मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वृद्ध माता‑पिता और उनके सबसे छोटे पुत्र तथा पुत्रवधू के बीच कंकड़बाग, पटना स्थित प्रीति रेस्ट हाउस नामक विश्राम गृह को लेकर उत्पन्न पारिवारिक विवाद से संबंधित है।
पिता, जो सेवानिवृत्त कर्मचारी और वरिष्ठ नागरिक हैं, उक्त विश्राम गृह के स्वामी और समन्वयक हैं। यह संपत्ति उन्हें बिहार राज्य आवास बोर्ड द्वारा 20.07.1992 की स्थायी लीज के माध्यम से आवंटित की गई थी। वे और उनकी पत्नी अपनी सेवा के दौरान आवंटित किराए के फ्लैट में रहते हैं, जबकि विश्राम गृह से होने वाली आय उनके आर्थिक सहारे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सबसे छोटे पुत्र का विवाह 14.06.2018 को दूसरी अपीलकर्ता से प्रेम विवाह के रूप में हुआ, जिसे प्रारंभ में माता‑पिता ने पसंद नहीं किया, लेकिन बाद में अनिच्छा से स्वीकार कर लिया। पिता के अनुसार, पुत्रवधू के व्यवहार से निरंतर उत्पीड़न होता रहा। उसके द्वारा कई आपराधिक शिकायतें भी दर्ज कराई गईं, जिनमें उसकी अपनी मां तथा ससुराल वालों के खिलाफ शिकायतें और महिलाओं को घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत एक मामला शामिल था।
पिता ने कहा कि उनके तीनों बच्चे अच्छी तरह से स्थापित हैं। बड़ा पुत्र माता‑पिता के साथ रहता है और उनकी देखभाल करता है। दूसरा पुत्र बेंगलुरु में कार्यरत है। सबसे छोटा पुत्र (प्रथम अपीलकर्ता) शुरुआत में अपने ससुराल के घर में रह रहा था। माता‑पिता चाहते थे कि वह वहां न रहे और उन्होंने यह तक प्रस्ताव किया कि वे उसके और उसकी पत्नी के लिए किराए का आवास उपलब्ध करा देंगे, जबकि दोनों ही कमाने वाले हैं।
पुत्र के अनुरोध पर, उसे कुछ समय के लिए, जब तक कि वह अलग आवास की व्यवस्था न कर ले, विश्राम गृह के एक कमरे में अकेले रहने की अनुमति दी गई। इसके बजाय, वह अपनी पत्नी और बच्चे को वहां ले आया और पिता के अनुसार ताले तोड़कर दो और कमरे पर कब्जा कर लिया। माता‑पिता का आरोप था कि दंपति ने इमारत में जनता और अन्य किरायेदारों के लिए उपद्रव उत्पन्न किया।
इन आधारों पर पिता ने रखरखाव और माता‑पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत न्यायाधिकरण से अपने पुत्र और पुत्रवधू को विश्राम गृह के तीन कमरों से बेदखल करने की मांग की।
न्यायाधिकरण ने निष्कासन का आदेश पारित किया। इसके विरुद्ध पुत्र और पुत्रवधू ने पटना उच्च न्यायालय के समक्ष अनुच्छेद 226 के तहत एकल न्यायाधीश के समक्ष रिट याचिका दायर की। एकल न्यायाधीश ने रिट याचिका खारिज करते हुए निष्कासन आदेश को बरकरार रखा और यह माना कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को उनके जीवन और संपत्ति की त्वरित और सस्ती सुरक्षा प्रदान करना है तथा अधिनियम में निष्कासन की शक्ति निहित रूप से पढ़ी जा सकती है।
इसके विरुद्ध पुत्र और पुत्रवधू ने पटना उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष वर्तमान लैटर्स पेटेंट अपील (एलपीए संख्या 907 वर्ष 2023) दायर की।
न्यायालय ने क्या विचार किया और क्या निर्णय दिया
माननीय मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली खंडपीठ ने यह कहते हुए विचार आरंभ किया कि कानून और नैतिकता, दोनों ही मानव आचरण को आकार देते हैं। माता‑पिता देखभाल के हकदार हैं, परंतु संपत्ति अधिकारों के संबंध में निर्णय लेते समय न्यायालयों को वैधानिक शक्तियों के भीतर ही कड़ाई से कार्य करना होता है।
मुख्य प्रश्न यह था कि क्या वरिष्ठ नागरिक अधिनियम और बिहार रखरखाव एवं माता‑पिता तथा वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण नियम, 2012 के तहत, जब न तो भरण‑पोषण का कोई दावा हो और न ही अधिनियम की धारा 23(1) के तहत किसी संपत्ति के हस्तांतरण को चुनौती दी गई हो, तब न्यायाधिकरण के पास अपीलकर्ताओं को विश्राम गृह से बेदखल करने की शक्ति थी या नहीं।
अपीलकर्ताओं की दलीलें थीं कि:
• वरिष्ठ नागरिक अधिनियम न्यायाधिकरण को निष्कासन की कोई स्पष्ट शक्ति प्रदान नहीं करता और बिहार के 2012 के नियमों में भी ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
• दिल्ली उच्च न्यायालय के जिन अनेक निर्णयों में निष्कासन को बरकरार रखा गया, वे धारा 32 के तहत बनाए गए दिल्ली‑विशिष्ट नियमों पर आधारित थे, जो स्पष्ट रूप से निष्कासन का प्रावधान करते हैं। बिहार में ऐसे नियम नहीं हैं।
• पिता ने स्वयं न्यायाधिकरण के समक्ष कहा था कि वे पुत्र से भरण‑पोषण नहीं मांगते और वे अधिनियम की धारा 5 के तहत भरण‑पोषण का दावा नहीं कर रहे हैं।
• पिता द्वारा पुत्र को किसी शर्त के साथ कोई संपत्ति हस्तांतरित नहीं की गई थी, इसलिए धारा 23(1) लागू नहीं होती। न ही किसी ऐसी संपदा का हस्तांतरण हुआ था जिससे पिता को भरण‑पोषण का अधिकार प्राप्त हो, इसलिए धारा 23(2) का उपयोग निष्कासन को उचित ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता।
• पुत्र मूलतः विश्राम गृह में अनुमत कब्जाधारी (permissive occupant) था और उसका दावा है कि संपत्ति संयुक्त हिंदू परिवार की निधि से खरीदी गई थी, जिसके लिए उसने पहले से ही बंटवारा वाद दायर कर रखा है। इससे, उसके अनुसार, वह सह‑स्वामी बनता है जिसे निवास का अधिकार है। उस दीवानी वाद के गुण‑दोषों का पूर्वनिर्णय वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत सारांश कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।
पिता ने, राज्य के अधिवक्ता के समर्थन से, यह कहा कि:
• वह और उनकी पत्नी, दोनों वरिष्ठ नागरिक हैं, जिन्हें पुत्र और पुत्रवधू द्वारा प्रताड़ित किया गया तथा वे परिवारजनों के विरुद्ध अनेक आपराधिक मामले भी दायर कर रहे थे।
• उन्हें केवल 4089/- रुपये प्रतिमाह की अल्प पेंशन मिलती है और वे जीविका के लिए विश्राम गृह से मिलने वाले किराए पर निर्भर हैं। पुत्र और पुत्रवधू बिना किराया दिए तीन कमरे घेर कर बैठे हैं, जिससे वे उन्हें महत्वपूर्ण आय से वंचित कर रहे हैं।
• दोनों अपीलकर्ता कमाने वाले हैं — पुत्र नौकरी करता है और पुत्रवधू प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता हैं। वे अलग आवास वहन कर सकते हैं और पिता की स्वयं अर्जित संपत्ति में रहने का कोई अधिकार उन्हें नहीं है।
• भले ही कोई स्पष्ट निष्कासन शक्ति न हो, जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के अधिनियमगत उद्देश्य को प्रभावी बनाने के लिए धारा 22 और 32 के तहत न्यायाधिकरण के अधिकार‑क्षेत्र में ऐसी शक्ति को निहित माना जाना चाहिए।
खंडपीठ ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम और उसके विधायी ढांचे (scheme) का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया। न्यायालय ने उल्लेख किया कि अधिनियम का अध्याय II भरण‑पोषण से संबंधित है, जबकि अध्याय V जीवन और संपत्ति की सुरक्षा से संबंधित है। धारा 23 के दो पृथक भाग हैं:
• धारा 23(1) उस स्थिति को कवर करती है जहां कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति इस शर्त पर हस्तांतरित करता है कि प्राप्तकर्ता उसे बुनियादी सुविधाएं और शारीरिक आवश्यकताएं उपलब्ध कराएगा, परंतु वह ऐसा करने में विफल रहता है। ऐसी स्थिति में, वरिष्ठ नागरिक के विकल्प पर, न्यायाधिकरण उस हस्तांतरण को धोखाधड़ी, दबाव या अनुचित प्रभाव से किया गया घोषित कर शून्य कर सकता है।
• धारा 23(2) उस स्थिति से संबंधित है जहां किसी संपदा से वरिष्ठ नागरिक को भरण‑पोषण पाने का अधिकार हो। यदि ऐसी संपदा हस्तांतरित कर दी गई हो तो, यदि हस्तांतरण विनामूल्य (gratuitous) हो या ऐसे अधिकार की जानकारी के साथ किया गया हो, तो उस संपदा के प्राप्तकर्ता के विरुद्ध भरण‑पोषण का अधिकार प्रवर्तित किया जा सकता है। परंतु धारा 23(2) के तहत स्वयं हस्तांतरण को शून्य नहीं ठहराया जाता।
न्यायालय ने उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय S. Vanitha v. Deputy Commissioner, Bengaluru Urban District & Others, (2021) 15 SCC 730 पर विचार किया। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत न्यायाधिकरण को, यदि भरण‑पोषण और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक और समीचीन हो, तो निष्कासन का आदेश देने का अधिकार हो सकता है, परंतु ऐसा निष्कासन भरण‑पोषण और सुरक्षा के अधिकार के प्रवर्तन का एक “आनुषंगिक” (incident) उपाय है और इसमें प्रतिद्वंद्वी दावों, जिनमें घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अधिकार भी शामिल हैं, को ध्यान में रखना अनिवार्य है।
पटना उच्च न्यायालय ने बल देकर कहा कि S. Vanitha में यह टिप्पणी धारा 23(1) वाले मामले के संदर्भ में की गई थी, जहां वरिष्ठ नागरिक द्वारा किया गया हस्तांतरण शून्य घोषित किया जा सकता था और जहां कुछ राज्यों (जैसे दिल्ली) के नियम स्पष्ट रूप से निष्कासन का प्रावधान करते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि S. Vanitha में धारा 23(2) के तहत निष्कासन के उपाय का समर्थन नहीं किया गया है, जहां विधि केवल हस्तांतरित संपदा से भरण‑पोषण के अधिकार के प्रवर्तन की बात करती है, न कि हस्तांतरण रद्द करने या कब्जाधारी को हटाने की।
खंडपीठ ने दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा और पंजाब के अनेक उच्च न्यायालयी निर्णयों का परीक्षण किया, जिनमें वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत निष्कासन के आदेश पारित किए गए थे। उसने यह नोट किया कि इन में से कई निर्णय:
• धारा 32 के तहत बनाए गए राज्य‑विशिष्ट नियमों या “कार्य योजना” (Action Plans) पर आधारित थे, जो स्पष्ट रूप से निष्कासन की अनुमति देते हैं।
• मुख्यतः उन मामलों से संबंधित थे, जहां संतान या ससुराल वाले, वरिष्ठ नागरिकों के साथ उसी घर में रह रहे थे और उनके प्रति वास्तविक या आसन्न शारीरिक हिंसा व उत्पीड़न के आरोप थे।
खंडपीठ ने इनकी तुलना पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के निर्णय Simrat Randhawa v. State of Punjab and Others (CWP No. 4744 of 2018) से की, जिसमें कहा गया था कि:
• रखरखाव न्यायाधिकरण, निष्कासन न्यायाधिकरण नहीं है।
• निष्कासन केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है और स्पष्ट विधिक आधार के बिना इसे कार्यपालिका की कार्रवाई के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता।
• वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, साधारण निष्कासन (eviction simpliciter) का प्रावधान नहीं करता, सिवाय इसके कि धारा 23(1) के अंतर्गत किसी हस्तांतरण के शून्य होने की परिणति स्वरूप, सहायक राहत के रूप में ऐसा हो सके।
पटना उच्च न्यायालय ने इस तर्क का अनुमोदन किया और माना कि अधिनियम या बिहार 2012 के नियमों में जिन उपायों जैसे निष्कासन का उल्लेख नहीं है, उन्हें केवल अधिनियम की प्रस्तावना या उद्देश्यों और कारणों के विवरण का हवाला देकर जोड़ा नहीं जा सकता।
तथ्यों पर कानून लागू करते हुए, न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान दिया:
• पिता के न्यायाधिकरण के समक्ष दिए गए आवेदन में धारा 5 के तहत पुत्र से भरण‑पोषण का दावा नहीं किया गया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उन्हें उससे भरण‑पोषण की आवश्यकता नहीं है।
• यह आरोप नहीं था कि पिता ने पुत्र को देखभाल की शर्त पर कोई संपत्ति हस्तांतरित की है, अतः धारा 23(1) लागू ही नहीं होती।
• यह भी कोई मामला नहीं था कि जिस संपदा से पिता को भरण‑पोषण का अधिकार था, उसे हस्तांतरित कर दिया गया था, इसलिए धारा 23(2) वास्तव में प्रासंगिक नहीं थी।
• पिता ने स्वीकार किया था कि उन्होंने पुत्र को कुछ समय के लिए विश्राम गृह के एक कमरे में रहने की अनुमति दी थी। अब विवाद इस बात को लेकर था कि पुत्र और उसका परिवार उसी इमारत के तीन कमरों पर कब्जा बनाए हुए है।
न्यायालय ने यह भी ध्यान में रखा कि:
• माता‑पिता और पुत्र का परिवार अब एक ही इमारत में नहीं रहते। माता‑पिता किराए के फ्लैट में रहते हैं, जबकि अपीलकर्ता अलग से विश्राम गृह में रहते हैं।
• अपीलकर्ताओं द्वारा माता‑पिता के विरुद्ध वास्तविक एवं आसन्न शारीरिक हिंसा का कोई आरोप नहीं था, हालांकि उपद्रव और आपराधिक शिकायतों के आरोप अवश्य थे।
• विश्राम गृह में अन्य किरायेदार भी हैं और ऐसा कोई आरोप नहीं था कि पुत्र उनके किराए की वसूली कर रहा है या पिता को वह किराया प्राप्त करने से रोक रहा है।
खंडपीठ ने यहां तक कि एक अधिवक्ता आयुक्त के माध्यम से, पिता और पुत्र की बैठक करवा कर सुलह कराने का प्रयास किया। रिपोर्ट से पता चला कि कोई मेल‑मिलाप संभव नहीं हुआ। माता‑पिता पूर्व आचरण को लेकर कठोर रुख पर अड़े रहे और मध्यस्थता विफल रही।
इन परिस्थितियों में न्यायालय ने माना कि बिहार में लागू वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, इस मामले में न्यायाधिकरण को निष्कासन का आदेश देने का अधिकार नहीं देता। अधिकतम, जहां कमरों पर कब्जा वरिष्ठ नागरिक को किराए की आय से वंचित कर रहा हो, वहां अधिनियम के तहत उपलब्ध एकमात्र राहत यह हो सकती है कि उस संपत्ति से भरण‑पोषण के अधिकार का प्रवर्तन किया जाए, न कि निष्कासन का आदेश दिया जाए।
न्यायालय ने आगे यह स्पष्ट किया कि भले ही पुत्र लंबित वाद के आधार पर सह‑स्वामित्व का दावा करता हो, फिलहाल ऐसा कोई स्थगन आदेश (injunction) नहीं है जो पिता के विशिष्ट कब्जे (exclusive possession) पर रोक लगाता हो। अतः पुत्र केवल सह‑स्वामी होने या माता‑पिता‑संतान संबंध के आधार पर ही पिता की इमारत में रहने की जिद नहीं कर सकता। इसी प्रकार, पिता वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत निष्कासन प्राप्त नहीं कर सकते और यदि उन्हें पूर्ण कब्जा चाहिए तो उन्हें दीवानी न्यायालय का रुख करना होगा।
अतः खंडपीठ ने:
• न्यायाधिकरण द्वारा पारित निष्कासन आदेश और उसे सही ठहराने वाले एकल न्यायाधीश के निर्णय दोनों को निरस्त कर दिया।
• यह घोषित किया कि फिलहाल, अपीलकर्ताओं को विश्राम गृह के अन्य कमरों की आय पर कोई अधिकार नहीं है और न ही वे अन्य निवासियों को उत्पीड़ित या बाधित कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई उत्पीड़न होता है, तो जिला दंडाधिकारी, पटना या स्थानीय थाना प्रभारी को शिकायतों पर कार्रवाई करनी होगी।
• यह निर्देश दिया कि मामला जिला दंडाधिकारी, पटना को यह जांच करने के लिए वापस भेजा जाए कि अपीलकर्ताओं द्वारा कब्जे में लिए गए तीन कमरों का उचित किराया क्या होगा और अपीलकर्ताओं को यह निर्देश दिया जाए कि वे वह किराया नियमित रूप से पिता के खाते में जमा करें।
अंत में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पिता स्वतंत्र हैं कि वे दीवानी न्यायालय में निष्कासन वाद दायर कर सकते हैं। ऐसे किसी दीवानी वाद या घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाही को इस निर्णय में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना, स्वतंत्र रूप से तय किया जाएगा, क्योंकि यह निर्णय केवल वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के दायरे तक सीमित है।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण है
यह निर्णय बिहार में वरिष्ठ नागरिकों, वयस्क संतानों और उन अधिवक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक संपत्ति संबंधी विवादों से निपटते हैं।
पहला, यह स्पष्ट कर देता है कि बिहार में रखरखाव और माता‑पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत गठित न्यायाधिकरण को निष्कासन न्यायालय की तरह नहीं माना जा सकता, जब तक कि मामला धारा 23(1) के दायरे में स्पष्ट रूप से न आए और ऐसे कदम के समर्थन में उपयुक्त नियम न हों।
माता‑पिता केवल वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत आवेदन देकर स्वतः ही पुत्र, पुत्री या पुत्रवधू को संपत्ति से बेदखल नहीं करा सकते, विशेषकर तब जब कोई शर्त के साथ संपत्ति का हस्तांतरण न हुआ हो और न ही भरण‑पोषण का कोई दावा हो। निष्कासन के लिए उन्हें अभी भी दीवानी न्यायालय जाना पड़ सकता है।
दूसरा, यह निर्णय एक मध्य मार्ग दिखाता है। भले ही किसी मामले में अधिनियम के तहत निष्कासन की अनुमति न हो, न्यायाधिकरण वरिष्ठ नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा की रक्षा इस तरह कर सकता है कि यह सुनिश्चित हो कि उन्हें उस संपत्ति से उचित किराये की आय मिले जिसका उपयोग कोई अन्य व्यक्ति कर रहा है। यहां न्यायालय ने यह सुनिश्चित किया कि पिता को पुत्र और पुत्रवधू द्वारा कब्जे में लिए गए तीन कमरों का किराया प्राप्त हो।
तीसरा, न्यायालय ने यह सावधानी बरती कि बंटवारे के वाद और घरेलू हिंसा अधिनियम की कार्यवाहियों जैसे लंबित मामलों का पूर्वनिर्णय न हो। उसने याद दिलाया कि प्रत्येक विधिक मंच की अपनी भूमिका है और वरिष्ठ नागरिक अधिनियम को इतना नहीं फैलाया जा सकता कि वह संपत्ति कानून या अन्य विधियों के तहत महिलाओं के अधिकारों पर हावी हो जाए।
व्यावहारिक दृष्टि से, यह निर्णय बिहार की परिवारों और अधिवक्ताओं को मार्गदर्शन देता है: यदि माता‑पिता स्वयं अर्जित संपत्ति से निष्कासन चाहते हैं जहां कोई शर्तबद्ध हस्तांतरण नहीं किया गया है, तो सामान्यतः उन्हें दीवानी वाद दायर करना चाहिए; वरिष्ठ नागरिक अधिनियम मुख्य रूप से भरण‑पोषण के लिए है और सीमित हस्तांतरण‑सम्बंधी मामलों में ऐसे हस्तांतरणों को रद्द करने के लिए।
कानूनी प्रश्न और उनके उत्तर
- प्रश्न: क्या बिहार में वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के तहत गठित रखरखाव न्यायाधिकरण के पास यह शक्ति है कि वह धारा 23(1) के अंतर्गत कोई हस्तांतरण न होने और भरण‑पोषण के दावे के अभाव में, किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति से पुत्र और पुत्रवधू को बेदखल कर सके?
उत्तर: नहीं। पटना उच्च न्यायालय ने माना कि अधिनियम और बिहार 2012 के नियमों के तहत, ऐसी परिस्थितियों में न्यायाधिकरण निष्कासन का आदेश नहीं दे सकता। निष्कासन, यदि कभी हो भी, तो केवल धारा 23(1) के तहत किसी हस्तांतरण को शून्य घोषित करने की परिणति के रूप में हो सकता है। अन्यथा, न्यायाधिकरण केवल संपत्ति से भरण‑पोषण के अधिकार को प्रवर्तित कर सकता है, जैसे कि उचित किराया अदा करने का निर्देश देकर। - प्रश्न: जहां पुत्र, अपने पिता के स्वामित्व वाले विश्राम गृह के किसी हिस्से पर कब्जा कर बैठा हो और इस प्रकार पिता को उन कमरों से किराए की आय से वंचित कर रहा हो, वहां कौन‑सी राहत दी जा सकती है?
उत्तर: न्यायालय ने माना कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत उचित राहत यह है कि इस स्थिति को उस संपत्ति से वरिष्ठ नागरिक के भरण‑पोषण को प्रभावित करने वाली माना जाए। जिला दंडाधिकारी, कब्जे में लिए गए कमरों का उचित किराया निर्धारित कर सकते हैं और पुत्र तथा पुत्रवधू को निर्देश दे सकते हैं कि वे वह किराया नियमित रूप से वरिष्ठ नागरिक को अदा करें, परंतु इस तथ्य स्थिति में अधिनियम के तहत उन्हें बेदखल नहीं किया जा सकता।
न्यायालय द्वारा उद्धृत मामले
- S. Vanitha v. Deputy Commissioner, Bengaluru Urban District & Others, (2021) 15 SCC 730.
- Sunny Paul v. State of NCT of Delhi, 2018 SCC Online Del 11640.
- Smt. Darshna v. Govt. of NCT of Delhi, W.P.(C) No. 6592 of 2018, judgment dated 18.07.2018 (Delhi High Court).
- Sandeep Gulati v. Divisional Commissioner & Others, 2020 SCC Online Del 2517.
- Aarshya Gulati v. Govt. of NCT of Delhi & Others, 2019 SCC Online Del 8801.
- Shadab Khairi & Another v. State & Others, 2018 SCC Online Del 7626.
- Saraswati Devi v. Ganga Ram Sharma & Another, 2023 SCC Online Del 2093.
- Namdeo and Another v. State of Maharashtra, W.P. No. 2035 of 2020 (Bombay High Court).
- Neeraj Shivkumar Maholay & Another v. State of Maharashtra, CRWP No. 5508 of 2018 and connected cases (Bombay High Court).
- Anil Kumar Dhiman & Another v. State of Haryana and Others, CRWP No. 1357 of 2019 (Punjab and Haryana High Court).
- Simrat Randhawa v. State of Punjab and Others, CWP No. 4744 of 2018 (Punjab and Haryana High Court).
मामले का विवरण
मामला संख्या: लैटर्स पेटेंट अपील संख्या 907 वर्ष 2023, सिविल रिट अधिकारिता केस संख्या 7851 वर्ष 2022 में
मामले का शीर्षक: Ravi Shankar & Another v. State of Bihar & Others
पीठ: माननीय मुख्य न्यायाधीश (K. Vinod Chandran, C.J.) और माननीय श्री न्यायमूर्ति Partha Sarthy
निर्णय की तिथि: 03.01.2024
उद्धरण: 2024(1) PLJR 502
पक्षकारों के अधिवक्ता:
- अपीलकर्ताओं की ओर से: Mr. Syed Alamdar Hussain, Advocate; Ms. Surya Nilambari, Advocate
- राज्य की ओर से: Mr. P.K. Verma, AAG-3; Mr. Sanjay Kumar Ghosarvey, AC to AAG-3
- प्रतिवादी संख्या 8 (पिता/वरिष्ठ नागरिक) की ओर से: Mr. Bindhyachal Singh, Senior Advocate; Ms. Smriti Singh, Advocate; Mr. Vipin Kr. Singh, Advocate
मामले का स्वरूप: रखरखाव और माता‑पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत न्यायाधिकरण द्वारा पारित निष्कासन आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका की खारिजी के विरुद्ध लैटर्स पेटेंट अपील।
निर्णय का लिंक: पूर्ण पटना उच्च न्यायालय का निर्णय पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
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