के अंतर्गत परिवार न्यायालय में लंबित वैवाहिक कार्यवाही में, लिखित बयान में उपहारों और स्त्रीधन की वापसी के लिए की गई प्रार्थना को वैध प्रतिदावा माना जा सकता है?
उत्तर: नहीं। प्रतिदावा को आदेश VIII नियम 6A, सहपठित आदेश VII नियम 1 CPC के तहत निर्धारित प्रारूप और विवरणों के साथ दाखिल किया जाना आवश्यक है, तथा व्यक्ति को स्पष्ट रूप से यह लिखना चाहिए कि वह प्रतिदावा उठा रहा है। मात्र लिखित बयान में की गई साधारण प्रार्थना पर्याप्त नहीं है। - प्रश्न: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23A के तहत प्रतिदावों का अनुमत दायरा क्या है?
उत्तर: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय Nitaben Dinesh Patel के अनुसार, धारा 23A के अंतर्गत प्रतिदावा केवल हिंदू विवाह अधिनियम की धाराओं 9, 10, 11, 12 और 13 के तहत दी जाने वाली राहतों (सहवास की पुनर्स्थापना, वैध अलगाव, विवाह की शून्यता/निरस्तीकरण और तलाक) के लिए ही किया जा सकता है, संपत्ति या उपहार-संबंधी राहतों के लिए नहीं। - प्रश्न: क्या परिवार न्यायालय ने विविध वाद संख्या 12 of 2018 को प्रवेश स्तर पर ही खारिज करते समय किसी अधिकार-क्षेत्रीय त्रुटि (ज्यूरिस्डिक्शनल एरर) का ارتकाप किया?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय को आदेश दिनांक 29.06.2019 में कोई दोष या अधिकार-क्षेत्र की त्रुटि नहीं मिली और उसने उस आदेश की पुष्टि की, साथ ही याचिकाकर्ता को पृथक रूप से सक्षम न्यायालय में जाने की स्वतंत्रता छोड़ी।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- Nitaben Dinesh Patel v. Dinesh Dahyabhai Patel, (2021) 20 SCC 210.
- Anil Kumar v. Sunil Kumar and Anr., 2023 SCC OnLine Ker 8218.
- Ramani Ammal v. Susilammal, AIR 1991 Madras 163.
मामले का विवरण
वाद संख्या: Civil Miscellaneous Jurisdiction No. 1131 of 2019
मामले का शीर्षक: Sima Devi @ Sima Kumari v. Manoranjan Singh
न्यायालय: High Court of Judicature at Patna
पीठ: Hon’ble Mr. Justice Arun Kumar Jha
निर्णय की तिथि: 03.04.2024
उद्धरण: 2024 (2) PLJR 552
अधिवक्ता:
याचिकाकर्ता (पत्नी) की ओर से: Mr. J. S. Arora, Senior Advocate; Mr. Manoj Kumar, Advocate
प्रतिवादी (पति) की ओर से: Mr. Om Prakash Maharaj, Advocate
मामले का स्वरूप: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन सिविल विविध याचिका, जिसमें विविध वाद संख्या 12 of 2018 में, जो वैवाहिक वाद संख्या 18 of 2011/11 of 2015 से उत्पन्न हुआ था, परिवार न्यायालय, बेगूसराय के प्रधान न्यायाधीश के आदेश को चुनौती दी गई थी।
अपहृत (चैलेंज्ड) आदेश: माननीय प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, बेगूसराय का दिनांक 29.06.2019 का आदेश, जिसके द्वारा विविध वाद संख्या 12 of 2018 को प्रवेश स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।
निर्णय से संबंधित आधिकारिक लिंक: Patna High Court Judgment – C.Misc. No. 1131 of 2019
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