मालिकाना हक़ के आधार पर निष्कासन डिक्री बरक़रार, न कि किरायेदारी के आधार पर — पटना उच्च न्यायालय, 2024

पटना उच्च न्यायालय ने मुज़फ़्फ़रपुर स्थित एक मकान के क़ब्ज़ाधारियों द्वारा दायर द्वितीय अपील को ख़ारिज कर दिया। क़ब्ज़ाधारियों ने स्वयं को किरायेदार नहीं बल्कि मालिक बताया और ज़मींदारन (मालकिन) के अधिकार को चुनौती दी थी। न्यायालय ने निचली अदालतों के उन फ़ैसलों को बरक़रार रखा, जिनमें मालकिन का शीर्षक (टाइटल) मान्य किया गया था और क़ब्ज़ाधारियों को अतिक्रमणकारी माना गया था। अब निष्कासन डिक्री की तामील की कार्यवाही आगे बढ़ेगी।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद ब्रह्मपुरा गाँव, थाना सदर, ज़िला मुज़फ़्फ़रपुर में स्थित एक मकान तथा उससे सटे 46 दशमलव भूमि से सम्बंधित है। इसमें सम्मिलित प्लॉट हैं: आर.एस. प्लॉट संख्या 143 (20 दशमलव), 142 (3 दशमलव), 147 (17 दशमलव) और 144 (6 दशमलव)।

वादिनी के अनुसार, एक शारदा देवी (प्रतिवादी संख्या 3) ने समय–समय पर पाँच पंजीकृत विक्रय विलेखों के माध्यम से कुल 46 दशमलव भूमि ख़रीदी: दो विलेख दिनांक 10.03.1980, दो विलेख दिनांक 01.10.1980 और एक विलेख दिनांक 24.02.1982। ये विलेख अभिलेखित किरायेदारों या उनके वैधानिक उत्तराधिकारियों द्वारा निष्पादित किए गए थे। ख़रीद के बाद शारदा देवी का नाम म्यूटेशन में दर्ज हो गया और उन्होंने राज्य को किराया अदा किया।

वादिनी का कहना था कि प्रतिवादी संख्या 1 और 2, जो ठेकेदार थे, ने शारदा देवी से मकान मासिक किरायेदार के रूप में लिया और खुली ज़मीन का उपयोग अपने काम के लिए किया। बाद में, शारदा देवी ने उक्त संपत्ति (राज्य के नाम दर्ज भूमि को छोड़कर) वादिनी को पंजीकृत विक्रय विलेख दिनांक 07.10.2003 के द्वारा 3,00,000 रुपये में बेच दी और प्रतिवादी संख्या 1 और 2 को वादिनी को किराया चुकाने को कहा।

वादिनी ने दावा किया कि उसे मकान की आवश्यकता अपने निवास और बच्चों की शिक्षा हेतु है। उसने प्रतिवादियों से मकान खाली करने को कहा और उनके इंकार करने पर विधिक नोटिस भेजा। प्रतिवादियों ने कथित रूप से उसके शीर्षक और मकान-मालिक–किरायेदार संबंध को ही नकार दिया। तब उसने शीर्षक वाद संख्या 424/2004 दायर किया।

वाद में वादिनी ने मांग की: (i) अनुसूची–I भूमि पर अपने अधिकार और शीर्षक की घोषणा; (ii) प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में 16.12.2005 को निष्पादित विक्रय विलेख संख्या 26560 को शून्य, ‘lis pendens’ से बाधित और अपने विरुद्ध अप्रभावी घोषित किया जाए; (iii) यह घोषणा कि प्रतिवादी संख्या 1 और 2 किरायेदार हैं; (iv) व्यक्तिगत आवश्यकता के आधार पर उनका निष्कासन; (v) 07.10.2003 से लेकर कब्ज़ा सुपुर्दगी तक क्षतिपूर्ति; तथा (vi) अन्य उपयुक्त राहतें।

प्रतिवादी संख्या 1 और 2 ने वाद का प्रतिवाद किया। उन्होंने स्वयं को किरायेदार मानने से इंकार किया और इसके विपरीत मालिकाना हक़ का दावा किया। उनका कथन था कि 1985 में उन्होंने हरदेव सिंह को, जो कथित रूप से कब्ज़े में था, एक समझौते के तहत भूमि के एवज़ में 15,000 रुपये दिए। उनका दावा था कि उन्होंने आठ दशमलव पर अपने ख़र्चे से पक्का मकान बनाया, शेष भूमि पर कॉन्ट्रैक्ट की सामग्री रखी, और बाद में 1991 में 4,95,000 रुपये और चुकाए। उनके अनुसार सौहार्दपूर्ण संबंधों के कारण उन्होंने कुछ समय तक विक्रय विलेख पर ज़ोर नहीं दिया, जब तक कि 16.12.2005 को हरदेव सिंह ने प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में पंजीकृत विलेख निष्पादित कर उसे पूर्ण मालिक न बना दिया।

उन्होंने शारदा देवी और वादिनी के शीर्षक पर आक्षेप लगाया, यह कहते हुए कि संपत्ति मूल रूप से एक समान पूर्वज की थी और पारिवारिक व्यवस्था के तहत संपूर्ण विवादित भूमि विशेष रूप से हरदेव सिंह को दे दी गई थी। बिहार राज्य, जो प्रतिवादी संख्या 5 था, ने इस बात पर वादिनी का पक्ष लिया कि आर.एस. प्लॉट संख्या 144 राज्य के नाम दर्ज है और 16.12.2005 को प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में हुआ विक्रय ‘lis pendens’ से बाधित है।

न्यायालय प्रथम (ट्रायल कोर्ट) ने वाद को आंशिक रूप से डिक्री किया। उसने किरायेदारी तथा व्यक्तिगत आवश्यकता के आधार को अस्वीकार कर दिया, परंतु वादिनी का आर.एस. प्लॉट संख्या 143, 147 और 142 पर शीर्षक घोषित किया और माना कि प्रतिवादी अनधिकृत क़ब्ज़ाधारी हैं जो निष्कासन के लिए उत्तरदायी हैं। यह माना गया कि प्लॉट 144 (6 दशमलव) पर वादिनी का कोई शीर्षक नहीं है और वह भूमि राज्य की है। प्रथम अपीलीय न्यायालय (शीर्षक अपील संख्या 67/2015) ने इस निर्णय की पुष्टि की। इसके बाद प्रतिवादी संख्या 1 और 2 ने पटना उच्च न्यायालय में द्वितीय अपील संख्या 140/2021 दायर की।

न्यायालय ने क्या जाँचा और क्या निर्णय दिया

द्वितीय अपील की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा द्वारा दीवानी प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 100 के अंतर्गत की गई। 03.03.2022 को न्यायालय ने चार महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न निर्धारित किए, जो निम्न बिंदुओं पर केंद्रित थे:

  • क्या बिहार भवन (पट्टा, किराया एवं निष्कासन) नियंत्रण अधिनियम, 1982 (BBC अधिनियम) के तहत वर्णित वाद की सुनवाई कर रही अदालत, आदेश VII नियम 7 दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत शीर्षक के आधार पर निष्कासन की डिक्री दे सकती है,
  • क्या निचली अदालतों ने बिना अभ्यावेदन (प्लीडिंग) के ही प्रतिवादियों को अतिक्रमणकारी मानकर ग़लत किया,
  • क्या वादिनी का शीर्षक केवल सर्वेक्षण और राजस्व अभिलेखों के आधार पर घोषित किया गया, तथा
  • क्या निष्कासन और शीर्षक की घोषणा दोनों को साथ लेकर दायर वाद विधिसंगत रूप से ग्राह्य था।

बहस के दौरान दोनों पक्षों ने स्वीकार किया कि प्रश्न (i) और (iv) BBC अधिनियम तथा आदेश VII नियम 7 CPC के अंतर्गत अधिकार–क्षेत्र के दायरे से जुड़े हुए हैं।

अपीलार्थियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि:

  • वाद BBC अधिनियम के अंतर्गत निष्कासन वाद था, जिसमें शीर्षक का निर्णय नहीं किया जा सकता;
  • जब दोनों अदालतों ने यह पाया कि मकान-मालिक–किरायेदार संबंध अस्तित्व में नहीं है, तो वे शीर्षक घोषित करने या आदेश VII नियम 7 CPC के अंतर्गत “वैकल्पिक राहत” के रूप में निष्कासन की डिक्री देने के अधिकारी नहीं थे; और
  • जब वादिनी का किरायेदारी संबंध वाला कथित मामला विफल हो गया, तो प्रतिवादियों को अतिक्रमणकारी घोषित कर उसे निष्कासन की डिक्री नहीं मिल सकती थी।

वादिनी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने इसका प्रतिवाद करते हुए कहा कि:

  • वाद एक नियमित शीर्षक वाद था, न कि केवल BBC अधिनियम के अंतर्गत निष्कासन वाद;
  • वादिनी ने शीर्षक की घोषणा की मांग की थी और ‘ad valorem’ न्यायालय शुल्क भी अदा किया था, अतः दीवानी न्यायालय का अधिकार–क्षेत्र BBC अधिनियम से सीमित नहीं था; तथा
  • जब प्रतिवादियों ने स्वयं किरायेदारी से इंकार करके मालिकाना हक़ का दावा कर दिया, तो वे BBC अधिनियम के संरक्षण से बाहर हो गए और न्यायालय आदेश VII नियम 7 CPC के तहत शीर्षक के आधार पर निष्कासन की डिक्री दे सकता है।

उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अवलोकन किया, जिनमें Tribhuwanshankar v. Amrutlal, LIC v. India Automobiles & Co., Dr. Ranbir Singh v. Asharfi Lal और Rajendra Tiwary v. Basudeo Prasad सम्मिलित हैं। इन निर्णयों में सामान्य विधि के अंतर्गत निष्कासन वाद और विशेष किराया–नियंत्रण क़ानूनों के अंतर्गत वादों के बीच अंतर किया गया है, परंतु यह भी स्वीकार किया गया है कि जहाँ कानून अनुमति देता है, वहाँ न्यायालय वैकल्पिक राहत दे सकता है और जब किरायेदार शीर्षक पर विवाद करे तो न्यायालय शीर्षक का औपचारिक नहीं, बल्कि प्रसंगवश परीक्षण कर सकता है।

पटना उच्च न्यायालय ने अपने ही पूर्व निर्णय Sukhdeoji v. Purushottam Sharma & Ors. का भी हवाला दिया, जिसमें यह मान्यता दी गई कि आदेश VII नियम 7 CPC के अंतर्गत किसी निष्कासन वाद में, यदि पक्षकार शीर्षक के मुद्दे पर मुक़दमे में शामिल हुए हों और किसी प्रकार की हानि न हो, तो किरायेदारी सिद्ध न होने पर भी सामान्य शीर्षक के आधार पर डिक्री दी जा सकती है।

इस मामले में न्यायालय ने यह पाया कि:

  • वादपत्र में स्पष्ट रूप से शीर्षक की घोषणा के साथ निष्कासन और अन्य राहतों की मांग की गई थी।
  • अधिकार और शीर्षक से सम्बंधित विशिष्ट मुद्दे तैयार किए गए और दोनों निचली अदालतों द्वारा उनका निर्णय किया गया।
  • वादिनी ने शीर्षक की घोषणा हेतु उचित न्यायालय शुल्क अदा किया था।

आदेश VII नियम 7 CPC, जिसका उद्धरण निर्णय में किया गया है, न्यायालयों को यह अनुमति देता है कि वे मामले के दायरे में आने वाली, न्यायोचित सामान्य या अन्य राहत दे सकते हैं, भले ही वह स्पष्ट रूप से नहीं मांगी गई हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब कोई बड़ा राहत मांगी गई हो पर वह पूर्ण रूप से सिद्ध न हो, तो उसमें निहित छोटी राहत प्रदान की जा सकती है, परंतु मांगी गई राहत से बड़ी राहत नहीं दी जा सकती।

इन सिद्धांतों के आधार पर उच्च न्यायालय ने माना कि यह वाद एक नियमित शीर्षक वाद था, जो BBC अधिनियम के सीमित अधिकार–क्षेत्र तक बँधा नहीं था। अतः निचली अदालतें शीर्षक का निर्णय करने और उसके आधार पर अनधिकृत क़ब्ज़ाधारियों का निष्कासन आदेशित करने के लिए सक्षम थीं। महत्वपूर्ण प्रश्न (i) और (iv) अपीलार्थियों के विरुद्ध निपटाए गए।

दूसरे प्रश्न पर — कि क्या अदालतों ने ग़लत रूप से “तीसरा मामला” अतिक्रमण का बना दिया — अपीलार्थियों ने तर्क दिया कि वादिनी ने केवल किरायेदारी की ही दलील की थी, अतः जब वह विफल हो गई, तो वाद ख़ारिज हो जाना चाहिए था। उच्च न्यायालय ने इसे अस्वीकार कर दिया।

भवगती प्रसाद v. श्री चंद्रमौल (AIR 1966 SC 735) पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने कहा कि यदि कोई मुद्दा, भले ही स्पष्ट शब्दों में न उठाया गया हो, परंतु तैयार मुद्दों द्वारा आवृत हो और दोनों पक्ष यह जानते हुए साक्ष्य प्रस्तुत करें कि विवाद क्या है, तो न्यायालय उसे तय कर सकता है। केवल तकनीकी अभ्यावेदन संबंधी आपत्तियाँ, जब कोई वास्तविक हानि नहीं हुई हो, तो न्यायोचित निर्णय में बाधा नहीं बन सकतीं।

यहाँ प्रतिवादियों के लिखित बयान में स्वयं कहा गया था कि:

  • वे बिल्कुल भी किरायेदार नहीं हैं,
  • उन्होंने स्वयं अपना पक्का मकान बनाया है और भूमि पर मालिकों की भाँति कब्ज़ा रखा है, तथा
  • उन्होंने 16.12.2005 के पंजीकृत विक्रय विलेख के द्वारा हरदेव सिंह से संपत्ति ख़रीदी है।

इन दावों के मद्देनज़र न्यायालय ने यह देखा कि प्रतिवादियों की संभाव्य विधिक स्थिति केवल तीन हो सकती थी: मालिक/मकान-मालिक, लाइसेंसी या अतिक्रमणकारी। मुक़दमे के बाद निचली अदालतों ने यह पाया कि:

  • मकान-मालिक–किरायेदार संबंध सिद्ध नहीं हुआ;
  • हरदेव सिंह द्वारा प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में निष्पादित 16.12.2005 का विक्रय विलेख शून्य है और ‘lis pendens’ से बाधित है, क्योंकि यह वाद लंबित रहते हुए निष्पादित किया गया, जब अभिलेखों पर शारदा देवी का शीर्षक विद्यमान था; तथा
  • प्रतिवादी संख्या 1 और 2 का कोई अधिकार, शीर्षक या हित नहीं है और वे अनधिकृत क़ब्ज़े में हैं।

एक बार ये निष्कर्ष निकल आने पर, प्रतिवादियों को अतिक्रमणकारी कहना और उनका निष्कासन आदेशित करना विधि के सामान्य परिणाम के रूप में अनिवार्य हो गया। चूँकि वादिनी ने स्पष्ट रूप से प्रतिवादियों को परिसरों से निष्कासित करने की प्रार्थना की थी, न्यायालय ने माना कि कोई नया मामला गढ़ा नहीं गया और प्रतिवादियों को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुँची। महत्वपूर्ण प्रश्न (ii) भी अपीलार्थियों के विरुद्ध तय किया गया।

तीसरे प्रश्न पर, अपीलार्थियों का कहना था कि वादिनी का शीर्षक केवल पुनरीक्षण सर्वे ‘खतियान’ और राजस्व अभिलेखों के आधार पर घोषित किया गया, जो शीर्षक के दस्तावेज़ नहीं होते। उच्च न्यायालय ने क़ानूनी सिद्धांत को तो स्वीकार किया लेकिन पाया कि अपीलार्थियों की तथ्यगत बुनियाद ग़लत थी।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के उस विधि–नियम को दोहराया कि राजस्व अभिलेख और म्यूटेशन प्रविष्टियाँ:

  • स्वयं में न तो शीर्षक का सृजन करती हैं और न ही उसे समाप्त,
  • केवल कब्ज़े के संबंध में एक प्रत्युत्तर योग्य अनुमान उत्पन्न करती हैं, और
  • मुख्यतः राजकोषीय उद्देश्यों के लिए तैयार की जाती हैं।

परंतु, निचली अदालतों के निर्णयों की समीक्षा करते हुए उच्च न्यायालय ने माना कि वादिनी का शीर्षक केवल सर्वेक्षण या राजस्व अभिलेखों के आधार पर स्वीकार नहीं किया गया था। इसके विपरीत, दोनों अदालतों ने भरोसा किया:

  • शारदा देवी के पक्ष में दर्ज पंजीकृत विक्रय विलेखों की श्रृंखला पर (10.03.1980, 01.10.1980 और 24.02.1982), जो अभिलेखित किरायेदारों या उनके उत्तराधिकारियों द्वारा निष्पादित थे; और
  • 07.10.2003 दिनांकित पंजीकृत विक्रय विलेख पर, जिसके द्वारा शारदा देवी से वादिनी को हस्तांतरण किया गया।

इन विलेखों को प्रतिवादियों ने कभी उपयुक्त कार्यवाही में चुनौती नहीं दी। अपीलीय न्यायालय ने इन दस्तावेज़ों (प्रदर्श 1/ए से 1/ई आदि) की विस्तार से जाँच कर यह पुष्ट किया कि वादिनी के पास आर.एस. खाता संख्या 32, प्लॉट 143 (20 दशमलव), आर.एस. खाता संख्या 29, प्लॉट 147 (17 दशमलव) और आर.एस. खाता संख्या 90, प्लॉट 142 (3 दशमलव) पर वैध अधिकार, शीर्षक और हित हैं। केवल आर.एस. खाता संख्या 102, प्लॉट 144 (6 दशमलव) को बिहार राज्य की संपत्ति माना गया।

उच्च न्यायालय ने लंबित वाद के दौरान ख़रीदारों (purchasers pendente lite) से सम्बंधित न्यायिक दृष्टांतों, विशेष रूप से K.N. Aswathnarayan Setty v. State of Karnataka और Md. Noorul Hoda v. Bibi Raifunnisa पर भी विचार किया, जिनमें यह ज़ोर दिया गया है कि वाद लंबित रहते हुए ख़रीदार सफल वादी की डिक्री को विफल नहीं कर सकते और जो भी व्यक्ति किसी ऐसे विलेख को, जो उस पर बाध्यकारी है, निष्प्रभावी कराना चाहता है, उसे उसके निरस्तीकरण की माँग करनी होती है। प्रतिवादियों ने न तो वादिनी और न ही शारदा देवी के विक्रय विलेखों के निरस्तीकरण की मांग की।

इन परिस्थितियों में न्यायालय ने माना कि वादिनी का शीर्षक पंजीकृत विक्रय विलेखों पर आधारित था, न कि केवल सर्वेक्षण प्रविष्टियों पर, और महत्वपूर्ण प्रश्न (iii) भी अपीलार्थियों के विरुद्ध निपटाया गया।

अंततः, न्यायालय ने द्वितीय अपील को ख़ारिज कर दिया, प्रथम अपीलीय न्यायालय के निर्णय और डिक्री की पुष्टि की तथा निष्पादन वाद संख्या 01/2015 में आगे की कार्यवाही पर लगाया गया अपना पूर्ववर्ती अंतरिम आदेश दिनांक 29.03.2022 समाप्त कर दिया। प्रत्येक पक्ष को अपने–अपने व्यय स्वयं वहन करने के लिए छोड़ दिया गया और अधीनस्थ न्यायालय के अभिलेख वापस भेजने का निर्देश दिया गया।

यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है

यह निर्णय उन संपत्ति विवादों के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ भूमि पर क़ब्ज़ा किए हुए लोग बाद के क्रेताओं या अपंजीकृत पारिवारिक व्यवस्थाओं का सहारा लेकर पहले से दर्ज पंजीकृत विलेखों को निष्प्रभावी करने की कोशिश करते हैं।

पहला, पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जब किसी नागरिक वाद में शीर्षक की घोषणा और निष्कासन की प्रार्थना के साथ उचित न्यायालय शुल्क देकर वाद दायर किया जाता है, तो वह बिहार भवन (पट्टा, किराया एवं निष्कासन) नियंत्रण अधिनियम, 1982 के सीमित अधिकार–क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। दीवानी न्यायालय शीर्षक के प्रश्न पर पूर्ण रूप से विचार कर सकता है और यदि मूल किरायेदारी संबंध का दावा असफल भी हो जाए, तो भी मालिकाना हक़ के आधार पर निष्कासन का आदेश दे सकता है।

दूसरा, यह निर्णय दिखाता है कि यदि कोई क़ब्ज़ाधारी ज़मींदारन (मालकिन) के शीर्षक का ही इंकार कर दे और स्वयं को मालिक बताने लगे, तो वह किराया–नियंत्रण क़ानून के संरक्षण को खोने का जोखिम उठाता है। यदि वह अपने शीर्षक को सिद्ध नहीं कर पाता, तो उसे अतिक्रमणकारी माना जा सकता है और मकान खाली करने का आदेश दिया जा सकता है।

तीसरा, न्यायालय ने पुनः पुष्ट किया है कि सर्वे ‘खतियान’ और म्यूटेशन प्रविष्टियाँ मात्र से शीर्षक सिद्ध नहीं होता। पंजीकृत विक्रय विलेख और निरंतर कब्ज़ा कहीं अधिक महत्त्व रखते हैं। वाद लंबित रहने के दौरान किए गए ख़रीद–फ़रोख़्त (pendente lite) पूर्व–विलेखधारी और न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने वाले व्यक्ति के अधिकारों को परास्त नहीं कर सकती।

बिहार में संपत्ति ख़रीदने या उस पर क़ब्ज़ा रखने वाले सामान्य लोगों के लिए संदेश स्पष्ट है: विधिपूर्ण पंजीकृत दस्तावेज़ों पर भरोसा करें, यह समझें कि चल रहे मुक़दमे के दौरान किए गए बाद के “समझौते” जोखिम भरे होते हैं, और यह जानें कि दीवानी न्यायालय, किरायेदारी पर विवाद होने की स्थिति में भी, मालिकाना हक़ के आधार पर निष्कासन की डिक्री दे सकता है।

क़ानूनी प्रश्न और उनके उत्तर

  • प्रश्न: क्या दीवानी न्यायालय, जो किसी वाद को बिहार भवन (पट्टा, किराया एवं निष्कासन) नियंत्रण अधिनियम, 1982 के अंतर्गत वर्णित मानकर सुन रहा हो, आदेश VII नियम 7 CPC के तहत, किरायेदारी सिद्ध न होने पर भी शीर्षक के आधार पर निष्कासन की डिक्री दे सकता है?
    उत्तर: हाँ। जहाँ वाद एक नियमित शीर्षक वाद हो, जिसमें शीर्षक की घोषणा और निष्कासन की प्रार्थना के साथ उचित न्यायालय शुल्क अदा किया गया हो, वहाँ न्यायालय शीर्षक का निर्णय कर सकता है और आदेश VII नियम 7 CPC के तहत न्यायसंगत वैकल्पिक राहत के रूप में निष्कासन का आदेश दे सकता है, भले ही मकान-मालिक–किरायेदार संबंध स्थापित न हो।
  • प्रश्न: क्या निचली अदालतों ने, विशिष्ट अभ्यावेदन के अभाव के बावजूद, प्रतिवादियों को अतिक्रमणकारी मानकर किसी नए मामले को ग़ैरक़ानूनी रूप से गढ़ लिया?
    उत्तर: नहीं। प्रतिवादियों ने स्वयं किरायेदारी से इंकार कर मालिकाना हक़ का दावा किया था। शीर्षक पर मुद्दे तैयार किए गए, साक्ष्य प्रस्तुत किए गए और जब वादिनी का शीर्षक स्वीकार हो गया तथा प्रतिवादी संख्या 1 के पक्ष में विक्रय विलेख शून्य घोषित कर दिया गया, तो प्रतिवादियों की अतिक्रमणकारी स्थिति विधिक रूप से स्वतः उत्पन्न हुई। किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई।
  • प्रश्न: क्या वादिनी का शीर्षक केवल पुनरीक्षण सर्वे प्रविष्टियों और राजस्व अभिलेखों के आधार पर ही ग़लत रूप से घोषित किया गया?
    उत्तर: नहीं। दोनों निचली अदालतों ने अपने निष्कर्ष वादिनी और उसकी विक्रेता के पक्ष में पंजीकृत विक्रय विलेखों की श्रृंखला पर आधारित किए। सर्वे और म्यूटेशन अभिलेखों को केवल सहायक सामग्री के रूप में देखा गया, न कि शीर्षक के दस्तावेज़ के रूप में।

न्यायालय द्वारा उद्धृत निर्णय

  • Tribhuwanshankar v. Amrutlal, (2014) 2 SCC 788
  • LIC v. India Automobiles & Co., (1990) 4 SCC 286
  • Dr. Ranbir Singh v. Asharfi Lal, (1995) 6 SCC 580
  • Rajendra Tiwary v. Basudeo Prasad, (2002) 1 SCC 90
  • Sukhdeoji v. Purushottam Sharma & Ors., (2014) 1 PLJR 332
  • Bhagwati Prasad v. Sri Chandramaul, AIR 1966 SC 735
  • K.N. Aswathnarayan Setty (Dead) through LRs & Ors. v. State of Karnataka & Ors., AIR 2014 SC 279
  • Md. Noorul Hoda v. Bibi Raifunnisa & Ors., (1996) 7 SCC 767
  • Union of India v. Vasavi Coop. Housing Society Ltd. & Ors., AIR 2014 SC 937 : (2014) 2 SCC 269
  • Guru Amarjit Singh v. Rattan Chand & Ors., (1993) 4 SCC 349
  • State of Himachal Pradesh v. Keshav Ram & Ors., (1996) 11 SCC 257
  • Sawarni v. Inder Kaur & Ors., (1996) 6 SCC 223
  • Balwant Singh & Ors. v. Daulat Singh (Dead) by LRs & Ors., (1997) 7 SCC 137
  • Jitendra Singh v. State of Madhya Pradesh & Ors., 2021 SCC OnLine SC 802

मामले का विवरण

मामला संख्या: द्वितीय अपील संख्या 140/2021

मामला शीर्षक: श्री मधुरेन्द्र कुमार सिंह एवं अन्य बनाम श्रीमती आशा देवी एवं अन्य

सिटेशन: 2024 (2) PLJR 506

न्यायालय: पटना उच्च न्यायालय

पीठ / माननीय न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति सुनील दत्ता मिश्रा

निर्णय की तिथि: 15.04.2024

अधिवक्ता:

  • अपीलार्थी (प्रथम पक्ष प्रतिवादी) की ओर से: श्री सुनील कुमार वर्मा, अधिवक्ता; श्री सुमन कुमार वर्मा, अधिवक्ता; श्री अनीश कुमार, अधिवक्ता; श्री अमरेश कुमार मिश्रा, अधिवक्ता
  • प्रतिवादीगण (वादिनी सहित) की ओर से: श्री राजेन्द्र नारायण, वरिष्ठ अधिवक्ता; श्री सुनील कुमार पांडेय, अधिवक्ता

मामले का स्वरूप: धारा 100 CPC के अंतर्गत द्वितीय अपील, जो एक शीर्षक वाद से उत्पन्न हुई, जिसमें अचल संपत्ति पर अधिकार, शीर्षक और हित की घोषणा, पश्चातवर्ती विक्रय विलेख को शून्य और ‘lis pendens’ से बाधित घोषित करने, तथा निष्कासन और सहायक राहतों की प्रार्थना की गई थी।

अंतिम परिणाम: द्वितीय अपील ख़ारिज; प्रथम अपीलीय न्यायालय की डिक्री, जिसमें वादिनी का आर.एस. प्लॉट संख्या 143, 147 और 142 पर शीर्षक स्वीकार किया गया और प्रतिवादी संख्या 1 और 2 को अतिक्रमणकारी मानकर उनके निष्कासन का आदेश दिया गया (आर.एस. प्लॉट संख्या 144, जो बिहार राज्य की संपत्ति है, को छोड़कर), बरक़रार; निष्पादन वाद संख्या 01/2015 पर लगाया गया स्थगन आदेश समाप्त।

Link to judgement; https://patnahighcourt.gov.in/viewjudgment/OSMxNDAjMjAyMSMxI04=-pfsAu3tXCH0=

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